हमने बताया कि तकफ़ीरी वहाबी विचारधारा महिला के बारे में बड़ा अपमानजनक विचार रखती है और उसे प्रयोग का सामान समझती है।

हमने इसी संदर्भ में जेहाद निकाह के फ़तवे के बारे में चर्चा की थी जो इस्लाम के नियमों और सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। दाइश और अन्नुस्रह फ़्रंट जैसे आतंकी संगठन अपने मुफ़्तियों के फतवों की आड़ में महिलाओं के साथ शैतानी बर्ताव करते हैं और उन्हें अपने अधर्मी व ग़ैर इंसानी इच्छाओं की भेंट चढ़ाते हैं। जब हम दाइश तथा उसके जैसे विचार रखने वाले अन्य संगठनों की आपराधिक गतिविधियों के सबंध में पश्चिमी सरकारों की उदासीनता, मौन और कभी कभी सहयोग को देखते हैं तो इन आतंकी संगठनों के अस्तित्व में लाने के मुख्य लक्ष्यों का अनुमान होता है। इस पूरे खेल का लक्ष्य इस्लाम की छवि को ख़राब करना है। पश्चिमी सरकारें लंबे समय से इस प्रयास में हैं कि इस्लाम को रूढ़िवादी और हिंसक धर्म के रूप में प्रचारित करें। यह सरकारें दुनिया में होने वाली अधिकतर आतंकी घटनाओं को मुसलमानों से ज़रूर जोड़ देते हैं और मुसलमानों को आतंकवाद का पहला आरोपी मानती हैं।

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तकफ़ीरी विचारधारा की उत्पत्ति और इसका फैलाव पश्चिम के लिए अद्वितीय मौक़ा साबित हुआ जिसका फ़ायदा उठाकर पश्चिम ने इस्लाम को बदनाम किया और इस्लाम की बड़ी हिंसक तसवीर पेश की। आतंकी तत्व, अलग अलग बहानों से बेगुनाहों का ख़ून बहाते हैं, गला काटते समय अल्लाहो अकबर के नारे लगाते हैं और इसे ईश्वर के शत्रु की हत्या का नाम दे देते हैं। कभी कभी सिर कटी लाशों की तसवीरों के साथ क़ुरआन की कुछ आयते लिखकर उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर देते हैं। यह लोग अपने इन अपराधों और कलंकित आचरण को इस्लाम से जोड़ देते हैं। इसका नतीजा यह है कि पश्चिम के राजनैतिक साहित्य में इस्लाम को चरमपंथ और आतंकवाद का प्रयाय कहा जाने लगा है। हालिया दशकों में पश्चिमी सरकारों ने इस्लाम को बदनाम करने की जो शैली अपनाई है उस पर विचार करने से पता चलता है कि वह इस्लाम को अप्रिय और हिंसप्रेमी धर्म के रूप में पहचनवाना चाहती हैं। इसका एक उदाहरण दाइश के अपराधों पर आने वाली प्रतिक्रिया है। वह जब भी दाइश के बारे में बात करती हैं या कोई बयान जारी करती हैं तो उसके लिए इस्लामिक स्टेट का शब्द प्रयोग करती हैं ताकि इस धारणा को प्रबल करें कि दाइश ही इस्लाम तथा इस्लामी राजनैतिक व्यवस्था का असली प्रतिनिधि है। यह पश्चिम की इस्लामोफ़ोबिया की रणनीति का एक भाग है।

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पश्चिमी सरकारें और संचार माध्यम ऐसी स्थिति में इस्लाम पर यह हमले कर रहे और इसे रूढ़िवादी व हिंसा प्रेमी धर्म ज़ाहिर कर रहे हैं कि जब दुनिया में मुसलमान ही सबसे ज़्यादा आतंकवाद की भेंठ चढ़े हैं। मुस्लिम बाहुल्य देशों में फैले आतंकवाद की व्यापकता और घातकता पश्चिमी देशों की तुलना में कई गुना ज़्यादा है। दाइश जैसे तकफ़ीरी आतंकी संगठनों का पहला निशाना वह मुसलमान हैं जो इस्लाम के एकेश्वरवाद, न्यायप्रेम तथा शांति प्रेम जैसे सिद्धांतों से विरोधाभा रखने वाले दाइशी विचारों से अलग मत रखते हैं। दाइश तथा अन्य तकफ़ीरी आतंकियों ने सबसे बड़े अमानवीय अपराध मुस्लिम बाहुल देशों में ही कर रहे हैं। इस्लाम की छवि ख़राब करने के साथ ही तकफ़ीरी आतंकियों की नज़र और भी एक बड़े लक्ष्य पर केन्द्रित है। यह संगठन विभिन्न इस्लामी मतों के बीच विवाद की आग भड़का रहे हैं। उनक यह लक्ष्य अमरीका तथा यूरोप की विस्तारवादी सरकारों की नीतियों के उद्देश्यों से पूर्णतः समन्वित है। शीया और सुन्नी समुदायों के बीच मतभेद पैदा करना इन संगठनों का मूल लक्ष्य है। यह संगठन इस कोशिश में हैं कि ईरान को जहां शीयों की सबसे बड़ी आबादी बसती है अन्य मुसलमानों के मुक़ाबले पर खड़ा कर दें। अबू मुसअब ज़रक़ावी ईरानी शीयों के ख़तरे का हौवा खड़ा करते हुए कहता है कि शीया इस्लामी समुदाय से बाहर हो चुके हैं बल्कि उन्होंने अपना अलग धर्म गढ़ लिया है जिसका लक्ष्य ईरान के माध्यम से सुन्नी जगत पर क़ब्ज़ा करना और पूरे इस्लामी जगत की बागडोर अपने हाथ में लेना है। यह आतंकी तत्व प्रचार कर रहे हैं कि इराक़ भी इस्लाम के हाथ से निकल चुका है और शीयों के क़ब्ज़े में चला गया है। हालांकि इस्लामी गणतंत्र ईरान हमेशा मुस्लिम देशों की एकता व एकजुटता की बात करता है। आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में इस समय ईरान दुनिया का एक मज़बूत देश है जो भरपूर संकल्प के साथ आतंकवाद से लड़ रहा है। ईरान ने 17 हज़ार से अधिक शहीदों की क़ुरबानी पेश की है जो आतंकवाद का निशाना बने। वैसे इस्लामी जगत को बांटने की योजना के तहत पश्चिमी सरकारें क्षेत्र के वहाबी व तकफ़ीरी हल्क़ों की मदद से काम कर रही हैं। इस तरह कहा जा सकता है कि तकफ़ीरी वहाबी संगठन और पश्चिमी सरकारें एक दूसरे के पूरक के रूप में काम कर रही हैं।

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तकफ़ीरी आतंकी संगठनों की आपराधिक गतिविधियों और उनके परिणामों से पता चलता है कि तकफ़ीरी आतंकी संगठन हक़ीक़त में पश्चिमी सरकारों तथा उनके पदचिन्हों पर चलने वाली क्षेत्रीय सरकारों की नीतियों का परिणाम हैं। इन संगठनों को यह सरकारें इस्लामी जगत में जहां जहां शून्य की स्थिति है वहां स्थापित कर देना चाहती हैं। क्षेत्र से बाहर की शक्तियों की रणनीति यह है कि मुसलमानों को आपसी लड़ाइयों में इस तरह गुत्थम गुत्था कर दें कि वह सब कमज़ोर हों ताकि पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में पांव पसारने का पश्चिम को खुला मौक़ा मिल जाए। यह ताक़तें इस्लामी जगत को बांट देना चाहती हैं और क्षेत्र में अपनी पैठ बनाने की चेष्टा में हैं ताकि ज़ायोनी शासन सुरक्षित रहे। इसी उद्देश्य से विस्तारवादी सरकारें मुसलमानों के बीच बेबुनियाद विवाद पैदा करके तथा उनके भीतर एक दूसरे से भय व आतंक की स्थिति फैलाकर इस्लामी देशों को एक दूसरे से दूर रखना चाहती हैं। अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के एजेंट एडवर्ड स्नोडेन ने जो दस्तावेज़ जारी किए उनसे भी पता चलता है कि अमरीका, ज़ायोनी शासन और ब्रिटेन की मिलीभगत से दाइश संगठन अस्तित्व में आया है। अमरीका ने इस संगठन को बनाया तथा ज़ायोनी शासन और ब्रिटेन ने दुनिया भर से आतंकियों को इस संगठन में शामिल होने के लिए सीरिया की ओर पलायन करवाया। कैनेडा के अर्थ शास्त्री और भूमंडलीकरण अनुसंधान केन्द्र के संस्थापक प्रोफ़ेसर माइकल चाडोफ़िस्की ने अपने एक लेख इराक़ के विभाजन का सिनारियो में लिखते हैं कि दाइश पश्चिम के सैनिक एलायंस का एक साधन है। इस संगठन को अमरीका और पश्चिम के शत्रु के रूप में पेश किया जाता है जबकि दस्तावेज़ों और साक्ष्यों से पता चलता है कि इसका गठन अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए और इस्राईली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद ने किया। उनका मानना है कि दाइश के हाथों बेगुनाहों की हत्या इस्लामी देशों में अमरीका के हस्तक्षेप का बहाना है। अमरीका के लेखक डाक्टर कुईन पार्ट ने अपने एक लेख मे लिखा कि दाइश की ज़िम्मेदारी सांप्रदायिक झड़पों का दायरा विस्तृत करना, मध्यपूर्व को अस्थिर बनाना और पूरे क्षेत्र को अमरीका के हस्तक्षेप के लिए पूरी तरह तैयार करना है।

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इस बीच वहाबी विचारधारा ने तकफ़ीरी संगठन के लिए वैचारिक आधार का काम किया। वहाबी मुफ़्तियों ने कुफ़्र के फतवे देकर मुसलमानों के बीच टकराव का रास्ता तैयार कर दिया और आज भी वह इसी काम में लगे हुए हैं। वह अपने फ़तवों से सीधे साधे लोगों को जत्या और जनसंहार पर उकसाते हैं। दाइश जैसे तकफ़ीरी संगठन इन्हीं फ़तवों की मदद से अपने आतंकी कृत्यों का तर्क पेश कर देते हैं। वह क्षेत्र में अपनी समर्थक सरकारों की मदद से इस्लामी समुदाय के भीतर गृह युद्ध की आग फैलाने के प्रयास में हैं। जबकि क़ुरआन ने मुसलमानों को एकता की दावत दी है और मतभेदों से दूर रहने की बार बार नसीहत की है। ईश्वर क़ुरआन में मुसलमानों को एक दूसरे का भाई कहता है। क़ुरआन की आयत में ईश्वर कहता है कि निश्चित रूप से मुसलमान आपस में भाई हैं तो अपने भाइयों के बीच सुलह कराओ।  

 

Sep १७, २०१७ १०:५२ Asia/Kolkata
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