हमने तकफ़ीरी गुटों के अपराधों और अत्याचारों के परिणामों के बारे में बात की थी।

तकफ़ीरियों की गतिविधियों का एक परिणाम, शांति का संदेश देने वाले इस्लाम धर्म के चेहरे को बिगाड़ना है। पश्चिमी सरकारों के हितों के अनुरूप, तकफ़ीरी आतंकवादियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाकर, इस्लाम को बदनाम किया है। इससे पश्चिमी सरकारों को एक सुनहरा अवसर मिल गया और उन्होंने तकफ़ीरियों के अपराधों का हवाला देकर, इस्लाम के ख़िलाफ़ जमकर दुष्प्रचार किया।

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पश्चिमी अधिकारी और मीडिया जब दाइश के बारे में बात करते हैं या कोई बयान जारी करते हैं तो दाइश को इस्लामी स्टेट कहते हैं, ताकि लोगों को यह बताएं कि दाइश ही इस्लाम है या इस्लाम का आदर्श शासन है। यह पश्चिमी जगत के इस्लामोफ़ोबिया का ही एक भाग है। तकफ़ीरी विचारधारा के विश्लेषण के लिए सबसे अधिक ध्यान योग्य बिंदु यह है कि यह विचारधारा आयतों और हदीसों की ग़लत व्याख्या करती है, इस तरह से कि कठोर और रूढ़ीवादी सोच को इस्लाम से जोड़ती है। संभव है कि दाइश और अन्य तकफ़ीरी गुटों के निचली सतह के सदस्य यह सोचते हों कि हम धर्म की सेवा कर रहे हैं। इस तरह के लोग धर्म की ग़लत व्याख्या करते हैं और उसे ही सही समझते हैं।

दाइश समेत तकफ़ीरी आतंकवादी गुटों के सदस्यों की आपराधिक प्रष्ठभूमि होती है, वे आपराधिक प्रवृत्ति और, हत्याओं और हिंसा में रूची रखने के कारण ही इन गुटों से जुड़ते हैं। उनमें से कुछ लोग पैसे और जेहादुन्निकाह के तहत अय्याशी के लिए इन गुटों में शामिल होते हैं। इन तकफ़ीरी आतंकवादी गुटों के नेता और उच्च अधिकारी बड़ी शक्तियों की जासूसी एजेंसियों से जुड़े होते हैं और इन शक्तियों के हितों के लिए काम करते हैं। उनकी रणनीति और गतिविधियां पश्चिमी शक्तियों और कुछ क्षेत्रीय देशों के राजनीतिक और सामरिक हितों के अनुसार होती हैं।

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दाइश के कुछ सरग़ना इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम के कमांडर और ख़ुफ़िया अधिकारी रह चुके हैं और उन्हें किसी भी धर्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। रक्तपात, जनसंहार, नृशंस हत्याएं, जेहादे निकाह, महिलाओं और लड़कियों का रेप, उन्हें सेक्सवर्कर के रूप में इस्तेमाल करना और लूटपाट जैसे इन गुटों के अपराधों का इस्लाम और इस्लाम की शिक्षाओं से कोई लेना देना नहीं है। इन गुटों को धर्म की कोई परवाह नहीं होती है। हालांकि दिखावटी तौर पर वे इस तरह के दावे करते हैं और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं।

तकफ़ीरी आतंकवादी गुट युवाओं को धोखा देने और उन्हें अपने जाल में फंसाने के लिए धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। यद्यपि उनकी असली पहचान आतंकवाद, हिंसा और क्रूरता ही होती है। बहरहाल इन गुटों के कृत्यों और अपराधों के कारण, विश्व में इस्लाम धर्म की तस्वीर ख़राब हो रही है।

तकफ़ीरी चरमपंथी गुटों द्वारा इस्लामी शिक्षाओं की ग़लत व्याख्या के विपरीत, इस्लाम एक प्राकृतिक एवं जीवन को सरल बनाने वाला धर्म है। अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया है कि धर्म में आसानी है। इसका अर्थ है कि ईश्वर ने इंसान स्वभाव और प्रकृति के सिद्धांतों के अनुसार धार्मिक नियम बनाए हैं। ईश्वर ने ऐसे नियम नहीं बनाए जिनसे उसके बंदों को समस्याओं का सामना करना पड़े या वह उनके लिए कठिन हों। इसीलिए इस्लामी नियम और शिक्षाएं कठोर, असहनीय और अप्राकृतिक नहीं हैं।

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क़ुरान के सूरए हज की 78वीं आयत में ईश्वर इस संदर्भ में कहता है कि धर्म में तुम्हारे लिए कठिनाई नहीं रखी गई है। लेकिन जो धर्म वहाबी और तकफ़ीरी पेश करते हैं वह कठोर, नृशंस और यह हराम वह हराम जैसी बातों से भरा हुआ है। वे हर चीज़ का आधार हराम पर रखते हैं। हालांकि यह फ़ारमूला क़ुरान और पैग़म्बरे इस्लाम की शिक्षाओं के विरुद्ध है। इसलिए कि इस्लाम ने हर चीज़ की बुनियाद हलाल और जायज़ होने पर रखी है, लेकिन यह कि किसी चीज़ का हराम होना क़ुरान और सुन्नत से साबित हो जाए।

वहाबियों और सलफ़ियों की एक दूसरी समस्या यह है कि यह लोग इस्लाम के संयम एवं संतुलन बनाए रखने के विचार को नज़र अंदाज़ कर देते हैं। इस्लाम संयम एवं संतुलन का धर्म है और उसकी शिक्षाओं एवं दिशा निर्देशों में तार्किक संतुलन पाया जाता है। इसलिए धर्म के किसी एक भाग को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश नहीं किया जा सकता या इसके विपरीत किसी दूसरे भाग को महत्वहीन नहीं बनाया जा सकता। इसी तरह धर्म के किसी एक भाग के लिए दूसरे भाग को छोड़ा नहीं जा सकता। हालांकि तकफ़ीरी एवं सलफ़ी विचारधार में जेहाद को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाता है और उसके मूल अर्थ को बदल दिया जाता है, जबकि धर्म की बहुत सी अहम शिक्षाओं की उपेक्षा कर दी जाती है।

तकफ़ीरी विचारधारा में जेहाद को दो कारणों से उसके मूल रास्ते से भटका दिया गया है। पहला यह कि तकफ़ीरी और वहाबी लोग जेहाद के बहाने, नैतिकता, दया, इंसानियत और अन्य धार्मिक सिद्धांतों को पैरों तले रौंद देते हैं। लोगों को बहुत ही क्रूरता से यातनाएं देते हैं और उनकी नृशंस तरीक़े से हत्याएं करते हैं, लोगों के घरों को आग लगा देते हैं और उनका माल लूट लेते हैं। वहाबी अनेकेश्वरवादियों और काफ़िरों के ख़िलाफ़ जंग पर आधारित आयतों की व्याख्या मुसलमानों के साथ जंग से करते हैं और सही रास्ते से भटक जाते हैं।

वास्तव में जेहाद से उनका अभिप्राय, मुसलमानों का नरसंहार है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब ईश्वर क़ुरान में मुसलमानों से उन ग़ैर मुस्लिमों के साथ भलाई करने का आदेश देता है जो उनके साथ जंग की हालत में नहीं हैं। इस्लाम समस्त इंसानों के साथ भलाई का आदेश देता है, वह चाहे किसी भी धर्म के अनुयाई हों। जब ग़ैर मुस्लिमों के साथ अच्छे बर्ताव और सदाचार का आदेश दिया जा रहा है और अकारण उनके साथ युद्ध से रोका जा रहा है तो मुसलमानों के साथ युद्ध और उनकी हत्या कैसे सही ठहराई जा सकती है।

तकफ़ीरी गुटों का मानना है कि जो मुसलमान उनकी विचारधारा और आस्था से सहमत नहीं हैं और उनकी विचाराधारा का अनुसरण नहीं करते हैं, उनके साथ जेहाद और उनका नरंसहार एक धार्मिक कर्तव्य है। हालांकि जेहाद इस्लाम के सिद्धांतों में से एक है और उसके लिए विशेष परिस्थितियों का होना और विशेष शर्तों का पालन ज़रूरी है। जेहाद किन लोगों के ख़िलाफ़ और किन परिस्थितियों में किया जा सकता है, इसके लिए क़ुरान और पैग़म्बरे इस्लाम ने नियम और सिद्धांत बना दिए हैं। इन नियमों और सिद्धांतों का तकफ़ीरी जेहाद से कोई संबंध नहीं है।

दाइश ने कुछ मनगंढत और नक़ली हदीसों के आधार पर अंतिम काल जैसी कुछ निशानियों के बहाने अपने बारे में कहानियां गढ़ ली हैं, इस प्रकार वह अंतिम काल के घटनाक्रमों में प्रभावी भूमिका निभाकर यह दिखाना चाहता है कि वह अपने दुश्मनों पर हमेशा हावी रहता है। जबकि इस प्रकार की समस्त हदीसें गढ़ी गई और नक़ली हैं। यहां तक कि दाइश के प्रचारक सही हदीसों की भी अपनी रूची और पसंद के हिसाब से व्याख्या कर लेते हैं।                    

 

Sep १७, २०१७ ११:१२ Asia/Kolkata
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