ईरान के पश्चिमी आज़रबाइजान प्रांत के तालाब या वेटलैंड, पक्षियों के पलायन करने के मार्ग पर स्थित हैं इसलिए दुनिया में इन्हें पक्षियों के सबसे अहम निवास स्थलों में गिना जाता है।

इस प्रांत में स्थायी व मौसमी 30 तालाब या वेटलैंड हैं और इन तालाबों के इकोसिस्टम प्रकृति का अद्भुत एलबम नज़र आते हैं। इसी इकोसिस्टम की वजह से विभिन्न प्रकार के पक्षी इन तालाबों में जीवन यापन करते हैं। आज के कार्यक्रम में अपनी हरियाली व उपजाउ भूमि के लिए मशहूर प्रांत पश्चिमी आज़ारबाइजान का सफ़र करेंगे और इस दौरान इस प्रांत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अहमियत रखने वाले एक स्थल के बारे में बताएंगे जिसमें 3 वेटलैंड शूरगिल, यादगार लो और दुर्गे संगी स्थित हैं।

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शूरगिल, यादगार लो और दुर्गे संगी झील एक दूसरे से अलग इकाई है। इनमें से हर एक में एक झील और एक दलदली क्षेत्र हैं जिसमें वर्षा के मौसम में बाढ़ आती है। ये तीनों वेटलैंड लगभग 2500 हेक्टर क्षेत्रफल पर फैले हुए हैं। इन तीनों तालाबों में मौजूद पानी बारिश, सोतों और छोटी नहरों के होते हैं। शूरगिल ऐसा तालाब है जिसका किनारा खारा है और इसका दलदली भाग मौसमी वर्षा में पानी से भर जाता है और इस प्रकार इसके दोनों भाग एक दूसरे से मिल जाते हैं। यादगार लो शूरगिल तालाब से छोटा है लेकिन इसका पानी मीठा है। यादगार लो तालाब में पानी में डूबी हुयी वनस्पतियां और नरकुल पार्य जाते हैं। पुर्गी संगी तालाब कि जिसका दूसरा नाम सीरान गिली भी है, इस अंतर्राष्ट्रीय स्थल में मौजूद तीसरा तालाब है। यह तालाब कम गहरा है और मौसमी वर्षा का इस पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।            

शूरगिल अपनी कम गहरायी, कम खारे और खारे पानी की वजह से मशहूर है। यह तालाब ज़्यादा से ज़्यादा 1 मीटर गहरा है और आम तौर पर पतझड़ और शीत ऋतु में इसमें ज़्यादा पानी इकट्ठा होता है। यादगार लो और दुर्गे संगी मीठे पानी की कम गहरायी वाली झीलें हैं। इनके चारों ओर कई दलदली क्षेत्र हैं।

शूरगिल और यादगार लो तालाब का बड़ा क्षेत्र घास और दलदली क्षेत्र में उगने वाली सेज नामक वनस्पति से ढका रहता है जबकि दुर्गे संगी में कम क्षेत्र पर वनस्पतियां पायी जाती हैं। वास्तव में दुर्गे संगी तटवर्ती क्षेत्र में पाए जाने वाले तालाबों की श्रेणी में आता है। ये तालाब नदियों के पानी में आने वाले उतार-चढ़ाव के नतीजे में निकलने वाली तलछट की देन हैं और प्रायः उन क्षेत्रों में वजूद में आते हैं जहां से नदियां गुज़रती या जहां गिरती हैं।

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शूरगिल, यादगार लो और दुर्गे संगी पलायन करने वाले पक्षियों के मार्ग में स्थित होने और जलचर व पानी के आस-पास जीवन यापन करने वाले पक्षियों के अंडे देने के स्थल की दृष्टि से बहुत ही अहमियत रखता है। इस क्षेत्र में घोंसला बनाने वाले पक्षियों में चैता पक्षी भी है। यह पक्षी ऐसे क्षेत्र में निवास करता है जहां झील, दलदली भूमि और वनस्पतियों का घनत्व ज़्यादा हो। कहा जाता है कि पूरी दुनिया का एक तिहाई मार्बल्ड टील या चैता पक्षी अकेले ईरान में मौजूद है और इस दुर्लभ पक्षी के अंडे बच्चे देने के स्थलों में पश्चिमी आज़रबाइजान भी है।  

शूरगिल, यादगार लो और दुर्गे संगी उरूमिये झील के दक्षिण में स्थित है। उरूमिये झील के दक्षिण में बड़ी संख्या में तालाब मौजूद हैं। उरूमिये झील दुनिया में खारे पानी की दूसरी सबसे बड़ी झील है। पिछले कुछ वर्षों में इस झील में पर्यावरण की दृष्टि से बहुत बदलाव आए जिसका प्रभाव इस झील के दक्षिण में स्थित तालाबों पर भी पड़ा। ये तीनों तालाब विगत में पानी से भरे और हरियाली से संपन्न थे। इन तालाबों में फ़्लैमिन्गो, तिलोर, सफ़ेद सर वाली बत्तख़ और चैता अरदके मरमरी बड़ी संख्या में पायी जाती थी और इन्हीं तालाबों में ये पक्षी अंडे भी देते थे। पिछले कुछ वर्षों में इन तालाबों मे पर्यावरण की दृष्टि से बहुत बदलाव आए। सूखे और सिंचाई के अस्थायी तंत्र को इसका मुख्य कारण कहा जा सकता है। इसी प्रकार कुएं की खुदाई, सतह पर बहने वाले पानी और नहरों की जगह भूमिगत जलस्रोत का दोहन भी इन तीनों तालाब में आए बदलाव के अन्य कारण हैं। ऊपरी भाग में अंधाधुंध पानी का निकालना, पशुओं को चरने के लिए बेलगाम छोड़ना, मनमानी खेती और पानी की राशनिंग का पालन न होना भी इस बात का कारण बना कि ये तालाब मोन्ट्रो (Montreux ) रेकॉर्ड में शामिल हों। जिन तालाबों में इकोलॉजी की दृष्टि से बहुत ज़्यादा बदलाव आते हें उन्हें रामसर कन्वेन्शन और मोन्ट्रो रेकॉर्ड में शामिल कर लिया जाता है। इन तालाबों को फिर से जीवन देकर उन्हें पिछली हालत में लौटाने के लिए कई प्रकार के क़दम उठाने की ज़रूरत है।

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पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों तालाबों को फिर से जीवित करने का सबसे उचित तरीक़ा यह है कि इन्हें स्थानीय सोसाइटी और पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय संगठनों के हवाले कर दिया जाए। जैसा कि दुर्गे संगी तालाब को जीवित करने के लिए यह योजना पेश की गयी कि स्थानीय लोगों पर आधारित एक प्रशासनिक तंत्र बनाया जाए जिसे पक्षियों के निवास्थल की रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी जाए। इसी प्रकार इस बात पर भी बल दिया गया कि स्थानीय लोगों में पर्यावरण की अहमियत के बारे में जागरुकता पैदा की जाए। सिविल सोसायटी के सहयोग से इस क्षेत्र का 1500 हेक्टर भूभाग तालाब के पुनर्जीवन परियोजना के अधीन हो गया। इसी प्रकार दुर्गे संगी तालाब के पानी की राशनिंग की रक्षा के लिए गुदार नदी से निकली नहरों से 18 किलोमीटर तक तलछट भी निकाली गयी। चूंकि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पक्षियों के निवास स्थल की रक्षा करना है, इसलिए इस परियोजना में ऐसे स्थलों को चिन्हित किया गया हैं जहां पर पक्षी घोंसला बनाएंगे और जहां पर वनस्पतियां उगायी जाएंगी।    

तीनों तालाबों को बचाने के लिए शुरु हुयी परियोजना को दस साल हो चुके हैं। इन दस साल में इस परियोजना का नतीजा बहुत अच्छा रहा है। पिछले कुछ साल में तालाब के जल स्तर की रक्षा, भूमिगत पानी की परत को फिर से जीवित करना, चरागाहों व आस-पास के पहाड़ों को नुक़सान पहुंचाने वाली प्रक्रियाओं को रोकना और जैविक विविधता लाना इस परियोजना की उपलब्धियां रही हैं। उम्मीद की जाती है कि यह प्रक्रिया तेज़ी से दूसरे पड़ोसी क्षेत्रों में भी अपनायी जाएगी।

 

Sep १७, २०१७ १५:११ Asia/Kolkata
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