हमने आपको वर्ष 2011 तक इस्लाम सहयोग संगठन की विभिन्न चरणों में गतिविधियों और अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इस संगठन के क्रियाकलाप विशेषकर सदस्य देशों के बीच एकता पैदा करने के बारे में बताया था।

हमने आपको यह भी बताया था कि यदि इस संगठन के घोषणापत्र में वर्णित सिद्धांतों और लक्ष्यों को मापदंड बनाएं तो इस संगठन की सफलताएं बहुत ही कम रही हैं। दूसरे शब्दों में इन कालों में इस्लामी सहयोग संगठन या इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन पूर्ण रूप से अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सका है किन्तु दावा नहीं किया जा सकता कि इस संगठन ने कोई सफलता ही प्राप्त नहीं की है क्योंकि यदि यह संगठन न होता तो निश्चित रूप से इस्लामी जगत की स्थिति आज से बदतर होती।

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सदस्य देशों के लिए सामूहिक सुरक्षा पैदा करना और मतभेदों का शांतिपूर्ण समाधान, ओआईसी के घोषणापत्र में वर्णित दो महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं और यदि हम इस संगठन की सफलता की समीक्षा करना चाहें तो हमें इन दो लक्ष्यों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। सदस्य देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा पैदा करने में ओआईसी के प्रयास अधिक सफल नहीं हैं क्योंकि बहुत से मामलों में इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन की भूमिका, केवल परिवर्तनकर्ता की रही है न कि हलकर्ता की। इसी प्रकार मतभेदों को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने के मामले में भी इस संगठन को अधिक कामयाबी हासिल नहीं हो सकी, यहां तक कि कुछ मामलों में ओआईसी ने देशों के बीच युद्ध और रक्तपात बढ़ाने की ओर ही क़दम बढ़ाया है।

यदि इस्लामी सहयोग संगठन ने अपने लक्ष्य प्राप्त करने में अधिक सफलता प्राप्त नहीं की है तो इसका कारण क्या हो सकता है? ओआईसी के विभिन्न चरणों में इस्लामी जगत के परिवर्तनों की समीक्षा करने से पता चलता है कि इस्लामी सहयोग संगठन की असफलता का मुख्य कारण, ओआईसी के सदस्य देशों में राष्ट्रीय हितों को सामूहिक और संगठन के हितों पर प्राथमिकता प्राप्त थी जबकि मुस्लिम देश यदि इस्लाम धर्म को आधार बनाते तो यह मुसलमानों के बीच एकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था क्योंकि इस्लाम धर्म ने हमेशा से सामूहिक हितों को व्यक्तिगत और राष्ट्रीय हितों पर प्राथमिकता दी है किन्तु इस्लामी सहयोग संगठन में इस सिद्धांत पर ध्यान नहीं दिया गया और सामूहिकों के बजाए अपने व्यक्तिगत और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी गयी जिसके कारण सदस्य देशों में मतभेद फैल गये और सदस्य देशों के बीच मतभेद की खाई गहराती गयी। स्पष्ट है कि जब कोई अंतर्राष्ट्रीय या क्षेत्रीय संगठन अपने घोषणापत्र में वर्णित सिद्धांतों और नियमों की अनदेखी करते हुए अपने हितों को सामूहिक और संगठन के हितों पर प्राथमिकता देगा तो संगठन में सहयोग और विश्वास की भावना कमज़ोर हो जाएगी।

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उदाहरण स्वरूप इस्लामी सहयोग संगठन के एक सदस्य देश मिस्र ने जब इस्राईल के साथ शांति में अपना राष्ट्रीय हित देखा तो उसने सीना मरुस्थल को वापस लेने के लिए, इस्राईल से मुक़ाबले के ओआईसी के महत्वपूर्ण सिद्धांत को रौंद दिया और इस्राईल के साथ कैंप डेविड समझौता कर लिया। मिस्र की इस कार्यवाही ने सदस्य देशों के बीच यह भ्रांति फैला दी कि एक संगठन में सहयोग के लिए उसके सिद्धांतों को पैरों तले रौंदा जा सकता है और संगठन के दीर्घावधि लक्ष्यों की राष्ट्रीय और अल्पावधि हितों पर बलि चढ़ाई जा सकती है। मिस्र द्वारा इस्राईल के साथ समझौता किए जाने से सदस्य देशों में अविश्वास पैदा होने के अतिरिक्त कुछ देशों ने इस संगठन की सदस्यता ही छोड़ दी और संगठन में पायी जाने वाली किसी हद तक मज़बूती को और भी धचका लग गया। इसके अलावा मिस्र की इस कार्यवाही ने संगठन में इस प्रकार की कार्यवाही की बुराई को समाप्त कर दिया और इसके कारण कुछ सदस्य देश भी इसी रास्ते पर निकल पड़े। उदाहरण स्वरूप कैंप डेविड समझौते के बाद मोरक्को ने जिसने ओआईसी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, सबसे पहले इस्राईल के हाथ मिलाने के लिए क़दम बढ़ाया।

दूसरी ओर संगठन के हितों पर राष्ट्रीय हितों के रूझहान का एक उदाहरण ईरान पर इराक़ का सैन्य हमला था। यह हमला सी हालत में किया गया कि इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सिद्धांत में स्पष्ट रूप से सदस्य देशों के बीच मतभेद को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने पर बल द या गया है। ईरान में इस्लामी क्रांति के सफल होने और इस्लामी व्यवस्था के सत्ता में आने से इस्लामी सहयोग संगठन पहले से अधिक मज़बूत और दृढ़ हो सकता था किन्त इराक़ ने अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए अरवंद रूद नामक नदी समझौते का उल्लंघन कर दिया जो 1975 में अलजीरिया और ईरान के बीच हुआ था। इराक़ ने इसी को पर्याप्त नहीं समझा और सदस्य देशों के बीच होने वाले समझौतों को एक ओर रख दिया। इस्लामी जगत के दो प्रभावी और इस्राईल से संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में रहने वाले दो देशों के के बीच यह युद्ध आठ साल तक जारी रहा जिसके कारण दोनों देशों की महत्वपूर्ण ऊर्जाएं कम हो गयीं। निसंदेह इस युद्ध में इस्लामी सहयोग संगठन की न्यायपूर्ण और प्रभावी भूमिका, युद्ध की आग को रोक सकती थी और युद्ध से होने वाले नुक़सान की भरपायी कर सकती और यह संगठन मुस्लिम देशों को उनके उच्च स्थान तक पहुंचाने में मार्गदर्शन की भूमिका अदा कर सकता था।

ओआईसी के अपने लक्ष्य को पूर्ण रूप से व्यवहारिक बनाने में असफलता मिलने का दूसरा कारण, इन लक्ष्यों का आपस में टकराना और इस संगठन की कार्यवाहियों का दूसरी क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से मेल न खाना था। इसके बावजूद कि इस्लामी सहयोग संगठन ने अपने घोषणापत्र में दूसरे क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के बीच प्राकृतिक संबंध स्थापित करने का भरसक प्रयास किया किन्तु व्यवहारिक रूप में ओआईसी और अन्य क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के हितों के बीच टकराव पैदा हो गया जिसके कारण यह संगठन अपने लक्ष्यों को पूर्ण रूप से व्यवहारिक न कर सका। इस दावे का अर्थ यह नहीं है कि इस संगठन तथा क्षेत्र और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के दूसरे संगठनों विशेषकर संयुक्त राष्ट्र संघ के लक्ष्यों और उमंगों के बीच विरोधाभास पाया जाता था क्योंकि ओआईसी ने सदैव अपने प्रस्तावों में संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ संबंधों के विस्तार और सहयोग पर बल दिया है।

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उदाहरण स्वरूप इस्लामी सहयोग संगठन के विदेशमंत्रियों की 16वीं बैठक में इस संगठन तथा अन्य क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के बीच संबंधों के विस्तार के बारे में एक प्रस्ताव पारित किया गया। कभी कभी तो इस्लामी सहयोग संगठन अपने बड़े बड़े हितों को संयुक्त राष्ट्र संघ के हित पर क़ुरबान कर देता है और उसके क्रियान्वयन पर बल देता है। उदाहरण स्वरूप इस्लामी सहयोग संगठन ने इराक़ द्वारा कुवैत पर हमले के समय संयुक्त राष्ट्र संघ के दृष्टिकोण की पुष्टि की थी और संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। इस प्रकार के दृष्टिकोण अपनाने के कारण इस्लामी सहयोग संगठन की भीषण आलोचनाएं भी हुई हैं। इससे पता चलता है कि इस्लामी सहयोग संगठन के घोषणापत्र में जो लक्ष्य और उद्देश्य बयान किए गये हैं वह पूरी तरह संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों और लक्ष्यों के ही समान है जैसे साम्राज्यवाद, जातीय भेदभाव से संघर्ष, न्याय और शांति की स्थापना।

इस बात के दृष्टिगत कि इस्लामी सहयोग संगठन के अधिकतर सदस्य देश अरब है इसीलिए इसके फ़ैसले इस्लामी दृष्टिकोण से अधिक अरब दृष्टिकोण की ओर से रुझहान रखने लगे और इसका मुख्य कारण अरब संघ का इस संगठन में प्रभाव है। उदाहरण स्वरूप, इस्राईल के साथ फ़िलिस्तीनियों की शांति की योजना के मुद्दे पर इस्लामी सहयोग संगठन, बुरी तरह अरब संघ से प्रभावित दिखा और इस्राईल के विषय पर कुछ सिद्धांतों पर सहमति के बावजूद, सऊदी अरब और कुछ अरब देशों के दबाव में यह योजना पास हो गयी। यह योजना अरब संघ की 12वीं बैठक में पास कर दी गयी। यही विषय ईरान से युद्ध के दौरान इस्लामी सहयोग संगठन द्वारा इराक़ के समर्थन की ओर इशारा भी करता है।

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एक अन्य कारण जिसकी वजह से इस्लामी सहयोग संगठन अपने लक्ष्य प्राप्त करने में विफल रहा है वह अपने प्रस्तावों के क्रियान्वयन की गैरेंटी है। प्रस्ताव के अधर में लटके रहने के कारण एक दूसरे के निकट न केवल सदस्यों के फ़ैसलों की विश्वसनीयता पर बट्टा लग गया बल्कि इस संगठन की अंतर्राष्ट्रीय साख पर भी आंच आने लगी। इसीलिए इस्लामी सहयोग संगठन अपने किसी भी प्रस्ताव या सुझाव के क्रियान्वयन की गैरेंट नहीं दे सका जिसके कारण दूसरे संगठन और देश, इसके प्रस्तावों को अधिक महत्व नहीं देते हैं। यह सी स्थिति में है कि इस संगठन के सदस्य देश आर्थिक, राजनैतिक और सामरिक स्रोतों से संपन्न होने के कारण अपने प्रस्तावों को निश्चित रूप से लागू करवा सकते हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी विश्वसनीयता में वृद्धि कर सकते हैं। सा प्रतीत होता है कि सदस्य देशों के बीच भीषण मतभेद के कारण, प्रस्ताव के क्रियान्वयन में रुकावट पैदा हो गयी है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि विभिन्न कालों में ओआईसी संगठन के क्रियाकलापों पर नज़र डालने से यह सिद्ध होता है कि तीन मुख्य कारक, अर्थात संगठन या सामूहिक हितों पर अपने व्यक्तिगत हितों को दृष्टिगत रखने के कारण यह संगठन अपने मुख्य लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है और इसका यह नुक़सान हुआ है कि यह संगठन अपने मुख्य लक्ष्य अर्थात मुस्लिम देशों के बीच एकता स्थापित करने में विफल रहा है।

 

Sep २४, २०१७ १३:२६ Asia/Kolkata
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