हमने वर्ष 2011 तक इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी के क्रिया-कलापों की समीक्षा की थी।

इसी प्रकार हमने इस बात की भी समीक्षा की थी कि ओआईसी के सदस्य देशों के मध्य एकता व कएजुटता उत्पन्न करने में इस संगठन ने क्या भूमिका निभाई और इस संबंध में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में ओआईसी की सफलता अपेक्षाकृत रही है। इसी प्रकार हमने इस बात की भी समीक्षा की थी कि इस संगठन ने जो प्रस्ताव पारित किये हैं उनका कोई विशेष महत्व नहीं है। इसी प्रकार हमने पिछले कार्यक्रम में इस बात का मूल्यांकन किया था कि तीन मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से ओआईसी अपने लक्ष्यों को प्राप्त न कर सका। पहला यह है कि ओआईसी में राष्ट्रीय हितों को सार्वजनिक व सदस्य देशों के हितों पर प्राथमिकता दी गयी और दूसरे कुछ क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय संगठनों के हितों से ओआईसी के हितों का टकरा जाना है और तीसरे ओआईसी ने जिन प्रस्तावों को पारित किया है उन्हें लागू करने का ओआईसी के पास कोई प्रावधान नहीं है। हम इस बात की समीक्षा व विश्लेषण करेंगे कि हालिया पांच वर्षों में इस्लामी देशों में जो परिवर्तन हुए उसके संबंध में ओआईसी के दृष्टिकोण क्या थे।

ज़ैनुल आबेदीन बिन अली

 

अरब व इस्लामी देशों में इस्लामी जागरुकता की जो लहर आरंभ हुई वह टयूनीशिया से हुई थी। दूसरे शब्दों में ट्यूशिया वह पहला देश था जहां से राजनीतिक और क्रांतिकारी परिवर्तनों की चिंगारी फूटी थी। ट्यूनीशिया का एक शिक्षित युवा मोहम्मद बूअज़ीज़ी था जो बेरोज़गार था, मजबूर होकर वह ठेले पर सामान बेचता था। भ्रष्टाचार और पुलिस के दुर्व्यवहार से तंग आकर उसने स्वयं को 18 दिसंबर 2010 को आग लगा ली। उसका यह कदम कारूद सिद्ध हुआ जिससे ट्यूनीशिया के राजनीतिक और सामाजिक हल्कों में भूकंप आ गया विशेषकर इस देश के युवा बहुत क्रोधित हुए। ट्यूनीशिया के बाद दूसरे अरब देशों में भी विरोध की लहर फैल गयी। ट्यूनीशिया के लोग और युवा सड़कों पर आ गये। बेकारी, खाद्य संकट, भ्रष्टाचार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक आज़ादी का न होना वे चीज़ें हैं जिसने इस देश के लोगों के जीवन को दूभर बना दिया था। टयूनीशिया के जनप्रदर्शनों ने शीघ्र ही इस देश के राष्ट्रपति ज़ैनुल आबेदीन बिन अली की सरकार को लक्ष्य बनाया । लोगों और पुलिस के मध्य गम्भीर और हिंसात्मक झड़पें हुईं। सुरक्षा बलों की दमनात्मक कार्यवाहियों के परिणाम में बहुत से प्रदर्शनकारी हताहत व घायल हुए परंतु अंत में जनता की विजय हुई और 14 जनवरी 2011 को ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति ज़ैनुल आबेदीन बिन अली के सऊदी अरब भाग जाने के साथ ही इस देश की सरकार का अंत हो गया। इस प्रकार उनका 23 वर्षीय शासन काल ख़त्म हो गया। उसके बाद इस देश में आपात काल की घोषणा करके अंतरिम सरकार का गठन कर दिया गया।

ट्यूनीशिया की जनक्रांति के सफल हो जाने और बिन अली के इस देश से भाग जाने के बाद वहां की जनक्रांति की लहर मिस्र पहुंच गयी। मिस्र के लोग भी इस देश की तानाशाही सरकार की नीतियों व कार्यक्रमों से नाराज़ थे अत: वे भी सड़कों पर आकर इस देश तानाशाह हुस्नी मुबारक के त्याग पत्र की मांग करने लगे।

हुस्नी मुबारक
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मिस्र के तानाशाह राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन इस देश के कुछ सीमित क्षेत्रों से आरंभ हुए थे परंतु शीघ्र ही वे पूरे देश में फैल गये। वास्तव में लगभग एक हज़ार लोगों से आरंभ हुआ प्रदर्शन लाखों की संख्या में होने वाले प्रदर्शन का रूप धारण कर गया और मिस्र की राजधानी काहेरा का अत्तहरीर स्कावयर जनप्रदर्शन के केन्द्र में परिवर्तित हो गया। अंत में कुछ ही दिनों में मिस्र की सेना ने जनता के साथ होने और हुस्नी मुबारक ने सत्ता से अलग होने की घोषणा कर दी जिसके बाद मिस्री जनांदोलन सफल हो गया।

मिस्र जनांदोलन के सफल और इस देश के संविधान में संशोधन के बाद राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए जिसमें अहमद शफ़ीक़ के मुकाबले में मिस्र के मुसलिम ब्रदर हुए संगठन के एक नेता मोहम्मद मुर्सी चुनाव जीत गये और जनता द्वारा चुने गये पहले राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने सत्ता की बागड़ोर संभाली।

इस्लामी जागरुकता की जो लहर फैली थी मिस्र के बाद वह लीबिया पहुंच गयी। इस देश में 13 जनवरी 2011 से जनांदोलन आरंभ हो गये और उसके अगले महीने 17 फरवरी को वह अपने चरम बिन्दु पर पहुंच गये। उसके बाद कर्नल मोअम्मर कज़्ज़ाफ़ी के विरोधियों ने लीबिया के पूर्वी और आधे पश्चिमोत्तरी नगरों पर नियंत्रण कर लिया। उसके बाद से लीबिया के बाहर की शक्तियों ने इस देश के परिवर्तनों में भूमिका निभानी आरंभ कर दी।

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लीबिया की सेना और विरोधियों के मध्य लड़ाई तेज़ हो जाने और कई हज़ार विरोधियों के मारे दिये जाने के बाद सुरक्षा परिषद ने इन हत्याओं की भर्त्सना की और मोअम्मर कर्नल क़ज़्ज़ाफ़ी को युद्धापराधी घोषित किया । उसके कई दिनों के बाद अमेरिका, फ़्रांस और ब्रिटेन ने कुछ क्षत्रों में क़ज़्ज़ाफ़ी की सेनाओं पर बमबारी कर दी। इस प्रकार विदेशियों ने कर्नल क़ज़्ज़ाफ़ी के विरोधियों का समर्थन किया जिससे कुछ ही दिनों में उसकी सरकार का अंत हो गया।

इस्लामी जागरुकता की जो लहर फैली थी वह यमन और बहरैन में भी फैल हुई थी। यमन के उत्तर और दक्षिण के बहुत से नगरों में जनवरी 2011 के मध्य में प्रदर्शन आरंभ हो गये थे। यमन के लोग आरंभ में देश के संविधान में परिवर्तन , बेरोज़गारी, विषय आर्थिक स्थिति और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे परंतु थोड़े ही समय में वे यमन के तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के त्यागपत्र की मांग करने लगे। यमन में होने वाले परिवर्तनों में अब तक काफ़ी उतार- चढ़ाव आये हैं परंतु वर्तमान समय में सत्ता की बागडोर जन संगठन अंसारुल्लाह और हूसियों के नियंत्रण में है और सऊदी अरब और उसके घटकों ने यमन के भगोड़े व अपदस्थ राष्ट्रपति मंसूर हादी को दोबारा सत्ता में वापस लाने के बहाने जो दो साल से अधिक समय से यमन पर हमला कर रखा है वह भी सत्ता के समीकरण को परिवर्तित नहीं कर सका है।

14 फ़रवरी 2011 से बहरैन में इस देश की तानाशाही सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन आरंभ हो गये। बहरैन में होने वाले प्रदर्शन आम तौर पर शांतिपूर्ण रहे हैं और इन प्रदर्शनों का लक्ष्य अधिक राजनीतिक आज़ादी और मानवाधिकारों का सम्मान था और लोग सीधे रूप से आले ख़लीफ़ा सरकार के परिवर्तन मांग नहीं कर रहे थे परंतु पुलिस के हिंसक व दमनात्मक व्यवहार के कारण लोग व प्रदर्शनकारी बहरैन की तानाशाही सरकार की समाप्ति और उसके स्थान पर लोकतांत्रिक सरकार की मांग करने लगे। बहरैन में भी बहुत उतार-चढ़ाव आये परंतु सत्ता अब भी आले खलीफा परिवार के हाथ में है।

कर्नल क़ज़्ज़ाफ़ी

इस समय बहरैन, यमन और सीरिया के राजनीतिक परिवर्तन बहुत जटिल हो गये हैं और कुछ इस्लामी देशों के मध्य जो शत्रुता अस्तित्व में आ गयी है और जो लड़ाइयां हो रही हैं पश्चिमी देश और इस्लाम के कट्टर शत्रु उससे ख़ूब लाभ उठा रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इन बहुत से परिवर्तन के पीछे जायोनी शासन का हाथ है और विदित में इस्लामी और तकफीरी व आतंकवादी गुटों तथा उनके नेताओं का व्यापक समर्थन जाने व अनजाने में सीआईए और मोसाद के एजेन्ट कर रहे हैं।

खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी भी इन देशों में होने वाले परिवर्तनों के संबंध में कोई भूमिका न निभा सका जबकि वह न्यायपूर्ण व निष्पक्ष दृष्टिकोण अपना कर सकारात्मक भूमिका निभा सकता था। शोचनीय बिन्दु यह है कि ओआईसी ने न केवल समारात्मक भूमिका नहीं निभाई बल्कि कुछ अवसरों पर उसने अतार्किक दृष्टिकोण अपना कर इन विवादों और दुश्मनियों को और हवा देने का प्रयास किया। 

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सीरिया में जो लड़ाई हो रही है उसे बंद कराने की दिशा में ओआईसी एक निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका सकता था परंतु सऊदी अरब की मांग पर अगस्त 2012 में इस्लामी देशों के नेताओं की शिखर बैठक मक्का में हुई। यह शिखर बैठक ऐसे समय में हुई जब सीरियाई सरकार के विरोधियों की इस्तांबोल , टयूनीशिया और यूरोप में होने वाली बैठकें विफल हो चुकी थीं। इसी प्रकार सीरियाई सरकार के विरोधी अरब संघ की बैठकों का भी परिणाम नहीं निकला था। सऊदी अरब के पवित्र नगर मक्का में 2012 में जो शिखर बैठक हुई थी उसमें ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भी भाग लिया था और उसमें उन्होंने अरब देशों में सुधार और विदेशी हस्तक्षेप से मुकाबले की आवश्यकता पर बल दिया था। उस बैठक में ईरानी राष्ट्रपति ने बल देकर कहा था कि होशियारी के साथ दोनों चीज़ों पर ध्यान दिया जाना चाहिये यानी अरब देशों की जनता की मांगों पर ध्यान दिया जाये और साहस व बहादुरी के साथ शत्रुओं का मुकाबला कया जाये और इस दिशा में दुश्मन और उसके षड़यंत्रों को बाधा नहीं बनने दिया जाना चाहिये और यह दोनों चीज़ें एक ही वास्तविकता हैं और दोनों एक दूसरे के लिए ज़रूरी हैं परंतु ईरान के दृष्टिकोण व सुझाव के तार्किक होने के बावजूद सऊदी अरब के दबाव में ओआईसी में सीरिया की सदस्यता को विलंबित कर दिया गया।

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ओआईसी के इस दृष्टिकोण से सीरिया संकट का न केवल समाधान नहीं हुआ बल्कि उसमें और भी वृद्धि हो गयी। ओआईसी का यह दृष्टिकोण वही चीज़ था जिसके इस्लामी देशों के दुश्मन क्षेत्र में अपने लक्ष्यों को आगे बढ़ाने और इस्लामी जगत में मतभेद के अधिक करने के इच्छुक थे। क्योंकि मक्का में ओआईसी की शिखार बैठक के समाप्त होने के ठिक बाद अमेरिकी विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता ने इस बैठक में ओआईसी में सीरिया की सदस्यता को विलंबित किये जाने का स्वागत किया था।

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Sep २५, २०१७ १५:२४ Asia/Kolkata
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