इंसान की एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है कि वह पर्यावरण को सुरक्षित रखे।

आजकल सरकारों के अलावा, ग़ैर सरकारी संगठन या एनजीओ भी पर्यावरण को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। पिछली शताब्दी में इंसान ने प्रकृति और धरती को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया, लेकिन उसने पिछले तीन दशकों के दौरान यह भी समझ लिया कि उसके हित इसी में हैं कि प्रकृति एवं पर्यावरण की सुरक्षा की जाए। इसीलिए उसे व्यापक पैमाने पर अपनी गतिविधियों में सुधार और धरती एवं प्रकृति के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने की ज़रूरत महसूस हुई। आज देशों के विकास की योजनाओं में पर्यावरण की सुरक्षा को मद्देनज़र रखा जाता है और पर्यावरण को सुरक्षित रखना विकसित एवं विकासशील देशों के लिए चुनौती बन गया है।

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पर्यावरण को सुरक्षित रखने और स्थिर विकास के लिए विशेषज्ञों ने स्थानीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर कुछ क़दम उठाए हैं और यह नारा दिया है कि स्थानीय स्तर पर काम करना चाहिए, लेकिन वैश्विक स्तर पर सोचना चाहिए। हर समाज में ग़ैर सरकारी संगठनों की भूमिका काफ़ी अहम होती है, इसलिए कि यह संगठन सार्वजनिक स्तर पर स्वेच्छा से काम करते हैं। यहां तक कि 1992 में रियो धरती सम्मेलन में जिसमें 21 सूत्रिय एजेंडा पारित किया गया था, इस तरह के संगठनों को स्थायी विकास में भागीदार बताया गया था। संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव कोफ़ी अन्नान ने 21वीं सदी को एनजीओज़ की सदी कहा था।

मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि ग़ैर सरकारी संगठन, नॉन प्रोफ़िट ऑर्गनाइज़ेशन या ग़ैर लाभकारी संगठन हैं, जो स्थायी विकास, पर्यावरण, भुखमरी को कम करने, समानता एवं न्याय के प्रसार और मानवाधिकारों की रक्षा जैसे विस्तृत उद्देश्यों के लिए काम करते हैं। यह संगठन स्थानीय लोगों और पीड़ित गुटों के संपर्क में होते हैं और सरकारी सेवाओं से अधिक महत्वपूर्ण सेवाएं अंजाम देते हैं। इन संगठनों की गतिविधियों में अनुसंधान, जानकारियों का प्रसार, शिक्षा, समाज सेवा, नियमों में परिवर्तन करने के लिए दबाव डालना और सरकारी अवज्ञा शामिल है। इनमें से कुछ संगठन छोटे होते हैं और कुछ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं।

धरती सम्मेलन के बाद, पर्यावरण के क्षेत्र में सक्रिय ग़ैर सरकारी संगठनों के प्रभाव के कारण, थोड़े समय में विश्व में हरित क्रांति की शुरूआत हुई। इसी कारण, पश्चिमी देशों में इस आंदलोन के बहुत से समर्थकों ने इस आंदोलन को एक सफल प्रक्रिया बताया। इस प्रकार से कि आज पर्यावरण का समर्थन करने वाले संचार माध्यमों एवं संगठनों के प्रयोग से लोगों का समर्थन जुटा सकते हैं और वित्तीय स्रोतों में वृद्धि कर सकते हैं। इसके अलावा, यह संगठन क़ानूनों को पारित कराने में और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ज़रूरी नियमों का पालन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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धरती सम्मेलन के बाद ग़ैर सरकारी संगठनों की प्रभावी भूमिका के कारण, थोड़े ही समय में हरित क्रांति विश्व में एक अग्रणि योजना बन गई। इसी कारण, पश्चिमी देशों में इन संगठनों के सदस्यों और समर्थकों ने इस आंदोलन की सफलता का अनुमान लगाया। इस प्रकार से कि आज पर्यावरण का समर्थन करने वाले बड़े पैमाने पर मीडिया और संगठनों का प्लेटफ़ार्म इस्तेमाल कर सकते हैं और लोगों का धीरे धीरे ध्यान खींचकर वित्तीय स्रोतों में वृद्धि कर सकते हैं। इसके अलावा पर्यावरण आंदोलन क़ानून बनाने और इनके पालन में स्थिर स्थिति का दावा कर सकता है।

स्थानीय स्तर पर भी लोगों की आस्था और परम्पराओं से अवगत होने के कारण ग़ैर सरकारी संगठन सरकारी संस्थाओं की काफ़ी मदद कर सकते हैं। इन संगठनों की गतिविधियों को स्वेच्छा और ज़रूरतों के दृष्टिगत तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला यह कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच शिक्षा का स्तर बढ़ाना और पर्यावरण की सुरक्षा की संस्कृति का प्रसार करना। दूसरे यह कि प्राकृतिक स्रोतों से लाभ उठाने और उनकी सुरक्षा के बारे में सूचनाओं का प्रसार करना और तीसरे यह कि यह संगठन सार्वजनिक सुविधाओं से लाभ उठाते हुए लोगों को पौधों के उत्पादन, उनके रोपण, नदियों की सफ़ाई, पहाड़ों की सफ़ाई और पेड़ों और जानवरों का समर्थन करते हैं और लोगों को इसके लिए प्रेरित करते हैं।

जैसा कि हमने उल्लेख किया कि जो ग़ैर सरकारी संगठन पर्यावरण की सुरक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं, वह किसी एक देश में सीमित नहीं हैं, बल्कि यह संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हीं में से ग्रीन पीस का नाम लिया जा सकता है। यह संगठन कोई सरकारी संगठन नहीं है और यह किसी सरकार, कंपनी या राजनीतिक पार्टी से वित्तीय सहायता नहीं लेता है। इस अंतरराष्ट्रीय संगठन का ख़र्च इसके लगभग 30 लाख समर्थक उठाते हैं।

इस ग़ैर सरकारी संगठन की स्थापना अलासका के एमचिटका द्वीप में अमरीका के परमाणु परीक्षण के विरोध स्वरूप 1971 में कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया राज्य में हुई। थोड़े ही समय में इसने पर्यावरण के समर्थकों का ध्यान अपनी और खींच लिया और व्हेल की विलुप्त होती हुई नस्ल को बचाने, सील के शिकार पर लगाम लगाने, समुद्र एवं नदियों में परमाणु कचरा दबाने और परमाणु परीक्षण पर रोक जैसे विषयों के बारे में अभियान चलाया। जो लोग पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाते हैं, ग्रीन पीस के सदस्य शांतिपूर्ण मार्गों से उनका मुक़ाबला करते हैं। जैसे कि वे छोटी नावों को पानी में छोड़ते हैं और व्हेल का शिकार करने वाले शिकारियों की बंदूक़ों के सामने खड़े हो जाते हैं। इस तरह के साहसी एवं ख़तरनाक क़दमों को मीडिया में ख़ूब कवरेज मिली और लोगों में पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाने वालों के प्रति रोष व्याप्त हुआ।

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पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चलाए जाने वाले अभियानों में ग्रीन पीस को काफ़ी सफलता मिली है। यही कारण है कि कुछ देशों की सरकारों ने इसके ख़िलाफ़ हिंसात्मक कार्यवाही तक की है। उदाहरण स्वरूप, 10 जुलाई 1985 को ग्रीन पीस का एक जहाज़ जिसका नाम रेनबो युद्धक था, फ़्रांस के परमाणु परीक्षण के विरोध में इस संगठन के सदस्यों को मोरुरोवा ले जाने वाला था, जब यह न्यूज़ीलैंड के ऑकलैंड बंदरगाह पर पहुंचा, तो 2 बम धमाकों के कारण यह डूब गया। इस संगठन का एक सदस्य भी इसमें डूबकर मर गया। इस घटना की जांच से पता चला कि इस जहाज़ को धमाके से उड़ाने में फ़्रांस की जासूसी एजेंसी के एजेंटों का हाथ था। इस रहस्योद्घाटन के बाद अतंरराष्ट्रीय स्तर पर फ़्रांस की काफ़ी बदनामी हुई, जिसके बाद इस देश के रक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना और जासूसी एजेंसी के प्रमुख को पद से हटा दिया गया।

पर्यावरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला एक दूसरा संगठन वर्ल्ड वाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर है। पर्यावरण के क्षेत्र में सक्रिय यह सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1961 में स्विट्ज़रलैंड में हुई, वर्तमान समय में यह 100 देशों में सक्रिय है और विश्व भर में लगभग 50 लाख लोग इसके समर्थक हैं। इस संगठन का महत्वपूर्ण काम, दुनिया भर में जानवरों की सुरक्षा करना है। यह संगठन दुनिया भर में जानवरों की कई नस्लों को विलुप्त होने से बचा चुका है। यह संगठन हर प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बनाकर रहता है। यही कारण है कि जानवरों और जंगलों को बचाने के लिए यह राजनीतिज्ञों के मुक़ाबले में खड़ा हो जाता है। उदाहरण स्वरूप, कुछ साल पहले, स्पेन के नरेश ख़्वान कारलोस ने हाथी का शिकार करने के लिए अफ़्रीक़ा की यात्रा की, इस संगठन की स्पैनिश शाख़ा ने राजा के इस क़दम का व्यापक विरोध किया। इस संगठन के सदस्यों ने घोषणा कर दी कि कारलोस का यह क़दम इस संगठन के उद्देश्यों के विरुद्ध है। ख़्वान कारलोस को इस यात्रा के लिए अपने देश की जनता से माफ़ी मांगना पड़ी। हालांकि सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगे जाने तक 85 हज़ार लोग इस संगठन के मानद अध्यक्ष के रूप में नरेश के इस्तीफ़े की मांग की याचिका पर हस्ताक्षर कर चुके थे।

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ग़ैर सरकारी संगठनों की गतिविधियों के अध्ययन से पता चलता है कि इन संगठनों ने पर्यावरण के क्षेत्र में काफ़ी हद तक पर्यावरण के अंतरराष्ट्रीय अधिकारियों की खाई को भर दिया है और अंत में कहा जा सकता है कि आज पर्यावरण के अधिकारों की सुरक्षा में काफ़ी हद तक इन संगठनों की भूमिका है।                            

 

Oct १७, २०१७ १४:०७ Asia/Kolkata
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