पारंपरिक रूप से शिष्टाचार के बारे में दो लोगों या फिर समाज के लोगों के संबंधों पर बात होती है लेकिन कुछ विशेषज्ञों के अनुसार अब तक इंसानों और धरती, पशुओं व वनस्पतियों के द्विपक्षीय संबंधों को संकलित करने वाले शिष्टाचार के बारे में अधिक ध्यान नहीं दिया गया है।

उनके विचार में इस तीसरे भाग अर्थात पर्यावरण से मनुष्य के संबंध के बारे में शिष्टाचार का विस्तार, पर्यावरण के लिए एक क्रांतिकारी और आवश्यक अवसर है। आज इस बात की ज़रूरत अधिक महसूस की जा रही है कि अन्य जीवों के मुक़ाबले में मनुष्य की पसंद संतुलित होनी चाहिए और मानवीय क्षतियो से ग़ैर इंसानी वस्तुओं को सुरक्षित रखने की शैली पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। इस आधार पर आज, शिष्टाचार, पर्यावरण के बारे में मनुष्य की चिंताओं के निवारण के एक अधार के रूप में ध्यान का केंद्र बना हुआ है।

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निश्चित रूप से पर्यावरण संबंधी समकालीन संकट, भौतिक, विस्तारवाद और वर्चस्ववादी सोच और एक शब्द में संसार में मनुष्य के वैचारिक विकार और व्यवहारिक अज्ञानता का परिणाम है। मानवीय जीवन व समाज में असंतुलन और पर्यावरण के संकट, लोगों के भीतर के असंतुलन और अनियमितता को दर्शाते हैं। यद्यपि 1960 के दशक से पर्यावरण संबंधी संकट गंभीर रूप से सामने आने लगे हैं लेकिन अगर यह तै हो कि पर्यावरण संबंध चेतावनियां सिर्फ़ सम्मेलनों में ही दी जाती रहें तो फिर एक टिकाऊ जीवन तक कभी नहीं पहुंचा जा सकेगा। निश्चित रूप से इस संबंध में सफलता, जीवन के विभिन्न मैदानों में लोगों की ओर से अपनी क्षमताओं और सृजनात्मकता के प्रयोग पर निर्भर है। यही कारण है कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के बाद के साहित्य में कहा जाता है कि पर्यावरण की समस्याओं को, जिन्हें ख़ुद इंसान ने पैदा किया है, केवल तकनीक का इस्तेमाल करके पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता बल्कि इसके लिए मनुष्य के रवैये में परिवर्तन ज़रूरी है। इस आधार पर पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार के आधार पर लोगों के व्यवहार का संकलन करने की ज़रूरत है ताकि मनुष्य और प्रकृति के संबंध की पुनः समीक्षा की जा सके। इस विषय का महत्व इस सीमा तक है कि बताया जा रहा है कि पर्यावरण विज्ञान की दिशा भौतिक व जैविक विज्ञानों की ओर से हट कर व्यवहारिक विज्ञान की ओर मुड़ रही है।

अमरीका के रूसी मूल के समाजशास्त्री व दार्शनिक पेट्रीम सोरोकीन विश्व समुदाय की ओर से पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं। तकनीकी व औद्योगिक वस्तुओं के अत्यधिक विकास के बावजूद अब भी हम पहले से कहीं अधिक नैतिक, शिष्टाचारिक व मानवीय दरिद्रता का आभास कर रहे हैं। समकालीन विचारक गोरल टोरडिन भी पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि केवल भौतिक कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं, हमें भविष्य के बारे में एक ऐसा स्पष्ट कार्यक्रम तैयार करने की ज़रूरत है जो नैतिक और शिष्टाचारिक मान्यताओं पर आधारित हो।

इस आधार पर पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार का संकलन, इस संबंध में मनुष्य की ज़रूरत पर आधारित है। पर्यावरण की रक्षा में शिष्टाचार के महत्व को समझते हुए अनेक लोगों ने इस संबंध में अनेक विचार व दृष्टिकोण पेश करने की कोशिश की है। इनमें लियोपोल्ड, टेलर, रीगन और नाइस जैसे पश्चिमी विद्वानों का नाम लिया जा सकता है। इन लोगों ने अन्य जीवों और वस्तुओं के बारे में शिष्टाचार के संकलन की ज़रूरत का उल्लेख करते हुए कई प्रकार के शिष्टाचारों को पेश किया है। उदाहरण स्वरूप रीगन ने पर्यावरण संबंधी जो शिष्टाचार पेश किया है उसे पशुओं के समर्थन में एक मज़बूत रुख़ समझा जा सकता है जबकि लियोपोल्ड ने धरती के बारे में जो शिष्टाचार पेश किया है उसमें ज़मीन की एकजुटता, स्थिरता व सुंदरता की रक्षा में मदद पर बल दिया गया है।

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इन सभी दृष्टिकोणों व परिभाषाओं में जो बात अहम है वह ऐसे सिद्धांत तैयार करने में पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार की ज़िम्मेदारी है जो प्रकृति के साथ इंसानों के रिश्तों को नियंत्रित करें। दूसरे शब्दों में ऐसे सिद्धांत बनाए जाएं जो प्रकृति को नुक़सान पहुंचाने से रोकने, उसकी रक्षा और उसे प्रबल बनाने में इंसानों की ज़िम्मेदारी को निर्धारित करें। इस आधार पर पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार का मुख्य काम प्रकृति के संबंध में समाज के भीतर नैतिक रुकावटें और शिष्टाचारिक प्रतिबंध पैदा करना है। ये रुकावटें और प्रतिबंध उस समय सामने आएंगे जब व्यक्ति स्वेच्छा से अपने स्वार्थों को सीमित करे और इस बात को दिल से स्वीकार करे कि अन्य जीवों को भी जीवन, आज़ादी और स्रोतों से लाभ उठाने का अधिकार है।

पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार के बारे में अध्ययन और शोध में इस शिष्टाचार के स्थानीय होने पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि आज हर क्षेत्र के हालात और आवश्यकताएं अलग अलग होती हैं। इस प्रकार के शिष्टाचार के प्रसार में हर स्थान की संस्कृति, मान्यताओं, आस्थाओं और विचारधाराओं पर उचित ढंग से ध्यान दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर पर्यावरण संबंधी शिष्टाचार में क्षेत्रों की धार्मिक व ऐतिहासिक पहचान की रक्षा को भी दृष्टिगत रखा जाना चाहिए क्योंकि व्यक्तिगत और सार्वजनिक व्यवहार पर आइडियालोजी और धार्मिक शिक्षाओं का जो प्रभाव होता है वह काफ़ी निर्णायक होता है और उससे पर्यावरण के संबंध में सहयोग के लिए लाभ उठाया जा सकता है।

इसी बात के दृष्टिगत आज बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि पर्यावरण का संकट वस्तुतः एक आध्यात्मिक व धार्मिक संकट है और सांसारिक जीवन से धर्म का अलग होना पर्यावरण संबंधी संकटों के सामने आने का अहम कारण हो सकता है। इस प्रकार के विचारों की अहमियत और अन्य जीवों व वनस्पतियों सहित दूसरों के साथ व्यक्ति के व्यवहार पर नैतिक आस्थाओं और धार्मिक मान्यताओं के प्रभाव के चलते इस बात पर बल दिया जा रहा है कि पर्यावरण संबंधी संकटों का समाधान, धार्मिक परंपराओं की ओर वापसी में खोजा जाना चाहिए। यह विषय हमें ईश्वर पर आस्था जैसे एक अन्य विषय की ओर उन्मुख करता है। ईश्वर पर आस्था का एक अर्थ इस बात पर ईमान रखना है कि वही धरती का रचयिता व रक्षक है। सभी ईश्वरीय धर्मों में इस बात पर बल दिया गया है। इस आधारपर पर्यावरण की देखभाल वास्तव में उन चीज़ों की देखभाल है जिनका संबंध ईश्वर से है।

दूसरी ओर इतिहास में अनेक धर्मों ने अपने धार्मिक आदेशों या शरीयत के माध्यम से मनुष्य के जीवन के लिए आचरण व सिद्धांत निर्धारित किए हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पर्यावरण की रक्षा में सहायक रहे हैं। उदाहरण स्वरूप सांसारिक माया मोह से दूरी संबंधी आदेशों का, जिनकी अनेक धर्मों में विभिन्न रूपों में सिफ़ारिश की गई है, यद्यपि पर्यावरण से कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन यह उसकी रक्षा के लिए अत्यंत उपयोगी मार्गों में से एक हो सकता है। इसके अलावा विभिन्न धर्मों में पर्यावरण और जीवों के बारे में अनेक आदेश हैं, जैसे पशुओं से प्रेम, पेड़ों को क्षति न पहुंचाना और पानी को दूषित न करना इत्यादि। स्पष्ट है कि इस प्रकार के धार्मिक आदेश पर्यावरण संबंधी नियमों व सिद्धांतों के संकलन में एक ध्यान योग्य स्रोत हो सकते हैं। इसी बात के दृष्टिगत ब्रिटेन के समाज शास्त्री गिडेन्ज़, पर्यावरण की रक्षा के संबंध में धार्मिक सिफ़ारिशों और पारंपरिक मार्गों को अधिक महत्व दिए जाने पर बल देते हैं। उनके विचार में धर्मों ने पर्यावरण के संबंध में उचित व्यवहार पेश किया है।

इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसकी नज़र में पर्यावरण का जीवन भी है और उसका महत्व भी बहुत अधिक है। इस्लाम ने पर्यावरण के बारे में मनुष्य के व्यवहार के बारे में कुछ नियमों को दृष्टिगत रखा है और इंसान को उनके प्रति उत्तरदायी बनाया है। इस्लाम सिफ़ारिश करता है कि मनुष्य पर्यावरण के संबंध में ज़िम्मेदारीपूर्ण रवैया अपनाए और उसकी मूल मान्यता को स्वीकार करे। इस समाधान की जो विशेषताएं हैं वे प्रकृति के संबंध में मनुष्य की आवश्यकता अर्थात ईश्वर की सभी रचनाओं के बारे में समानता की भावना पैदा करने में पूरी तरह से सहायक हैं। यह एक वैश्विक विषय है और अगर इसके संबंध में लापरवाही न की जाए तो ये मानवता के समक्ष स्पष्ट शिक्षाएं और व्यापक क्षमताए पेश करता है।

 

Oct १७, २०१७ १४:३२ Asia/Kolkata
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