वर्ष 61 हिजरी क़मरी में अत्याचार और बनी उमैया के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन, बलिदान व महाकाव्य का मूरत है, इसी वजह से यह आंदोलन इंसानों की भावनाओं को बहुत प्रभावित करता है और उनके मन में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके निष्ठावान साथियों के प्रति जोश पैदा करता है।

यही आशूरा के आंदोलन की विशेषता है जिसकी पैग़म्बरे इस्लाम ने इमाम हुसैन की शहादत से बहुत पहले भविष्यवाणी करते हुए कहा था, "हुसैन की शहादत से मोमिन के मन में ऐसी आग भड़केगी जो कभी ख़ामोश नहीं होगी।" पैग़म्बरे इस्लाम की इस भविष्यवाणी को लगभग 1400 साल हो रहे हैं और हर साल चेहलुम के अवसर पर दसियों लाख लोगों की विशाल रैली से इसी बात की पुष्टि होती है।

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सवाल यह है कि क्या हुसैन बिन अली का भव्य आंदोलन सिर्फ़ जोश व भावनाओं पर आधारित है या सत्य पर आधारित इस में आंदोलन  बुद्धिमत्ता, तार्किकता और दूरदर्शिता भी थी। आम तौर पर बुद्धि को हित, आरम और भौतिक मज़ों की प्राप्ति के साधन के तौर पर देखा जाता है। इस तरह की बुद्धि अपने आप में लाभदायक है लेकिन इसके सही मार्ग से भटकने की बहुत अधिक संभावना है। जैसा कि इंसान ने इसी बुद्धि के ज़रिए बहुत से अपराध किए, जनसंहारक हथियार बनाए और राष्ट्रों का शोषण किया लेकिन इस्लाम के मद्देनज़र अक़्ल व बुद्धि वह है जिसके ज़रिए इंसान लोक-परलोक में कल्याण हासिल करे और उच्च मानवीय मूल्यों से सुशोभित हो। इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, "अक़्ल दो प्रकार की होती है एक परलोक के लिए और दूसरी इस दुनिया में जीवन यापन के लिए।" इस्लाम के मद्देनज़र बुद्धि सांसारिक आकलन से अधिक संपूर्ण है, यह बुद्धि सिर्फ़ व्यक्तिगत व भौतिक हित को नज़र में नहीं रखती बल्कि वह लोक परलोक दोनों जगह में इंसान की मुक्ति चाहती है।

इन सब बातों के मद्देनज़र अब इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बुद्धि और ईश्वरीय संदेश ‘वही’ को अपने आंदोलन का आधार क़रार दिया न कि सांसारिक फ़ायदा उठाने तक सीमित बुद्धि।

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ईरानी दार्शनिक डॉक्टर ग़ुलाम हुसैन दीनानी साफ़ शब्दों में कहते हैं, "मेरी नज़र में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बुद्धि का साक्षात रूप हैं। ईश्वरीय पैग़म्बर और महापुरुष बुद्धि का साक्षात रूप हैं। अगर बुद्धि साक्षात रूप में प्रकट होना चाहे तो वह ईश्वरीय पैग़म्बर के रूप में प्रकट होगी और यह प्रकट हुयी है।"

ईरान के एक और बुद्धिजीवी हुज्जतुल इस्लाम अब्दुल हुसैन ख़ुसरो पनाह आशूर के आंदोलन में बुद्धिमत्ता के बारे में बल देकर कहते हैं, "अगर किसी व्यक्ति की बुद्धि का लक्ष्य सिर्फ़ जीवन-यापन हो और वह परलोक को कोई स्थान न दे। सिर्फ़ इस दुनिया के बारे में सोचे और कहे कि मैं अपनी बुद्धि के ज़रिए योजना बनाऊं, अधिक फ़ायदा उठाऊं और अधिक शक्ति हासिल करूं। बुद्धि का यह रूप आशूरा आंदोलन में निहित बुद्धिमत्ता के अनुकूल नहीं है।"   

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन शुरु से ही बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का दृष्य पेश करता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मोआविया के क्रियाकलापों पर पैनी नज़र रखे थे और जानते थे कि वह धर्म को ख़त्म करने और अपनी और अपने बेटे यज़ीद के लिए हुकूमत के आधार मज़बूत करना चाहता है। इस नीति के जारी रहने का मतलब इस्लामी समाज की भीतर से तबाही थी। इमाम हुसैन को समाज की स्थिति की गहरी जानकारी थी। वह समझ चुके थे कि पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के 50 साल के बाद बहुत से लोग भ्रष्ट हो चुके हैं और उनके पास नाम का इस्लाम बचा है। यज़ीद जैसे भ्रष्ट व अय्याश व्यक्ति के हाथ में सत्ता का पहुंचना इस कड़वी सच्चाई की ओर इशारा कर रहा था कि समाज की स्थिति त्रासदी की ओर बढ़ रही है। ऐसे हालात में इस्लामी बुद्धिमत्ता ख़ामोशी को सही नहीं समझती और लोगों के धर्म की मुक्ति को व्यक्तिगत हित पर वरीयता देती है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन भी इसी तार्किकता व बुद्धिमत्ता पर आधारित था।

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इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपने आंदोलन के आरंभ से ही ऐसे लोगों का सामना हुआ जो सिर्फ़ अपने भौतिक हितों के बारे में सोचते थे। ऐसे लोग थे जिनके मन में जीवन का मोह, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन के उद्देश्य को समझने में उनके लिए बाधा बना हुआ था। यहां तक कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कुछ दोस्त उनसे हमदर्दी के तहत उन्हें कर्बला जाने से मना कर रहे थे और कुछ तो यज़ीद की बैअत अर्थात आज्ञापालन के वचन के ज़रिए सांसारिक समृद्धि की ओर इमाम हुसैन को आमंत्रित कर रहे थे। डॉक्टर दीनानी इस तरह के लोगों के बारे में कहते हैं, "जिन लोगों ने कर्बला में इमाम हुसैन का साथ न दिया वे या तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले पर थे, या पूरी तरह असत्य में डूबे हुए थे और अगर वे असत्य के पाले में न थे और आध्यात्मिक नेतृत्व के इच्छुक न थे, वे अपनी बुद्धि के हिसाब किताब में फंसे हुए थे।" इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इस्लामी तर्क के अनुसार, यज़ीद बिन मुआविया जैसे भ्रष्ट शख़्स के आज्ञापालन की हामी भरना ऐसा अपमान था जो उन जैसी हस्ती की शान में न था इसीलिए इमाम हुसैन कहते थे, "मैं मौत को परमसुख और अत्याचारियों के साथ जीवन को दुर्भाग्य के सिवा कुछ नहीं समझता।"                  

हुसैन बिन अली यज़ीद की आज्ञापालन का इंकार करने के बाद मक्का गए। उनके मक्का जाने के पीछे भी दूरदर्शिता थी। वहां वह 4 महीने से कुछ अधिक समय के दौरान इस्लामी जगत के विभिन्न क्षेत्रों से इस पवित्र शहर जाने वाले श्रद्धालुओं के सामने बनी उमय्या की साज़िश से पर्दा उठाते और अपने आंदोलन के उद्देश्य को बयान करते। यहां तक कि उमवी कारिंदों ने उनकी हत्या की साज़िश बनायी और वे मक्के से निकल कर कूफ़े के लिए रवाना हुए। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने इस्लामी कर्तव्य के आधार पर विभिन्न अवसर पर लोगों को अपने आंदोलन से जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे और अपने आंदोलन की सत्यता को साबित करने के लिए ठोस तर्क पेश करते थे। इनमें से कुछ लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के तर्क को क़ुबूल करते और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कारवां में शामिल होते थे लेकिन ज़्यादातर लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सत्य की बात को नहीं समझ पाते बल्कि अपनी कमज़ोर बुद्धि व सांसारिक मोहमाया के कारण विभिन्न बहानों से उनका साथ देने से दामन बचाते रहे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आशूर के दिन भी दुश्मन को नसीहत की ताकि उनका मार्गदर्शन हो जाए। वह इस्लामी तर्क के ज़रिए उन्हें भलाई की ओर बुला और जनसंहार व दुर्भाग्य के दुष्परिणाम की ओर से सचेत कर रहे थे। लेकिन उनमें से कुछ लोगों के सिवा बाक़ी जंग, रक्तपात, धन-दौलत और पद के चक्कर में थे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की शहादत सिर्फ़ आत्मिक आयाम से न थी। उन्होंने इस रास्ते को पूरे विवेक के साथ चुना था। इन महान शहीदों को ईश्वर की ओर से उनके लिए स्वर्ग में स्थान के बारे में किए गए वादे पर पूरा विश्वास था और साथ ही उन्हें यह भी विश्वास था कि उनकी शहादत से उमवी शासन का पतन शुरु होगा। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथी न सिर्फ़ अपने दौर बल्कि पूरे इतिहास में सत्य प्रेमियों के लिए आदर्श हैं। दूसरी ओर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों को क़ैद करना भी आशूरा आंदोलन के प्रचार और यज़ीद बिन मोआविया के अत्याचारी शासन के चेहरे से नक़ाब उतारने में प्रभावी तत्व साबित हुआ। इस उच्च उद्देश्य की प्राप्ति ईश्वर पर भरोसे और सटीक, बुद्धिमत्तापूर्ण व दूरदर्शितापूर्ण योजना के बिना संभव न थी।      

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इस्लामी विचारकों के बीच एक और विषय पर चर्चा होती है और वह यह कि क्या आशूरा आंदोलन की तार्किकता इश्क़ से विरोधाभास रखती है? कुछ लोगों का यह ख़्याल है कि आशूरा आंदोलन भावना से प्रेरित था इसमें बुद्धिमत्ता का कोई रोल न था क्योंकि बुद्धि ऐसे आंदोलन का आदेश नहीं देती जिसका अंजाम शहादत हो। लेकिन इस्लामी दर्शनशासत्रियों का मानना है कि बुद्धि और इश्क़ एक दूसरे से अलग नहीं हैं और बुद्धि जब अपनी संपूर्णतः के चरण में पहुंचती है तो परमात्मा तक पहुंच जाती है। उस्ताद ग़ुलाम हुसैन दीनानी इस बारे में कहते हैं, "बुद्धि व इश्क़ के समन्वय को तरीक़त कहते हैं जो ईश्वर तक पहुंचने का सीधा रास्ता है। तरीक़त ईश्वर तक बिना किसी मध्यस्थ के सीधे पहुंचने का रास्ता है। तरीक़त में इश्क़ और बुद्धि एक दूसरे से अलग नहीं हैं। एक ही सिक्के के दो रुख़ हैं।" वह इस सच्चाई को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के वजूद में साक्षात बताते हुए कहते हैं, "इमाम हुसैन बुद्धि का साक्षात रूप हैं। बुद्धि का चरम हैं जो इश्क़ के रूप में प्रकट हुयी। यह बुद्धिमत्तापूर्ण इश्क़ है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बुद्धि उनका इश्क़ है और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का इश्क़ उनकी बुद्धि है।"

यद्यपि भौतिक दृष्टि से बुद्धिमत्ता के निकट बलिदान, शहादत, वफ़ादारी, सम्मान व अत्याचार से विरक्तता का कोई स्थान नहीं होता और इन बातों को वह भावना व निरर्थक उत्तेजना मानती है लेकिन इस्लाम के मद्देनज़र बुद्धिमत्ता में ये सभी विशेषताएं सही व तर्कपूर्ण हैं। बुद्धि व इश्क़ ईश्वरीय संदेश ‘वही’ की छात्रछाया में दो पर की तरह विकास करते हुए परिपूर्णतः तक पहुंचती है और यह वही सच्चाई है जो आशूर के अमर आंदोलन में अपने श्रेष्ठ रूप में ज़ाहिर हुयी। इसी वजह से डॉक्टर दीनानी कहते हैं, "आशूरा मेरी नज़र में इश्क़ और बुद्धि के संगम की महाघटना है जिसमें बुद्धि इश्क़ हो जाती है और इश्क़ बुद्धि हो जाता है। अगर इंसान इस चरण पर पहुंच जाए तो परिपूर्णतः के बहुत ऊंचे चरण पर पहुंच गया है।" इमाम हुसैन के जागरुकता भरे आंदोलन में जोश व भावना के साथ बुद्धिमत्ता शामिल होना इस बात का कारण बना कि उनका उद्देश्य लोगों की आत्मा को प्रभावित करे और सबके लिए यहां तक कि ग़ैर मुसलमान४ के लिए भी आदर्श बने।

ईरान के महान विचारक शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी इस बारे में कहते हैं,"इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अमर रहने का राज़ यह है कि उनका आंदोलन एक ओर तर्कपूर्ण है और उसमें बौद्धिक आयाम है तो दूसरी ओर भावनाओं की गहरायी तक पहुंचा हुआ है।"

 

 

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Nov २०, २०१७ १६:२९ Asia/Kolkata
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