आपको याद होगा हमने इस्लामी-ईरानी संस्कृति और पश्चिमी सभ्यता के बीच अंतर का उल्लेख किया था।

हालांकि इन दोनों सभ्यताओं ने एक दूसरे पर प्रभाव डाला है, लेकिन इस्लामी सभ्यता और पश्चिमी सभ्यता के बीच काफ़ी अंतर पाया जाता है।

चौथी हिजरी शताब्दी में इस्लामी सभ्यता विकास के चरम पर पहुंची। यह 11वीं ईसवी शताब्दी का काल था और इस काल में यूरोप अज्ञानता के अंधेरों में डूबा हुआ था। इस काल में इस्लामी जगत में बड़ी संख्या में विद्वान पैदा हुए, जिन्होंने इस्लामी सभ्यता की बुनियाद रखने में अहम भूमिका निभाई। इनमें से कई विद्वान ईरानी थे। फ़ाराबी एक ऐसे दक्ष विद्वान थे, जिन्होंने अपने बाद के विद्वनों को वैचारिक रूप से बहुत प्रभावित किया। फ़ाराबी का प्रभाव इतना गहरा है कि कहा जा सकता है कि उनके विचारों ने इस्लामी सभ्यता को फलने फूलने का अवसर प्रदान किया।

अबू नस्र फ़ाराबी

 

अबू नस्र फ़ाराबी का जन्म तुर्किस्तान के फ़ाराब शहर में 257 हिजरी में हुआ। उन्होंने फ़ाराब में ही शिक्षा ग्रहण की। दर्शनशास्त्र के लिए स्वयं को समर्पित करने से पहले वे फ़ाराब में न्यायपालिका से जुड़े हुए थे। उसके बाद उच्च शिक्षा ग्रहण के लिए वे बग़दाद गए और वहां महान विद्वानों से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने अन्य दार्शनिकों की भांति अपना जीवन शिक्षा ग्रहण करने, शिक्षा देने और किताबें लिखने में बिताया।

फ़ाराबी के काल में इस्लामी और ईसाई जगत के बीच शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में ध्यान योग्य आदान प्रदान शुरू हो चुका था। इस काल में मुस्लिम विद्वानों ने यूनानी किताबों का अरबी में अनुवाद शुरू कर दिया था। इन अनुवादों और मुसलमानों एवं ईसाईयों के बीच होने वाले वाद विवादों के कारण, मुस्लिम विद्वानों ने अन्य सभ्यताओं के तर्क-संबंधित ज्ञान में रूची दिखाई। ऐसी परिस्थितियों में फ़ाराबी नाम की एक प्रतिभाशाली हस्ती का उदय हुआ। फ़ाराबी ने न केवल पूर्व सभ्यताओं की तर्क-संबंधित विरासत को इस्लामी जगत तक स्थानांतरित किया, बल्कि उनके विकास और विस्तार में अहम भूमिका निभाई और इन विचारों एवं इस्लामी तार्किक विषयों के बीच एक गहरा रिश्ता जोड़ दिया। फ़ाराबी ने धर्म और दर्शनशास्त्र के बीच समन्वय बैठाने का अथक प्रयास किया। उनका मानना था कि इस्लाम और यूनानी दर्शनशास्त्र के बीच किसी तरह का कोई विरोधाभास नहीं है। हां अगर कहीं कोई मतभेद है भी तो वह बहुत ही आशिक है, जिसे दर्शन द्वारा हल किया जा सकता है।

फ़ाराबी को द्वितीय गुरू, इस्लामी दर्शन के संस्थापक और यूनानी तर्कशास्त्र को इस्लामी जगत तक स्थानांतरित करने वाले जैसे नामों से याद किया गया। ज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में उनके महत्व के लिए इतना ही कहना काफ़ी होगा कि अनेक व्याख्याकारों और लेखकों ने उन्हें महान मुस्लिम दर्शनशास्त्री माना है।

अनेक इतिहासकारों एवं पश्चिमी विद्वानों का मानना है कि मुसलमानों ने ज्ञान के क्षेत्र में और ज्ञान को यूनानी काल से रेनिसेंस काल तक स्थानांतरित करने में बहुत अहम भूमिका निभाई है। इस बीच, फ़ाराबी उन विद्वानों में से हैं, जिन्होंने अपनी किताबों में ज्ञान का वर्गीकरण किया और इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पहले ऐसे मुस्लिम विद्वान हैं, जिन्होंने ज्ञान के वर्गीकरण पर विशेष ध्यान दिया। उनकी किताब एहसाउल उलूम पश्चिमी एवं इस्लामी विद्वानों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई. उन्हें विभिन्न विषयों में जैसे कि तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, भौतिकविज्ञान, गणित, नैतिकशास्त्र और राजनीतिक शास्त्र में पूर्ण दक्षता प्राप्त थी और उन्होंने इन विषयों में 70 से अधिक किताबें लिखीं।  

फ़ाराबी की रचनाओं को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले भाग में उन किताबों को रखा जा सकता है, जो उन्होंने दूसरों की किताबों की व्यख्या में लिखी हैं और दूसरे भाग में वह किताबें जो उन्होंने ख़ुद लिखी हैं। फ़ाराबी की अधिकांश किताबें तर्कशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र और अफ़लातून एवं अरस्तू की किताबों की व्याख्या के संबंध में हैं। उनकी प्रसिद्ध किताबों आराए अहले मदीनए फ़ाज़िला और तहसीले सआदत का उल्लेख किया जा सकता है। फ़ाराबी ने इस किताब में ईश्वर और इंसान के कल्याण का उल्लेख किया है। इसके अलावा इस किताब का एक अन्य विषय समाज है। फ़ाराबी का मानना था कि समाज एक जानदार की भांति है, जिसके समस्त अंग और भाग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और उनके बाक़ी रहने के लिए उनका आपस में समन्वय एवं सहयोग ज़रूरी है। निःसंदेह मुस्लिम दर्शनशास्त्रियों के बीच, फ़ाराबी ऐसे दर्शनशास्त्री हैं, जिनके दर्शन में राजनीतिक रंग भी पाया जाता है।

फ़ाराबी को द्वितीय गुरु के नाम से भी जाना जाता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि अरस्तू के बाद जिन्हें प्रथम गुरु कहा जाता है, फ़ाराबी को द्वितीय गुरु क्यों कहा जाता है। इस सवाल का जवाब जानने से पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मुसलमानों ने ही अरस्तू को प्रथम गुरु का नाम दिया है, पश्चिमी दर्शनशास्त्रियों ने इसका इस्तेमाल इस्लामी शिक्षाओं से प्रभावित होकर किया है। कुछ लोगों का मानना है कि फ़ाराबी, अरस्तू के बाद सबसे महान विद्वान और उनके सबसे बड़े व्याख्याकार थे, इसलिए उन्हें द्वितीय गुरु का नाम दिया गया। कुछ अन्य शोधकर्ताओं का मानना है कि तर्कशास्त्र में फ़ाराबी की दक्षता के कारण उन्हें यह नाम दिया गया और ख़ुद अरस्तू को प्रथम गुरु तर्कशास्त्र के संकलन के कारण कहा गया। इसके अलावा कुछ दूसरे विद्वानों का कहना है कि फ़ाराबी को यह लक़ब दर्शनशास्त्र में नई विचारधारा की स्थापना के कारण दिया गया। इन लोगों का मानना है कि फ़ाराबी पहले मुस्लिम दर्शनशास्त्री थे।

इन तर्कों के तार्किक होने का इनकार किए बिना, इस बिंदु पर ध्यान देना चाहिए कि फ़ाराबी की रचनाएं एपिस्टिमोलॉजी की विभिन्न शैलियों की परिभाषा एवं विभिन्न इस्लामी विषयों के बीच संबंध पर बल देती हैं।

इस्लामी सभ्यता के विशेष वातावरण के मद्देनज़र, जिसमें एकेश्वरवाद और मानवीय जीवन में उसके प्रभाव पर ख़ास ध्यान दिया जाता है, स्पष्ट है कि फ़ाराबी ने इस्लामी सभ्यता में और उससे पहले अरस्तू ने यूनान में जो कार्य किया, इस्लामी दृष्टिकोण के मुताबिक़, इतना महत्वपूर्ण था कि उन्हें विशेष लक़ब या टाइटल दिया जाए। यहां तक कि मुस्लिम विद्वानों ने अरस्तू को प्रथम गुरु का नाम दिया। इसका मतलब है कि इस्लामी सभ्यता को रूप देने में फ़ाराबी की भूमिका के कारण ही उन्हें यह लक़ब दिया गया।

फ़ाराबी एक महान मुस्लिम दर्शनशास्त्री हैं। तर्क-संबंधित विषयों के इतिहास में विशेषकर अफ़लातून और अरस्तू के दर्शन की पुष्टि में और इन दोनों के दृष्टिकोणों को एक दूसरे के निकट लाने में और इस्लामी दर्शन के सिद्धांतों के आधार पर उन्हें परखने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। फ़ाराबी का मानना था कि दर्शनशास्त्र एक ऐसा विषय है, जिसका उद्देश्य वास्तविकता की खोज करना है, इसलिए दार्शनिक वास्तविकता एवं धार्मिक वास्तविकता के बीच समन्वय पाया जाता है। फ़ाराबी ख़ुद भी किन्दी और राज़ी जैसे दर्शनशास्त्रियों के ऋणी हैं।

किंदी पहले ऐसे दर्शनशास्त्री थे, जिन्होंने धर्म और दर्शन के बीच संबंध स्थापित किया और फ़ाराबी, इब्ने सीना और इब्ने रुश्द के लिए मार्ग प्रशस्त किया। मोहम्मद बिन ज़करिया राज़ी भी बुद्धि या तर्क को मूल मानते थे और उस पर पूर्ण रूप से भरोसा करते थे।

इन दर्शनशास्त्रियों से पहले इस्लामी जगत में दर्शनशास्त्र को दो भागों में बांटा जाता था। एक मश्शाई दर्शन, जो अरस्तू से संबंधित था। मश्शाई इसिलए कहा जाता था, क्योंकि अरस्तू अपने शिष्यों को चलते हुए पढ़ाते थे और उनके तर्क का आधार बुद्धि पर होता था। दूसरा दर्शन इश्राक़ कहलाता है, यह दर्शन पूर्वी एवं ईरानी दर्शनशास्त्रियों के बीच प्रचलित था, जिसे शेख़ शहाबुद्दीन सोहरवर्दी ने पुनर्जीवित किया। इसका आधार दिल से रहस्यों के पर्दे हटने और वास्तविकता को प्राप्त करने पर होता है। फ़ाराबी ने यूनान से प्रभावित होकर इस्लामी जगत में बुद्धि और दर्शन की भूमिका का विस्तार किया।                     

 

Feb ०५, २०१८ १४:१३ Asia/Kolkata
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