आपको याद होगा कि हमने यह बताया कि बहुत से पश्चिमी विद्वान व इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि मुसलमानों ने ज्ञान की उत्पत्ति की प्रक्रिया और मानव जाति की ज्ञान की विरासत को यूनान युग से पुनर्जागरण के युग तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया है।

इस बीच फ़ाराबी ऐसे विद्वानों में हैं जिन्होंने ज्ञान के वर्गीकरण में मूल योगदान दिया है। इसी तरह हमने यह बताया कि फ़ाराबी उन बड़े दार्शनिकों में हैं जिनका अफ़्लातून और अरस्तू के दर्शनशास्त्र को एक दूसरे के निकट करने और दर्शनशास्त्र के आधारों का इस्लामी शिक्षाओं के लाभ समन्वय बैजने में बहुत बड़ा स्थान है। फ़ाराबी का यह मानना है कि दर्शनशास्त्र का सिर्फ़ एक अर्थ है। इसका उद्देश्य सत्य की खोज है। इस प्रकार धार्मिक सत्य दार्शनिक सत्य एक दूसरे से समन्वित हैं।

 

इब्ने सीना 370 हिजरी क़मरी में बुख़ारा के निकट एक गांव में पैदा हुए। उस समय बुख़ारा सामानी शासन श्रंख्ला की राजधानी थी। इब्ने सीना के पिता सामानी शासन के कारिन्दों में थे और कुछ समय तक बुख़ारा के आस-पास के क्षेत्रों का शासन उनके हाथ में था। इब्ने सीना पांच साल की उम्र में अपने परिवार के साथ बुख़ारा गए और दस साल की उम्र तक उन्होंने क़ुरआन और अरबी साहित्य सीखा। जैसा कि वह ख़ुद कहते हैं कि उनके ज्ञान से लोग हैरत में पढ़ जाते थे। कुछ समय तक बोख़ारा में उन्होंने ज्यूरिसप्रूडेन्स अर्थात धर्मशास्त्र की शिक्षा हासिल की और फिर ‘नातली’ नाम के एक उस्ताद से तर्कशास्त्र की शिक्षा हासिल की। वे इस ज्ञान में बड़ी तेज़ी से तरक़्क़ी करते हुए अपने उस्ताद से आगे निकल गए और फिर अधिक ज्ञान के लिए उन्हें ख़ुद से अध्ययन करना पड़ा। 16 साल की उम्र में इब्ने सीना चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे स्थान पर पहुंचे कि बहुत से चिकित्सक व चिकित्सा विज्ञान के विद्वान उनसे परामर्श लेते थे। 18 साल की उम्र में उन्होंने तर्कशास्त्र, भौतिकशास्त्र, खगोल शास्त्र, ज्यामिती और गणित की शिक्षा हासिल की। उस वक़्त तक सिर्फ़ मेटाफ़िज़िक्स को छोड़ ऐसा कोई विषय न था जिसका उन्हें ज्ञान न हो। वह ख़ुद कहते हैं कि अरस्तू की मेटाफ़िज़िक्स का 40 बार अध्ययन किया मगर समझ में न आयी यहां तक कि जब फ़ाराबी की मेटाफ़िज़िक्स के उद्देश्य के बारे में किताब पढ़ी तब जाकर अरस्तू की किताब समझ में आयी।

इब्ने सीना इस्लामी काल के सबसे प्रभावी ईरानी चिकित्सक, दार्शननिक व विद्वानों में गिने जाते हैं। ‘क़ानून’, ‘शिफ़ा’, ‘अलइशारात’, ‘अलमब्दा वल मआद’ ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में उनकी मूल्यवान रचनाओं का एक भाग हैं। वह सिर्फ़ चिकित्सा विज्ञान और दर्शन शास्त्र में ही माहिर नहीं थे ब्लकि गणित, भौतिकशास्त्र, संगीत और शायरी में भी उनके अपने दृष्टिकोण थे। इस बात में शक नहीं कि इब्ने सीना इस्लामी ईरानी सभ्यता में ज्ञान के क्षेत्र की सबसे मशहूर हस्तियों में हैं क्योंकि उन्होंने भी फ़ाराबी की तरह विज्ञान के वर्गीकरण में प्रभावी योगदान दिया। जैसा कि इस संदर्भ में उनकी किताब ‘रिसालतुन फ़ी अक़्सामिल उलूमिल अक़लिया’ इस बात की गवाह है। इब्ने सीना ने इसी तरह गणित में तर्कशास्त्र का उपयोग किया। उन्होंने यह साबित किया कि ज्ञान की प्राप्ति सिर्फ़ एक शैली से नहीं बल्कि कई शैलियों से मुमकिन है।  उन्होंने अपने दौर में दर्शनशास्त्र को उच्च स्थान दिलाया। उन्होंने गणित के साथ साथ बतलीमूस या टॉलमी द्वारा खगोल शास्त्र में गणित के इस्तेमाल के विषय की समीक्षा की। यह बात अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर यह कहें कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में ‘शिफ़ा’ किताब की रचना है। इस किताब में इब्ने सीना ने अरस्तू के दर्शनशास्त्र को इस्लामी पैराए में पेश किया कि जिसका न सिर्फ़ इस्लामी दर्शनशास्त्र बल्कि पश्चिमी विद्वानों के विचारों पर भी प्रभाव पड़ा।

इब्ने सीना अरस्तू के दर्शनशास्त्र से प्रभावित थे। उन्होंने इस्लामी जगत में दर्शनशास्त्र के ‘मशाई’ नामक पंथ को प्रचलित किया। उन्हें ईश्वर के वजूद को साबित करने के लिए ‘बुरहाने सिद्दीक़ीन’ नामक शैली का प्रवर्तक कहा जाता है। इस शैली के तहत ईश्वर के वजूद को उसी के ज़रिए साबित किया जाता है। उन्होंने प्रलय के संबंध में भी साफ़ तौर पर कहा है कि इस दिन इंसान का शारीरिक रूप से जीवित होना दर्शन शास्त्र व तर्कशास्त्र के ज़रिए साबित नहीं किया जा सकता लेकिन चूंकि सच्चे ईश्वरीय दूत ने इसका एलान किया है इसलिए हम इसे स्वीकार करते हैं। इब्ने सीना के दर्शनशास्त्र का इस्लामी दर्शन शास्त्र पर और फिर इसके बाद मध्ययुगीन शताब्दियों में योरोपीय दर्शनशास्त्र पर बहुत असर पड़ा। इब्ने सीना ने मशाई मत में रचनात्मकता पैदा की ओर अरस्तू की बहुत सी अस्पष्ट बातों को स्पष्ट किया।

इब्ने सीना ने अपने दार्शनिक विचारों को मुसलमानों की आम आस्था के मुताबिक़ ढालने की बहुत कोशिश की। वह सभी विषयों पर सिर्फ़ बुद्धि के ज़रिए बहस करते थे। यही वजह है कि बहुत से लोगों ने जो सिर्फ़ धर्म के विदित अर्थ को समझते हैं, इब्ने सीना पर नास्तिक होने का इल्ज़ाम लगाया। इस तरह के लोग इब्ने सीना की किताबों को जलाने की बात करते थे। मिसाल के तौर पर इब्ने सीना के 60 साल बाद ग़ज़ाली ने अपनी किताब में दर्शन शास्त्र की समीक्षा में इब्ने सीना को नास्तिक कहा था। ग़ज़ाली ने इसलिए इब्ने सीना को नास्तिक कहा क्योंकि तीन विषयों पर जिसमें से एक इंसान के शारीरिक रूप से प्रलय के दिन लौटने के विषय पर ऐसी बातें कही थीं जो धर्म की विदित बातों से मेल नहीं खातीं। इतिहास में न तो इब्ने सीना अकेले दार्शनिक हैं जिन्हें नास्तिक कहा गया और इसी तरह ग़ज़ाली अकेले धर्मगुरु नहीं हैं जिन्होंने दार्शनिक पर नास्तिक होने का इल्ज़ाम लगाया। इब्ने सीना के बाद शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी, मुल्ला सद्रा सहित बहुत से दार्शनिकों पर नास्तिक होने का इल्ज़ाम लगा। ग़ज़ाली ऐसे मत के अनुयायी थे जो सिर्फ़ धार्मिक ग्रंथ के सिर्फ़ विदित अर्थ को क़ुबूल करते हैं इसमें निहित अर्थ को नहीं मानते। इस्लामी जगत के वैचारिक मंच पर इब्ने सीना को नास्तिक कहना इतना आम था कि अहम इस्लामी संप्रदायों ख़ास तौर पर सुन्नी संप्रदाय ने उनके दर्शन शास्त्र को पूरी तरह नकार दिया था। ग़ज़ाली के बाद इब्ने रुश्द जैसे दार्शनिकों ने इब्ने सीना को फिर से इस्लामी जगत में पहचनवाने की कोशिश की लेकिन इब्ने सीना के विचारों का फिर उस तरह से स्वागत नहीं हुआ जैसा पहले था। इस बात में शक नहीं कि इस विषय और इस्लामी सभ्यता के पतन में गहरा संबंध लगता है।              

यूं तो इब्ने सीना ने बहुत सी किताबें लिखीं लेकिन उनकी दो किताबें ‘शिफ़ा’ और ‘क़ानून’ यूरोप में चिकित्सा विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान व दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में रेफ़्रेन्स बुक के तौर पर प्रचलित थीं। इब्ने सीना चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत ही मशहूर हकीम थे जिन्होंने बुक़रात और जालीनूस की विरासत को आपस में मिलाया। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, 12वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक इब्ने सीना की शिक्षाएं चिकित्सा क्षेत्र में सैद्धांतिक व व्यवारिक दोनों आयाम से आधार समझी जाती थीं। इब्ने सीना की ‘क़ानून’ किताब का जेरार्ड केरमोनाई ने 1150 से 1187 के बीच अनुवाद किया। इस किताब का कुल 78 बार अनुवाद हुआ अलबत्ता इसमें से कई बार इस किताब के किसी विशेष भाग का अनुवाद हुआ। ज़्यादातर अनुवाद लैटिन ज़बान में हुआ। कई बार हिब्रू ज़बान में स्पेन, इटली और दक्षिणी फ़्रांस में भी अनुवाद हुआ। इब्ने सीना की चिकित्सा विज्ञान की किताबों का अनुवाद उनकी दर्शन शास्त्र की किताबों के जितना अच्छा नहीं हुआ। उनकी चिकित्सा विज्ञान की किताबों में कुछ यूनानी शब्द बदल गए और उन्हें अरबी शब्द में पेश किया गया जिनका अर्थ स्पष्ट नहीं है। इसी तरह अरबी में कुछ तकनीकी शब्दावली को लैटिन शब्द में पेश किया गया है जिसका अर्थ स्पष्ट नहीं है। इसके बावजूद ‘क़ानून’ किताब यूरोप की सभी यूनिवर्सिटियों में चिकित्सा विज्ञान का आधार रही है।

इब्ने सीना ने इस्लामी सभ्यता के फलने फूलने में प्रभावी योगदान तो दिया ही है साथ ही उन्होंने योरोप में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में पश्चिमी सभ्यता पर गहरी छाप छोड़ी है। आज दुनिया में वैज्ञानिक व सांस्कृतिक मंच पर उनके योगदान को सराहा जा रहा है। मिसाल के तौर पर चार साल पहले इस्लामी गणतंत्र ईरान की कोशिश और यूनेस्को के समर्थन से बेलारूस में ‘क़ानून’ किताब के 1000 साल पूरे होने पर एक कॉन्फ़्रेंस का आयोजन हुआ। यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बुकोवा ने इस सम्मेलन के नाम संदेश में इब्ने सीना के वैज्ञानिक योगदान की सराहना करते हुए कहा, “बड़े गर्व की बात है कि पूरब की प्रतीभा इब्ने सीना की इंसान की शरीर रचना के बारे में पहली विश्वकोष समझी जाने वाली क़ानून किताब की हज़ारवीं सालग्रह पर, उनकी याद में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस में भाग लेकर गर्व महसूस कर रही हूं। मेरे लिए फ़ख़्र की बात है कि इस्लाम के स्वर्णिम काल के इस महान विद्वान को श्रद्धांजली दूं। वह ईरान में पैदा हुए और उनकी अधिकांश किताबें अरबी में हैं लेकिन पूरी मानवता के लिए हैं क्योंकि उनकी किताब से शताब्दियों तक यूरोप और एशिया में रेफ़्रेन्स बुक के तौर पर फ़ायदा उठाया जाता रहा।”

यूनेस्को की महानिदेशक ने इस संदेश में क़ानून किताब की 1000वीं सालग्रह को चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नई वैज्ञानिक शैली का पता लगाने के लिए एक अवसर की संज्ञा देते हुए कहा कि यूनेस्को ने इस वर्षगांठ को नई वैज्ञानिक शैलियों का पता लगाने के लिए विशेष किया है। इब्ने सीना की ज़िन्दगी का, कि जिन्होंने अध्ययन और विज्ञान की प्रगति के लिए अनेक सफ़र किए, यह संदेश है कि विज्ञान की कोई सीमा नहीं होती।

 

Feb ०५, २०१८ १४:३३ Asia/Kolkata
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