हमने बताया था कि इस्लाम के आगमन और विभिन्न राष्ट्रों व जातियों के बीच उसके तेज़ी से फैल जाने और फिर उसमें विभिन्न मानवीय संस्कृतियों के जुड़ जाने से एक महान और मज़बूत सभ्यता की आधार शिला रखी गई जिसमें विभिन्न राष्ट्र व जातियों की भागीदारी थी।

ये राष्ट्र, इस्लामी मान्यताओं के सहारे एक ऐसी सभ्यता की आधार शिला रखने में सफल हुए जिसे इस्लामी सभ्यता कहा जाता है। इस सभ्यता ने, एक धर्म अर्थात इस्लाम और एक भाषा अरबी के माध्यम से विभिन्न जातियों व गुटों को एकजुट कर दिया। यह सभ्यता महानता व परिपूर्णता के उस चरण तक पहुंच गई कि उसके सभी आयामों के बारे में ज्ञान हासिल करना बहुत मुश्किल है।

ख़ारज़मी

 

इसी तरह हमने इशारा किया कि इस स्वर्णिम काल की विशेषताओं में से एक उन बुद्धिजीवियों, ज्ञानियों और दार्शनिकों का अस्तित्व है जो अपने समय के सबसे प्रतिष्ठित और दक्ष लोग थे। ये ज्ञानी, भौतिक ज्ञानों में भी और धार्मिक ज्ञानों व दर्शनशासत्र में भी बेजोड़ दक्षता रखते थे और उन्होंने ऐसे ऐसे ज्ञानों का आधार रखा जिससे शताब्दियों बाद तक पश्चिमी सभ्यता तृप्त होती रही। पिछले दो कार्यक्रमों में इस काल के दो महान ज्ञानियों के रूप में फ़ाराबी और इब्ने सीना के प्रयासों के बारे में चर्चा की गई थी।

 

जाबिर इब्ने हय्यान और ख़ारज़मी दूसरी शताब्दी हिजरी के दो इस्लामी विद्वान थे। जाबिर इब्ने हय्यान पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे आलेही व सल्लम के मदीना पलायन के लगभग सौ साल बाद ईरान के तूस नगर में पैदा हुए और बग़दाद में हारून रशीद के दरबार में सरकारी हकीम नियुक्त हुए। वे हमेशा इस सोच में रहते थे कि तांबे और सीसे जैसी सस्ती धातों को सोने में बदल दें। हालांकि उन्हें इस काम में सफलता नहीं मिली लेकिन उन्हें प्रायोगिक रसायनशास्त्र की आधारशिला रखी। उनके महत्वपूर्ण काम भौतिकशास्त्र, दर्शनशास्त्र, चिकित्सा और रसायनशास्त्र के क्षेत्र में हैं। बुद्धिजीवियों ने जाबिर इब्ने हय्यान को दार्शनिक, गणितज्ञ, चिकित्सक, खगोलशास्त्री, तर्कशास्त्री, अंतरिक्ष विज्ञानी, लेखक इत्यादि के रूप में याद किया है जिससे उनके ज्ञान व दक्षता का पता चलता है।

ख़ारज़मी का जन्म वर्ष 159 हिजरी क़मरी में ख़ारज़्म नामक क्षेत्र में हुआ था। वे इस्लामी जगत के सबसे पहले अहम गणितज्ञ थे। उन्होंने भारतीय ज्ञानों की प्राप्ति के लिए भारत की भी यात्रा की और भारत के अंकों और आंकड़ों से परिचित हुए। अपने इन अनुभवों को उन्होंने किताबों में भी लिखा है। ख़ारज़्मी की जब्र व मुक़ाबला नामक किताब के लैटिन भाषा में अनुवाद के बाद गणित के क्षेत्र में क्रांति आ गई। यह अलजब्रा के ज्ञान में पहली इस्लामी किताब थी और लैटिन में इसका अनुवाद अलगोरिद्म के नामसे हुआ और इस प्रकार पश्चिमी गणितज्ञों ने ख़ारज़मी का नाम लेगारिद्म रख दिया जो ख़ुद उन्होंने गणित के एक विषय के लिए निर्धारित किया था।

 

अबू बक्र मुहम्मद ज़करिया राज़ी भी इस्लामी सभ्यता को अस्तित्व प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले विद्वानों में से एक थे। उनका जन्म वर्ष 258 हिजरी क़मरी में तेहरान के निकट स्थित रैय शहर में हुआ और वर्ष 339 में उसी शहर में उन्होंने दुनिया से आंखें बंद कीं। जब उनकी आयु दस साल थी तभी उनके पिता का निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने रैय शहर में जो उस समय ज्ञान का एक अहम केंद्र था और वहां अनेक मस्जिदें, विद्यालय और शिक्षा केंद्र थे, गणित, दर्शन, खोगलशास्त्र और साहित्य की शिक्षा प्राप्त की। इन विषयों को पढ़ते समय वे रसायनशास्त्र की ओर उन्मुख हुए और फिर इसी के हो कर रह गए। वे जाबिन इब्ने हय्यान को रसायनशास्त्र में अपना गुरू मानते थे।

अबू बक्र मुहम्मद ज़करिया राज़ी

 

मुहम्मद ज़करिया राज़ी ने तांबे को सोने में बदलने के लिए अथक प्रयास किए और इस राह में उनकी आंखों को भी काफ़ी नुक़सान पहुंचा। उन्होंने 30 साल की उम्र से रैय शहर में चिकित्सा विज्ञान अर्जित करना शुरू किया और फिर बग़दाद की यात्रा की क्योंकि तीसरी शताब्दी हिजरी या नवीं शताब्दी ईसवी में बग़दाद, चिकित्सा व अन्य विज्ञानों की किताबों के अनुवाद के लिए बहुत प्रख्यात था और उस काल के शासकों द्वारा अस्पताल बनवाए जाने के कारण बड़े बड़े विद्वान और चिकित्सक बग़दाद में एकत्र हो गए थे जिससे चिकित्सा विज्ञान सीखने के लिए अच्छा वातावरण उत्पन्न हो गया था।

मुहम्मद ज़करिया राज़ी ने चिकित्सा विज्ञान में बेजोड़ कारनामे पेश किए हैं और इसी तरह औषधि विज्ञान में भी उनके प्रयासों से काफ़ी विकास हुआ। राज़ी ने अलकोहल व सल्फ़्यूरिक एसिड की खोज व उनकी विशेषताओं की पहचान करके औषधि विज्ञान में एक नया अध्याय खोल दिया। उन्होंने इन दोनों पदार्थों को मिला कर कई नई दवाएं बनाईं और चिकित्सा विज्ञान की बड़ी सेवा की। वास्तव में कहना चाहिए कि  अगर चिकित्सा व रसायनशास्त्र में मुहम्मद ज़करिया राज़ी की सेवाओं की अनदेखी कर दी जाए तब भी औषधि विज्ञान में उन्होंने जो काम किए हैं उनके चलते उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।

 

अबू रेहान अलबीरूनी भी उन विद्वानों में से एक थे जिन्होंने इस्लामी सभ्यता को अस्तित्व प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म वर्ष 362 में ख़ारज़्म में हुआ। उन्होंने सुलतान महमूद ग़ज़नवी के साथ भारत की यात्रा की और उस देश की समृद्ध संस्कृति को अच्छी तरह समझने के लिए संस्कृत भाषा सीखी। इस यात्रा के बाद उन्होंने भारत के धर्मों और रीति-रिवाजों के बारे में एक किताब लिखी। बीरूनी ने लगभग 180 किताबें लिखी हैं जिससे पता चलता है कि ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें कितनी दक्षता प्राप्त थी।

अबू रेहान अलबीरूनी ने अनेक दृष्टिकोण पेश किए जिन्हें उनसे पहले किसी ने भी बयान नहीं किया था। उन्होंने इसी तरह सबसे पहले ज़मीन के स्थिर न होने का दृष्टिकोण पेश किया और विभिन्न शहरों में क़िब्ले की दिशा के निर्धारण का तरीक़ दुनिया के सामने पेश का। अलबीरूनी ने गणित, खगोलशास्त्र, भुगोल, भौतिकशास्त्र और रसायनशास्त्र में भी अनेक अहम कारनामे अंजाम दिए हैं। इन ज्ञानों में उनकी अनेक किताबें आज भी मौजूद हैं। अबू रेहान अलबीरूनी की किताबों का अनुवाद लैटिन भाषा में कम ही हुआ जिसके चलते वे पश्चिम वालों के लिए कुछ समय पहले तक अंजान बने रहे।

अबू रेहान अलबीरूनी

 

इब्ने हैसम भी इस्लामी जगत के अहम विद्वानों में से एक हैं। उनका जन्म वर्ष 354 हिजरी क़मरी में अहवाज़ नगर में हुआ और सन 430 हिजरी में क़ाहेरा में उनका निधन हुआ। उन्हें ज्ञान प्राप्ति का बड़ा शौक़ था और यह शौक़ उस समय पैदा हुआ जब उन्हें यह आभास हुआ कि तक शास्त्र से ईश्वर के निकट नहीं हुआ जा सकता। इसी लिए वे भौतिक ज्ञानों और दर्शनशास्त्र की ओर उन्मुख हुए। उन्हें ज्ञान प्राप्ति का इतना शौक़ था कि उन्होंने बसरा शहर में अपना मंत्री पद त्याग दिया और ज्ञानार्जन के लिए मिस्र रवाना हो गए।

इब्ने हैसम ने खगोलशास्त्र, गणित और भौतिकी में सौ किताबें और पुस्तिकाएं लिखी हैं जिनमें से अधिकांश का अब पता नहीं है। उन्होंने प्रकाश के बारे में सटीक प्रयोग किए जिसके चलते उन्हें इस क्षेत्र का सबसे दक्ष व्यक्ति माना जाता है। उन्होंने प्रकाश के बारे में जो प्रयोग किए उन्हीं के चलते आगे चल कर कैमरा, फ़िल्म कैमरा और प्रोजेक्टर का आविष्कार हुआ। उन्होंने कैमरे में खींची गई तस्वीरों को छापने के लिए डार्क रूप का दृष्टिकोण भी पेश किया और आंख के विभिन्न भागों के बारे में भी विस्तार से बताया।

इब्ने हैसम

 

ख़ाजा नसीरुद्दीन तूसी भी इस्लामी सभ्यता के चरम के काल के विद्वानों में से एक हैं। उनका जन्म वर्ष 598 हिजरी क़मरी में ईरान के तूस शहर में हुआ। उन्हें ज्ञान व शिक्षा का बहुत शौक़ था और कोशारावस्था और युवाकाल में ही वे गणित, खगोलशास्त्र और दर्शन में अपने समय के प्रख्यात विद्वानों में गिने जाने लगे थे। ख़ाजा नसीर इस्लाम के वैचारिक इतिहास के सबसे प्रभावी लोगों में से एक हैं। उन्होंने मंगोलों के हमले के समय, विद्वानों की किताबों को सुरक्षित रखने और नई इस्लामी सभ्यता को अस्तित्व प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। कहा जाता है कि ज्ञान में वे अबू अली सीना के समान थे बस उन्हें चिकित्सा नहीं आती थी जबकि अबू अली सीना दक्ष चिकित्सक भी थे।

ख़ाजा नसीरुद्दीन तूसी

 

ख़ाजा नसीरुद्दीन तूसी भी अबू अली सीना की तरह राजनीति में आए, हालांकि ये काम उनकी अपनी मर्ज़ी से नहीं हुआ था। हलाकू ख़ान को जब उनके ज्ञान के बारे में पता चलता तो उसने उनकी हत्या नहीं होने दी और उन्हें अपने साथ रख लिया। मंगोल शासकों को इस्लाम की ओर उन्मुख करने में ख़ाजा नसीर का बड़ा हाथ था। उन्होंने बग़दाद पर विजय में हलाकू ख़ान का बड़ा साथ दिया जिससे हलाकू उनसे बहुत प्रभावित हो गया था। ख़ाजा नसीरुद्दीन तूसी ने अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवन और अपने समय के राजनैतिक, सामाजिक और सामरिक दबाव के बावजूद विभिन्न ज्ञानों में 190 से अधिक किताबें और पुस्तिकाएं लिखी हैं।

 

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Feb ०५, २०१८ १५:३० Asia/Kolkata
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