हमने यमन में होने वाले परिवर्तनों की समीक्षा की थी।

इसी प्रकार हमने यमन की क्रांतिकारी सरकार को गिराने और अंसारुल्लाह संगठन को समाप्त करने के लिए सऊदी अरब और उसके घटकों द्वारा किये जाने वाले पाश्विक हमलों की समीक्षा की थी। इसी प्रकार हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि सऊदी अरब ने यमन पर जो हमला किया है वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ है और उसने इस्लामी जगत के मध्य तनाव को अधिक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

बहरैन फार्स की खाड़ी का सबसे छोटा और 32 द्वीपों से मिलकर बना देश है। मनामा इस देश की राजधानी है और अरबी वहां की राजभाषा है। इसके अलावा फारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी भी वहां बोली जाती है। सासानियों के काल से अर्थात दो हज़ार से अधिक वर्षों से बहरैन ईरान का भाग रहा है परंतु वर्ष 1522 से 1602 तक वह पुर्तगालियों के अधिकार में रहा। वर्ष 1602 में पुर्तगालियों को फार्स की खाड़ी से निकाल दिये जाने के बाद बहरैन एक बार फिर ईरान का भाग बन गया और वहां वर्ष 1971 तक ईरान का शासन रहा यहां तक कि राष्ट्रसंघ ने मध्यस्थता की और ईरानी सरकार के स्वीकार कर लैने के बाद यह द्वीप फार्स खाड़ी का एक स्वतंत्र देश बन गया जबकि इससे पहले तक बहरैन ईरान का एक प्रांत था। 706 वर्ग किलोमीटर बहरैन का क्षेत्रफल है और इसकी जनसंख्या लगभग 10 लाख है जिसमें 70 प्रतिशत शीया हैं और बाकी 30 प्रतिशत में सुन्नी, ईसाई, यहूदी और दूसरे धर्मों के अनुयाई हैं। शैख हमद बिन ईसा आले ख़लीफा वर्ष 1999 से अब तक इस देश के नरेश हैं और लिबरल, वामपंथी और धार्मिक पार्टियों सहित लगभग 15 पार्टियां इस देश में सक्रिय हैं।

बहरैन के शीया मुसलमानों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है। एक अरब शीया और दूसरे ग़ैर अरब शीया। 20 प्रतिशत ईरानी मूल के लोग बहरैन के गैर अरब शीया हैं और वे बहरैन के एक स्वतंत्र देश बनने से पहले ही वहां जाकर बस गये थे। ईरानी कब बहरैन गये इसकी तिथी निर्धारित नहीं की जा सकती क्योंकि ईरानी सदैव वहां थे। इसके विपरीत कुवैत और संयुक्त अरब इमारात में बहुत से ईरानियों ने इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद या उससे पहले पलायन किया जबकि ईरानी सदैव बहरैनी जनसंख्या का भाग रहे हैं। जो ईरानी बहरैनी नागरिक हो चुके हैं और वे वर्षों से वहां रह रहे हैं सालों का समय बीत जाने के बाद भी उनकी भाषा, संस्कृति और परम्परायें बदली नहीं हैं और अब भी वे पूर्णरूप से बाकी हैं। जो ईरानी बहरैनी हो चुके हैं वर्षों का समय बीत जाने के बावजूद उनकी मातृभाषा फारसी है और वे अपने घरों में फारसी में बात करते हैं और अरबी को उनके लिए दूसरी भाषा समझा जाता है।

 

बहरैन की जनसंख्या का दूसरा भाग अरब शीयों के है जिनका प्राचीन समय से ईरान से विस्तृत संबंध रहा है। इन संबंधों के महत्वपूर्ण मोड़ का संबंध सफवी काल से है अर्थात लगभग 500 वर्ष पुराना है और उस काल में शीया ईरान का आधिकारिक धर्म था। उस दौर में और उसके बाद के वर्षों में बहरैन के शीया धर्मगुरू ईरान आकर शीया धर्म का प्रचार- प्रसार करते थे और ये धर्मगुरू ईरान और इस्लामी जगत के मध्य संपर्क सेतु की भूमिका निभाते थे।

बहरैन में विभिन्न जाति व धर्म के लोग रहते हैं परंतु सबसे अधिक शीया हैं। रोचक बात यह है कि वहां तानाशाही और ग़ैर शीया सरकार है जबिक सुन्नी मुसलमान अल्पसंख्या में हैं। बहरैन का राजनीतिक नेतृत्व आले ख़लीफा के हाथों में है और बहुसंख्या में होने के बावजूद शीया मुसलमानों की सत्ता में भागीदारी न के बराबर है। आले ख़लीफा शासन सऊदी अरब से गहरा संबंध रखता है और वह शीयों के शक्तिशाली होने से डरता है। इसी कारण और बहरैनी जनसंख्या का ताना बाना बदलने के लक्ष्य से मनामा सरकार ने पिछले कई वर्षों से नई नीति अपनाई है जिसके कारण जार्डन, फिलिस्तीन, लेबनान, सऊदी अरब और मिस्र सहित बहुत से देशों के नागरिकों के लिए बहरैन पलायन की भूमि प्रशस्त हो गयी है और इन देशों के बहुत से नागरिकों ने बहरैन पलायन करवाया है परंतु इसके बावजूद शीया मुसलमान अब भी वहां बहुसंख्या में हैं। इसके अलावा बहरैन की तानाशाही सरकार शीया मुसलमानों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं दे रही है और उनके नागरिक अधिकारों और उनकी नागिरकता को समाप्त कर रही है जो उनकी अप्रसन्नता का कारण बनी है। शीया मुसलमानों की अप्रसन्नता और सुधार के लिए इस देश की तानाशाही सरकार ने जो वादे किये थे उसका पालन न किया जाना बहरैनी समाज में अशांति का मुख्य कारण है परंतु 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में बहरैन में जो जनक्रांति आरंभ हुई उसे इस देश के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ समझा जाना चाहिये। बहरैन में जो परिवर्तन आरंभ हुए वह 14 फरवरी 2011 को शुरु हुए और वे टयूनीशिया, मिस्र, जार्डन, यमन और लीबिया में होने वाले परिवर्तनों से प्रभावित थे। उस समय से लेकर आज तक इस देश में आले खलीफा की तानाशाही सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण जनप्रदर्शन होते रहे हैं। बहरैन की तानाशाही सरकार ने लोगों की वैध मांगों पर ध्यान देने के बजाये उनके दमन की नीति अपनाई जो अब तक जारी है। यही नहीं बहरैनी सरकार ने इस देश में जारी जनान्दोलन के दमन के लिए सऊदी सैनिकों को भी बुला लिया है और ये सैनिक मार्च 2011 से बहरैन में दाखिल हुए और उस समय से वे बहरैनी सुरक्षा बलों के साथ मिलकर इस देश में जारी शांतिपूर्ण जनांदोलनों को निर्ममता से कुचल रहे हैं परंतु बहरैन में सऊदी सैनिकों की उपस्थिति से न केवल आले खलीफा सरकार की स्थिति को बेहतर बनाने में कोई सहायता नहीं मिली बल्कि बहरैनी जनता के विरोध, क्रोध और घृणा में और गति आ गयी। बहरैन की तानाशाही सरकार ने इस देश की जनता की वैध मांगों पर ध्यान नहीं दिया और उसके दमन के लिए सऊदी सैनिकों को बुला लिया यह  सरकार के विरुद्ध लोगों की आपत्तियों में वृद्धि का कारण बना यहां तक कि लोग पहले आले खलीफा सरकार द्वारा सुधार कार्य किये जाने की मांग कर रहे थे पर अब वे अपनी मांग परिवर्तित करके बहरैन की तानाशाही सरकार के स्थान पर लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना की मांग कर रहे हैं।  

    

 

इस संबंध में तमर्रुद आंदोलन के समर्थकों ने “तूफाने तमर्रुद” शीर्षक के अंतर्गत आले खलीफा सरकार के खिलाफ पहला शांतिपूर्ण प्रदर्शन 14 अगस्त 2013 को देश के विभिन्न क्षेत्रों में किया। “तमर्रुद” आंदोलन के समर्थकों ने बहरैन के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर “इस्क़ातुन नेज़ाम” जैसे नारे लगाये और उस दिन होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में जनता के हाथों बहरैन के भविष्य के निर्धारण पर बल दिया गया। बहरैन में तमर्रुद आंदोलन की ओर से आले खलीफा सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण जनप्रदर्शन करने की घोषणा के बाद आले ख़लिफ़ा के सुरक्षा बलों ने भी समूचे देश में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी और जनांदोलनों के दमन के लिए उन्होंने विषैली गैस सहित दूसरे हथियारों व शैलियों का प्रयोग किया। इस प्रकार से कि कुछ प्रदर्शनकारियों को दम घुटने की समस्या का सामना करना पड़ा। बहरैन का तमर्रुद अथवा असहयोग आंदोलन मिस्र की तानाशाही सरकार को गिराने के लिए चलाए गए आंदोलन को देखकर था। बहरैन में आले खलीफा की सरकार की ओर से जनता के दमन में वृद्धि हो जाने और आज़ादी व डेमोक्रेसी की मांग को प्राप्त करने के लिए तमर्रुद आंदोलन गठित हुआ था और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में जारी रहा। बहरैन में तानाशाही सरकार की विरोधी पार्टियों व दलों की घोषणा के अनुसार 14 फरवरी 2011 को इस देश में आरंभ होने वाले विरोधों व शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में आले खलीफा के सुरक्षा बलों में कम से कम 135 लोगों को शहीद कर दिया। इसी प्रकार इन प्रदर्शनों ने 10 हज़ार से अधिक लोग घायल हो गये जबकि 2900 से अधिक को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी प्रकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में भाग लेने के आरोप में 800 लोगों को उनके कार्यों से हटा दिया गया।

इसी प्रकार बहरैनी संसद ने 29 जुलाई को लोगों को एकत्रित होने और बहरैन में प्रदर्शन करने से संबंधित कानून को परिवर्तित कर दिया। नये कानून के अनुसार राजधानी मनामा में हर प्रकार के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया गया और घोषणा कर दी गयी कि मनामा में हर प्रकार का प्रदर्शन और उसमें भाग लेना गैर कानूनी है और जो लोग इन प्रदर्शनों में भाग लेंगे उनकी नागरिकता समाप्त कर दी जायेगी। इस कानून के पारित हो जाने के बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार आयोग ने बहरैनी संसद के इस कदम की आलोचना की और एक विज्ञप्ति जारी करके घोषणा की कि बहरैन की संसद ने प्रदर्शन से संबंधित और आतंकवादी गतिविधियों से मुकाबले के बहाने जो परिवर्तन किये हैं उससे इस देश की मानवाधिकार की स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इस विज्ञप्ति में बहरैनी संसद की ओर से बनाये जाने वाले कानून को निरस्त किये जाने की मांग के साथ बल देकर कहा गया कि नागरिकता एक मौलिक अधिकार है और राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार घोषणापत्र के 15वें अनुच्छेद में उस पर बल दिया गया है।

 

बहरैनी नागरिकों की नागरिकता समाप्त करना और दूसरे देशों के नागरिकों को वहां लाकर बसाना और उन्हें बहरैन की नागरिकता देना उस स्ट्रैटेजिक नीति का पूरक है जिसे आले खलीफा की सरकार ने अपनाया है। बहरैनी लोगों की नागरिकता समाप्त करने में विश्व के समस्त देशों में आले खलीफा की सरकार का पहला स्थान है जबकि नागरिकता के अधिकार के सम्मानित होने के कारण वह मानवाधिकारों का खुला हनन है।

आले खलीफा सरकार द्वारा बहरैनी नागरिकों की नागरिकता समाप्त करने और मानवाधिकारों के हनन के संबंध में इस देश के मानवाधिकार केन्द्र के एक सक्रिय सदस्य नेज़ाल आले सलमान ने कहा है कि वर्ष 2012 से अब तक लगभग 280 बहरैनी नागरिकों की नागरिकता समाप्त की जा चुकी है। इसी संबंध में बहरैन के गृहमंत्रालय ने इस देश के एक वरिष्ठ शीया धर्मगुरू शैख ईसा अहमद कासिम पर इस देश में साम्प्रदायिकता के प्रचार का आरोप लगाया और घोषणा की है कि उसने शैख ईसा कासिम की नागरिकता समाप्त कर दी है। बहरैनी सरकार के इस कदम से लोगों के दमन में मनामा सरकार और उसके समर्थकों व घटकों की नीतियां पहले से अधिक स्पष्ट हो गयी हैं और उसके इस कदम से इस्लामी जगत में फूट और मतभेद में वृद्धि हो गयी है। क्योंकि बहरैन की तानाशाही सरकार ने इस देश के लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और उनकी कानूनी मांगों का जवाब देने के बजाये इस्लामी गणतंत्र ईरान पर आरोप लगाया है कि वह बहरैन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है जबकि ईरान और बहरैनी जनता के मध्य गहन धार्मिक व सांस्कृतिक समानता होने के बावजूद ईरान ने सदैव इस बात का कड़ाई से खंडन किया है कि वह बहरैन सहित किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। ईरान का कहना है कि बहरैन की सरकार को विदेशियों विशेषकर सऊदी अरब के हस्तक्षेप को रोकना चाहिये था और इस देश के लोगों के कानूनी अधिकारों को मान्यता देकर जनप्रदर्शनों को समाप्त करने की भूमि प्रशस्त करनी चाहिये थी और उसे इस्लामी देशों के मध्य मतभेदों को हवा देने का काम नहीं करना चाहिये।

 

इस बीच अमेरिका बहरैन के साथ स्ट्रैटेजिक संबंध होने विशेषकर फार्स की खाड़ी में अमेरिका का पांचवां बेड़ा मौजूद होने के कारण वह बहरैन और अपने समर्थक सऊदी अरब की दमनकारी नीतियों का समर्थन कर रहा है। अमेरिकी अधिकारी व राजनेता मानवाधिकार और डेमोक्रेसी के संबंध में समस्त सिद्धांतों व चिंताओं को भूल गये हैं और उनका ध्यान इस्लामी देशों के मध्य फूट डालने व विवाद पर केन्द्रित हो गया है और इस बात से वे खुश हैं। श्रोता मित्रो जैसाकि आप जानते हैं कि यमन में जनता द्वारा चुनी गयी सरकार को समाप्त करने और बहरैनी जनता के शांतिपूर्ण जनांदोलनों के दमन में सऊदी अरब महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है परंतु वह इस्लामी जगत के आम जनमत की मांगों का जवाब देने के बजाये सदैव ईरान पर निराधार आरोप लगाता है कि वह बहरैन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और विरोधियों का समर्थन करता है।

 

 

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Feb १७, २०१८ १४:२६ Asia/Kolkata
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