हमने यमन और बहरैन में क्रान्तिकारी राजनैतिक हालात की समीक्षा की जो इस्लामी जागरुकता के नाम से मशहूर हैं।

हमने आपको यह भी बताया कि यमन पर सैन्य हमले में जिसका लक्ष्य यमन की जनता द्वारा समर्थित सरकार को गिराना था और इसी तरह बहरैन के शांतिपूर्ण जनप्रदर्शन के दमन में सऊदी अरब का रोल है लेकिन सऊदी अरब इस बारे में जनमत के सामने जवाबदेह होने के बजाए दूसरे देशों पर अपने आंतरिक मामले में हस्तक्षेप और प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने का इल्ज़ाम लगाता रहा है। इसी प्रकार हमने इस बात का भी उल्लेख किया कि यमन और बहरैन में सऊदी अरब का खुल्लम खुल्ला सैन्य हस्तक्षेप अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का खुला उल्लंघन है और उसके इस क़दम से इस्लामी जगत में फूट बढ़ी है।

 

आपको बताते चलें कि इस्तांबोल में इस्लामी देशों के राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में सऊदी अरब के दबाव में इस्लामी गणतंत्र ईरान के ख़िलाफ़ भी अनुच्छेद शामिल किया गया और इस घोषणापत्र की विषयवस्तु इस्लामी जगत में फूट डालने पर आधारित थी। इस घोषणापत्र से लगभग एक साल पहले ईरान-सऊदी अरब के बीच राजनैतिक टकराव की स्थिति पैदा हो चुकी थी जिसके कारण इस घोषणापत्र में ईरान के ख़िलाफ़ अनुच्छेद शामिल किया गया।

यमन में क्रान्तिकारी फ़ोर्स के हाथों सरकार के गिरने और अंसारुल्लाह के हाथ में सत्ता की लगाम आने के बाद सऊदी अरब ने यमन पर सैन्य हमले का फ़ैसला किया लेकिन सऊदी शासन और राजनैतिक व सैन्य टीकाकारों के अनुमान के विपरीत इस हमले के नतीजे में यमन में मानव त्रासदी का दायरा फैलता गया और इस देश का बहुत बड़ा भाग तबाह हो गया। इसी तरह इस हमले के नतीजे में सऊदी अरब को न तो जीत मिली और न ही अंसारुल्लाह का पतन हुआ।  इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई ने यमन जंग की शुरुआत के दिनों में इस जंग में ईरान के किसी तरह के रोल को रद्द करते हुए इस जंग में सऊदी अरब की जीत को नामुमकिन बताया था। यमनी जनता व सरकार के अदम्य प्रतिरोध से सऊदी शासन बौखला गया और उसने इस जंग में रियाज़ की बदनामी को छिपाने के लिए ईरान पर प्रचारिक व मानसिक हमले शुरु कर दिए।     

 

इसके बाद अगली बदनामी 2015 के हज में हुयी जब सऊदी शासन की लापरवाही के कारण पहले मस्जिदुल हराम और फिर मिना में हज संस्कार के दौरान हज़ारों हाजी हताहत हुए। हज के इतिहास में कभी भी इतने ज़्यादा हाजियों की मौत नहीं हुयी थी जितना 2015 के हज के दौरान हुयी। 2015 के हज में 42 देशों के हाजियों की मौत हुयी। अफ़ग़ानिस्तान, अलजीरिया, बांग्लादेश, बेनीन, बोर्किना फ़ासो, कैमरून, चाड, चीन, जिबूती, मिस्र, इथोपिया, गाम्बिया, घाना, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, इराक़, आइवरी कोस्ट, जॉर्डन, केन्या, लेबनान, लीबिया, मलेशिया, माली, मोरिशस, मोरक्को, नेरदलैंड, नीजर, नाइजेरिया, ओमान, पाकिस्तान, फ़िलिपीन, सेनेगल, सोमालिया, श्रीलंका, सूडान, तन्ज़ानिया, ट्यूनीशिया, तुर्की और युगांडा वे देश थे जहां के हाजी हताहत व घायल हुए थे। दुर्घटना के कारण को लेकर सऊदी अरब और उन देशों के बीच विवाद बढ़ा जिन देशों के हाजी सबसे ज़्यादा संख्या में हताहत हुए। इस दुर्घटना को घटे दो साल होने को हैं लेकिन अभी तक जांच संस्था इस दुर्घटना का कारण स्पष्ट नहीं कर पायी हैं। घायलों को मदद पहुंचाने की शैली भी वह बिन्दु है जिसके बारे में बहुत से सवाल उठे। इसी प्रकार हताहत हुए हाजियों के शवों की पहचान और उन्हें स्थानांतरित करने के विषय को लेकर सऊदी अरब और उन देशों के बीच विवाद रहा जिन देशों के हाजी इस दुर्घटना में हताहत हुए थे। इस दुर्घटना में सबसे ज़्यादा ईरानी हाजी हताहत हुए जिनकी संख्या 464 थी। यही वजह थी कि ईरान ने इस दुर्घटना की जांच के लिए एक समिति के गठन की बारंबार मांग की लेकिन सऊदी अरब ने इस मांग का सकारात्म जवाब न दिया बल्कि इससे आगे बढ़ते हुए उसने पिछले साल ईरानी हाजियों को हज करने से रोक दिया। लेकिन अभी इस दुर्घटना को ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा था कि सऊदी अरब ने इस देश के शिया धर्मगुरू को मौत की सज़ा देकर बाक़ी मुसलमानों और ख़ास तौर पर शियों के साथ अपनी दुश्मनी को और उजागर कर दिया। मिना दुर्घटना के सिर्फ़ तीन महीने बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने एक बयान के ज़रिए सऊदी अरब के शियों के नेता शैख़ निम्र बाक़िर अन्निम्र को मौत की सज़ा के हुक्म के लागू होने की सूचना दी। अलअरबिया टीवी चैनल ने ख़बर दी थी कि इस देश के गृह मंत्रालय के बयान के अनुसार शैख़ निम्र और बाक़ी 46 आरोपियों को कि जिनमें अधिकांश को आतंकी कहा गया था, सऊदी अरब के 12 इलाक़ों में मौत की सज़ा दे दी गयी। शैख़ निम्र बाक़िर अन्निम्र 1379 हिजरी क़मरी में पूर्वी सऊदी अरब के अवामिया क़स्बे में पैदा हुए। वे एक वरिष्ठ धर्मगुरु होने के साथ साथ मानवाधिकार कार्यकर्ता भी थे। उन्हें 2012 में सऊदी अरब के शियों के विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था।   

 

सऊदी अरब की फ़ौजदारी अदालत ने शैख़ निम्र पर राष्ट्रीय सुरक्षा के ख़िलाफ़ क़दम उठाने का आरोप लगाते हुए, तलवार से उनकी गर्दन मारने और लोगों के बीच सलीब पर उनके शव को लटकाने का आदेश दिया था। मध्ययुगीन दौर की सज़ा के इस बर्बरतापूर्ण तरीक़े को ऐसी हालत में लागू किया गया कि अनेक मानवाधिकार संगठनों ने शैख़ निम्र को मौत की सज़ा का निंदा करते हुए आले सऊद शासन से इस आदेश को वापस लेने की मांग की थी। शैख़ निम्र को मौत की सज़ा पर अनेक देशों की ओर से प्रतिक्रिया सामने आयी जिसके कारण सऊदी शासन पर जनमत की ओर से कड़ा दबाव पड़ा और वह दुनिया में अलग थलग पड़ गया। शैख़ निम्र को मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ ईरान में भी जनाक्रोश फूट पड़ा और बड़े पैमाने पर लोगों ने सऊदी शासन के ख़िलाफ़ आपत्ति दर्ज करायी। ईरानी जनता शैख़ निम्र को मौत की सज़ा से इतना ज़्यादा ग़ुस्से में थी कि राजधानी तेहरान और मशहद में सऊदी वाणिज्य दूतावास के समाने कुछ लोगों ने प्रदर्शन भी किया। हालांकि लोगों के प्रदर्शन को ईरानी पुलिस ने क़ाबू में किया और ईरान सरकार ने पूरी कोशिश की कि सऊदी कूटनयिकों को कोई नुक़सान न पहुंचे लेकिन सऊदी अरब ने जो विश्व जनमत के दबाव से ख़ुद को निकालने के बहाने की तलाश में था, इस घटना पर बहुत कड़ी प्रतिक्रिया दिखाते हुए इस्लामी गणतंत्र ईरान से अपना राजनैतिक संबंध ख़त्म कर लिया।

 

सऊदी अरब ख़ुद को अलग थलग पड़ने से बचाने और अपने अमानवीय अपराधों को छिपाने के लिए सिर्फ़ ईरान से संबंध विच्छेद पर ही नहीं रुका बल्कि उसने इस्तांबोल में इस्लामी देशों के 13वें शिखर सम्मेलन में इस्लामी देशों को ललचाकर व धमकाकर, उन्हें ईरान के ख़िलाफ़ एकजुट करने की कोशिश की। इस बैठक में उन देशों ने जो ख़ुद क्षेत्र में दाइश सहित आतंकवादी संगठनों के समर्थक हैं, ईरान के ख़िलाफ़ माहौल बनाकर तेहरान को उसकी नीति से रोकने की कोशिश की। वह नीति जो फ़िलिस्तीन, यमन और बहरैन की पीड़ित जनता का समर्थन करने पर आधारित है। इस बैठक के घोषणापत्र में सऊदी अरब ने तेहरान में सऊदी अरब के दूतावास और मशहद में उसके वाणिज्य दूतावास की घटना की निंदा में एक अनुच्छेद शामिल कराया। इसके अलावा इस घोषणापत्र में सऊदी अधिकारियों की इच्छानुसार इस देश में दी गयी मौत की सज़ा के संबंध में ईरान के दृष्टिकोण की निंदा की गयी और सऊदी अरब में शियों के वरिष्ठ धर्मगुरु शैख़ निम्र बाक़िर अन्निम्र सहित जिन लोगों को मौत की सज़ा दी गयी, उन्हें आतंकी कहा गया।

 

हालांकि यह घोषणापत्र सऊदी शासन के दबाव में पारित हुआ लेकिन बहुत से इस्लामी देशों ने जिन्हें सऊदी अरब के दावे के निराधारन होने और ईरान के ख़िलाफ़ इल्ज़ाम के झूठे होने का पता था, सऊदी अरब का साथ न दिया जैसे लेबनान और इराक़, लेकिन इस घोषणापत्र के जारी होने से यह बात ज़ाहिर हो गयी कि रियाज़ अरब संघ, फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद और इस्लामी सहयोग संगठन जैसे संगठनों को वित्तीय मदद रोकने की धमकी के ज़रिए उन पर प्रतिरोध के ख़िलाफ़ अपनी द्वेषपूर्ण कार्यवाहियों और इस्लामी जगत में अपनी विध्वंसक नीतियों का साथ देने के लिए दबाव डाल रहा है और ईरान का नुक़सान पहुंचाने के किसी भी मौक़े नहीं चूक रहा है। हालांकि अगर ईरान और सऊदी अरब एकजुट हो जाएं तो इस्लामी जगत के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंच में एक बड़ी ताक़त बन सकते हैं। इससे भी ज़्यादा खेद की बात यह है कि सऊदी शासन ने अपने यहां अमानवीय अपराध पर पर्दा डालने के लिए और विश्व जनमत की ओर से आलोचना व निंदा की लहर को रियाज़ से तेहरान की ओर मोड़ने के लिए मुसलमानों के सबसे बड़े दुश्मन इस्राईल से हाथ मिला लिया और अमली तौर पर इस शासन की विस्तारवादी नीतियों की दिशा में क़दम उठा रहा है।       

इस समय इस्लामी जगत में एकता की स्थिति सही नहीं है बल्कि कुछ देश इस मुश्किल को हल करने के बजाए दुश्मन की मदद कर रहे हैं। यही वजह है कि हर दिन इस्लामी जगत में फूट बढ़ती जा रही है। इस्तांबोल घोषणापत्र ने इस संगठन के एकता पैदा करने के रोल के संबंध में मुसलमनों के मन में रही सही उम्मीद की किरण भी ख़त्म कर दी। लेकिन इसके बावजूद उम्मीद है कि भविष्य में इस्लामी देशों में एकता मज़बूत होगी।

 

Feb १७, २०१८ १५:५६ Asia/Kolkata
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