हमने ईरान में वैज्ञानिक प्रगति के बारे में विस्तार से चर्चा की थी। 

हमने आपको बताया था कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद किस प्रकार से वैज्ञानिक दृष्टि से विकास हुआ और विश्व के कई विश्वसनीय वैज्ञानिक केन्द्रों ने इसकी पुष्टि भी की है।  हमने आपको यह भी बताया था कि ईरान के वैज्ञानिकों ने किस प्रकार विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये जिसपर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विद्वानों और वैज्ञानिकों ने प्रतिक्रियाएं व्यक्त कीं। 

ज्ञान एवं विज्ञान के बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का विचार यह है कि ज्ञान और ईमान, एक-दूसरे के लिए बहुत ज़रूरी हैं क्योंकि यही दोनों वास्तव में आधार हैं।  एक इस्लामी विद्धान एवं धर्मगुरू होने के नाते आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि ज्ञान की प्राप्ति एक धार्मिक कर्तव्य है।  उनका मानना है कि व्यक्तिगत एवं सामाजिक विकास के लिए ज्ञान और अध्यात्म दोनों ज़रूरी हैं।  वे कहते हैं कि ज्ञान और अध्यात्म में से कोई भी एक, मनुष्य को जीवन में सफलता प्रदान नहीं कर सकता बल्कि इसके लिए दोनों का साथ होना ज़रूरी है।  वे ज्ञान और अध्यात्म की तुलना ऐसे परों से करते हैं जिनके बिना उड़ान संभव नहीं है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यदि केवल अध्यात्म पर भरोसा कर लिया जाए और ज्ञान को अनदेखा कर दिया जाए तो आधुनिक विकास के मार्ग बंद हो जाएंगे और मनुष्य केवल अध्यात्म में ही पड़ा रह जाएगा।  उनका कहना है कि यदि कोई समाज अध्यात्म को अपनाए और ज्ञान को छोड़ दे तो वह इस अर्थ में है कि मानो उसने उड़ने वाले परों में से एक को तोड़ दिया है और उड़ने के प्रयास कर रहा है।  आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि यह सोचना ग़लत है कि इस्लाम, केवल अध्यात्म का पक्षधर है और उसने भौतिकता को छोड़ दिया है।  नहीं एसा नहीं है बल्कि विकास के लिए वह दोनों को ज़रूरी मानता है।  इस्लाम की दृष्टि में संसार को त्यागकर केवल अध्यात्म की प्राप्ति में लगे रहना ग़लत है जिसकी इस्लाम कड़ी निंदा करता है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ईरान की इस्लामी शासन व्यवस्था के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य, युवाओं को ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रेरित करने के साथ ही साथ उन्हें अध्यात्म की ओर ले जाना भी है।  इस बारे में वे कहते हैं कि हम ऐसी आदर्श पीढ़ी समाज को देना चाहते हैं जो ज्ञान अर्जित करने के साथ ही साथ अध्यात्म को भी अपनाए और अपने भीतर पाई जाने वाली आध्यात्मिक विशेषताओं से अधिक से अधिक लाभ उठाए।  ऐसी पीढ़ी जो ज्ञान के साथ ही नैतिकता और अध्यात्म के प्रति कटिबद्ध हो।  वे कहते हैं कि हर वह समाज जिसने केवल वैज्ञानिक प्रगति की हो किंतु आध्यात्म की दृष्टि से वह बहुत पीछे हो तो वहां पर व्यक्ति और समाज दोनो ही घाटा उठाते हैं।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यदि कोई एसा समाज हो जो वैज्ञानिक दृष्टि से तो बहुत विकसित हो किंतु वहां पर नैतिकता की कमी हो, आध्यात्म की ओर कोई विशेष ध्यान न दिया जाए और चारों ओर वासना ही वासना हो तो ऐसा समाज निश्चित रूप में घाटा उठाने वाला समाज है।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई के अनुसार ईरान में ज्ञान के महत्व को समझने के लिए ज्ञान के बारे में पश्चिम के क्रियाकलापों की समीक्षा करना भी ज़रूरी है।  वे इस बार में पश्चिमी क्रियाकलापों की समीक्षा तीन आयामों से करते हैं।  पहले यह कि मध्ययुगीन काल के दौरान ज्ञान के बारे में दृष्टिकोण में पाया जाने वाला विरोधाभास, दूसरे पश्चिम द्वारा ज्ञान के माध्यम से विश्व पर वर्चस्व बनाने के प्रयास और तीसरे ज्ञान पर एकाधिकार की कोशिश।  मध्ययुगीन काल में ज्ञान के बारे में चर्च के दृष्टिकोण की समीक्षा करते हुए वरिष्ठ नेता कहते हैं कि उस काल में जो वैज्ञानिक प्रगति में बाधाएं आईं उनका मुख्य कारण वास्तव में ईसाई धर्म नहीं था बल्कि मध्ययुगीन काल में ईसाई धर्म में फैली हुई कुरीतियां थीं।  वे कहते हैं कि यूरोप में वैज्ञानिक प्रगति का आरंभ, ईसाई धर्म के अंत के अर्थ में था क्योंकि उस समय ईसाई धर्म में बहुत सी ऐसी कुरितियां फैल चुकी थीं जो पूर्णरूप में विज्ञान से विरोधाभास रखती थीं।  उस काल में यदि कोई विद्वान कोई अविष्कार करता था तो या तो उसे दंड दिया जाता या फिर कोड़े लगाए जाते थे।  कभी-कभी तो उसे आग में झोंक दिया जाता था।  एसे में स्वभाविक सी बात है कि यदि विज्ञान तरक़्क़ी करेगा तो फिर वह इस प्रकार के धर्म को एक किनारे लगा देगा।  और वास्तव में हुआ भी एसा ही।

वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अध्यात्म के बिना ज्ञान के दुष्प्रभावों में से एक यह था कि पश्चिम ने इसके माध्यम से पूरे विश्व विशेषकर कमज़ोर देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना आरंभ कर दिया जिसे इस समय भी स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।  वर्तमान समय में पश्चिम, राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक दृष्टि से पूरे संसार पर वर्चस्व जमाने के प्रयास में लगा हुआ है।  इस समय संसार में राजनीतिक वर्चस्व, तीन बिंदुओं पर आधारित है।  धन-दौलत, वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रगति और तीसरे मीडिया पर नियंत्रण।  विगत की तुलना में वर्तमान समय में सत्ता का मापदंड बदल चुका है।  इस समय निश्चित रूप में विज्ञान भी सत्ता प्राप्ति के मापदंड में से एक है।  पुराने ज़माने में एसा कुछ नहीं था।  उस काल में विज्ञान को वर्चस्व स्थापित करने के लिए प्रयोग नहीं किया जाता था किंतु इस समय एसा हो रहा है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि वर्तमान समय में पश्चिम, अपने राजनैतिक वर्चस्व के लिए विज्ञान को एक हथकंडे के रूप में प्रयोग कर रहा है।  पश्चिम ने वैज्ञानिक विकास के माध्यम से अपना वर्चस्व बढ़ाया और इसी के माध्यम से अपनी सत्ता मज़बूत की।  जब से विज्ञान या वैज्ञानिक विकास, यूरोप के हाथों लगा उस समय से उसे अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए इसका खुलकर दुरूपयोग किया है और कर रहा है।

वरिष्ठ नेता कहते हैं कि वर्चस्ववादी शक्तियों ने विश्व पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए जो नीति निर्धारित की है वह है दूसरे देशों पर सांस्कृतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक वर्चस्व बनाए रखना।  इसके लिए ज़रूरी है कि जिसपर वर्चस्व स्थापित किया जा रहा है या जो वर्चस्व में है उसको स्वावलंबित न बनने दिया जाए।  अर्थात ऐसे देश को सदैव अपने पर निर्भर रखा जाए ताकि वह विकास न कर सकें।  वे कहते हैं कि वर्तमान समय में संसार का राजनीतिक तानाबाना इस प्रकार का है कि सामने वाला पक्ष या तो वर्चस्ववादी है या फिर वर्चस्व को स्वीकार कर रहा है।  आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि यदि हम यह चाहते हैं कि इस राजनैतिक तानेबाने को तोड़ा जाए और विश्व के राष्ट्र अपने भीतर पाई जाने वाली क्षमताओं से लाभ उठाएं तो फिर उनको पूरी गंभीरता के साथ ऐसे विज्ञान की ओर बढ़ना होगा जो अध्यात्म से जुड़ा हुआ हो।

वरिष्ठ नेता कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति के माध्यम से पश्चिम पूरे संसार में विज्ञान का एकाधिकार स्थापित करना चाहता है।  वे कहते हैं कि इस मामले में पश्चिमी सभ्यता और इस्लामी सभ्यता में बहुत अंतर पाया जाता है।  पश्चिम, वैज्ञानिक प्रगति से स्वयं लाभ उठाते हुए उसे दूसरों तक पहुंचने से रोकता है जबकि इस्लाम में ज्ञान अर्जित करने के साथ ही साथ दूसरों को भी शिक्षित बनाने पर बल दिया गया है।  इस्लाम में ज्ञान की प्राप्ति के लिए लोगों को न केवल प्रेरित किया गया है बल्कि इस कार्य को एक ईश्वरीय दायित्व भी बताया गया है।  विगत में मुसलमानों ने वैज्ञानिक विकास को सीमित नहीं रहने दिया बल्कि उसको पूरे विश्व में फैलाया जबकि पश्चिम का प्रयास यह है कि इसपर केवल उसका ही एकाधिकार हो।  जिस प्रकार से इस्लाम में ज्ञान अर्जित करना धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य है उसी प्रकार से मुसलमानों ने इसे अनिवार्य समझकर दूसरों तक पहुंचाया है।  पश्चिम ने विज्ञान पर वर्चस्व स्थापित करने के साथ ही वह चीज़े संसार को दीं जिनकी उनको आवश्यकता नहीं रही।  दूसरे शब्दों में जिसका महत्व उनकी दृष्टि में समाप्त हो गया उसे उन्होंने दूसरों को दिया और जो चीज़ उनके निकट महत्व रखती थी उसे अपने ही पास रोके रखा।

 

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Feb २८, २०१८ १४:१५ Asia/Kolkata
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