हमने आपको बताया था कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने ज्ञान और ईमान को दो एसे परों की संज्ञा दी जिनमें से किसी एक के बिना उड़ना संभव नहीं है।

उनका मानना है कि ज्ञान और ईमान दोनों के सहारे ही मानव, लोक और परलोक में सफलता अर्जित कर सकता है।  हमने यह भी बताया था कि वरिष्ठ नेता ने ज्ञान या शिक्षा के संबन्ध में तीन आयामों से पश्चिम में शिक्षा के विषय की समीक्षा की थी।

 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि पश्चिम ने विज्ञान और तकनीक को माध्यम बनाकर पर्यावरण को एसी क्षति पहुंचाई है जिसका भुगतान मानव समाज को करना पड़ रहा है।  आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि वर्तमान समय में जो विज्ञान के बारे में बड़े-बड़े दावे करते हैं उनको भलिभांति पता है कि उन्होंने विज्ञान के नाम पर संसार में कितना विनाश किया है।  वे कहते हैं कि उन्होंने तेल को ज़मीन से निकाला लेकिन उसे आग लगाई।  उन्होंने जहां तेल के भण्डारों को नुक़सान पहुंचाया वहीं पर पर्यावरण को बुरी तरह से दूषित किया।  उन्होंने विज्ञान और विकास के नाम पर मानवता को हर प्रकार से नुक़सान पहुंचाया है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि पश्चिम की एक अन्य बुराई यह है कि उसने ज्ञान को पैसे से जोड़ दिया।  वे कहते हैं कि पश्चिम में ज्ञान के बारे में जो दृष्टिकोण है वह इस्लाम के दृष्टिकोण से विराधाभास रखता है।  ज्ञान के बारे में पश्चिमी विचारधारा के विपरीत इस्लाम का मानना है कि ज्ञान की प्राप्ति से मनुष्य का आत्म निर्माण भी होता है जबकि पश्चिम में आत्म निर्माण को कोई महत्व प्राप्त नहीं है।  इस समय पश्चिम में जो चीज सबसे अधिक महत्व रखती है वह पैसा है जबकि इस्लाम में एसा नहीं है।  इस्लाम में पैसा सबकुछ नहीं है बल्कि ज़िंदगी गुज़ारने का एक माध्यम है जबकि पश्चिम में पैसा ही सबकुछ है।  पश्चिम की दृष्टि में वह ज्ञान लाभदायक है जिससे पैसा बनाया जा सके अर्थात जो धन अर्जित करने का माध्यम हो न कि जनसेवा का।  इस्लाम में ज्ञान को प्रगति और विकास का कारण बताया गया है जबकि पश्चिम में इससे केवल भौतिक लाभ उठाने को महत्व प्राप्त है।

 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस समय पश्चिम की मुख्य समस्या यह है कि वहां पर हर चीज़ को पैसे से आंका जाता है।  वे कहते हैं कि पश्चिम में यह देखा जाता है कि इस अविष्कार से कितना लाभ होगा? इस शोध से कितने पैसे मिलेंगे? इस अनुसंधान के परिणाम में हमें क्या लाभ होगा? दूसरे शब्दों में पश्चिम मे हर काम लाभ और हानि के आधार पर किया जा रहा है।  एसे में जब हमें कोई व्यक्ति या समाज एसे मिले जहां पर शिक्षा या काम का आधार सेवा हो तो पता चलता है कि ज्ञान का क्या महत्व है।  उस समय ज्ञान के वास्वतिक महत्व का आभास होता है।  वास्तविकता यह है कि भला काम या सदकर्म ही प्रशंसनीय है और उसको ईश्वर पसंद करता है।  इसके बदले में वह काम में बरकत देता है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि एक अन्य वैश्विक समस्या, जिसे पश्चिम ने जन्म दिया है , प्रतिभा पलायन या ब्रेनड्रेन है।  वे कहते हैं कि इस समय बहुत से देश और राष्ट्र, अपने ही उन युवाओं की क्षमताओं और योग्यताओं से उचित ढंग से लाभान्वित नहीं हो पा रहे हैं।  इसका मुख्य कारण है प्रतिभा पलायन अर्थात योग्य और प्रतिभाशालियों का देश छोड़कर चले जाना है।  अब हो यह रहा है कि कोई राष्ट्र अपने युवाओं को शिक्षित करता है उनको पढ़ाता लिखाता है और जब उनसे लाभ उठाने का समय आता है तो इस बीच दुश्मन का एक हाथ आता है और वह उस प्रतिभाशाली युवा को अपने ही राष्ट्र से अलग करके ले जाता है।  यही है प्रतिभा पलायन या दूसरे शब्दों में राष्ट्रों के बुद्धिमानों और बुद्धिजीवियों की चोरी।

 

यह वर्चस्ववादी हर उस देश के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं जो उनकी इच्छा के विरुद्ध विज्ञान या अन्य क्षेत्र में प्रगति करना चाहते हैं। वरिष्ठ नेता ने कहा कि इसका स्पष्ट उदाहरण ईरान का शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम है। इस बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि वे लोग कहते हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने जा रहा है। वे भलिहांति जानते हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने जा रहा है। वे भलिभांति जानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है। यह एक दुष्प्रचार है। वर्चस्ववादी चाहते हैं कि ईरानी राष्ट्र, आधुनिक तकनीक से लाभान्वित न हो सके। वे चाहते हैं कि ईरान, विज्ञान और तकनीक से वंचित रहे।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई का कहना है कि विज्ञान की प्राप्ति की आड़ में पश्चिमी सभ्यता को नहीं अपनाना चाहिए। वे कहते हैं कि विज्ञान और पश्चिमी संस्कृति दो अलग विषय हैं । लोगों को चाहिए कि वे अधिक से अधिक विज्ञान और तकनीक को सीखें किंतु उनको किसी भी स्थिति में पश्चिमी संस्कृति को नहीं अपनाना चाहिए। वे कहते हैं इससे तातपर्य अनियंत्रित आज़ादी, निरंकुशता , पैसे के पीछे भागना, आत्ममुग्धता और भौतिकवाद का बोलबाला है। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस्लाम हमको शिक्षा प्राप्त करने का आदेश देता है और कहता है कि हमें अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए लेकिन ज्ञात प्राप्त करने और किसी की संस्कृति को अपनाने में बहुत अंतर है जिसे समझना बहुत ज़रूरी है। यह बहुत बड़ी भूल है कि कोई कहे कि पश्चिम में विज्ञान बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए वहां की संस्कृति भी बहुत अच्छी होगी अत: उसे अपना लिया जाए। निरंकुशता, भौतिकता को महत्व देना, घमण्ड, दूसरों को गिरी नज़र से देखने और इस जैसी बातें बुरी हैं जो पश्चिमी संस्कृति का भाग हैं। इसीलिए हमें इस संस्कृति को अपनाने से बचना चाहिए।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं तीसरी दुनिया के पिछड़ेपन का मुख्य कारण यहां के विचारकों और बुद्धिजीवियों द्वारा पश्चिम का अंधा अनुसरण और स्वयं को उनके मुक़ाबले में गिरा हुआ समझना है। वे कहते हैं कि इन कारकों के अतिरिक्त पश्चिमी देश, उन देशों के मार्ग में बाधाएं डालते रहते हैं जो विकास और प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ने के प्रयास करते हैं। पश्चिम, अन्य देशों के विकास को रोकने के मार्ग में तरह- तरह की बाधाएं डालता रहता है।

 

 

 

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Feb २८, २०१८ १६:२३ Asia/Kolkata
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