आपको बताया कि मस्जिद की मुख्य उपयोगिता इबादत व उपासना है लेकिन राजनैतिक, सांस्कृतिक, प्रशिक्षण, सैन्य व न्यायिक इत्यादि मामलों में भी इसकी उपयोगिता है और रोचक बात यह है कि इन सभी गतिविधियों का ध्रुव मस्जिद का इमाम होता है।

जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के दौर में आप ही मदीना स्थित मस्जिदुन नबी के संचालन के ज़िम्मेदार थे। इस तरह मस्जिद में एक व्यक्ति जो धार्मिक व राजनैतिक मामलों का ध्रुव था, शासन करने के साथ साथ मस्जिद के संचालन की भी ज़िम्मेदारी निभाता था। इस तरह इस्लाम के आरंभिक दौर में मस्जिद की राजनैतिक उपयोगिता उसके उपासना संबंधी आयाम के बाद अधिक थी। आपके लिए यह जानना भी रोचक होगा कि पवित्र काबे का भी इस्लाम के उदय से पहले विशेष स्थान था। पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी पर नियुक्ति से पहले पवित्र काबा उस दौर के समाज की राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र हुआ करता था। यही वजह है कि मक्का के विभिन्न क़बीले और गुट काबे के संचालन को अपने हाथ में लेने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते थे और यह प्रतिस्पर्धा कभी भी हिंसक रूप अख़्तियार कर लेती थी।

 

इस्लाम के आरंभ में मस्जिद धर्म और राजनीति के संगम का बेहतरीन प्रतीक थी और धर्म व राजनीति के एक दूसरे अलग न होने का सिद्धांत व्यवहारिक रूप से पहली बार मस्जिदुन नबी में दिखने में आया। मदीना की सादा सी नज़र आने वाली मस्जिद में पैग़म्बरे इस्लाम समाज के नेता और लोगों के इमाम के रूप में लगभग हमेशा ही मस्जिद में मौजूद रहते थे। पैगम़्बरे इस्लाम मस्जिद में अपनी उपस्थिति से कि जो लोगों के इकट्ठा होने का केन्द्र थी, अपने अनुयाइयों को बताते थे कि लोगों का नेतृत्व करने वाला वास्तव में उनका सेवक है। पैग़म्बरे इस्लाम का काम, वास्तव में ईश्वर की प्रसन्नता के लिए की जाने वाली सेवा थी। उनका उद्देश्य शासन करना, धन संपत्ति अर्जित करना, या ख़ुद को बड़ा दिखाना न था। पैग़म्बरे इस्लाम जो काम करते थे वह इस्लाम व मुस्लिम समाज से मोहब्बत के नाते करते थे। दूसरे शब्दों में उनका धर्म ही उनकी राजनीति थी।

इस्लाम के उदय के समय मस्जिद पैग़म्बरे इस्लाम के आज्ञापालन और प्रशासनिक कार्यक्रमों के एलान करने का स्थान भी थी। जैसा कि मदीना में मस्जिदुन नबी के निर्माण के बाद ज़्यादातर मुसलमानों ने मस्जिद में पैग़म्बरे इस्लाम के आज्ञापालन का प्रण लिया था।

 

मुसलमानों के पहले ख़लीफ़ा हज़रत अबू बक्र के आज्ञापालन का पहला चरण सक़ीफ़ा बनी साएदा नामक स्थान पर हुआ था लेकिन इसके एक दिन बाद लोगों ने सार्वजनिक स्तर पर उनके आज्ञापालन का प्रण मस्जिदुन नबी में लिया था। उस समय हज़रत अबू बक्र मिंबर पर गए और जिस ज़ीने पर पैग़म्बरे इस्लाम बैठते थे उससे एक ज़ीना नीचे बैठे थे और ईश्वर की स्तूति के बाद कहा था, "मैं जबकि आप लोगों से बेहतर नहीं हूं, मगर आप पर हुकूमत कर रहा हूं, तो अगर सीधे मार्ग पर रहा तो मेरा अनुसरण कीजिएगा और अगर मार्ग से हट गया तो मुझे सीधा कर दीजिए।"

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने भी जब लोगों के बहुत अनुरोध पर ख़िलाफ़त क़ुबूल की तो मस्जिदुन्नबी गए और लोगों के आज्ञापालन के प्रण लेने के बाद एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने अपनी ख़िलाफ़त के स्वरूप व कार्यक्रम को साफ़ तौर पर बयान किया।        

 

कार्यक्रम के इस भाग में मोरक्को की दो मशहूर मस्जिदों "हस्सान मस्जिद" और "हसन द्वितीय की मस्जिद" के बारे में आपको बताने जा रहे हैं।

"हस्सान मस्जिद" मोरक्को के रबात शहर में स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण मोवह्हेदी परिवार के तीसरे शासक याक़ूब मंसूर मोवह्हेदी ने 592 हिजरी क़मरी में करवाया था। बताया जाता है कि याक़ूब मंसूर मोवह्हेदी ने कैस्टेल के राजा अल्फ़ॉन्सो अष्टम को जंग में हराने के बाद स्पेन की कोर्डोबा मस्जिद से अधिक भव्य मस्जिद बनाने की कोशिश की। याक़ूब मंसूर मोवह्हेदी ने इस मस्जिद के व्यापक निर्माण की डीज़ाइन बनायी थी लेकिन 1199 में उनकी मौत के बाद सारा काम रुक गया। इस मस्जिद का काम बाद के दौर में भी पूरा न हुआ और आज भी उसी स्थिति में बाक़ी है।

"हस्सान जामा मस्जिद" इराक़ के सामर्रा नगर की जामा मस्जिद के बाद इस्लामी जगत की सबसे बड़ी मस्जिद है। इस मस्जिद के मिनार ज़्यादातर अफ़्रीक़ी देशों की मस्जिदों से सबसे बड़ा है। हालांकि इस मस्जिद का काम अधूरा रहा और विभिन्न दौर में इस मस्जिद के विभिन्न भाग तबाह हो गए, लेकिन इसके बावजूद यह मस्जिद पूर्वी और आंदलुसियाई कलाओं के संगम का बहुत अच्छा नमूना पेश करती है। इस मस्जिद में बहुत ही सुंदर शिलालेख मौजूद हैं। कहा जाता है कि इस मस्जिद के निर्माण की डीज़ाइन याक़ूब मंसूर के दादा ने पेश की थी ताकि दुश्मनों के हमलों की स्थिति में यह मस्जिद उनकी और उनके सिपाहियों की रक्षा के लिए एक ठोस क़िला हो।

मस्जिद का नमाज़ पढ़ने वाला क्षेत्रफल 1932 मीटर का है। इसे अंग्रेज़ी वर्णमाला के टी अक्षर के आकार में बनाया गया है। इस मस्जिद में अन्य मस्जिदों के विपरीत कई आंगन हैं हालांकि आम तौर पर मस्जिदों में एक ही आंगन होता है। मस्जिद का बड़ा आंगन मिनार के निकट है। इस आंगन के दाएं और बाएं दो छोटे छोटे आंगन हैं। इन दोनों आंगन में बहुत से खंबे हैं। इन खंबों की लंबाई 6 से 25 मीटर के बीच है। यह खंबे बेलनाकार बनाए गए हैं। मोरक्को की मस्जिदों में बेलनाकार खंबे इन मस्जिदों के मुख्य आकर्षणों में गिने जाते हैं। हस्सान मस्जिद में छत नहीं है। इसके खंबे संगे मरमर के हैं। इस मस्जिद में लगभग 400 खंबे और 16 द्वार हैं। 6 द्वार पश्चिमी, 4 द्वार पूर्वी, 2 द्वार दक्षिणी और बाक़ी 4 उत्तरी छोर पर हैं। मस्जिद का मेहराब 3 मीटर है। अलबत्ता अब उसका निशान रह गया है। मस्जिद का मेहराब उसकी मीनार के ठीक सामने है।

मस्जिद के उत्तरी छोर पर एक पत्थर की मीनार है जो आयताकार है। इस मीनार की मौजूदा ऊंचाई 40 मीटर है और अगर यह पूरी होती तो इसकी ऊंचाई 70 मीटर से ज़्यादा होती। इस मीनार में उस दौर की बनी अन्य मीनारों की तरह बीचों बीच में आयाताकार ख़ाली जगह है। इस मीनार की वास्तुकला की विशेषता यह है कि इसे मरमर जैसे बहुत मज़बूत पत्थर से बनाया गया है ताकि प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहे।   

          

मोरक्को की एक और मस्जिद "हसन द्वितीय की मस्जिद" है। इस मस्जिद का निर्माण कार्य 1980 में तटवर्ती शहर काज़ाबलांका में शुरु हुआ और 1993 में ख़त्म हुआ। यह मस्जिद 20 हज़ार वर्ग मीटर के क्षेत्रफल पर फैले होने के साथ ही मस्जिदुल हराम और मस्जिदुन नबी के बाद क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। इस मस्जिद का कुछ भाग काज़ाबलांका शहर के तट के ऊपर बना है।

मस्जिद की दीवारें कंक्रीट और मरमर की बनी हैं। मस्जिद के भीतरी भाग को प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से सुसज्जित किया गया है। खड़िया की यह विशेषता होती है कि वह आसानी ने किसी भी सांचे में ढल जाती है। इसके अलावा इसमें चिपकने की क्षमता भी होती है, इस पर हर तरह का रंग चढ़ जाता है, सस्ती व बहुतायत होती है, इसलिए इसे सजावट के काम में बहुत इस्तेमाल करते हैं। "हसन द्वितीय की मस्जिद" में उत्कीर्ण कला का भी इस्तेमाल हुआ है। इसका गुंबद उत्कीर्ण कला का नमूना पेश करता है।

 

"हसन द्वितीय की मस्जिद" में 25000 नमाज़ी एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं। यह मस्जिद एटलांटिक महासागर के तट पर स्थित है। इस मस्जिद के गेट आधुनिक तकनीक से सुसज्जित हैं। इसके गेट ख़ुद ब ख़ुद खुलते और बंद होते हैं। मस्जिद में ऐसा लेज़र सिस्टम लगा है कि उससे निलकने वाली लेज़र की किरण 30 किलोमीटर तक क़िबले की दिशा बताती है। इसकी मीनारें दुनिया में सबसे ऊंची मस्जिद की मीनार है। मस्जिद के पास क़ुरआनी शिक्षाओं का एक मदरसा भी है जिसमें छात्र पारंपरिक व आधुनिक दोनों तरीक़ों से धार्मिक व क़ुरआनी ज्ञान हासिल करते हैं।

"हसन द्वितीय की मस्जिद" मोरक्को के तत्कालीन शासक हसन द्वितीय की 60वीं सालगिरह पर बनायी गयी। लेकिन यह मस्जिद मस्जिद से ज़्यादा एक तरह की प्रतीक और काज़ाबलांका के लिए एक तरह से पर्यटन स्थल बन चुकी है। बताया जाता है कि इस मस्जिद के निर्माण में 2500 मिस्त्रियों और 10000 दक्ष मज़दूरों ने 6 साल तक दिन रात काम किया। इसके निर्माण में 40 से 60 करोड़ डॉलर का ख़र्च आया। इसेसे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस मस्जिद और मस्जिद मस्जिदुन नबी जैसी सादा मस्जिद के बीच कितना अंतर है। बल्कि यह कहना सही होगा कि "हसन द्वितीय की मस्जिद" उपासना से ज़्यादा प्रचारिक आयाम पर आधारित है।

 

Mar ०३, २०१८ १६:४७ Asia/Kolkata
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