इराक़ में सन 1925 से  सन 1958 में " अब्दुलकरीम क़ासिम" के नेतृत्व में सैन्य विद्रोह तक 10 संसदीय चुनावों का आयोजन हुआ जिनमें हमेशा इराक़ नरेश और उनके निकटवर्तियों का प्रभाव नज़र आया।

अब्दुलकरीम क़ासिम के विद्रोह से इराक़ में राजशाही शासन का अंत हो गया। सन 1970 में और " बास पार्टी" के विद्रोह के बाद देश को प्रजातांत्रिक तरीक़े से चलाने का कानून पारित किया गया लेकिन उसे सन 1980 तक लागू नहीं किया गया। सन 1980 के बाद संसद का पुनर्गठन हुआ और सद्दाम के पतन तक इराक़ में 6 संसदीय चुनावों का आयोजन हुआ लेकिन इस पूरी अवधि में संसद पर " बास पार्टी  " का पूरी तरह से नियंत्रण रहा। सद्दाम के पतन के बाद से अब तक सन 2006, 2010 और 2014 में तीन संसदीय चुनावों का आयोजन हो चुका है और सन 2018 में होने वाले संसदीय चुनाव नये इराक़ का चौथा संसदीय चुनाव और इराक़ी इतिहास का 20 वां चुनाव होगा।

 

नये इराक़ के संविधान में विधायिका को बहुत अधिक महत्व प्राप्त है। अनुच्छेद 47 के अनुसार संघीय सरकार में  विधायिका दो सदनों पर आधारित होती है एक लोकसभा और दूसरे प्रान्तों व क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की राज्य सभा पर। 48 वें अनुच्छेद के अनुसार संसद इराकी जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होती है और और हर एक लाख इराक़ियों पर एक सांसद होना ज़रूरी है जिसे सीधे रूप से आम चुनाव द्वारा चुना जाता है। इस संसद में महिलाओं की संख्या सांसदों की एक चौथाई से कम नहीं होनी चाहिए। 55 वें अनुच्छेद के अनुसार सांसद, 4 वर्ष के लिए चुने जाते हैं और यह चार वर्ष की अवधि, संसद की पहली बैठक से शुरु होती है और आखिरी बैठक तक जारी रहती है। संसदीय चुनाव, जारी संसद  की अवधि खत्म होने से 45 दिन पहले होते हैं। इसी तरह अनुच्छेद क्रमांक 59 में सांसदों की ज़िम्मेदारियों का वर्णन किया गया है जो संघीय कानून बनाने, सरकार की निगरानी, अंतराष्ट्रीय समझौतों को पारित करने, युद्ध और अपातकाल को पारित करन, फेडरल अपील कोर्ट के सदस्य और प्रमुख , एटार्नी जनरल, न्यायपालिका निरीक्षण परिषद के प्रमुख  का निर्धारण,  राजदूतों और विशेष पदों के लिए नामित अधिकारियों  उच्च कमांडरों  की पुष्टि , राष्ट्रपति पर  महाभियोग  विश्वास मत आदि जैसे कर्तव्यों पर आधारित होती है। 

 

 इराक में सन 2018 के चुनाव कई पहलुओं से महत्वपूर्ण हैं । सन 2018 के चुनाव के महत्व का एक पहलु यह है कि यह इराक़ पर आतंकवादी संगठन " दाइश " के हमले के बाद पहला चुनाव है। वास्तव में सन 2014 में इराक़ में होने वाले संसदीय चुनाव के बाद ही इराक के एक तिहाई क्षेत्र पर दाइश के क़ब्ज़े की भूमिका तैयार हुई थी क्योंकि सन 2014 के संसदीय चुनाव में  नूरी मालेकी के नेतृत्व में  " कानून की सरकार गठजोड़ " ने भारी बहुमत से चुनाव जीत लिया जिसकी वजह से प्रधानमंत्री का निर्धारण इस गठजोड़ का कानूनी अधिकार था लेकिन इराक़ के अन्य राजनीतिक दलों और संगठनों  विशेषकर नूरी मालेकी के विरोधियों ने इस का कड़ा विरोध आरंभ कर दिया। उनका कहना था कि अगर नूरी मालेकी तीसरी बार भी इराक़ के प्रधानमंत्री बन गये तो इससे इराक़ में नये प्रकार की तानाशाही का खतरा पैदा हो जाएगा। इस विषय पर विवाद बढ़ता गया और इस दौरान आतंकवादी गुट दाइश, कुछ इराक़ी ग़द्दारों और विदेशी शक्तियों की मदद से, इराक़ के मोसिल नगर में घुस गया और फिर उसे अपनी राजधानी बना कर इस गुट ने धीरे धीरे इराक़ के एक तिहाई भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया। 

 

 ऐसे हालात में  इराक में 2018 के आम चुनाव का आयोजन होगा कि यह देश पिछले चार वर्षों के दौरान किसी भी अन्य चीज़ से अधिक दाइश  से संघर्ष में फंसा रहा है। सन 2014 में " क़ानून की सरकार गठजोड़" और " अद्दावा" पार्टी की ओर प्रधानमंत्री पद के लिए मनोनीत " हैदर अलएबादी" इन चार वर्षों के दौरान इस देश के प्रधानमंत्री रहे , उन्होंने ने ही  दिसबंबर 2017 में इराक में दाइश के अंत की औपचारिक रूप से घोषणा की। इराक़ी मामलों के विशेषज्ञ " ज़ैदअली" ने अलजज़ीरा की वेबसाइट पर अपने एक विश्लेषण में लिखा है कि हैदर अलएबादी, इराक में दाइश के अंत के ट्रम्प कार्ड के साथ  इस देश के संसदीय चुनाव के मैदान में क़दम रखेंगे और उनका समर्थन " कानून की सरकार गठजोड़" से बाहर की पार्टियों भी करेंगीं। 

 

 

   इराक़ी संसदीय चुनाव के अहम होने की दूसरी वजह यह है कि इस बार के चुनाव  में  " स्वंय सेवी बल" के आधार पर एक नया गठजोड़ भी चुनावी मैदान में उतरा है। " हश्दुश्शाबी" अर्थात " इराक़ी स्वंय सेवी बल" ने इस देश में दाइश के खिलाफ युद्ध में महत्वपूर्ण व प्रभावशाली भूमिका निभाई है जिसकी वजह से इराक़ी जनता में उसे बेहद लोकप्रियता हासिल है लेकिन चूंकि " स्वंय सेवी बल" एक सरकारी सुरक्षा संगठन है इस लिए कानून के अनुसार वह स्वंय चुनाव में भाग नहीं ले सकता जिसकी घोषणा इराकी चुनाव आयोग और  स्वंय सेवी बल के कमांडरों ने भी की है लेकिन इस बल से संबंधित राजनीति संस्थाएं और दल, नया गठजोड़ बना कर चुनाव में भाग ले सकती हैं। " स्वंय सेवी बल" से संबंध रखने वाले " अलफत्ह" गठजोड़ ने चुनाव में भाग लेने के लिए तैयार है और यही चीज़, इराक  के इस बार के चुनाव को नये इराक़ में होने वाले पिछले तीनों चुनावों से अलग करती है और चूंकि इराक़ी स्वंय सेवी बल, इ्सलामी गणतंत्र ईरान से निकट है, विदेशी शक्तियों विशेषकर सऊदी अरब, अमरीका  तथा कुछ इराकी धड़ों ने व्यापक स्तर पर इस दल के खिलाफ प्रचार आरंभ कर रखा है यहां तक कि वह खुल कर उन सभी दलों की चुनाव में भागीदारी का विरोध कर रहे हैं जो इराकी स्वंय सेवी बल से निकट समझे जाते हैं लेकिन उनके विरोध का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 

 संगीत 

सन 2018 के इराकी चुनाव के महत्वपूर्ण होने की एक अन्य वजह यह है कि  जिस तरह से यह चुनाव दाइश के बाद होने वाला पहला चुनाव है उसी तरह, इराकी कुर्दिस्तान में अत्यन्त विवादस्पद जनमत संग्रह के बाद होने वाला पहला चुनाव भी है। सद्दाम के बाद इराकी कुर्दों ने इस देश में तीसरी ताक़त के रूप में अपनी जगह बनाने की बहुत कोशिश की है जिसके दौरान उन्हें इस देश में शक्ति विभाजन में अच्छा हिस्सा मिल गया  लेकिन इसके बावजूद इराकी कुर्दिस्तान में पृथकतावादी गतिविधियां यथावत जारी रहीं हैं। इसी लिए इराक़ी कुर्दिस्तान की स्थानीय सरकार ने देश व विदेश में व्यापक विरोध के बावजूद, इस सरकार के पूर्व प्रमुख " मसऊद बारेज़ानी " की हठधर्मी की वजह से पिछले वर्ष 25 दिसंबर को इराक से कुर्दिस्तान के अलग होने के लिए जनमत संग्रह का आयोजन कराया लेकिन हैदर अलएबादी के नेतृत्व में केन्द्रीय सरकार ने किरकूक और  अन्य विवादस्पद क्षेत्रों में सेना भेज कर इन सभी क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इस दौरान स्वंय कुर्द दलों के मध्य भी मतभेद पैदा हो गये जिसकी वजह से इराक की केन्द्रीय सरकार के लिए काम और आसान हो गया। मसऊद बारेज़ानी की योजना विफल हो गयी और उन्होंने अपनी कुर्द सहयोगी पार्टी पर गद्दारी का आरोप भी लगाया। सन 2018 के चुनाव एेसी हालत में आयोजित होंगे कि जब कुर्द दलों के बीच और केन्द्रीय सरकार से उनके मतभेद यथावत जारी हैं, यह चुनाव, इराक़ के नये वातावरण में कुर्दों के लिए परीक्षा भी साबित हो सकते हैं। इस संदर्भ में इराकी मामलों के विशेषज्ञ " मुस्तफा हबीब" का कहना है कि किरकूक में चुनाव प्रक्रिया और फिर उसके परिणाम इराक में अगले चुनाव के अत्याधिक महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल होंगे। 

 

इराक़ के आगामी संसदीय चुनाव इस देश में पिछले तीन संसदीय चुनावों की भांति नये नेताओं के प्रभाव के निर्धारण की नज़र से भी महत्वपूर्ण होंगे। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और संसद सभापति को सांसद चुनते हैं। इसके साथ ही मंत्रिमंडल  में शामिल मंत्रियों को भी संसद से विश्वास मत लेना पड़ता है। यह चीज़ इराक के आगामी चुनाव से नहीं बल्कि इस देश के आगामी संसद से संबधिंत होगी जिसमें संसद का ढांचा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा जैसा कि पहले भी हो चुका है। मध्य पूर्व के मामलों के विशेषज्ञ " हसन शुकरीपूर" का कहना है कि इराक में आगामी संसदीय चुनाव में  विदेशियों खिलाड़ियों के मध्य प्रतिस्पर्धा किसी भी अन्य समय से अधिक होगी। सऊदी अरब , अमरीका, तुर्की और इस्लामी गणतंत्र ईरान इराक के आगामी चुनाव पर विशेष रूप से नज़र रखे हैं। 

 

 

टैग्स

Mar ०६, २०१८ १३:४६ Asia/Kolkata
कमेंट्स