मानवाधिकार ऐसे अधिकार हैं जिनका संबन्ध आम आदमी से है। 

इस संसार में जीवन व्यतीत करने के लिए मानवजाति के कुछ अधिकार हैं जिनको मानवाधिकार कहा जाता है।  यह मनुष्य के मौलिक अधिकार हैं जिसका अधिकार हर व्यक्ति को है।  संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकारों का अन्तर्राष्ट्रीय घोषणापत्र जारी किया था।  आजकल मानवाधिकारों की बातें बहुत की जाती हैं।

वैसे तो मानवाधिकारों का विषय बहुत पुराना है किंतु पिछली एक शताब्दी से इसकी ओर कुछ अधिक ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है।  इसके कई कारण बताए जाते हैं जिनमें से एक लोगों की जागरूकता का बढ़ना भी है।  विश्व के कुछ एेसे देश है जो स्वयं को मानवाधिकारों का ठेकेदार बताते हैं।  ऐसे देश मानवाधिकारों को एक हथकण्डे के रूप में प्रयोग करते हैं।  इस प्रकार के देश, मानवाधिकारों की आड़ में दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं।  वे देश जो इस प्रकार का काम करते हैं उनमें से एक ब्रिटेन भी है।

किसी भी देश की न्यायपालिका, उस देश में अन्याय के विरुद्ध कार्यवाही करने का प्रतीक होती है।  बहुत से समाज सेवियों का कहना है कि ब्रिटेन में आम लोगों को न्याय दिलवाने में न्यायपालिका और विधिपालिका एक बाधा के रूप में परिवर्तित हो चुकी हैं।  11 अक्तूबर सन 2016 को एमनेस्टी इंटरनैश्नल ने एक रिपोर्ट जारी करके इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि ब्रिटिश नागरिकों को क़ानूनी सेवाएं प्रदान करने और इस संबन्ध में सहायता देने में सुस्ती दिखा रही है।  इस रिपोर्ट के अनुसार इस संदर्भ में सरकारी बजट में कमी की गई है।  क़ानूनी सलाह न देने के दुष्प्रभाव बच्चों, पलायनकर्ताओं और समाज के कमज़ोर वर्ग पर पड़ेंगे।

इसके अतिरिक्त ब्रिटेन में भेदभाव, जातिवाद और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन जैसे मामले भी स्पष्ट रूप में देखे जा सकते हैं।  3 अक्तूबर सन 2016 को राष्ट्रसंघ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ब्रिटेन में हालिया वर्षों में नस्लवाद और भेदभाव की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।  "नस्लवाद की सामप्ति" नामक इस समिति का कहना है कि नस्लवाद से संबन्धित रिपोर्टें बहुत कम ही सामने आती हैं।  अब अगर वे सार्वजनिक हो भी जाएं तो न्यायालय में उनके विरुद्ध कार्यवाही लगभग न के बराबर है।  आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के नाम से सुरक्षा की नई नीति के कारण सुरक्षाबलों को लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिक अवसर मिल गया है।  इस नीति से पलायनकर्ता, अश्वेत और अल्पसंख्यक अधिक प्रभावित हैं।  आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के नए क़ानून में आतंकवाद और अतिवाद की अस्पष्ट परिभाषा के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक आज़ादी को चोट पहुंच रही है।

समाजी कार्यकर्ताओं का कहना है कि ब्रिटेन में अश्वेतों और एशियन मूल के लोगों के विरुद्ध सुनियोजित ढंग से बहुत कुछ हो रहा है।  "नस्लभेद समाप्त" नामक समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन में रहने वाले अफ़्रीकी मूल के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं, नौकरी और न्याय के क्षेत्र में तरह तरह की बाधाओं का सामना है।  इसका एक उदाहरण पुलिस में नौकरी के लिए अश्वेतों के साथ किया जाने वाला भेदभाव है।  गार्डियन समाचारपत्र ने 22 अक्तूबर 2015 की अपनी रिपोर्ट में आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया था कि ब्रिटेन में पुलिस में नौकरी के लिए कालों की तुलना में गोरों कोअधिक अवसर मिलते हैं।  इसी प्रकार ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के सत्ताकाल में रोज़गार के अवसर बढ़े थे किंतु अश्वेत अल्पसंख्यकों के बीच बेरोज़गारी अधिक बढ़ी थी।

ब्रिटेन में रहने वाले मुसलमानों को वहां के अन्य अल्पसंख्यकों की तुलना में अधिक भेदभाव का सामना है।  इस देश का आतंकवाद विरोधी नियम, ब्रिटेन में रहने वाले मुसलमानों पर दबाव डालने का बहुत अच्छा हथकण्डा बन गया था।  लंदन के समानता आयोग के अनुसार पाकिस्तान के नागरिकों से अन्य देशों से आए गोरे लोगों की तुलना में 154 बार अधिक पूछताछ की जाती है।  इस देश में रहने वाले मुसलमान इस बात को स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्हें बहुत अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।  एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में रहने वाले मुसलमानों में आधे लोगों का यह मानना है कि सरकार उनके साथ भेदभाव पूर्व व्यवहार करती है।  एक सर्वेक्षण के अनुसार 46 प्रतिशत मुसलमनों ने बताया है कि इस्लाम के बारे में निर्थक पूर्वागृह के कारण ब्रिटेन में रहने वाले मुसलमानों का जीवन कठिन हो चुका है।

मुसलमानों को वहां पर अपने धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन में भी कई प्रकार की सीमितताओं का सामना करना पड़ता है।  डेलीमेल ने 11 जून 2015 को अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि पूर्वी लंदन के एक स्कूल ने वहां पर पढ़ने वाले मुसलमान बच्चों के माता-पिता को पत्र भेजकर सूचित किया था कि रमज़ान के महीने में स्कूल के बच्चों का रोज़ा रखना स्कूल के क़ानून के हिसाब से ग़ैर क़ानूनी है।  ब्रिटेन में यदि कहीं कोई मस्जिद बनाई जाती है तो उसके विरुद्ध प्रदर्शन होने लगते हैं।  ब्रिटेन के एक इस्लाम विरोधी गुट ने इस देश के Dudley डूडली नगर में विरोध प्रदर्शन करके एक मस्जिद के निर्माण में बधाएं डाली थीं।  इस गुट का नाम था, "फुटबाल के सारे समर्थक इस्लामीकरण के विरोधी"।

वैसे तो ब्रिटेन में मुसलमानों को भेदभाव का समाना करना पड़ता है किंतु इस भेदभाव का सबसे अधिक सामना महिलाओं को करना पड़ता है।  एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि हिजाब करने वाली महिलाओं को कार्यस्थल पर हिजाब न करने वाली महिलाओं की तुलना में अधिक भेदभाव का समाना करना पड़ता है।  इस देश की संसद की अगस्त 2016 की  एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में नौकरियां देने वाले हिजाब करने वाली महिलाओं को कमज़ोर समझते हैं और नौकरी देते समय अधिकांश मुसलमान महिलाओं को नौकरी नहीं दी जाती। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बात अब समाज में एक प्रकार के स्वीकार्य भेदहाव में परिवर्तित हो चुकी है।  ब्रिटेन की मुसलमान महिलाओं में बेरोज़गारी, 18 प्रतिशत है जबकि अन्य धर्म के मानने वालों में यह प्रतिशत बहुत कम है।

ब्रिटेन की ज्वलंत समस्याओं में से एक निर्धन्ता और बेघरी का मामला है।  वास्तव में यह सरकार की लापरवाही का परिणाम है।  गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार लंदन में लोगों बेघरों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है।  इस रिपोर्ट के अनुसार लंदन में सन 2009 में सड़कों पर सोने वालों की संख्या 3673 थी जो सन 2015 में बढ़कर 7500 हो गई।  ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेता का कहना है कि यह कंज़रवेटिव पार्टी की सरकार की नीतियों का परिणाम है।  गार्डियन ने अपनी एक अन्य रिपोर्ट में बताया है कि ब्रिटेन में अस्सी लाख लोग एेसे हैं जो प्रतिदिन अपने लिए पर्याप्त भोजन का प्रबंध नहीं कर सकते।  इनमें से आधे एेसे हैं जो कभी-कभी पूरा दिन भूखे रह जाते हैं।  इस प्रकार से ब्रिटेन, भूखे लोगों की दृष्टि से पौलैण्ड, स्टोनिया, स्लोवाकिया और माल्टा से भी नीचे के स्तर पर पहुंच गया है।

ब्रिटेन में लड़कियों और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं बहुत खेद जनक हैं।  इस देश में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा में घरेलू हिंसा सबसे ऊपर है।  एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन में 30 प्रतिशत महिलाएं, 16 वर्ष की आयु से ही घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं।  इसी प्रकार ब्रिटेन में लगभग 91 प्रतिशत महिलाएं विभिन्न शैलियों में यौन हिंसा का शिकार होती हैं।  वहां पर स्कूलों में भी लड़कियों के विरुद्ध यौन हिंसा की घटनाएं देखने में मिलती हैं।  एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में सन 2013 में 16 से 18 साल की 42 प्रतिशत लड़कियां, स्कूलों में यौन हिंसा का शिकार बनीं।

पश्चिम में बाल अधिकारों का भी ख़ूब ढिंढोरा पीटा जाता है।  हालांकि ब्रिटेन में इनका ख़ूब हनन होता है।  बच्चों के साथ यौन हिंसा, बच्चों से ज़बरदस्ती मज़दूरी कराना, बच्चों को यातनाएं देना और इसी प्रकार की बहुत सी बातें वहां पर आम बात हो चुकी है।  गार्डियन की 8 अप्रैल 2015 की रिपोर्ट के अनुसार अन्य योरोपीय देशों की तुलना में ब्रिटेन में बच्चों को यातनाएं देने की घटनाएं अधिक घटती हैं।  इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दोषियों को उचित दंड न मिलने के कारण यह प्रक्रिया बढ़ती जा रही है।  संयुक्त राष्ट्रसंघ की रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में बल उत्पीड़न के परिणाम स्वरूप प्रतिवर्ष 100 बच्चे काल के गाल में समा जाते हैं।  स्वयं ब्रिटेन सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में लगभग बारह मिलयन बच्चे, योजन उत्पीड़न की चपेट में हैं।  रिपोर्टों के अनुसार ब्रिटेन में हर छह बच्चों में से एक बच्चा यौन हिंसा का शिकार होता है लेकिन छोटी लड़कियों में इसका अनुपात अधिक है।

 

 

टैग्स

Mar ०६, २०१८ १४:१४ Asia/Kolkata
कमेंट्स