वर्तमान समय मे संसार की लोकतांत्रिक सरकारों की ओर से लोगों को जो स्वतंत्रता प्रदान की गई है उसमें से एक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है अर्थात बोलने की आज़ादी। 

किसी समाज या राष्ट्र की सकारात्मक प्रगति में विरोधियों की बातों को सुनने, आलोचनाओं को सहन करने, जनता तथा मीडिया के सार्थक सुझावों के स्वागत और इस प्रकार की बातों का बहुत प्रभाव पड़ता है।  इस समय हम चारों ओर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे नारों को सुनते रहते हैं।  सुनने में तो यह एक बहुत अच्छा वाक्य लगता है लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि क्या इसका सम्मान किया जाता है और यह हर जगह लागू है।  क्या हर जगह पर लोगों को बोलने की आज़ादी है?

 

जब हम ग़ौर करते हैं तो यह पाते हैं कि ईरान में राजशाही सरकारों के काल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं था।  उस काल में केवल अभिव्यक्ति के कारण लोगों को जेल की हवा खानी पड़ती थी।  बहुत से समाचारपत्रों को केवल इसीलिए बंद कर दिया जाता था कि उन्होंने सच बात कही होती थी।  सन 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने अपना अर्थ हासिल किया।  वास्तव में यह इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई के सकारात्मक दृष्टिकोणों के कारण ही संभव हो सका। 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार समझते हैं।  वे कहते हैं कि यह मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है।  आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोगों को सरकारों ने नहीं दी बल्कि यह तो ईश्वर की देन है।  जब हम स्वतंत्रता जैसी ईश्वरीय विभूति के बारे में सोचते हैं तो यह पाते हैं कि इसका सम्मान किया जाए और इसे इसमें न तो कमी हो और न अतिशयोक्ती की जाए। ऐसा न हो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में मनमानी की जाने लगे।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वास्वत में स्वतंत्रता का ही एक भाग है।  लोगों और समाज को जागरूक करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में स्वतंत्र विचारों से जन्म लेती है।  जब किसी समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पाई जाए तो उस समाज के प्रतिभाशाली लोग अपने विचारों को व्यक्त कर सकेंगे जिसके कारण वह समाज प्रगति करेगा।  इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोगों के अपमान या बुरा भला कहने में बहुत अंतर है।  वे कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ नियम हैं।  हमें उन नियमों को सीखकर दूसरों को सिखाना चाहिए।  उनका मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्लाम की छत्रछाया में समर्थन किया जाए ताकि उसे मनमानी से सुरक्षित रखा जा सके।

 

पश्चिम में जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया गया है और इस्लाम जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कहता है उसमें बहुत अंतर पाया जाता है।  इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि एक मुसलमान को तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनुसरण न करके उसे इस्लाम से हासिल करना चाहिए।  वे कहते हैं कि पश्चिम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम की स्वतंत्रता के बीच बहुत फ़र्क़ है।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि जिस प्रकार से इस्लामी दृष्टिकोण में आज़ादी का अर्थ है ईश्वर के अतिरिक्त हर एक से मुक्ति प्राप्त करना, ठीक उसी प्रकार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है।  इस हिसाब से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है सच बात कहने से न डरना।  यदि किसी समाज का पीड़ित या अत्याचारग्रस्त व्यक्ति बिना किसी डर के अपनी बात उस देश के शासक तक सरलता से पहुंचा सके तो इसे वास्तविक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा जाएगा।  इस बात को स्पष्ट करते हुए इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि किसी भी समाज में आज़ादी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समाज के सबसे छोटे दर्जे का व्यक्ति निडर होकर अपनी बात देश के सबसे बड़े अधिकारी तक पहुंचा सके।  कुछ लोगों का यह मानना है कि ऐसा कभी भी संभव नहीं है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस प्रकार के लोगों को संभवतः स्वयं पर पूरा भरोसा नहीं है।  यदि समाज में आज़ादी पाई जाती हो तो लोगों के अधिकारों का सम्मान किया जाएगा।

इस्लाम में आज़ादी की जड़ें एकेश्वरवाद के दृष्टिकोण में निहित हैं।  इस हिसाब से आज़ादी, राष्ट्रों के दर्द की दवा है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यदि राष्ट्र चाहते हैं कि वे अत्याचारियों के अत्याचारों से न डरें और उनके मुक़ाबले में डटे रहें तो उन्हें चाहिए कि वे अपने भीतर की आज़ादी और आध्यात्मिक आज़ादी पर ध्यान दें।

जैसाकि हम पहले भी बता चुके हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरों का अपमान करने तथा इसके नाम पर अस्थिरता उत्पन्न करने में बहुत अंतर है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस्लाम ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित की हैं।  इसकी सबसे महत्वपूर्ण सीमारेखा यह है कि लोग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर लोगों को उकसा कर उन्हें गुमराह करें।  वे कहते हैं कि विशेष परिस्थितियों में यदि कोई व्यक्ति ऐसी बात कहता है जो लोगों के गुमराह होने का कारण बनती है तो इस्लाम की दृष्टि में यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है बल्कि निषेध है।  इसका कारण भी स्पष्ट है।  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोगों की भलाई के लिए है न कि उनकी बुराई के लिए।  यह समाज को जागरूक बनाने के लिए है, मतभेद फैलाने के लिए नहीं।  वह आज़ादी जो लोगों के गुमराह होने का कारण बने वह विचारों की प्रगति को रोक देती है जिससे समाज प्रगति के स्थान पर पीछे की ओर जाने लगता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक अन्य सीमा, समाज को अफ़वाहों से बचाते हुए उसे हर प्रकार के झगड़े और उपद्रव से सुरक्षित रखना है।  पवित्र क़ुरआन में अफ़वाहें फैलाने जैसे काम से रोका गया है।  ऐसे लोगों की निंदा की गई है जो समाज में अफ़वाहें फैलाते हैं।  क़ुरआन के अनुसार धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो अपने दृष्टिगत लक्ष्यों के लिए लोगों को उकसाते हैं और अफ़वाहे फैलाते हैं।  इस बारे में सूरे अहज़ाब की 60वीं आयत में ईश्वर कहता है कि मिथ्याचारी और अफ़वाहें फैलाने वाले यदि मदीने में झूठी बातें फैलाने से नहीं रूकते हैं तो मैं तुमको उनके विरुद्ध भेजूंगा।  इस आयत में “मुरजेफ़ून” शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ होता है समाज में अशांति फैलाने वाले या अफ़वाहे फैलाने वाले। यह ऐसे लोग होते हैं जो अपनी बातों से समाज में अशांति और उपद्रव फैलाते हैं।

इस्लाम किसी भी स्थिति में समाज में अशांति को पसंद नहीं करता।  वरिष्ठ नेता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबन्ध में कहते हैं कि बोलने की तो आज़ादी है किंतु यदि कोई व्यक्ति यह चाहता है कि वह बोलकर समाज की शांति को अशांत करे और लोगों के जीवन में समस्याएं उत्पन्न करे तो फिर इस्लाम इसे स्वीकार नहीं करता।  ऐसे में सरकार का कर्तव्य है वह इस प्रकार के लोगों के विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही करे।  इससे पता चलता है कि लोगों को उकसाने के लिए कुछ कहना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता एक अन्य बिंदु की ओर संकेत करते हैं।  वे कहते हैं कि इस्लाम के अनुसार कुछ ऐसे अवसर हैं जहां पर न बोलना निंदनीय है।  ऐसे अवसरों पर जहां पर बोलना चाहिए वहां पर ख़ामोश रहना निंदनीय है।  इस बारे में वे कहते हैं कि बात को कहने या न कहने के अवसर होते हैं।  वह समय जब चुप रहना उचित है ऐसे में बोलना अनुचित है।  इसी प्रकार कुछ ऐसे अवसर भी होते हैं जहां पर चुप रहना हराम हो जाता है।  वास्तविकता को छिपाना ग़लत है उसे छिपाना नहीं बल्कि बतलाना चाहिए।  इस संबन्ध में ईश्वर सूरे आले इमरान की आयत संख्या 187 में एक स्थान पर कहता है कि उसको निश्चित रूप में लोगों को बताओ उसको लोगों से न छिपाओ।  यदि कोई बुराई है तो उसे छिपाना पाप है बल्कि उसे सार्वजनिक किया जाए ताकि लोग उसे समझ सके।  इस प्रकार से कहा जा सकता है कि बात को कहना और उसे छिपाना दोनो ही काम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अन्तर्गत आते हैं।

 

Mar ०७, २०१८ १२:२० Asia/Kolkata
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