जीवन में काम या श्रम का बहुत महत्व है।

बेकार रहने से जीवन नरक बन जाता है।  काम करने से व्यक्ति अपने जीवन में उन्नति करता है।  किसी व्यक्ति देश या राष्ट्र की प्रगति के लिए श्रम बहुत ज़रूरी है।  एसे में यह कहना अनुचित नहीं है कि श्रम या मेहनत के बिना कुछ भी कर पाना संभव नहीं है।  किसी भी प्रकार के शारीरिक काम को श्रम कहा जाता है।  अगर काम न किया जाए तो सबकुछ बेकार है।  कहा गया है कि श्रम ही मनुष्य की वास्तविक संपत्ति है।  मेहनत करने से मनुष्य का मन प्रसन्न रहता है।  शरीर स्वस्थ रहता है।  उसे परिवार और समाज में सम्मान मिलता है।  श्रम करने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से जीवन में सफलता प्राप्त करता है।

 

काम के महत्व के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) का कहना है कि मेरे मानने वालों में से कुछ लोगों की दुआ ईश्वर स्वीकार नहीं करता।  इन लोगों में से एक वह है जो कोई काम न करे और ईश्वर से प्रार्थना करे कि हे ईश्वर मेरी आजीविका का प्रबंध कर दे।  इस्लाम में काम को बहुत महत्व प्राप्त है।  इस्लाम में मेहनत करने या श्रम को बहुत महत्व दिया गया है।  इसके विपरीत काम न करने वाले की निंदा की गई है।  इस्लाम के निकट एसा व्यक्ति सम्मानीय नहीं हो सकता जो मेहनत न करता हो।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई भी जीवन में कार्य के महत्व को स्वीकार करते हैं।  इस बारे में उनका कहना है कि काम या श्रम एक प्रशंसनीय चीज़ है।  वे पवित्र क़ुरआन के हवाले से बताते हैं कि अच्छे काम करके मनुष्य, घाटा उठाने से बच जाता है।  इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार केवल नमाज़ पढ़ना, रोज़े रखना और क़ुरआन पढ़ना ही अच्छे काम हैं बल्कि कुछ अन्य चीज़ें भी भले काम की सूचि में आती हैं।  उदाहरण स्वरूप जीवन को उचित ढंग से बिताना भी भला काम ही है।  उचित ढंग से जीवन व्यतीत करने में श्रम की बहुत बड़ी भूमिका है।

 

वरिष्ठ नेता पैग़म्बरे इस्लाम के एक कथन का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि एक बार उन्होंने एक युवक को देखा जो उन्हें देखने में अच्छा लगा।  उन्होंने उस युवक से पूछा कि तुम्हारा क्या नाम है।  बाद में जब उन्होंने उससे यह पूछा कि तुम क्या करते हो तो उसने कहा कि कुछ नहीं।  यह सुनकर पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि तुम मेरी नज़र से गिर गए।  इससे पता चलता है कि बेकार इन्सान का क्या महत्व है।

काम के महत्व के साथ ही इस्लाम में यह भी बताया गया है कि उसकी दृष्टि में कोई काम ऊंचा या नीचा नहीं होता बल्कि काम तो काम है।  इस्लाम में इस बात पर विशेष महत्व दिया गया है कि काम ऐसा हो जो हराम न हो।  खेद की बात यह है कि बहुत से लोग यह समझते हैं कि मेहनत-मज़दूरी एक घटिया काम है।  इस सोच का परिणाम यह निकला कि आजकल के युवा मेहनत और मज़दूरी को गिरा हुआ काम समझ कर उससे बचते हैं।  आज के युवा कठिन परिश्रम के स्थान पर कुर्सी-मेज़ पर बैठने वाले काम पसंद करते हैं।  हालांकि किसी समाज या देश के विकास के लिए हर प्रकार के काम ज़रूरी हैं।  अगर यह सोचा जाए कि शारीरिक श्रम वाले काम घटिया हैं और यह सोचकर लोग उनसे बचने लगें तो फिर तरक़्क़ी रुक जाएगी।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि काम का अर्थ बहुत विस्तृत है।  वे कहते हैं कि शारीरिक श्रम, मानसिक श्रम, विज्ञान के क्षेत्र में किये जाने वाले काम, प्रबंधन का काम और इसी प्रकार के अन्य काम, श्रम की सूचि में आते हैं।  वे कहते हैं कि अगर काम न हो तो फिर पूंजी, ऊर्जा, सूचनाएं और बाक़ी सारी चीज़ें धरी रह जाएंगी।  आज हम जो ऊंजी-ऊंची इमारतें, हवाई जहाज़, उपग्रह, कम्प्यूटर, इंटरनेट और बड़े-बड़े कारख़ानों जैसी जो चीज़ें देख रहे हैं वह सबकुछ श्रम का ही परिणाम हैं।

विश्व के सभी धर्मों में काम को, विशेषकर शारीरिक श्रम की ओर विशेष ध्यान दिया गया है।  ईश्वरीय दूत अपने जीवन में स्वयं शारीरिक श्रम किया करते थे।  इस बात के बहुत से उदाहरण मौजूद हैं कि ईश्वरीय दूत अपने जीवन में भांति-भांति के काम किया करते थे।  उन्होंने काम करने को कभी भी अपमान नहीं समझा।  वे अपने निजी काम तो स्वयं किया ही करते थे दूसरों के काम भी अंजाम दिया करते थे।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि अपनी आजीविका के लिए मेहनत करना प्रशंसनीय काम है।  इस बारे में वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के एक कथन को पेश करते हैं।  एक बार आपने एक साथी से हाथ मिलाया तो महसूस किया कि उसका हाथ बहुत कठोर है।  आपने पूछा कि तुम्हारा हाथ एसा क्यो हैं? उसने कहा कि हे ईश्वर के दूतः मैं अपने इन्ही हाथों से काम करता हूं जिसके कारण मेरे हाथ में (घट्टे) पड़ गए हैं।  पैग़म्बर ने उसके हाथ को चूमते हुए कहा कि यह वह हाथ है जिसे नरक की आग छू नहीं सकती।  इससे यह पता चलता है कि मेहनत का क्या महत्व है? वास्तव में काम बहुत महत्व का स्वामी है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने परिश्रमी व्यक्ति का हाथ चूमकर किसी मज़दूर का सम्मान नहीं किया बल्कि काम के महत्व को दर्शाया है।  यह हमारे लिए पाठ है।  हमे इससे पाठ लेना चाहिए।  जब ईश्वरीय दूत श्रम करने से नहीं कतराते थे तो हम एसा क्यों करें?  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि जिस समाज में श्रमिकों और मेहनत करने वालों का सम्मान किया जाएगा वह समाज अवश्य तरक़्क़ी करेगा।

इस्लाम, सुस्ती और बेकारी को बहुत बुरी दृष्टि से देखता है।  सुस्ती के कारण मनुष्य विकास से वंचित हो जाता है।  कहते हैं कि बेकार या ख़ाली लोग अपराध की ओर बढ़ने लगते हैं।  जिस समाज में जितने अधिक लोग बेकार और सुस्त होंगे वहां पर अपराध की संभावना अधिक हो जाती है।  इस प्रकार का समाज भ्रष्ट हो जाता है जिसका विनाश निश्चित होता है।  श्रम और मेहनत से मनुष्य, परिवार, समाज और देश का आर्थिक चक्र चलता है।  सुस्ती के कारण इस चक्र की गति धीमी पड़ने लगती है जो पिछड़ेपन का कारण बनती है।  बेकारी या बेरोज़गारी के बहुत बुरे परिणाम समाज पर पड़ते हैं।  बेकार व्यक्ति को समाज में बहुत ही गिरी नज़र से देखा जाता है।  एसा व्यक्ति सम्मान से वंचित रहता है।

एक बार "मआज़ बिन कसीर" नामक एक व्यक्ति इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की सेवा में आया।  उसने इमाम से पूछा कि वह कामकाज छोड़े दे और जो कुछ उसके पास है उसे पर्याप्त समझते हुए अब काम न करे।  इमाम ने उनसे कहा कि तुम एसा न करो।  आपने कहा कि यदि तुम एसा करते हो तो इससे तुमको अपमानित होना पड़ेगा।  काम कितना ही छोटा क्यों न हो वह बुरा नहीं होता बुरा यह है कि मनुष्य अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाए।  इमाम का कथन है कि अगर कोई व्यक्ति मेहनत करके ईंधन इकट्ठा करता है तो यह काम दूसरों के आगे हाथ फैलाने से कहीं बेहतर है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता काम के महत्व को बताते हुए कहते हैं कि युवाओं को मेहनत से कभी भी भागना नहीं चाहिए।  वे युवाओं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि युवाओं को अपना समय ख़ाली रहकर नहीं बल्कि काम के साथ गुज़ारना चाहिए।  वे कहते हैं कि इस बात को युवाओं को बहुत ही गंभीरता से लेना चाहिए कि ख़ाली रहने के बहुत नुक़सान हैं।  वे कहते हैं कि काम के बारे में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि वह काम जो मनुष्य अंजाम दे रहा है यदि उसका महत्व, काम करने वाले के लिए स्पष्ट हो तो फिर वह उसमें काहिली नहीं करेगा।

जब काम करने वाले व्यक्ति को यह मालूम होगा कि वह जो काम कर रहा है उससे उसको, उसके समाज, उसके देश और दूसरों को लाभ पहुंचेगा तो वह पूरी निष्ठा के साथ काम करने लगेगा और बिल्कुल भी काहेली नहीं करेगा।  जब मनुष्य को काम का महत्व भलिभांति पता होगा तो उसके भीतर एसी ऊर्जा पैदा होगी को काम के मार्ग की बाधाओं को हटाने में मदद करेगी।  इसलिए वरिष्ठ नेता कहते हैं कि मैं हरएक से यह सिफारिश करता हूं कि उन्हें जो भी काम दिया गया है उसे पूरी ईमानदारी और लगन के साथ अंजाम दें।  उसको महत्व दें और पूरी निष्ठा के साथ समाप्त करें।  इस संबन्ध में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कहना है कि उसपर ईश्वर की कृपा हो जो किसी काम या ज़िम्मेदारी को लेता है और उसे पूरी ईमानदारी से पूरा करता है।

 

 

टैग्स

Mar ०७, २०१८ १२:४५ Asia/Kolkata
कमेंट्स