आज की दुनिया में लोग एक दूसरे की आवश्यकता का आभास करते हैं।

एक दूसरे की सहायता से अपनी आवश्यकता को पूरा करते हैं। इस्लामी रवायतों व शिक्षाओं में लोगों की आवश्यकताओं को जल्द से जल्द पूरा करने पर बहुत बल दिया गया है। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने फरमाया हैः अगर तुम्हारे भाई ने तुमसे कुछ मांगा तो उसकी ज़रूरत को पूरा करने में जल्दी करो इससे पहले कि वह किसी वजह से आवश्यकता मुक्त हो जाये।

 

इस रवायत में धार्मिक भाई की आवश्यकता के शीघ्र पूरा करने पर बल दिया गया है। क्योंकि इस बात की संभावना है कि दूसरे को उसकी आवश्यकता का पता चल जाये और वह उसकी ज़रूरत को पूरा कर दे।

इस सिफारिश में कुछ बिन्दु नीहित हैं। पहला बिन्दु यह है कि जब कोई इंसान अपनी ज़रूरत को बयान करता है तो महातपूर्ण बात यह है कि जल्द से जल्द उसकी समस्या का समाधान कर दिया जाये। दूसरा बिन्दु यह है कि मांगने वाले की जो ज़रूरत है वह एक अनुकंपा भी है जिसे पेश किया गया है और महान व सर्वसमर्थ का सामिप्य प्राप्त करने का अवसर है। इस आधार पर इससे पहले कि यह अवसर हाथ से निकल जाये आध्यात्मिक हितों के लिए उससे लाभ उठाया जाना चाहिये।

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने फरमाया है कि दूसरों के साथ की जाने वाली भलाई पूरी नहीं होगी किन्तु तीन विशेषताओं के साथ  एक यह कि काम को जल्दी अंजाम दिया जाये दूसरे यह कि अपने कार्य को आवश्यकता रखने वाले व्यक्ति के समक्ष छोटा करके पेश किया जाये और तीसरे यह कि उसे दूसरों से छिपा कर रखा जाये।

 

काम को अंजाम देने में जल्दी/ कार्य की परिपूर्णता का कारण बनती है।

इन तीन शर्तों के लिए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने जो कारण बयान किये हैं वह ध्यान योग्य है। इमाम फरमाते हैं" जब ज़रूरतमंद ने अपनी ज़रूरत तुमसे बयान कर दी और तुमने जल्दी से उसे पूरा कर दिया तो तुम्हरा यह कार्य उसे अच्छा लगेगा। इमाम फरमाते हैं” वास्तव में जब तक किसी पर अधिक दबाव नहीं आयेगा वह अपनी इज़्ज़त को दूसरों के पास गिरवी नहीं रखेगा। इस हालत में जब अविलंब उसकी ज़रूरत पूरी कर दी जाये तो इस कार्य की मिठास उसके मन में सदैव बनी रहेगी किन्तु अगर तुम उसकी ज़रूरत पूरा कर दो और उसे यह दिखाओ कि तुम्हारी सेवा के लिए मैंने जो कार्य अंजाम दिया वह छोटा कार्य था और जो काम मैंने अंजाम दिया है उसके मुकाबले में तुम्हारा मूल्य मेरे नज़दीक अधिक है तो तुमने उसका सम्मान किया क्योंकि जब कोई किसी के सामने ज़बान खोलता व हाथ फैलाता है तो उसने अपने आपको तुच्छ व छोटा कर लिया। जब समस्या का समाधान करने वाला व्यक्ति अपने कार्य को छोटा दिखाता है तो उसका यह कार्य उस हीन भावना की भरपाई है जिसका आभास ज़रूरतमंद करता है। तीसरा बिन्दु यह है कि जब तुम अपने इस कार्य को गुप्त रखते हो तो तुमने अपने  कार्य को परिपूर्ण कर दिया।“  

 

अगर किसी से कुछ मांगा गया और उसने सकारात्मक जवाब दिया तो मांगने और देने वाले दोनों के एक दूसरे के प्रति कुछ दायित्व हैं। मांगने वाले का दायित्व यह है कि जिसने उसकी ज़रूरत पूरी की है वह उसका आभार व्यक्त करे और जो काम उसने किया है उसकी सराहना करे। यह एसा कार्य है जिसका आदेश बुद्धि देती है यानी यह एक बौद्धिक कार्य है।

बेहारुल अनवार किताब के संकलनकर्ता दिवंगत अल्लाम मजलिसी मसमअ बिन अब्दुल मलिक के हवाले से एक वाक़ेआ लिखते हैं। मसमअ बिन अब्दुल मलिक कहता है” हज और मिना की यात्रा में इमाम सादिक अलैहिस्सलाम की सेवा में मैं बैठा था। हमारे सामने कुछ अंगूर थे जिसे हम इमाम के साथ खा रहे थे। उसी समय एक ज़रूरतमंद आया और उसने इमाम से कुछ मांगा तो इमाम ने उसे अंगूर का एक गुच्छा देने का आदेश दिया। तो मांगने वाले ने कहा कि मुझे अंगूर नहीं चाहिये अगर पैसा है तो मुझे पैसा दीजिये। इस पर इमाम ने फरमाया ईश्वर तुम्हारी रोज़ी में बरकत दे उसके बाद इमाम ने उसे कुछ नहीं दिया। वह चला गया थोड़ी देर के बाद वह लौट कर आया और कहा वही अंगूर का गुच्छा मुझे दीजिये। इस पर इमाम ने फरमाया। ईश्वर तुम्हारी रोज़ी में बरकत दे हमारे पास कुछ नहीं है। यह कहने के बाद इमाम ने उसे कुछ नहीं दिया। उसके बाद दूसरा मांगने वाला इमाम की सेवा में आया तो इमाम ने उसे अंगूर का एक गुच्छा नहीं बल्कि अंगूर का तीन दाना दिया। उसने वही अंगूर का तीन दाना ले लिया और कहा कि ईश्वर का आभार है कि उसने हमें रोज़ी दी। इस पर इमाम ने उससे कहा कि रुको। उसके बाद अपने दोनों हाथों से अंगूर उठाया और उसे मांगने वाले को दे दिया। उसने फिर ईश्वर का आभार किया। उसके बाद इमाम ने अपने दास को आवाज़ दी और फरमाया तुम्हारे पास कितना पैसा है? दास ने कहा 20 दिरहम। इमाम ने उस 20 दिरहम को भी ले लिया और उसे मांगने वाले को दे दिया। इस पर भी उसने ईश्वर का आभार व्यक्त किया। फिर इमाम ने मांगने वाले से रुकने के लिए कहा और जो वस्त्र उन्होंने पहन रखा था उसे उतारा और मांगने वाले को दे दिया। इसके बाद मांगने वाले ने ईश्वर का आभार किया और इमाम के लिए दुआ की।

 

पवित्र कुरआन के सूरे मआरिज में महान ईश्वर कहता हैः वास्तविक नमाज़ी वे लोग हैं जिनके माल में मांगने वालों व दरिद्र लोगों के लिए एक निर्धारित अधिकार है। इस आधार पर मांगने वाले को वंचित नहीं किया जाना चाहिये। जैसाकि महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरे ज़ोहा में भी कहता है कि मांगने वाले को न झिड़को।

पवित्र कुरआन के सूरे मआरिज में जो यह कहा गया है कि वास्तविक नमाज़ी वे लोग हैं जिनके माल में मांगने वाले व दरिद्र लोगों के लिए एक निर्धारित हक है तो इस आयत में हक से तात्पर्य खुम्स व ज़कात और दूसरे अनिवार्य अधिकार हैं? या वे अधिकार हैं जिन्हें नमाज़ियों ने अपने उपर ज़रूरी कर लिया है और अगर अधिकार से तात्पर्य दूसरा अर्थ लिया जाये तो इसमें ग़ैर अनिवार्य अधिकार भी शामिल हो जायेंगे? कुछ मानना है कि इसकी दो सूरते हैं और इसमें अनिवार्य अधिकार शामिल नहीं है। क्योंकि अनिवार्य अधिकार सब लोगों के माल में है चाहे सदाचारी लोग हों या ग़ैर सदाचारी। अगर इस तरह से इसका अर्थ निकाला गया तो। यानी नमाजियों ने अपने उपर अपने माल में से कुछ वंचितों और मांगने वालों को देने को ज़रूरी कर लिया है।

पवित्र कुरआन के सूरे ज़ोहा की जो आयत है उसमें महान ईश्वर कहता है कि ला तन्हर यानी झिड़को नहीं तो यह शब्द नहार से बना है जिसका अर्थ दुर्व्यवहार से झिड़कना व भगाना होता है। यह भी संभव है कि ला तन्हर “नहर” शब्द से बना हो यानी उसका मूल शब्द नहर हो जिसका एक अर्थ जारी पानी है। क्योंकि नहर पानी को तेज़ी से भगाती है किन्तु मांगने वाले से क्या तात्पर्य है? इसकी कुछ व्याख्याएं हैं। सवाल करने वाले का पहला अर्थ शैक्षिक व आस्था संबंधी सवाल करने वाला है जबकि सवाल करने या मांगने वाले का दूसरा अर्थ आर्थिक दृष्टि से दरिद्र व वंचित होना है जबकि उसका तीसरा अर्थ वह है जिसमें दोनों अर्थ शामिल हों।  

पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से बहुत सी रवायतें आई हैं जिसमें दूसरों के सामने हाथ फैलाने की निंदा की गयी है और मना किया गय है क्योंकि दूसरों के सामने हाथ फैलाना महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पर भरोसा न करने और मांगने वाले के अपमान का कारण बनता है और चूंकि मोमिन की अपनी एक इज़्ज़त होती है इसलिए उसे दूसरों के सामने हाथ फैलाकर अपनी प्रतिष्ठा को आघात नहीं पहुंचाना चाहिये। पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि ईश्वर की दया से वह व्यक्ति दूर है जो अपने बोझ को दूसरों पर डालता है।“

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया है लोगों से सवाल, सवाल करने व मांगने वाले की ज़बान को कमज़ोर बना देता है, शूरवीर के दिल को कमज़ोर कर देता है और सक्षम स्वतंत्र को दासों की भांति कमज़ोर कर देता है। मांगने से उसकी इज़्ज़त और उसकी रोज़ी चली जाती है। यही वजह है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने एक पत्र में फरमाया है कि अगर ईश्वर और अपने बीच सम्पन्न व्यक्ति को माध्यम न बनाओ तो बेहतर है और सम्पन्न व्यक्ति से अपनी समस्याओं के समाधान के लिए न कहो बल्कि ईश्वर पर भरोसा रखो। क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में लिखा होगा वह तुम्हें मिलकर रहेगा यद्यपि वह थोड़ा ही क्यों न हो। यह थोड़ा दूसरों के ज़्यादा से बेहतर है। यद्यपि सम्पन्न लोगों के पास भी खुद से कुछ नहीं है।

पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि लोगों से कुछ न मांगों। उसी वक्त एक निर्धन व्यक्ति आया कि पैग़म्बरे इस्लाम से सहायता मांगे। पैग़म्बरे इस्लाम ने इस वाक्य को दोहराया। जो भी मुझसे मांगेगा मैं उसे दूंगा और जो आवश्यकता मुक्त होना चाहे उसे ईश्वर आवश्यकता मुक्त बना देगा। एक दूसरे स्थान पर आया है जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि जो मुझसे न मांगे वह ईश्वर के निकट प्रतिष्ठित है। जो निर्धन व्यक्ति पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में हाज़िर हुआ था उसने नहीं मांगा और वह अपने घर चला गया। जब वह अपने घर आ गया तो उसकी पत्नी ने उससे पूछा। क्यों तुमने पैग़म्बरे इस्लाम से सहायता नहीं मांगी? तो उसने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम ने इस प्रकार कहा। उसके पश्चात वह व्यक्ति मरुस्थल में चला गया। वहां उसने ईंधन इकट्ठा किया, उसे बेचा और आवश्यकतामुक्त हो गया और उसने पैग़म्बरे इस्लाम को अपनी स्थिति बताई तो पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया जैसाकि हमने कहा कि जो लोगों से न मांगे ईश्वर उसे आवश्यकतामुक्त बना देगा।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपनी प्रसिद्ध पुस्तक” रिसालये हुक़ूक़” में फरमाते हैं कि मांगने वाले का अधिकार यह है कि अगर तुम्हारे पास पैसा हो और तुम उसकी ज़रुरत को पूरा कर सकते हो तो उसे दान दो और उसकी ज़रूरत को पूरा होने के लिए दुआ करो, उसकी सहायता करो और अगर उसके सच बोलने के बारे में तुम्हें संदेह हो पंरतु तुम्हें विश्वास नहीं है तो यह संदेह शैतान की जाल है जो तुम्हें ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने से दूर करना चाहती है। प्रत्येक दशा में प्रतिष्ठित ढंग से उसका जवाब दो और अगर इस हालत में उसे कुछ दे दिये तो अच्छा कार्य किया किन्तु जिस व्यक्ति से सवाल किया जाये उसका हक़ यह है कि अगर उसने कुछ दे दिया तो उसे ले लिया जाये और उसका शुक्रिया अदा किया जाये और अगर नहीं दिया तो उसकी मजबूरी व उसकी बात को स्वीकार किया जाये और उसके बारे में अच्छा खयाल रखा जाये। जान लो कि अगर उसने कुछ नहीं दिया तो अपना माल नहीं दिया तो वह भर्त्सना व निंदा का पात्र नहीं है और अगर उसने अत्याचार किया तो अत्याचारी होना इंसान का स्वभाव है।

 

Mar ०७, २०१८ १७:१६ Asia/Kolkata
कमेंट्स