महान ईश्वर ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को 4 बच्चे प्रदान किए।

पहले इमाम हसन अलैहिस्सलाम, उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उसके बाद हज़रत ज़ैनब और आख़िर में हज़रत उम्मे कुलसूल। इमाम हसन अलैहिस्सलाम 15 रमज़ान सन 3 हिजरी क़मरी, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम 3 शाबान सन 4 हिजरी क़मरी, हज़रत ज़ैनब सन 5 हिजरी क़मरी और हज़रत उम्मे कुलसूम सन 6 हिजरी क़मरी को पैदा हुयीं। इस तरह हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा पर घर की देखभाल के साथ बच्चों की परवरिश की भी ज़िम्मेदारी थी। बच्चों की ऐसी परवरिश हो कि वे अपने परिवार की शोभा बढ़ाएं। ऐसे बच्चे हों जो हज़रत ज़हरा और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की तरह सभी नैतिक व मानवीय मूल्यों के प्रतीक हों ख़ास कर इसलिए भी कि सभी की नज़र इस परिवार की ओर लगी हुयी थी। उनके हर व्यवहार पर इस्लामी समाज नज़र रखे हुए था इसलिए उनका आचरण ऐसा हो कि दूसरे उससे प्रेरणा लें। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की छत्रछाया में परवरिश पायी थी, इस भारी ज़िम्मेदारी को निभाने की योग्यता रखती थीं। उन्होंने ऐसे बच्चों की परवरिश की जो इस्लाम के निर्णायक चरण में इस्लाम और इस्लामी जगत के हितों की अच्छी तरह रक्षा की और समाज का उस तरह मार्गदर्शन किया जिस तरह के मार्गदर्शन की ज़रूरत थी।

 

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के परिवार के सदस्यों की एक और विशेषता उनका बुराइयों से पाक चरित्र था और इसके पीछे ईश्वरिय इच्छा थी। पैग़म्बरे इस्लाम के एक अनुयायी इब्ने अब्बास कहते हैं, “एक दिन हज़रत अली, हज़रत फ़ातेमा और हसन व हुसैन पैग़म्बरे इस्लाम के सामने मौजूद थे। उस वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, हे प्रभु! तू जानता है कि ये मेरे घर वाले और सबसे प्रतिष्ठित लोग हैं। जो इन्हें दोस्त रखे तू उन्हें दोस्त रख और जो इनसे दुश्मनी करे तू उनसे दुश्मनी कर। इनकी मदद करने वालों की मदद कर, इन्हें हर बुरायी से पाक रख और हर पाप से दूर रख और जिबरईल के ज़रिए इनकी पुष्टि कर।” इस तरह हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के परिवार पर ईश्वर की विशेष कृपा ने उनके पूरे जीवन को अध्यात्म से भर दिया। उनके जीवन का हर क्षण, उनकी बातचीत, उनकी ख़ामोशी, उनकी ओर से शांति की कोशिश और जंग, उनका खड़ा रहना और बैठना, कुल मिलाकर यह कि उनके जीवन के व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार का लक्ष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करना था। वह उसी रास्ते की ओर क़दम बढ़ाते और वही काम करते जिसमें ईश्वर की प्रसन्नता हो। इसी वजह से पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा को संबोधित करते हुए फ़रमाया था, “ईश्वर ने जब संसार पर नज़र डाली तो मुझे सारे पुरुषों पर वरीयता दी। उसके बाद तुम्हारे पति अली को दूसरों पर वरीयता दी। उसके बाद तुम्हें पूरी दुनिया की औरतों पर वरीयता दी और अंततः हसन और हुसैन को स्वर्ग के जवानों पर वरीयता दी।”                    

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा ख़ुद ईश्वरीय प्रकाश का जलवा थीं। एक बार एक व्यक्ति ने इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम से पूछा कि हज़रत फ़ातेमा को ज़हरा क्यों कहते हैं? तो इमाम ने फ़रमाया, “इसलिए कि ईश्वर ने उन्हें अपने महान प्रकाश से पैदा किया। इस महान महिला के प्रकाश से ज़मीन और आसमान में इस तरह प्रकाश फैला कि फ़रिश्ते इस नूर से प्रभावित हुए और ईश्वर के सामने नत्मस्तक होकर उन्होंने ईश्वर से पूछा कि यह प्रकाश कैसा है? ईश्वर ने फ़रमाया कि यह ऐसी किरण है जिसे मैने अपने महान प्रकाश से पैदा किया और आसमान इसे ठहराया। उसे मैने अपने दूतों के वंश में रखा और इस प्रकाश से धर्म के मार्गदर्शकों को पैदा करुंगा ताकि लोग सत्य के मार्ग की ओर बढ़े। वे मेरे प्रिय उत्तराधिकारी होंगे।”

पति पत्नी और ख़ास तौर पर मां पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी घर में अध्यात्मिक माहौल बनाने की होती है। दूसरे शब्दों में मां की यह ज़िम्मेदारी होती है कि वह बच्चों के खान पान पर नज़र रखने के साथ साथ उनकी आत्मिक ज़रूरतों पर भी गंभीरता से ध्यान दे।  इस संदर्भ में सबसे अहम शैली जो बहुत ही प्रभावी होती है, ईश्वर की उपासना है। यही वजह है कि हज़रत फ़ातेमा ज़हरा जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की आधी रात के वक़्त ईश्वर की निष्ठा में डूबी हुयी नमाज़ें देखी थी, सबसे ज़्यादा उपासना को अहमियत देती थीं। पैग़म्बरे इस्लाम अपनी बेटी की इस विशेषता के बारे में फ़रमाते थे, “फ़ातेमा के मन में ईश्वर पर आस्था इतनी गहरी थी कि जब वह ईश्वर की उपासना करती थीं तो उन्हें अपने आस-पास की कोई ख़बर न होती थी।” पैग़म्बरे इस्लाम जो यह जानते थे कि हज़रत फ़ातेमा ज़हरा किसी हद से ईश्वर पर आस्था रखती हैं, फ़रमाते थे, “मेरी बेटी फ़ातेमा दुनिया की सर्वश्रेष्ठ महिला हैं। मेरा टुकड़े, मेरे दिन का चैन और मेरी आत्मा है। वह धरती पर मनुष्य के रूप में स्वर्ग की अप्सरा है। जब वह ईश्वर की इबादत के लिए मेहराब में खड़ी होती थीं तो उनके वजूद का प्रकाश आसमान पर मौजूद फ़रिश्ते देखते थे। ईश्वर उनसे कहता है, देखो मेरी बंदी किस तरह मेरे सामने नमाज़ के लिए खड़ी है। उसके शरीर के अंग मेरी महानता की वजह से कांप रहे हैं और वह मेरी उपासना में लीन है। गवाह रहना कि मैं ने फ़ातेमा के सच्चे अनुयाइयों को नरक के प्रकोप से अमान दी।”                 

पैग़म्बरे इस्लाम की शुद्ध संस्कृति में, जिसकी छत्रछाया में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का लालन पालन हुआ था, सृष्टि के रचयिता ईश्वर की उपासना की बहुत अहमियत है लेकिन यह उपासना उस समय अपने चरम पर पहुंचती है जब इसके साथ साथ ईश्वर के बंदों की ज़रूरतों को भी पूरा किया जाए। यही वजह है कि पवित्र क़ुरआन में नमाज़ और ज़कात नामक विशेष कर या नमाज़ और दान का एक साथ उल्लेख हुआ है। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का जीवन बहुत सादा था और कभी कभी बहुत सख़्त आर्थिक कठिनाइयों में उनका बसर होता था, लेकिन इसके बावजूद भी वह कभी भी वंचितों व भूखों को नहीं भूलीं और हमेशा ऐसे लोगों की मदद करती थीं।

 

पैग़म्बरे इस्लाम के एक महान अनुयायी जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी कहते हैं, एक दिन अस्र की नमाज़ के बाद एक बूढ़ा व्यक्ति पुराने कपड़े में मस्जिद में दाख़िल हुआ। पैग़म्बरे इस्लाम ने उस व्यक्ति से कुशलक्षेम पूछा तो उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, मैं भूखा हूं मुझे खाना खिलाइये। मुझे ज़रूरत है कुछ मुझे दीजिए और उचित कपड़े की भी ज़रूरत है। पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत बेलाल से कहा कि उस बूढ़े व्यक्ति को हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के घर ले जाओ ताकि उसकी ज़रूरत पूरी हो सके। वे उसे लेकर हज़रत फ़ातेमा के द्वार पर पहुंचे। उस बूढ़े व्यक्ति ने अपनी सारी ज़रूरत बयान की तो हज़रत फ़ातेमा ज़हरा ने गले में पहने वाला विशेष आभूषण उसे उपहार दिया और कहा, इसे बेच कर अपनी ज़रूरत पूरी कर लो। जैसे ही हज़रत अम्मार को यह बात पता चली तो उन्होंने तुरंत उस आभूषण को उचित क़ीमत पर ख़रीद लिया और उसकी सभी ज़रूरतें पूरी कर दीं। वह व्यक्ति जब पैग़म्बरे इस्लाम के पास पहुंचा तो आपने उससे पूछा कि तुम्हारी ज़रूरत पूरी हुयी? तो उसने कहा कि हज़रत फ़ातेमा के अनुदान से आवश्यकतामुक्त हो गया। ईश्वर से चाहता हूं कि फ़ातेमा को ऐसी चीज़ दे जो किसी ने न देखी हो न सुनी हो। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने अनुयाइयों को संबोधित करते हुए कहा, ईश्वर ने इसी दुनिया में फ़ातेमा को यह चीज़ दी है क्योंकि मुझ जैसा पिता, अली जैसा शौहर और हसन व हुसैन जैसे बेटे उन्हें दिए हैं।

हज़रत फ़ातेमा, उनके पति हज़रत अली और बेटे न सिर्फ़ सामान्य हालत में बल्कि कठिन से कठिन हालात में भी दूसरों की ज़रूरत को अपनी ज़रूरत पर वरीयता देते थे। इब्ने अब्बास कहते हैं कि एक बार हसन और हुसैन बहुत बीमार हुए। पैग़म्बरे इस्लाम अपने कुछ अनुयाइयों के साथ उन्हें देखने गए और हज़रत अली से फ़रमाया, हे अली अपने बच्चों की सेहत के लिए मनौती मानो। हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा और कुछ वर्णन के अनुसार इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहेमुस सलाम ने भी रोज़ा रखने की मनौती मानी। कुछ समय गुज़रा के ये दोनों शहज़ादे सेहतमंद हो गए। हज़रत फ़ातेमा ने जौ के आटे की रोटी पकायी। इफ़्तार के समय एक फ़क़ीर घर के दरवाज़े पर पहुंचा और उसने कहा ईश्वर की कृपा हो आप पर हे ईश्वर के पैग़म्बरे के परिजन मैं भूखा हूं मुझे कुछ खाने को दीजिए। सबने फ़क़ीर को ख़ुद पर वरीयता दी और अपने अपने हिस्से की रोटी उसे दे दी और ख़ाली पानी से इफ़्तार कर लिया। अगले दिन भी अपनी मनौती के अनुसार, रोज़ा रखा और जब इफ़्तार के लिए पकायी गयी रोटी से इफ़्तार करने बैठे तो उसी वक़्त एक अनाथ ने घर के द्वार पर आवाज़ दी और मदद की गुहार लगायी। इस बार भी पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों ने अनाथ की ज़रूरत को ख़ुद पर वरीयता दी अपना खाना उसे दे दिया और दूसरे दिन भी ख़ानी पानी से इफ़्तार किया। तीसरे दिन जब इफ़्तार करना चाहते थे कि इस बार एक क़ैदी ने हज़रत फ़ातेमा के द्वार को खटखटाया और मदद की गुहार लगायी। इस बार भी पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों ने अत्यधिक भूखे होने के बावजूद क़ैदी की ज़रूरत को अपनी ज़रूरत पर वरीयता दी और अपनी अपनी जौ की रोटी उसे दे दी और लगातार तीसरे दिन पानी पीकर इफ़्तार किया। उसी वक़्त हज़रत जिबरईल पैग़म्बरे इस्लाम के पास हाज़िर हुए और उन्हें दहर नामक सूरे की 1 से 8 आयतें पढ़ कर सुनायी और कहा कि ईश्वर आपको एसे परिवार से संपन्न होने पर बधाई देता है। इस घटना का वर्णन दहर सूरे की आठवीं और नवीं आयत में है। जिसमें ईश्वर फ़रमाता है, “वे अपने वचन को पूरा करते हैं और उस दिन से डरते हैं जिसका प्रकोप बहुत व्यापक होगा। अपने खाने को ज़रूरत होने के बावजूद फ़क़ीर, अनाथ और क़ैदी को देते हैं और कहते हैं कि हम तुम्हें ईश्वर के लिए दे रहे हैं और तुमसे कोई बदला नहीं चाहते।”

 

 

  ऐ

 

Mar ११, २०१८ १६:४२ Asia/Kolkata
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