हमने पिछले दो कार्यक्रम में इस्लामी और पश्चिमी संस्कृति व सभ्यता के बारे में वरिष्ठ नेता के दृष्टिकोण की समीक्षा की  थी और इस बात का उल्लेख किया कि वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई की नज़र में ज्ञान और आस्था एक दूसरे के पूरक हैं और यही चीज़ इस्लामी सभ्यता के चमकने का आधार बनी।

इसी तरह हमने बताया कि वरिष्ठ नेता पांच आयाम से पश्चिमी सभ्यता की समीक्षा करते हैं। एक मध्ययुगीन काल में वैज्ञानिक प्रगति से गिरजाघर के मद्देनज़र आस्था का टकराव। दो, पश्चिम का वंचित राष्ट्रों की लूटमार और दुनिया के देशों पर वर्चस्व के लिए ज्ञान विज्ञान को हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल करना। तीन, अन्य राष्ट्रों को विज्ञान व तकनीक देने के बजाए उसका एकाधिकार करना। चार, पश्चिम का विज्ञान व प्रौद्योगिकी के ज़रिए पर्यावरण को तबाह करना और पांच, विज्ञान को धन-संपत्ति का साधन बनाना।

 

इस कार्यक्रम में हम इस बात की ओर इशारा करेंगे कि वरिष्ठ नेता की नज़र में ग़ैर अविकसित देशों के वैज्ञानिक पिछड़ेपन में कौन से तत्वों का असर रहा है।

वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई की नज़र में पश्चिमी देशों ने विज्ञान व विकसित प्रौद्योगिकी अन्य देशों को देने के संबंध में कंजूसी से काम लिया और उन्हें ऐसे विज्ञान दिए जिन्हें ख़ुद वे नकार चुके हैं। पश्चिम ने स्वाधीन देशों को विज्ञान व प्रौद्योगिकी की प्राप्ति से रोकने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाए। उनका मानना है कि पश्चिम ने राष्ट्रों को वैज्ञानिक विकास से रोकने के लिए उनका अपमान किया, उनसे नवप्रवर्तन की शक्ति और वैज्ञानिक साहस छीनने के लिए नाना प्रकार के हथकंडे अपनाए। वरिष्ठ नेता इस बारे में कहते हैं, "साम्राज्यवादी देशों के वर्चस्व में रहे देशों के साथ एक अत्याचार यह हुआ कि उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से पीछे रखा गया। उन्हें व्यवहारिक रूप से विकास करने से रोका गया और मनोवैज्ञानिक रूप से उनका मनोबल गिराया गया ताकि वे ख़ुद को अक्षम समझें।" वरिष्ठ नेता कहते हैं कि तीसरी दुनिया के समाज को अपमानित करने का नतीजा यह हुआ कि ये समाज विज्ञान की चोटी पर पहुंचने और पश्चिम के साथ दूरी को कम करने या उनसे आगे निकलने की ओर से निराश हो गए। वरिष्ठ नेता कहते हैं, निराशा पैदा करना आत्म विश्वास और सफलता के मार्ग में मुख्य रुकावटों में से एक है। निराशा पैदा करना यानी क्षितिज को धुंधला करना और वैज्ञानिक फ़ासले को ज़्यादा दिखाना। यह सच्चाई है कि वैज्ञानिक विकास की नज़र से हमारे और विकसित जगत के बीच फ़ासला है। इसी फ़ासले का बार बार उल्लेख करते हैं और कहते हैं कि आप किस तरह इस फ़ासले को तय करेंगे? क्या ऐसा हो सकता है? इस तरह हमारे जवान वैज्ञानिकों व शोधकर्ताओं को निराश करते हैं। मैं कहता हूं कि जी हां क्यों नहीं हो सकता? हमें फ़ासले से निराश नहीं होना चाहिए। हम वैज्ञानिक रफ़्तार बढ़ा कर दूरी को कम कर सकते हैं।                   

आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई का मानना है ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता से पहले के वर्षों सहित अविकसित देशों के जवानों में निराशा व हीन भावना पैदा होने का कारण पश्चिम से प्रभावित बुद्धिजीवियों का वजूद है जो पश्चिम की वैज्ञानिक प्रगति की चकाचौंध में इतना खो गए कि उन्होंने अपने देश की क्षमता व इतिहास की ओर से आंखें मूंद ली और पश्चिमी सभ्यता के कमज़ोर पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर दिया। वे इस बारे में कहते हैं, "पश्चिम से प्रभावित बुद्धिजीवियों ने सबसे बड़ा पाप यह किया कि यही विचार उन्होंने विभिन्न तरीक़ों से लोगों के मन में बिठा दिया। अर्थात लोगों को यह समझाया कि ईरानी कुछ नहीं हैं, उनके विचार, विज्ञान, कला और इतिहास की कोई अहमियत नहीं है। जब आपको अपना वजूद मूल्यहीन लगने लगे तो आप क्या करेंगे? स्वाभाविक सी बात है कि ऐसे ध्रुव की ओर पनाह लेने की कोशिश करेंगे जो आपको मूल्यवान लगेगा। वह ध्रुव कहा है? उन्होंने ख़ुद ही इस ध्रुव को तय किया और वह पश्चमी संस्कृति, सभ्यता और विज्ञान है। पश्चिम ने दुनिया के विभिन्न राष्ट्रों को इस तरह वैज्ञानिक विकास के मार्ग से हटाया और ऐसा काम किया कि वे वैज्ञानिक विकास के पथ की ओर क़दम बढ़ाने की हिम्मत न करें। हालांकि इस्लामी क्षेत्रों में बड़ी वैज्ञानिक प्रगति की पृष्ठभूमि और क्षमता मौजूद है। आपको जो यह दिखाई दे रहा है कि दुनिया के वैज्ञानिक कारवां से हम पिछड़ गए हैं, संयोगवश घटना नहीं है।"

वरिष्ठ नेता का मानना है कि ईरान में इस्लामी क्रान्ति की एक उपलब्धि यह भी है इसने पश्चिम पर निर्भर संबंध को तोड़ कर ईरान में आत्म विश्वास की भावना को मज़बूत किया और जवानों की क्षमताओं को निखारा। इसी प्रकार उनका मानना है कि इस्लामी क्रान्ति के नतीजे में वैज्ञानिक निर्भरता की ज़न्जीर टूट गयी और जवानों में आत्म विश्वास की भावना मज़बूत हुयी जिससे ईरान में वैज्ञानिक विकास व प्रगति की पृष्ठिभूमि मुहैया हुयी। वरिष्ठ नेता के शब्दों में, "क्रान्ति से पहले जवानों और ग़ैर जवानों को विज्ञान के क्षेत्र में इनोवेशन अर्थात नवप्रवर्तन का अवसर नहीं दिया जाता था लेकिन क्रान्ति ने ईरान में स्वाधीनता और आत्म विश्वास की भावना को जीवित किया। इस्लामी क्रान्ति ने ईरान के लिए वैज्ञानिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया। इस कठिन दौर में हमारा वैज्ञानिक विकास, ईरान के उस पचास साठ साल के दौर के वैज्ञानिक विकास की तुलना में, कि जब दुनिया ने सबसे ज़्यादा तरक़्क़ी की, अधिक है।" वह जनता की इच्छाओं व मूल्यों के आधार पर आत्मनिर्भर यूनिवर्सिटियों की स्थापना को इस्लामी गणतंत्र के वैज्ञानिक दौर की विशेषताओं में गिनवाते हुए कहते हैं, "इस्लामी क्रान्ति ने यूनिवर्सिटियों को दो मुसीबतों से बचाया। एक यह कि यूनिवर्सिटियां आत्म-निर्भर हुयीं, उनमें आत्म विश्वास, ख़ुद से सोचने और वैज्ञानिक प्रगति की क्षमता पैदा हुयी और दूसरे यह कि यूनिवर्सिटियों को समाज के विभिन्न वर्गों से जोड़ा" अर्थात समाज के विभिन्न वर्गों के लिए ज्ञान की प्राप्ति आसान हुयी।             

आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई ईरान सहित स्वाधीन देशों पर पश्चिमी देशों की ओर से थोपी जाने वाली पाबंदियों को पश्चिमी सभ्यता की प्रवृत्ति को समझने का उचित मानदंड मानते और इसे प्रतिबंधित देशों के वैज्ञानिक, औद्योगिक, सामरिक और आर्थिक विकास की चोटियों तक पहुंचाने में भी प्रभावी तत्व मानते हुए कहते हैं, "दुनिया की सभी मुसीबतें व मुश्किलें एक इंसान और एक राष्ट्र के विकास के लिए सीढ़ी हो सकती हैं। जंग व पवित्र प्रतिरक्षा के दौरान ईरान पर चारों ओर से पाबंदी लगायी गयी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का मार्ग बंद किया गया और ज़रूरत की चीज़ें हासिल करने से हमें रोक दिया गया। आम गोलियां हमें नहीं बेचते थे लेकिन हमारे राष्ट्र ने इस कठिनाई से अपनी प्रगति का मार्ग समतल किया।" वरिष्ठ नेता ईरान की वैज्ञानिक, औद्योगिक व आर्थिक क्षेत्र में प्रगति को पाबंदियों की देन मानते हुए कहते हैं, "ये सब चीज़ें पाबंदी के दौर में हासिल हुयीं। अगर पाबंदी नहीं लगाते तो शायद यहां तक नहीं पहुंचते।" वरिष्ठ नेता विदेशी पाबंदियों को ईरान की वैज्ञानिक प्रगति को रोकने में तुच्छ और कुछ अवसरों पर इसका असर उलटा बताते हुए कहते हैं, "इस्लामी गणतंत्र ने अपनी क्षमता, नवप्रवर्तन और ख़ुद से प्रेरणा के ज़रिए जो सफलताएं हासिल की हैं, उससे आंखें चकाचौंध हो गयी हैं। ये सब पाबंदियों व दबाव के दौर में ईरानी राष्ट्र ने हासिल की हैं। अर्थात पाबंदियों का न सिर्फ़ यह कि असर नहीं हुआ बल्कि इसका उलटा असर हुआ। इसने हमारे भीतर की क्षमता को उभारा।"

वरिष्ठ नेता एक समाज व देश में वैज्ञानिक विकास को राष्ट्रीय स्तर पर आत्म विश्वास व आत्म सम्मान को बढ़ाने और मुश्किलों के हल में प्रभावी बताते हुए कहते हैं, "जिस राष्ट्र के पास ज्ञान विज्ञान हो, वैज्ञानिक विकास करे और दुनिया में विज्ञान के क्षेत्र में कारनामे करे तो उसमें स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वास व आत्म सम्मान की भावना पैदा होगी। अगर आत्म विश्वास व आत्म सम्मान की भावना किसी राष्ट्र में पैदा हो जाए तो बहुत सी मुश्किलें हल हो जाएंगी।"

वरिष्ठ नेता पश्चिम में आर्थिक व सामरिक शक्ति का राज़ पश्चिमी देशों की वैज्ञानिक शक्ति को मानते हुए कहते हैं, "आज जो लोग दुनिया में धौंस धमकी की भाषा में बात करते हैं, अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के ख़िलाफ़ व्यवहार करते हैं, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में लोगों, राष्ट्रों और सरकारों के साथ बहुत ही घटिया व्यवहार करते हैं और लज्जित भी नहीं होते बल्कि बड़ी ढिठाई से सिर ऊपर उठाए रहते हैं। ऐसा क्यों करते हैं? क्योंकि वे आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली हैं और इन सबसे अहम बात यह कि वे वैज्ञानिक शक्ति से संपन्न है जो इन सभी चीज़ों की बुनियाद है।"

आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई धौंस धमकी देने वाले देशों के सामने स्वाधीन देशों के शक्तिशाली होने को ज़रूरी बताते हुए कहते हैं कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ज़रूरी है कि ये देश वैज्ञानिक शक्ति हासिल करें। वरिष्ठ नेता कहते हैं, "हमें अपने लक्ष्य व आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली होना पड़ेगा। यह शक्ति कैसे हासिल होगी? इन सब चीज़ों की बुनियाद वैज्ञानिक शक्ति है। एक राष्ट्र वैज्ञानिक शक्ति के ज़रिए अपनी बात दुनिया के सभी लोगों तक पहुंचा सकता है। वैज्ञानिक शक्ति से राजनीति की दुनिया में प्रभुत्व हासिल किया जा सकता है। इसी के नतीजे में आर्थिक शक्ति हासिल होती है। यह शक्ति विज्ञान में है।

वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनेई ईरान सहित स्वाधीन देशों में वैज्ञानिक शक्ति की प्राप्ति के लिए वैज्ञानिक आंदोलन और साफ़्टवेयर की दृष्टि से शक्तिशाली होने को एकमात्र रास्ता बताते हुए कहते हैं कि इस तरीक़े से पश्चिम के साथ वैज्ञानिक फ़ासले की भरपायी की जा सकती है और इस्लामी सभ्यता को उसका उच्च स्थान दिला सकते हैं।

 

Mar १२, २०१८ १३:४१ Asia/Kolkata
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