हमने पश्चिमी देशों के मुक़ाबले में अनेक देशों के पिछड़ने के कारणों के बारे में ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का दृष्टिकोण बयान किया था और उल्लेख किया था कि पश्चिमी देश तीसरी दुनिया के देशों के विकास में तरह तरह की रुकावटें खड़ी करते हैं।

दूसरे यह कि यह देश पश्चिम से प्रभावित विचारकों द्वारा अन्य देशों में निराशा फैलाते हैं। इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले तक ईरान भी ऐसे ही देशों में शामिल था, लेकिन क्रांति की सफलता के बाद यहां निराशा उम्मीद और आत्मविश्वास में बदल गई और ईरानी राष्ट्र विभिन्न क्षेत्रों में अपना गौरव प्राप्त करने में सफल हो गया।

 

वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई के मुताबिक़, राजनीतिक, सामरिक, औद्योगिक और आर्थिक आधार के रूप में वैज्ञानिक गौरव प्राप्त करना वैज्ञानिक आंदोलन के स्वरूप पर निर्भर करता है। वे वैज्ञानिक आंदोलन की व्याख्या करते हुए कहते हैं, इस आंदोलन का अर्थ कम्पयूटर के सॉफ़्टवेयर्स को उपलब्ध करना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है किसी भी प्रगति की आत्मा और वास्तविकता, अर्थात ज्ञान का विस्तार। इस आंदोलन की आत्मा अर्थात ज्ञान का विस्तार और किसी एक राष्ट्र की प्रतिभाओं और योग्यताओं का सही इस्तेमाल करना। अगर कोई राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा हो और अपनी पहचान रखता हो तो उसके लिए यह अर्थ महत्वपूर्ण होगा। ऐसा राष्ट्र प्रगति करेगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो वह हमेशा दूसरों का मोहताज रहेगा।

वरिष्ठ नेता के मुताबिक़, साफ़्ट या वैज्ञानिक आंदोलन का अर्थ है ज्ञान और ज्ञान के विस्तार के क्षेत्र में ज्ञान की सीमाओं को तोड़ दिया जाए और एक महान क्रांति उत्पन्न हो जाए। इस आंदोलन का अर्थ है कि ज्ञान प्राप्ति के क्षेत्र में दूसरों के सामने हाथ मत फैलाओ, यानी दूसरे बोयें और फल तोड़े और अपनी ज़रूरत पूरी करने के बाद बचे हुए फल लाकर आपकी झोली में डाल दें।

वैज्ञानिक आंदोलन उत्पन्न करने के लिए वरिष्ठ नेता की दृष्टि में पश्चिम के वैज्ञानिक एकाधिकार पर सवाल खड़ा करना और शिक्षाविदों में पश्चिमी विज्ञान के सिद्धांतों का सामना करने के लिए आत्मविश्वास जगाना ज़रूरी है। वे कहते हैं, हमारे शिक्षकों और छात्रों को अनेक सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों के बारे में कि जिनके पश्चिमी स्वरूप को अंतिम स्वरूप समझा जाता है, सवाल करने चाहिएं, उन्हें इन विषयों पर शोध करना चाहिए और इस धारणा को समाप्त करना चाहिए, नए मार्गों की खोज करना चाहिए, ख़ुद भी उनसे लाभ उठाना चाहिए और दूसरों को भी अवसर प्रदान करना चाहिए। आज हमारे देश को इसी चीज़ की ज़रूरत है। आज देश को विश्वविद्यालयों से यही आशा है। विश्वदियालयों को एक संपूर्ण वैज्ञानिक आंदोलन राष्ट्र के सामने पेश करना चाहिए। जो लोग प्रयास करने वाले हैं, उन्हें चाहिए कि अपने सुझावों से इस्लामी मूल्यों के आधार पर एक वास्तविक समाज की बुनियाद रखें।

वरिष्ठ नेता की दृष्टि में पश्चिम के वैज्ञानिक विचारों पर सवाल खड़े करना इस आंदोलन के लिए ज़रूरी है। उनका मानना है कि ज्ञान के क्षेत्र में साहस और बहादुरी से ही बड़े वैज्ञानिक आंदोलन उत्पन्न होते हैं। दसियों साल से हम विदेशी और पश्चिमी किताबों को पढ़ रहे हैं। हमें लगता है कि हमारे भीतर सवाल और संदेह करने की शक्ति नहीं है। किताबों को पढ़ना चाहिए और ज्ञान को किसी से भी हासिल किया जा सकता है, लेकिन ज्ञान को अपनी उत्कृष्ट प्रक्रिया में शक्तिशाली आत्मा और आगे ले जाने वाले साहस की ज़रूरत होती है, ताकि वह प्रगति कर सके। दुनिया में वैज्ञानिक क्रांतियां इसी तरह से उत्पन्न हुई हैं।

वरिष्ठ नेता का मानना है कि शैक्षिक संस्थानों विशेष रूप से विश्वविद्यालयों और मदरसों में  उद्देश्यपूर्ण डिबेट इस लक्ष्यों को हासिल करने का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। वे शोधकर्ताओं की इस मांग के जवाब में कि शैक्षिक संस्थानों में नए विचारों को पेश करने और आलोचना एवं डिबेट्स के विभागों की स्थापना होनी चाहिए, कहते हैं कि इस विषय पर भरपूर ध्यान देते हुए, सवालों के जवाब देने का आंदोलन, वैज्ञानिक डिबेट्स और मूल्यवान विचारों की समस्त शैक्षिक संस्थानों में स्थापना होनी चाहिए और उसके लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

वरिष्ठ नेता वैज्ञानिक रचनात्मकता को वैज्ञानिक आंदोलन के लिए ज़रूरी बताते हैं और वैज्ञानिक शक्ति एवं वैज्ञानिक साहस को रचनात्मकता के लिए ज़रूरी मानते हैं। वे कहते हैं, वैज्ञानिक रचनात्मकता के लिए दो चीज़ें ज़रूरी हैं, एक वैज्ञानिक शक्ति और दूसरे वैज्ञानिक साहस। हालांकि वैज्ञानिक शक्ति ज़्यादा अहम है। पर्याप्त बुद्धिमत्ता, काफ़ी ज्ञान और शिक्षा प्राप्ति के लिए अथक प्रयास, ऐसी चीज़ें हैं, जो वैज्ञानिक शक्ति की प्राप्ति के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं। हो सकता है कुछ लोगों के पास वैज्ञानिक शक्ति हो, लेकिन उनके ज्ञान का कोई लाभ नहीं हो और राष्ट्र की प्रगति में उनकी कोई भूमिका नहीं हो। इसलिए वैज्ञानिक साहस भी ज़ूरूरी है।

वरिष्ठ नेता अराजकतावाद और वाहियात और वैज्ञानिक साहस के बीच अंतर करते हुए कहते हैं, वैज्ञानिक साहस के लिए ज़रूरी है कि संबंधित ज्ञान पर पूरा निंयत्रण होना चाहिए। वे लेखकों को बेहूदा बातों से दूर रहने की सिफ़ारिश करते हैं। वे कहते हैं, मैं किसी को वैज्ञानिक अराजकतावाद और बेहूदा बातों की सिफ़ारिश नहीं करता हूं। किसी भी क्षेत्र में जिन लोगों को ज्ञान नहीं है, लेकिन वे अपने विचार में रचनात्मकता करना चाहेंगे तो वह बेहूदा मामलों में फंसकर रह जायेंगे। हम कुछ विषयों में विशेष रूप से धार्मिक एवं सामाजिक विषयों में देखते हैं कि जिन लोगों के पास ज्ञान नहीं है वे मैदान में उतर जाते हैं और अपने विचार में रचनात्मकता दिखाते हैं, वास्तव में यह रचनात्मकता नहीं है, बल्कि बेहूदापन है, मैं इसकी सिफ़ारिश नहीं करता हूं।

पिछड़ेपन को दूर करने और ज्ञान के शिखर पर पहुंचने के लिए वरिष्ठ नेता वैज्ञानिक आंदोलन को ज़रूरी मानते हैं। वे कहते हैं, ऐसा नहीं है कि हमें ज्ञान में नए शिखर पर पहुंचने के लिए उन चरणों से गुज़रना ज़रूरी है, जिन्हें पश्चिमी ज्ञान ने निर्धारित किया है। ज्ञान का वृक्ष उन वृक्षों में से है, जो नीचे से ऊपर तक सभी जगह पत्ते उगा सकते हैं और नई शाख़ें निकाल सकते हैं। अगर इंसान ज्ञान में रचनात्मकता दिखाना चाहता है, तो उसके लिए ज़रूरी नहीं है कि वह इन समस्त चरणों को तय करे और फिर जाकर किसी एक चीज़ की वृद्धि करे। हमारे अंदर अच्छी प्रतिभाएं हैं, रचनात्मक आत्मा हमेशा हमें सीधा रास्ता सुझाती है, अतः सीधा रास्ता खोजना चाहिए।

वे प्रकृति के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए की जाने वाली कोशिश को सीधा मार्ग खोजने के लिए सहयोगी मानते हैं, वे कहते हैं, अब भी अनेक सीधे मार्ग मौजूद हैं। बड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि हम अभी भी प्रकृति के अधिक रहस्यों से पर्दा नहीं उठा पाए हैं, अभी बहुत सी चीज़ें खोजी नहीं जा सकी हैं। कौन खोज सकता है? वह व्यक्ति जो चिंतन कर सकता है, विद्वान और वैज्ञानिक बन सकता है और आधुनिक विषयों से लाभ उठाता है।

वैज्ञानिक आंदोलन के लिए और ज्ञान के शिखर पर पहुंचने के लिए वरिष्ठ नेता के अनुसार, समय की ज़रूरत होती है। वे आशा करते हैं कि 50 वर्षों में यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। वे कहते हैं, हमें आशा है कि अगले 50 वर्षों में हम दुनिया में ज्ञान के शिखर पर होंगे, अर्थात ज्ञान की सीमाओं को हम निर्धारित करेंगे। उस बिंदु तक पहुंचने के लिए हमें यह विश्वास रखना होगा कि यह संभव है। अगर हमें विश्वास नहीं होगा तो निश्चित रूप से नहीं पहुंच सकेंगे। वरिष्ठ नेता ज्ञान के आदान प्रदान में सार्थक रूप से संतुलन बनाए रखने के बारे में कहते हैं, ज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न देशों के बीच संबंध आयात एवं निर्यात का संबंध होना चाहिए, अर्थात उसमें संतुलन होना चाहिए। जिस तरह सामाजिक और आर्थिक मामलों में अगर किसी देश का आयात, निर्यात से अधिक होगा तो उसका संतुलन बिगड़ जाएगा और उसे चीट होने का एहसास होगा। ज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसा ही होना चाहिए। ज्ञान को आयात कीजिए, कोई बुराई नहीं है, लेकिन कम से कम उतनी ही मात्रा में उसका निर्यात भी कीजिए या उससे भी अधिक। यह प्रक्रिया दो पक्षीय होनी चाहिए, वरना आप हमेशा दूसरों के ज्ञान पर निर्भर रहेंगे, यह प्रगति नहीं है।         

         

 

 

Mar १२, २०१८ १३:४९ Asia/Kolkata
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