विदित रूप से प्रतीत नहीं हो रहा है कि म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों पर ढाये जा रहे अत्याचार समाप्त होंगे।

                            

विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के जो दावेदार हैं उनकी अर्थपूर्ण चुप्पी की आड़ में म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों की दयनीय स्थिति के बारे में प्रतिदिन हृदयविदारक खबरें प्रकाशित होती- रहती हैं। ह्यूमन राइट्स वाच ने सेटेलाइट से ली गयी तस्वीरों और एक वीडियो को प्रकाशित करके कहा है कि म्यांमार की सरकार जारी वर्ष के जनवरी महीने से अब तक बुल्डोजरों से रोहिंग्या मुसलमानों के 55 गांवों को ध्वस्त कर चुकी है और अब इन गांवों का कोई चिन्ह बाकी नहीं है। इन तस्वीरों में दो दिसंबर वर्ष 2017 को रोहिंग्या मुसलमानों के जलाये गये गांवों को देखा जा सकता है। इसी प्रकार इस क्षेत्र की तस्वीर जो जारी वर्ष के फरवरी महीने में ली गई है उसमें स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है कि इस क्षेत्र में घर, पेड़ और खेत कुछ भी बाकी नहीं हैं। म्यांमार के राखीन प्रांत में इस देश की सरकार ने जो कार्यक्रम लागू कर रखा है उसे व्यवहारिक बनाये जाने के समय वहां मौजूद एक कूटनयिक ने कहा है कि बर्बाद कर दिये गये क्षेत्र को मैंने देखा वहां रहने वालों से उस क्षेत्र को खाली करा लिया गया है, गांवों को जला दिया गया है कुछ क्षेत्रों को बुल्डोज़रों से बराबर और खेतों व फसलों को बर्बाद कर दिया गया है। कुछ गांवों में लोग अब भी रह रहे हैं परंतु वे बहुत डरे हुए हैं। हर जगह पुलिस, सुरक्षा बल और सैनिकों तथा चेक पोस्टों को देखा जा सकता है। ह्यूमन राइट्स वाच ने म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति के बारे में अपनी ताज़ा रिपोर्ट में लिखा है कि वर्ष 2017 के अंत में म्यांमार की सरकार ने कम से कम 55 गांवों को नष्ट कर दिया। समस्त घरों, हरियाली और वनस्पतियों को भारी उपकरणों से तबाह कर दिया है और इस तबाही को पहले और बाद की तस्वीरों में देखा जा सकता है। 362 गांवों में से अधिकांश वे गांव हैं जिन्हें पूर्णरूप से तबाह कर दिया गया है या उनके कुछ भागों को 25 अगस्त 2017 को लगाई गयी आग में जला दिया गया। सेटेलाइट से जो तस्वीर ली गयी है वह इस बात की सूचक है कि कम से कम दो गांवों को तबाह कर दिया गया है जबकि पहले यह गांव अछूते और उसमें लोग रहते थे और 10 अन्य गांवों के सैकड़ों घरों को अब पूरी तरह तबाह कर दिया गया है जबकि पहले इनके कुछ भाग को जलाया गया था। इसी प्रकार सेटेलाइट से ली गयी तस्वीरों में भली- भांति देखा जा सकता है कि म्यांमार की सरकार ने जनवरी महीने से अब तक रोहिंग्या मुसलमानों के 55 गांवों को तबाह कर दिया है।

 

म्यांमार की सरकार दो कारणों से रोहिंग्या मुसलमानों के घरों को तबाह कर रही है। पहला कारण यह है कि वह उन समस्त प्रमाणों व साक्ष्यों को मिटा देना चाहती है जिनसे इस बात का पता चलता है कि वह और अतिवादी बौद्धों ने कितनी निष्ठुरता व निर्दयता से रोहिंग्या मुसलमानों का जातीय सफाया किया है। दूसरा कारण यह है कि रोहिंग्या मुसलमानों के अंदर घर वापसी की जो उम्मीद है उसे म्यांमार की सरकार अपने इस कार्य से खत्म कर देना चाहती है।

जातीय सफाये के आरंभ से अब तक लगभग सात लाख रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। इसी प्रकार रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या, उनकी महिलाओं व लड़कियों के साथ बलात्कार और उनके गांवों को आग के हवाले किये जाने के बारे में हज़ारों रिपोर्टें प्रकाशित हो चुकी हैं। रोहिंग्या मुसलमानों की हृदयविदारक स्थिति के बारे में जो रिपोर्टें ह्यूमन राइट्स ने प्रकाशित की हैं वे उतनी ही नहीं हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बालकोष यूनिसेफ ने भी रोहिंग्या मुसलमानों की दयनीय स्थिति के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की है। बंग्लादेश के दक्षिण में रोहिंग्या मुसलमानों के जो शरणार्थी कैंप हैं उनमें मौजूद स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन की दूसरी आवश्यक संभावनाओं के बारे में यूनिसेफ ने अपनी हालिया रिपोर्ट में ध्यान दिया है। यूनिसेफ की रिपोर्ट में आया है कि बांग्लादेश में गर्मी के मौसम में जो तूफान आते हैं उनका समय निकट आ रहा है और दूषित जल के प्रयोग के कारण बीमारी फैलने के ख़तरों में वृद्धि हो गयी है। इस प्रकार की परिस्थिति में सबसे अधिक खतरा बच्चों को है। बांग्लादेश में गर्मी के मौसम में जो तूफान आते हैं वे प्रायः दो समय में आते हैं एक मार्च से जुलाई तक और दूसरे सितंबर से दिसंबर के बीच में। पिछले वर्ष जब ये तूफान इस क्षेत्र में आये थे तो लगभग एक चौथाई शरणार्थी कैंप नष्ट हो गये। यूनिसेफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन रोहिंग्या मुसलमानों को अपने नगर और गांव से निकाल दिया गया है वे अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें अपनी जान और स्वास्थ्य का खतरा है।

म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों को कई दशकों से भेदभाव की जघन्य समस्या का सामना है। म्यांमार की सरकार और अतिवादी बौद्ध रोहिंग्या मुसलमानों को इस देश के नागरिक के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं और जितना हो सकता है उनके साथ भेदभाव करते हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को किसी प्रकार का नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं है। म्यांमार की सत्ताधारी पार्टी की नेता और इस देश की विदेशमंत्री आंग सान सूची इस देश की जानी- मानी राजनेता हैं वे भी रोहिंग्या मुसलमानों के लिए कुछ नहीं कर रही हैं जबकि इस देश की सैनिक सरकार से वर्षों संघर्ष करने के कारण पश्चिम ने उन्हें शांति के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया था। खेद के साथ कहना पड़ता है कि नोबल पुरस्कार से सम्मानित महिला राजनेता आंग सान सूची भी उन अपराधों पर पर्दा डाल रही हैं जो रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुए और हो रहे हैं। रोचक बात है कि म्यांमार के अतिवादी बौद्धों ने रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जो अपराध किये हैं और कर रहे हैं उनकी तुलना उन अपराधों से नहीं की जा सकती जो इस देश की सैनिक सरकार से संघर्ष के दौरान आंग सान सूची पर हुए थे। जिन समस्याओं को सहन करने के कारण आंग सान सूची को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया वे उन समस्याओं व अपराधों के मुकाबले में कुछ भी नहीं हैं जिनका सामना रोहिंग्या मुसलमान कर रहे हैं। आंग सान सूची ने जिन समस्याओं का सामना किया इस समय म्यांमार की मुसलमान महिलांए सम्मान जनक जीवन बिताने और आज़ादी प्राप्त करने के लिए उससे सौ गुना अधिक समस्याओं का सामना कर रही हैं परंतु पश्चिम और मिडिया जगत में कोई उन अपराधों व अत्याचारों को देखने के लिए भी तैयार नहीं है जो म्यांमार के मर्दों, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हो रहे हैं। मानो म्यांमार के मुसलमान इंसान ही नहीं हैं और वे देखने के लायक़ नहीं हैं।

ब्रिटेन के विदेशमंत्री बोरिस जानसन एक पश्चिमी राजेनता हैं जिन्होंने अभी हाल ही में म्यांमार का दौरा किया और आंग सान सूची से मुलाकात की थी। उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों की हृदय विदारक स्थिति देखने के बाद आंग सान सूची से भेंट में कहा कि राखीन प्रांत में मुसलमानों के आवासीय क्षेत्रों के निरीक्षण के दौरान मैंने इस क्षेत्र में तबाही ही तबाही देखी। इसी प्रकार ब्रिटेन के विदेशमंत्री ने कहा कि मैं नहीं जानता कि क्या अब तक किसी ने देखा है कि इंसान दूसरे इंसानों के खिलाफ इस प्रकार का कार्य अंजाम दिया है या नहीं किन्तु मैंने अपने पूरे जीवन में इस प्रकार की चीज़ नहीं देखी है।

पश्चिमी राजनेता म्यांमार की जो यात्रा करते हैं और रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति का जो निरीक्षण करते हैं अधिकांशतः उसका  लक्ष्य राजनीतिक व प्रचारिक होता है। क्योंकि इन यात्राओं के बाद रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों और उनके जनसंहार को रोकने के लिए म्यांमार की सरकार पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं डाला जाता। इसी तरह रोहिंग्या मुसलमानों को पड़ोसी देशों में भागने से रोकने की दिशा में भी कोई प्रयास नहीं होता है। हाउस आफ कामंस ने यह कह कर ब्रिटेन की आलोचना की थी कि लंदन सरकार रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति की उपेक्षा कर रही है और उसकी इस आलोचना के बाद ब्रिटेन के विदेशमंत्री बोरिस जानसन ने म्यांमार की यात्रा की थी। बोरिस जानसन द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों की दुर्दशा पर खेद जताने के बाद इस देश की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों को रोकवाने के लिए म्यांमार की सरकार पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं डाला जबकि म्यांमार की सरकार पर दबाव डालने के लिए ब्रिटेन की सरकार के पास यूरोप और संयुक्त राष्ट्रसंघ की सतह पर बहुत संभावनाएं हैं। वास्तविकता यह है कि अपने लाभों पर आधारित ब्रिटेन और दूसरी पश्चिमी सरकारों की जो नीतियां हैं उनमें म्यांमार का स्थान महत्वपूर्ण नहीं है और इसी कारण वे रोहिंग्या मुसलमानों की समस्याओं व पीड़ाओं को कम करने के लिए कोई प्रयास नहीं करती हैं।

 

Mar १२, २०१८ १६:५६ Asia/Kolkata
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