हमने दसवीं शताब्दी के दूसरे अर्ध तथा ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों के प्रसिद्ध शायर मुहम्मद हुसैन नज़ीरी नीशापूरी के बारे में चर्चा की थी जो पारसी शैली आरंभ करने वाले और प्रसिद्ध लेखक थे।

उन्होंने अपने काल और अपने काल के शायरों और लेखकों को बहुत अधिक प्रभावित किया है। नज़ीरी इस सहस्त्राब्दी के ऐसे शायर थे जिनका जनाधार था और उनके बहुत से शेर लोग अपनी दिनचर्या में मुहावरों की भांति प्रयोग करते थे।

हमने बताया था कि मुहम्मद हुसैन नज़ीरी नीशापुरी का जन्म दसवीं शताब्दी के दूसरे अर्ध में नीशापुर में हुआ था। उन्होंने इसी शहर में आरंभिक शिक्षा प्राप्त की और उनका शुमार उन गिने चुने शायरों में होता था जिनकी ख्याति ख़ुरासान की सीमाओं से निकल कर दूर तक फैली।  वह अपनी जवानी के काल में अपनी शायरी की क्षमताओ को आंकने के लिए काशान गये और वहां उन्होंने कवि सम्मेलन में भाग लेकर अपनी क्षमता का लोहा मनवाया। उसके बाद वह इराक़ गये और वहां के मुशाएरों में भाग लिया और अपनी ख्याति में वृद्धि की और आख़िरकार एक सुरक्षित व शांत जीवन बिताने के लिए भारत चले गये।

नज़ीरी आगरा शहर गये और वहां जहांगीर के दरबार के मंत्री अब्दुर्रहीम ख़ान ख़ानान का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। ख़ाने ख़ानान ने नज़ीरी को नौकरी पर रखने के लिए बुलाया और उन्होंने ने भी ख़ान का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। ख़ाने ख़ानान के दरबार में नज़ीरी ने बहुत पैसा हासिल किया और उन्होंने सभी पैसा पलायनकर्ता ईरानियों विशेषकर ईरानी कलाकारों और शायरों पर ख़र्च किया। नज़ीरी नीशापुरी का वर्ष 1021 हिजरी क़मरी में गुजरात में देहान्त हो गया और वहीं उन्हें दफ़्न कर दिया गया।

 

हमने भाषा की सुरक्षा, प्रचलित जीवित भाषा का प्रयोग, शेर के अपनेपन और रवानी या प्रवाह सहित नज़ीरी नीशापूरी की विशेषताओं का उल्लेख किया था।

नज़ीरी नीशापूरी के शेरों की एक अन्य विशेषता, सबसे निची क्षणों तथा मनुष्य के जीवन की सबसे मधुर वास्तविकताओं को बयान करना था। फ़ारसी भाषा के आशेक़ाना क्लासिक शेर की एक मुख्य विशेषता है। इस प्रकार के शेरों में प्रेम और उसका मूल व विश्वव्यापी स्वरूप शामिल होता है। क्लासिक आशेक़ाना शेरों में प्रेम के व्यगतिगत व वास्तविक क्षणों का वर्णन नहीं होता। इस तरह के शेरों में प्रेमिका की व्यक्तिगत पहचान नहीं होती। वह एक वास्तविक व जानी पहचानी प्रेमिका नहीं होता।  इस आधार पर इस प्रकार का आशिक़, धरती पर और दुनिया में हमारे आसपास तो दिखता नहीं बल्कि यह उदाहरणीय प्रेम है जिसे होना चाहिए या आदर्श दुनिया में हो या ज़मीनी और वास्तविक दुनिया से अलग होकर सामने आए। इस प्रकार के प्रेम की मिसाल हम इराक़ी शैली में देखते हैं जिसमें प्रेम और परिज्ञान आपस में गुथे हुए हैं और प्रेमिका एक आदर्श में तबदील हो चुकी है और उसका हाल भी प्रेमी के साथ मिलकर उदाहरणीय हो चुका है। सादी और अमीर ख़ुसरो देहलवी ने यह ज़ंजीर तोड़ दी और एक नई शैली आरंभ की जो भावनात्मक पहलू लिए हुए है।

पूर्ण रूप से इस प्रकार के प्रेम को लिखित शेरों और दीवानों में देखा जा सकता है जिसका वास्तविक प्रेम के क्षण को बयान करने के कारण सब्क या मकतबे वक़ुअ नाम पड़ गया। नज़ीरी ने भी मकतबे वक़ुअ से प्रभावित होकर मनुष्य के भावनात्मक, व्यक्तिगत और वास्तविक क्षणों को बयान करने का प्रयास किया। इस भावनात्मक पल को बयान करने में वह इतना मगन हो जाते थे कि उसके शेर जादूई नज़र आते थे और उनका अपना एक अलग ही रंग होता था। यह संबोधकों को अपनी ओर आकर्षित करने का नज़ीरी का एक अन्य राज़ था जिसके कारण नज़ीरी के संबोधक उन पर मर मिटते थे।

मुहम्मद हुसैन नज़ीरी के शेरों की एक अन्य विशेषता यह थी कि वह भावनाओं की लड़ियों को एक दूसरे में पिरो दिया करते थे। इस प्रकार से कि सबसे भवनात्मक और वास्तविक पहलू दूसरों से शेयर करने योग्य नहीं होता था। नज़ीरी पूर्ण रूप से व्यक्तिगत क्षण शेयर कर सकते हैं और संबोधक भी इन क्षणों में भागीदार होता है। नज़ीरी, भावना को जगाने वाले, मन को बात को साक्षात पेश करने वाले और भावनाओं को रूप देने वाले शायर हैं। मान लिजिए कि आप किसी क्रोधित व्यक्ति के बारे में बताना चाहते हैं तो उसे आप दो तरह से पेश कर सबते हैं एक यह कि वह ग़ुस्से में था दूसरे यह कि उनकी पेशानियों पर बल पड़ गये थे, उनकी भवें चढ़ी हुई थीं, उनकी आंखों में ख़ून दौड़ रहा था, दांत किटकिटा रहे थे, थूक निगल रहे थे। पहले वाले अंदाज़ में हमने केवल ग़ुस्सा बयान किया जबकि दूसरे अंदाज़ में हमने क्रोध को साक्षातदूप में पेश किया, किस प्रकार? वास्तव में हमने क्रोध या ग़ुस्से को जो एक अर्थ है, कल्पना योग्य बनाया और उसको इस तरह पेश किया पढ़ने वाला महसूस करे।

अल्लामा शिब्ली नोमानी और दूसरे आलोचक, नज़ी नीशापुरी की सफलता और उनके शेरों की कामयाबी का राज़, यही भावनाओं को आपस में मिलाने और उनको साक्षात रूप देना मानते हैं। नज़ीरी की शायरी का मुख्य विषय, मनुष्य की व्यक्तिगत और वास्तविक भावनाएं हैं किन्तु यह चीज़ जितना उनके शेर में मिलती है दुनिया के किसी दूसरे शायर के शेरों में नहीं मिलती और वह भावनाओं को छूने की कला है।

इराक़ी शैली में देखे जाने वाली चीज़ों को कल्पना के माध्यम से पेश करते हैं और यही कारण है कि व्यक्तिगत, वास्तविक और प्रेम के गहरे रिश्तों को बयान करने के बजाए, प्रेम के एक आम व संपूर्ण नियम को बयान किया जाता है। जैसे गुल, बुलबुल, शमा, परवाना, प्रेमी व प्रेमिका, कण, सूरज इत्यादि। इसमें इशारों में प्रेम, प्रेमिका और प्रेमी के बीच रिश्ते को बयान किया जाता है। इसके मुक़ाबले में ख़ुरासानी शैली है जिसमें गुल बुलबुल, कण सूरज, शमा परवाना वह स्वयं हैं जिनको सूक्ष्मता से देखने के बाद समझा जाता है और उनकी कल्पना की जा सकती है।

नज़ीरी न तो इराक़ी शैली की ओर बढ़ते हैं और न ही ख़ुरासानी शैली को अपनाते हैं, वह इन दोनों में से किसी एक को नहीं चुनते, नज़ीरी इन सबसे हटकर भावना को इस प्रकार से पेश करते हैं कि सभी उसको अपने भीतर एहसास कर सकें, जब प्रेम का चित्रण पेश करे तो पाठक स्वयं को प्रेम, प्रेमिका और प्रेमी के बीच में पाए, शमा परवाने के उल्लेख में स्वयं को उसी का भाग समझे। यह नज़ीरी की विशेषता है जो उनको दूसरे शायरों से अलग करती है।

 

Mar १३, २०१८ १४:३८ Asia/Kolkata
कमेंट्स