इस्लाम मानवीय संबंधों को काफ़ी महत्व देता है।

इस्लाम में जिन मानवाधिकारों का उल्लेख किया गया है, उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती। इस्लाम ने मानवाधिकारों के तहत मेज़बान और मेहमान के अधिकारों का भी उल्लेख किया है। इस्लाम मेहमान की सेवा को काफ़ी महत्व देता है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) इस संदर्भ में फ़रमाते हैं, मेहमान स्वर्ग की ओर मार्गदर्शन करता है। मेहमान का सम्मान और महत्व इतना अधिक है कि इस्लाम में इसे एक ईश्वरीय उपहार बताया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, ईश्वर जब किसी पर मेहरबान होता है तो उसके लिए मूल्यवान उपहार भेजता है, लोगों ने पूछा हे पैग़म्बर वह उपहार क्या है, पैग़म्बर ने फ़रमाया, मेहमान अपने रिज़्क़ के साथ पहुंचता है और मेज़बान के परिवार के पापों को अपने साथ ले जाता है और ईश्वर उन्हें क्षमा कर देता है। 

 

एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम से कहा, मेरे मां-बाप आप पर क़ुर्बान हो जाएं मेरा कार्यक्रम इस प्रकार से है कि मैं पूर्ण रूप से वुज़ू करता हूं, नमाज़ पढ़ता हूं, समय पर ज़कात अदा करता हूं और ईश्वर के लिए मेहमान का खुले दिल से स्वागत करता हूं। पैग़म्बर ने फ़रमाया, शाबाश, नरक का द्वार तुम्हारे लिए बंद है, अगर तुम इसी तरह हो तो ईश्वर ने तुम्हें हर प्रकार के लोभ से पाक रखा है। 
पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, प्रत्येक मोमिन जो मेहमान को पसंद करता है, जब वह क़ब्र से उठेगा तो उसका चेहरा चौदहवीं के चांद की भांति चमक रहा होगा। प्रलय के दिन लोग पूछेंगे कि क्या यह व्यक्ति ईश्वरीय दूत है, एक फ़रिश्ता कहेगा, यह वह मोमिन है जो मेहमान का सम्मान करता था, उसका मार्ग स्वर्ग के अलावा और कुछ नहीं है। 

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया है कि अगर चार विशेषताएं मौजूद होंगी तो खाना संपूर्ण होगा, वह खाना हलाल हो, रोटी खाने वाले अधिक हों, खाना शुरू करने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़ी जाए और आख़िर में सूरए हम्द पढ़ा जाए। पैग़म्बरे इस्लाम की एक दूसरी हदीस है कि जब कोई किसी शहर में प्रवेश करता है तो वह वहां से निकलने तक उस शहर के निवासियों का मेहमान होता है, मेज़बान की अनुमति के बिना मेहमान को रोज़ा नहीं रखना चाहिए, ताकि उनके लिए किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हो, इसी तरह मेज़बान के लिए मेहमान की इजाज़त के बिना मुसतहब रोज़ा रखना उचित नहीं है, ताकि मेहमान को कठिनाई न हो। 
मेहमान के अधिक महत्व के बावजूद इस्लाम की दृष्टि से अत्यधिक शानदार मेहमान नवाज़ी न केवल अच्छी चीज़ नहीं है, बल्कि इस्लाम ने उससे रोका है। इस्लाम सिफ़ारिश करता है कि मेहमान नवाज़ी सादा होनी चाहिए, इसीलिए मेहमान और मेज़बान के बीच एक न्यायपूर्ण लकीर खींच दी है, वह यह है कि मेज़बान के पास जो कुछ हो वह उसे पेश करने में आनाकानी न करे और मेहमान को भी चाहिए कि जो सेवा मेज़बान करे उससे अधिक की इच्छा न करे। 
इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, ईमान रखने वाले लोग अपने मोमिन भाई के साथ किसी तरह का तकल्लुफ़ नहीं करते हैं, मुझे नहीं मालूम कि इन दो लोगों में से कौन अधिक अजीब है, वह व्यक्ति जो प्रवेश करते समय अपने भाई को तकल्लुफ़ में डालता है या वह व्यक्ति जो मेहमान को तकल्लुफ़ में डालता है। सलमान फ़ार्सी के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं कि मेहमान के लिए उस चीज़ के लिए परेशानी सहन न करें जो चीज़ नहीं है, हां जो कुछ मौजूद है उसे पेश करने में कोताही न करें। 
जैसा कि हमने उल्लेख किया कि इस्लाम के मुताबिक़, मेहमान एक ईश्वरीय उपहार और ईश्वर की ओर से भेजा हुआ होता है, उसका बहुत अधिक सम्मान किया जाना चाहिए। हज़रत अली के मुताबिक़ पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, मेहमान के अधिकारों में से एक अधिकार यह है कि जब तक वह चला नहीं जाए उसकी सुविधा का प्रबंध करना चाहिए ताकि उसे कोई परेशानी न हो। एक हदीस में है कि मेहमान का इतना ख़याल रखा जाना चाहिए कि उसके लिए टूथपिक भी उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। 

 

हां कभी कभी ऐसा होता है कि मेहमान शर्मीला होता है, इसीलिए कहा गया है कि मेहमान से खाना खाने के बारे में सवाल नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि खाना परोस दिया जाना चाहिए। इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, जब तुम्हारा भाई तुम्हारे यहां आए तो उससे यह नहीं पछो कि खाना खा चुके हो या नहीं, जो कुछ भी हाज़िर हो उसे पेश कर दो, इसलिए कि दानकर्ता वही है जो कुछ उसके पास है उसे ख़र्च करने में कंजूसी न करे।
ईश्वर के निकट मेहमान की ज़िम्मेदारियों में से एक यह है कि जो भोजन उसे परोसा जा रहा है उसका अपमान नहीं करे, इसलिए ईश्वर की जो कुछ नेमत होती है वह सम्मानजनक होती है, लेकिन सज्जन लोग सामान्य तौर पर जो कुछ भी परोसते हैं, मेहमान से कहते हैं कि आपकी सेवा में कुछ भी पेश नहीं कर सके, इसी तरह मेहमान की ज़िम्मेदारी होती है कि वह उसे कम न समझे। 
इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, मेज़बान जो कुछ अपने भाई के लिए पेश कर रहा है अगर वह उसे कम समझ रहा है तो वह भटक गया है, इसी प्रकार अगर मेहमान जो कुछ उसे परोसा गया है, वह उसे कम समझे तो वह भटक गया है। इस्लाम मेहमान का सम्मान करने की सिफ़ारिश करते हुए कहता है कि जब मेहमान प्रवेश करता है तो उसकी सहायता करो, लेकिन घर से निकलते समय उसकी मदद नहीं करो, क्योंकि कहीं वह यह न समझे कि आप उसके जाने से ख़ुश हैं। 
मेहमान की भी कुछ ज़िम्मेदारियां होती हैं। इसलिए कि ज़िम्मेदारियां द्विपक्षीय होती हैं। जिस तरह मेज़बान की ज़िम्मेदारियां हैं, उसी तरह मेहमान के भी कुछ कर्तव्य होते हैं। जो कुछ उक्त हदीसों में ज़िक्र हुआ है, उसके अलावा मेहमान को चाहिए कि मेज़बान जो कुछ अपने घर के बारे में उसके सामने प्रस्ताव रखे वह उसे स्वीकार करे। उदाहरण स्वरूप वह जहां भी बैठने के लिए कहे मेहमान वहीं बैठे। इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, तुममें से जब कभी कोई अपने मुसलमान भाई के घर जाए तो जहां कहीं वह बैठने के लिए वहीं बैठे, इसलिए कि घर का मालिक अपने घर की स्थिति से और उन भागों से कि जिन्हें वह दूसरों से छुपाना चाहता है अच्छी तरह परिचित होता है। 

 

एक रीति जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमेशा से प्रचलित रही है और इस्लाम ने भी उसकी पुष्टि की है, बल्कि उसकी सिफ़ारिश की है वह मेहमान की नवाज़ी या मेहमान की सेवा है। लेकिन अगर हम दुनिया भर की नैतिक पुस्तकों का अध्ययन करें और लोगों के आचरण की समीक्षा करें तो देखेंगे कि कहीं भी इस्लाम की नैतिक किताबों और मुसलमानों के आचरण के समान मेहमान को महत्व नहीं दिया गया है। इमाम रज़ा (अ) ने फ़रमाया है, एक व्यक्ति ने हज़रत अली (अ) को अपने घर पर आने की दावत दी। हज़रत अली (अ) ने फ़रमाया के मैं आऊंगा, लेकिन इस स्थिति में कि तुम्हें तीन काम करने होंगे। उसने पूछा कि वह तीन काम कौनसे हैं? हज़रत ने फ़रमाया कि घर के बाहर ने मेरे लिए किसी चीज़ का प्रबंध नहीं करोगे, घर में मुझसे कोई चीज़ छुपाओगे नहीं और भंडार करके नहीं रखोगे, अपने परिवार के लिए कोई समस्या उत्पन्न नहीं करोगे और उनके भोजन का हिस्सा कम नहीं करोगे। उस व्यक्ति ने हज़रत अली (अ) की यह बात स्वीकार कर ली। हज़रत ने भी उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। 
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, जब कभी भी आपका का कोई धार्मिक भाई आपके पास पहुंचे तो घर में जो कुछ भी हो उसके सामने पेश कर दो और अगर तुमने उसे दावत दी है तो उसकी मेहमान नवाज़ी के लिए प्रयास करो। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया है, अगर कोई बिना बुलाए ही किसी दस्तरख़्वान पर पहुंच जाए तो उसका पहुंचना चोरो की तरह है और जब वह बाहर निकलता है तो वह विनाशकारियों की भांति है। वे एक अन्य स्थान पर फ़रमाते हैं, अपने मेहमान के साथ भोजन करो, इसलिए कि मेहमान अकेले भोजन करने में शर्माता है। 
इस्लाम के मुताबिक़, मेहमान को मेज़बान पर प्राथमिकता हासिल है। हुसैन बिन नईम के अनुसार, हज़रत इमाम सादिक़ ने फ़रमाया है, क्या तुम अपने भाईयों को पसंद करते हो? मैंने कहा जी हां, उन्होंने पूछा उनमें से जो ग़रीब और निर्धन हैं क्या उन्हें लाभ पहुंचाते हो? मैंने जवाब दिया हां। इमाम ने फ़रमाया, ध्यान रखो उनसे प्रेम करना ज़रूरी है क्या उन्हें अपने घर आमंत्रित करते हो? मैंने कहा मैं कभी खाना नहीं खाता हूं, जब तक कि मेरे भाईयों में से दो या तीन लोग मेरे मेहमान नहीं होते हैं। उन्होंने फ़रमाया, वे तुम से अधिक श्रेष्ठ हैं। मैंने कहा, मैं आप पर क़ुर्बान जाउं, मैं उन्हें अपने घर पर दावत देता हूं, उन्हें भोजन कराता हूं, फिर भी वे मुझसे श्रेष्ठ हैं? इमाम ने फ़रमाया, हां, जब वे तुम्हारे घर में प्रवेश करते हैं, वे तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के रिज़्क़ के साथ प्रवेश करते हैं, और जब वापस लौटते हैं तो तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के पापों को बाहर ले जाते हैं।              

Apr ११, २०१८ १३:५५ Asia/Kolkata
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