इस्लाम धर्म ने परिवार के संदर्भ में विशेष रूप से सिफारिश की है और  बहुत सारे नियमों का वर्णन किया है।

इन सारी सिफारिशों और सारे नियमों का एक ही उद्देश्य है और वह यह कि परिवार में आपसी प्रेम बढ़े और परिवार के सदस्य , एक दूसरे से अधिक निकट हों और सुख-दुख में एक दूसरे का साथ दें। यह भी सब को पता ही है कि बच्चे परिवार का विशेष हिस्सा होते हैं और इसी लिए उनके विशेष अधिकार भी होते हैं और यही वजह है कि इस्लाम में बच्चों के अधिकारों पर खास तौर पर ध्यान दिया गया है। 

इस्लाम में परिवार के अधिकार 

 

आज के युग में पालन - पोषण के विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यदि आप यह चाहते हैं कि आप का बच्चा समाज का एक योग्य सदस्य बने और समाज को लाभ पहुचांए तथा मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह से सेहतमंद रहे तो फिर यह ज़रूरी है कि उसका प्रशिक्षण पैदा होने के साथ ही शुरु कर दिय जाए। अलबत्ता कुछ अन्य विशेषज्ञों का यह मानना है कि बच्चों का प्रशिक्षण तीन साल की आयु से आरंभ किया जाना चाहिए। 

यह तो कहना है वर्तमान युग के विशेषज्ञों का लेकिन इस्लाम इससे भी आगे है और उसका यह मानना है कि मां बाप को शादी से पहले और अपना जीवन साथी चुनने के समय ही अपनी संतान के प्रशिक्षण के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि वंश के नियम के अनुसार बच्चों का व्यक्तित्व, सोचने का अंदाज़ और इसी तरह उसकी भावनाएं और मनोदशा पूरी तरह से मां बाप और विशेष कर मां पर निर्भर होती है इस तरह से यह कहा जा सकता है कि अगर मां, अच्छे घराने से हो , सदगुणी हो, और नैतिक व धार्मिक नियमों का पालन करती हो तो सैद्धान्तिक रूप से यह विशेषताएं, उसकी संतान पर भी प्रभाव डालती हैं और इसके विपरीत अगर मां में इस प्रकार के गुण न हों तो भी उसका बच्चों पर असर पड़ता है । इन सब के अलावा भी बच्चों के प्रशिक्षण में मां की भूमिका बेहद अहम और असरदार होती है यही वजह है कि इस्लाम ने पुरुषों को अपना जीवन साथी चुनने के लिए खास नियम बताए हैं और इसी प्रकार महिलाओं से भी कहा है कि वह अपना जीवन साथी चुनने में कुछ खास बातों का ध्यान रखें। 

बच्चों का प्रशिक्षण

 

हमें अपने आप को उस बर्तन की भांति समझना चाहिए जिसमें तरह तरह सी चीज़ें रखी जाती हैं ज़ाहिर सी बात बर्तन  जितना साफ-सुथरा होगा उसमें रखी चीज़ उतनी ही साफ - सुथरी और अच्छी रहेगी। पैग़म्बरे इस्लाम (स ) ने फ़रमाया है कि कूड़े के ढेर पर उगने वाली हरियाली से दूर रहो, जब पूछा गया कि इससे आप का क्या आशय है? तो पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमायाः इस से आशय वह खूबसूरत औरत है जो ख़राब घराने में पली-बढ़ी हो। 

इस आधार पर इस्लामी विचारधारा  के अनुसार शादी का इरादा रखने और परिवान गठन की इच्छा रखने वाले को सिर्फ एक खूबसूरत जीवन साथी की ही तलाश नहीं होना चाहिए बल्कि उसे ऐसे जीवन साथी की तलाश होनी चाहिए जो अच्छे घर परिवार से हो और नैतिक व मानवीय मूल्यों से सुसज्जित हो क्योंकि किसी के लिए भी एक अच्छे जीवन साथी का मापदंड, रंग रूप नहीं होता बल्कि रूप के साथ-साथ, शराफत, अच्छा व्यवहार, हर हालत में गुज़ारा करने  जैसे अन्य गुण अत्याधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इस्लाम में सही जीवन साथी का चयन, बच्चे के पालन-पोषण में इतना महत्वपूर्ण है कि इसे बच्चों के अधिकार में गिना गया है और इसी लिए इस्लाम में कुछ खास प्रकार की महिलाओं से शादी से रोका गया है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा है कि, मंद बुद्धि और मूर्ख महिलाओं से शादी करने से बचो क्योंकि निश्चित रूप से उसके साथ रहना खुद एक समस्या है और उससे अधिक महत्वपूर्ण  यह है कि उसकी संतान भी बर्बाद और प्रशिक्षण के लिए अयोग्य होंगी। 

बच्चों के प्रशिक्षण में मां की भूमिका महत्वपूर्ण है। 

इस प्रकार की महिलाओं से शादी करने से इस लिए भी रोका गया है क्योंकि इस तरह की महिलाओं से शादी उसी तरह है जैसे कि एक खराब पौधे को एक अच्छे और मज़बूत पौधे के साथ प्रत्यारोपण किया जाए तो स्पष्ट सी बात है इस दशा में इस बात की कम ही उम्मीद है कि दोनों के मेल के बाद पैदा होने वाला फल अच्छा हो बल्कि इस तरह से वह अच्छा पौधा भी खराब हो सकता है। यह तो रही विवाह की बात  लेकिन शादी के बाद जब बच्चा पैदा होता है तो इ्स्लाम ने उसके अधिकारों का भी वर्णन किया है और माता पिता से सिफारिश की है कि वह संतान के अधिकारों का हनन न करें। बच्चों को सब से अधिक कृपा , दया व स्नेह की ज़रूरत होती है इस लिए अगर उनसे कोई ग़लती भी हो जाए तो उस पर संयम बरतना चाहिए अलबत्ता अगर उनका प्रशिक्षण हो रहा तो फिर उस समय थोड़ी सख्ती की जा सकती है। पैगम्बरे इस्लाम जब किसी यात्रा से वापस आते थे तो बच्चे उनके पास दौड़ते हुए पहुंचते थे, पैग़म्बरे इस्लाम खड़े हो जाते और उनसे कहते कि वह उनके कांधे पर चढ़े और बच्चे ऐसा ही करते थे उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम अपने अनुयाइयों से कहते थे कि वह भी ऐसा ही करें। 

 

संतान की शिक्षा पर नज़र रखना भी अभिभावकों का कर्तव्य और बच्चों का उन पर अधिकार है। बच्चों का प्रशिक्षण बहुत महत्वपूर्ण है। पैग़म्बरे इस्लाम (स ) ने फरमाया है कि अगर तुम में से कोई अपने बच्चे की सही तरह से शिक्षा दीक्षा का ध्यान रखता है तो उसका यह काम हर रोज़ दान दक्षिणा और ज़रूरतमंदों की मदद करने से भी अधिक सराहनीय है। इसी तरह हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया है कि किसी भी बाप की तरफ से अपने बच्चों के लिए शिष्टाचार और प्रशिक्षण से अच्छा उपहार कुछ और नहीं है।  बच्चों को सदा, बहकाए जाने का खतरा रहता है और यही वजह है कि ईश्वरीय मार्गदर्शकों ने बच्चों पर अधिक ध्यान देने की सिफारिश की है। 

बच्चों के प्रशिक्षण में मां की भूमिका महत्वपूर्ण है। 

 

बच्चों के प्रशिक्षण की दृष्टि से वर्तमान युग और भी खतरनाक और कठिन है। पैग़म्बरे इस्लाम(स) ने कहा है कि अफसोस है अंतिम युग के बच्चों पर उनके पिताओं की ओर से। इस पर पूछा गया कि हे ईश्वरीय दूत! आप उन पिताओं की ओर से चिंतित हैं जो अनेकेश्वरवादी होंगे? पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा: नहीं मुझे उन पिताओं की ओर से चिंता है जो विदित रूप से धर्म पर आस्था रखते होंगे लेकिन अपने बच्चों के भविष्य और उनकी आस्था के विषय की अनदेखी करते होंगे और उन्हें यह महसूस होता होगा कि अगर उन्होंने अपने बच्चों का संसार बसा दिया तो उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन कर लिया। पैगम्बरे इस्लाम ने कहा कि पिता पर बच्चे का एक अधिकार यह भी है कि वह अपने बच्चे का अच्छा नाम रखे फिर उसे पढ़ना लिखना सिखाए और फिर उसके लिए अच्छा जीवन साथी चुने। इसी तरह एक अन्य स्थान पर पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि बच्चे का पिता पर यह अधिकार है कि पिता उसे पढ़ना लिखना, तैरना और तीर कमान चलाना सिखाए। 

बच्चों की शिक्षा की निगरानी भी ज़रूरी है

 

हर बोलने वाले का यह अधिकार होता है कि आप उसकी बात गौर से सुनें, इस लिए इस्लामी शिष्टाचारों मेंयह शामिल है कि जब आप से कोई बात करे तो आप उसकी बात गौर से सुनें। बच्चों के सिलसिले में यह सिफारिश विशेष रूप से महत्व रखती है क्योंकि हो सकता है कि बच्चे आप से से एेसी बातें करें जिन में आप को बिल्कुल रूचि न हो लेकिन इसके बावजूद आप को उनकी बात सुनना चाहिए। बच्चों को भी सम्मान की उतनी ही ज़रूरत होती है जितनी किसी बड़े आदमी को होती है। यही वजह है कि अपने कर्तव्यों से भली भांति अवगत माता पिता अपनी संतान की बात बहुत ध्यान से सुनते हैं और उसकी टूटी फूटी और तोतली भाषा को भी समझ जाते हैं  और उस पर खुश होते हैं इस का सब से बड़ा फायदा यह होता है कि बच्चे को, बोलने का प्रोत्साहन मिलता है और वह बड़ा होने के बाद भी अपने दिल की बात अपने माता पिता से करने का साहस रखता है। इस्लाम में कहा गया है  कि अपनी संतान का सम्मान करो । यह वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम का आदेश है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कथन है कि हर व्यक्ति की बात उसके मन व आत्मा की शक्ति की सूचक है। इस लिए  लिए हर व्यक्ति को बात करके अपने बच्चे के मन की गहराई में उतरना चाहिए। 

बच्चों की शिक्षा की निगरानी भी ज़रूरी है

चौथे इमाम और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पुत्र हज़रत इमाम ज़ैनुलआबेदीन अलैहिस्सलम ने अपनी " अधिकार पत्रिका" में संतान के अधिकारों के बारे में कहा है कि " और तुम्हारी संतान का अधिकार यह है कि तुम्हें यह पता हो कि वह तुम से और तुम पर निर्भर है, सांसारिक जीवन में उसकी भलाई व बुराई तुम से है और तुम पर उसकी ज़िम्मेदारी, उसका अच्छा प्रशिक्षण और ईश्वर के आज्ञापालन में उसकी सहायता तुम पर अनिवार्य है। अगर तुम ने यह सब किया तो ईश्वर तु्म्हें भलाई देगा और अगर उसमें कमी की तो सज़ा मिलेगी इस लिए इस संदर्भ में ठीक से काम करना क्योंकि इस संदर्भ में तुम्हारे अच्छे काम का नतीजा इसी दुनिया में नज़र आएगा और उस दुनिया में तुम्हारे ऊपर इस संदर्भ में कोई जवाबदही नहीं होगी क्योंकि तुम अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर चुके होगे। 

 

 

Apr १७, २०१८ १४:३६ Asia/Kolkata
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