फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म आस्कर ग्रांट के जीवन पर बनी है।

यह फ़िल्म 2013 में बनी है और इसके निर्माता व निर्देशक रायान कोगलर हैं। यह फ़िल्म 85 मिनट की है। फ़ुरूटवेल स्टेशन आकलैड मैट्रो स्टेशन पर वर्ष 2009 की अंतिम के आख़िरी पहर में घटने वाली घटना से शुरु होती है। इस स्टेशन पर उस रात एक 22 वर्षीय अश्वेत युवा आस्कर ग्रांट की हत्या होती है। फ़िल्म के दूसरे हिस्से में आस्कर ग्रांट के जीवन को फ़िलमाया गया है। वह एक क़ानूनी नौकरी प्राप्त करने के लिए दर दर की ठोकरें खाता है ताकि ज़बरदस्ती मादक पदार्थ बेचने की लानत से छुटकारा पा ले। नलीशे पदार्थों की बिक्री एक अपराध है जिसके कारण उसे कुछ दिन जेल में रहना पड़ा और अब वह ज़मानत पर आज़ाद है। आस्कर कुछ समय अपनी पत्नी सूफ़िया और चार वर्षीय पुत्री तातीना के साथ गुज़ारता है। चूंकि वर्ष के अंतिम दिन आस्कर की मां का जन्मदिन है, आस्कर अपने परिवार के साथ अपनी मां के घर जाता है। उसके बाद आस्कर तातीना को अपने एक दोस्त के घर ले जाता है ताकि वह सूफ़िया और उसका मित्र सैन फ़्रांसिसको जाएं और नववर्ष की पटाखों का सुन्दर दृश्य देखें।

 

आस्कर अपनी माता के कहने पर अपनी गाड़ी के बजाए मैट्रो का प्रयोग करता है। आस्कर फ़ुरूटवेल स्टेशन के निकट अचानक अनचाहे तौर पर एक गोरे तस्कर से जिससे उसकी पहले ही झड़प होती है, उलझ जाता है। पुलिस को सूचना मिल जाती है और वह फ़ुरूटवेल स्टेशन पर संदिग्ध अश्वेतों को मैट्रो से उतारती है और उनकी छानबीन शुरु कर देती है। जिन लोगों की छानबीन होती रहती है उनमें आस्कर और उसके कई दोस्त भी शामिल होते हैं, छानबीन के दौरान पुलिस और अश्वेत संदिग्धों के बीच हाथपाई शुरु हो जाती है और अचानक पुलिसकर्मी आस्कर पर गोली चला देता है जिससे उसकी मौत हो जाती है।

 

कैलीफ़ोर्निया आकलैंड के फ़ुरूटवेल स्टेशन पर आस्कर और उसके साथियों के साथ जो घटना घटती है उसका वीडियो बनाकर एक अमरीकी नागरिक सोशल मीडिया पर डाल देता है और उसके बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तथा अमरीका के भीतर, नस्लभेद के विरुद्ध व्यापक स्तर पर प्रदर्शनों का क्रम आरंक हो जाता है जिसके परिणाम स्वरूप इस घटना में शामिल पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया जाता है। उस पुलिसकर्मी को जिसने आस्कर पर गोली चलाई थी हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया और बाद में उसने दावा किया कि ग़लती से उसके हाथ में इलेक्ट्रिक शॉकर के बजाए हथियार आ गया जिसे से ग़लती में हत्या हो गयी, जजों की पीठ ने उसे ग़लती से हत्या का ज़िम्मेदार माना और दो साल की उसको सज़ा हो गयी किन्तु ग्यारह महीने बाद वह आज़ाद हो जाता है और अमरीकी जनमत इस व्यवस्था पर अब भी सवाल खड़ी कर रही है।

 

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म ने फ़िल्म निर्माण के समस्त सिद्धांतों और क़ानूनों पर ध्यान देते हुए पूरी सच्चाई के साथ फ़िल्म की कहानी बयान की है। इस फ़िल्म में अमरीका समाज में अश्वेत अल्पसंख्यकों के सामने मौजूद समस्या अर्थात उनके विरुद्ध पुलिसगर्दी की ज़बरदस्ती और पुलिसी हिंसा को बड़े ही दुखद माहौल में फ़िलमाया गया है। कुछ आलोचकों का कहना है कि निर्देशक ने फ़िल्म के कुछ भाग में ग्रैंट के व्यक्तित्व को निगेटिव और हिंसक बनाकर पेश किया है ताकि फ़िल्म के हिरो से अधिक हमदर्दी हो और लोग उसे पसंद करें किन्तु आस्कर के विरुद्ध पुलिस की हिंसा और निर्दयता वास्तविक और पुष्ट है।

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म ने वर्ष 2013 में हालिवुड फ़िल्म फ़ेस्टेवल और सैन्डन्स फ़िल्म फ़ेस्टेवल में कई महत्वपूर्ण इनाम जीते। इस फ़िल्म ने समाज में मौजूद समस्या को एक पुष्ट दस्तावेज के साथ पेश किया इसीलिए इसकी समीक्षा की जानी बहुत ज़रूरी है। यही कारण है कि आज के कार्यक्रम में हमने इस फ़िल्म की समीक्षा करने का इरादा किया है। कार्यक्रम में हम पहले फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म का एक दृश्य पेश करते हैं।

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म के जिस दृश्य को हमने पेश करने लिए चुना है वह आस्कर के घर से शुरु होता है। इस सीन में आस्कर और उसकी पत्नी, आस्कर की माता के जन्मदिन के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए तैयार हो रहे हैं।

आस्कर कहता है मेरे हाथ से नौकरी निकल गयी।

सोफ़िया कहती है किस लिए?

आस्कर कहता है, देर करने की वजह से, जब हम नौकरी की तलाश में निकलने थे, वही कुछ दिन हाथ से निकल गये,

सोफ़िया कहती हैः उन्होंने आज तुमसे कह दिया?, वह भी आराम वाले दिन?

आस्कर ने कहाः मैं सच कहूं, दो सप्ताह पहले ही कह दिया था।

सोफ़िया नराज़ हो जाती है

आस्कर कहता हैः मैं क्षमा चाहता हूं, मैंने सोचा कि मुझे फिर से काम पर रख लिया जाएगा, मैंने सोचा कि मैं एमी को मना लूंगा ताकि वह फिर से मुझे काम पर रख ले।

सोफ़िया ने कहा कि तुम समझते हो कि ज़िंगदी मज़ाक़ है? तुम समझते हो कि नौकरी से निकालने के बाद कोई तुम्हें फिर से नौकरी पर रख लेगा? तुम्हारी औक़ात क्या है? पता भी है कुछ तुमको? मुझसे झूठ बोलते हो, अपनी लड़की से झूठ बोलते हो।

 आस्कर कहता है कि मैंने ने तुम्हे बताना ज़रूर नहीं समझा, मैं इसी तरह झूठ बोलता रहता तब तक तुम्हें कुछ पता ही नहीं चलता।

सोफ़िया कहती है कि तो फिर इसी तरह झूठ बोलते रहोगे, आएं, बाहर चरस बेच रहे थे?

आस्कर कहता है कि तुमने कहा कि मुझे सच्चाई बताओ, लेकिन तुम मेरी बातें ही नहीं सुनना चाहती।

सोफ़िया कहती है कि तुमने मुझे काम पर लगा दिया, तुम्हें पहले ही बता देना चाहिए था।

आस्कर कहता कि तुम मेरी बात ही नहीं सुनती।

सोफ़िया कहती है कि नहीं, दो सप्ताह लगातार झूठ बोलने के बाद और जब कोई रास्ता नहीं है अब सच बता रहे हो, यह कायरों का काम है, आज क्या काम किया? शर्त लगा लो चरस ही बेचने गये थे न?

आस्कर कहता है कि मैंने उसे बाहर फेंक दिया, सोफ़िया, मैं तुमसे यही तो कहना चाहता हूं, अब मैं थक चुका हूं, मैंने सोचा कि मैं काम फिर से शुरु करूं किन्तु वह कमबख़्त, ऐसा नहीं है।

सोफ़िया कहती है कि एक पैकेट चरस भी फेंक दिया और कुछ काम धंधा भी नहीं है, अब क्या करोगे?

आस्कर ने कहा कि एक क़ानूनी काम है, यदि 30 दिन के अंदर कुछ गड़बड़ नहीं हुई, इस दौरान एक आदत बन जाएगी, ठीक है?

सोफ़िया हंसते हुए कहती है कि मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी तुम भी मुझे अकेला न छोड़ना,

आस्कर तैयार होता है और अपने परिवार के साथ अपनी मां के जन्मदिन के कार्यक्रम में जाने के लिए निकल जाता है।

 

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म में हाथ के कैमरे का सहारा लिया जाता है जिससे इसकी वास्तविकता की पुष्टि होती है और ताकि वह संबोधक को फ़िल्मी दुनिया से निकालकर वास्तविकता की ओर से ले जाए और आस्कर ग्रांट के जीवन में अधिक उलझा देती है। इस दृश्य से पता चलता है कि आस्कर ने अपनी पत्नी को सबकुछ बताने का फ़ैसला किया और ग़ैर क़ानूनी काम न करे, फ़िल्म यह बताना चाहती है कि यदि अश्वेत लोगों के आसपास का माहौल सुरक्षित हो तो वह सरलता से बाइज़्ज़त और अच्छा काम पा सकते हैं, अपेक्षा है कि आस्कर एक क़ानूनी और बाइज़्ज़त काम पा सके या पहले वाली नौकरी पर उसे दोबारा रख लिया जाए, यदि अपने फ़िल्म देखा है तो आपको अवश्य याद होगा कि आस्कर एक श्वेत पुलिसकर्मी की गोली से मारा जाता है जो अमरीकी समाज में अश्वेत लोगों के विरुद्ध घृणा और नस्लभेद का परिणाम है जिसके कारण उनकी प्रगति में बधाएं खड़ी हो रही हैं।

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म, उन फ़िल्मों से एक है जो अमरीका के वर्तमान समाज में अश्वेत लोगों के सामने मौजूद समस्याओं को बयान करती है। फ़िल्म की कहानी, गोरे अमरीकियों के नस्लभेदी विचार जो दासप्रथा की मीरास है, अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। अमरीकी समाज  ने अश्वेतों की अपने जीवन सुधारने में अधिक सहायता नहीं की। अमरीकी कालों के सामने सबसे बड़ी समस्या, एक इज़्ज़तदार काम पाना है किंतु इस प्रकार के काम उनके लिए सीमित हैं और काले मजबूर होकर ग़ैर क़ानूनी काम की ओर चले जाते हैं। गोरे लोग, कालों को ग़ुडे और मुजरिम समझते हैं जब तक साबित न हो कि वह मुजरिम नहीं है। अमरीकी समाज की नागरिक और आर्थिक संस्थाओं द्वारा भेदभाव किए जाने के कारण वह अपने योग्य काम प्राप्त नहीं कर पाते।

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म ने पूरी निष्ठा से अमरीका में अश्वेत लोगों के जीवन को खोलकर पेश किया है। यद्यपि आस्कर कभी कभी इस फ़िल्म में लड़कियों से छेड़छाड़ करता और उनको देखता है किन्तु The Birth of a Nation दा बर्थ आफ़ ए नेश्न की तरह इस फ़िल्म में हरकत नहीं करता।    

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म में मुजरिम या ग़ैर क़ानूनी काम करने वाले का अर्थ थोड़ा नर्म रखा गया है। उसका मुजरिम होना उससे नस्लभेद की वजह से नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति और माहौल की वजह से है। आस्कर एक क़ानूनी काम पाना चाहता है किन्तु इस प्रकार के काम एक काले के लिए अमरीकी समाज में प्राप्त करना बहुत कठिन है। फ़िल्म में दिखाया गया है कि आस्कर देश के क़ानून का सम्मान करता है, अपने परिवार को बहुत चाहता है और खुलकर अपनी ज़िंगदी जीना चाहता है। वह कहता है कि इन सबके बावजूद अमरीकी समाज उसको पहले दर्जे के नागरिक के रूप में स्वीकार नहीं करता । आस्कर अपना और अपने परिवार का जीवन सुधारना चाहता है किन्तु समाज उसकी सहायता नहीं करता। इस विषय का कारण, पहले ही फ़ैसला कर लेना है। गोरे लोग काले लोगों के बारे में पहले ही फ़ैसला कर लेते हैं, वह उन्हें अपना हिस्सा नहीं समझते, जिसके कारण अमरीका में कालों को नौकरी नहीं मिलती और उनके लिए काम के अवसर सीमित हो जाते हैं और यह परिवार में तनाव बढ़ने और अश्वेत समाज के बिखराव का कारण बनता है।

 

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Apr १७, २०१८ १६:२२ Asia/Kolkata
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