इस्लामी मानवाधिकार कुछ अधिकारों और दायित्वों का संग्रह है जिसमें समाज के स्तर पर एक व्यक्ति की आज़ादी जैसे अधिकार, परिवार के भीतर लोगों के अधिकार, परिवार के लोगों के आपसी संबंध, ईश्वर के अधिकार, ईश्वरीय विभूतियों जैसे मनुष्य का अस्तित्व, उसकी आयु और उसके शरीर के अंग शामिल हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र व हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पुत्र हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने एक पुस्तक में जिसका नाम रिसालए हक़ूक़ है बहुत विस्तार से बयान किया है कि इस्लाम की दृष्टि से मानवाधिकार क्या हैं। इस पुस्तक में वह आत्मा के अधिकार की बात करते हैं और कहते हैं कि तुम्हारे ऊपर तुम्हारी आत्मा का अधिकार यह है कि उसे ईश्वर की आज्ञा के मार्ग पर रखो, अपनी ज़बान को उसका अधिकार दो, अपने कानों को उनका अधिकार दो इसी तरह शरीर के अन्य अंगों को उनका अधिकार दो। इन अधिकारों को अदा करने के संबंध में ईश्वर से मदद मागो।

 

आत्मा का अधिकार अदा करना है तो इसके लिए ज़रूरी है कि इंसान अपनी आत्मा को अच्छी तरह पहचाने। क्योंकि यदि इंसान अपनी आत्मा को नहीं पहचानेगा तो उसके अधिकारों को भी नहीं पहचान पाएगा और इन अधिकारों को अदा करने पर ध्यान भी नहीं दे पाएगा।

ईश्वर क़ुरआन के सूरए मोमेनून में इंसान की रचना के सभी चरणों को जिन्हें अन्य आयतों में अलग अलग बयान किया गया है, एक साथ और क्रमबद्ध रूप से बयान किया है। ईश्वर कहता है कि हमने इंसान को गीली मिट्टी के निचोड़ से पैदा किया है, फिर उसे शुक्राणु के रूप में सुरक्षित गर्भाशय के भीतर रखा, फिर उसे जमा हुआ ख़ून बनाया, फिर उसे चबाए हुए गोश्त के रूप में बदला, और उसे हड्डियों का रूप दिया और हड्डियों को गोश्त पहनाया, फिर उसे नई रचना का रूप दिया, तो महान है वह ईश्वर जो सर्वोत्तम रचनाकार है।

इंसान की आत्मा क्या है इस बारे में अलग अलग विचार पाए जाते हैं। एक भौतिकवादी विचार है जो कहता है कि इंसान बस इसी शारीरिक अस्तित्व तक सीमित है, यह विचार केवल इंसान के ज़ाहिरी अस्तित्व को देखता है जो इंसान के जन्म से शुरु होता है और मृत्यु पर पहुंच का समाप्त हो जाता है। मरने के साथ ही यह अस्तित्व मिट जाता है। दूसरा विचार यह कहता है कि आत्मा हमेशा बाक़ी रहती है, इंसान शरीर और आत्मा से मिलकर बनता है। मौत से ज़िंदगी ख़त्म नहीं होती इस्लाम भी इसी दूसरे विचार का समर्थन करता है।

 

जो इंसान ख़ुद को पहचानता है, अपनी सभी क्षमताओं, ईश्वर की दी हुई नेमतों, वैचारिक पूंजी, आत्मीय व शारीरिक सामर्थ्य से अवगत होता है तथा अपनी योग्यताओं के बारे में भलीभांति जानता है उसे यह भी पता होता है कि इन क्षमताओं और इस पूंजी को अपने कल्याण के लिए कैसे प्रयोग करे। जब इंसान इन सभी क्षमताओं को हासिल कर लेता है तो उसका लोक परलोक का जीवन सौभाग्यशाली हो जाता है। जबकि इसके विपरीत कोई इंसान एसा भी हो सकता है जो ख़ुद को पहचानता न हो तथा इन लक्ष्यों के लिए तनिक भी प्रयास न करे तो नतीजे में अंधकार के रास्ते पर चल पड़ता है। अतः ख़ुद को पहचानने का एक बड़ा फ़ायदा यह है कि इंसान भ्रांति के अंधकर और उसकी गहराई में गिरने से बच जाता है जिधर उसकी आंतरिक इच्छाएं उसे खींचती हैं।

इंसान के अंगों का भी इंसान पर अधिकार होता है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम कहते हैं कि तुम्हारी ज़बान का तुम पर हक़ यह है कि उसे गालम गलौच से सुरक्षित रखो, उसे अच्छी बातें करने की आदत डालो, उसे संस्कारी रखो, उसे बंद रखो, केवल वहीं पर उसे बोलने दो जहां बोलने की ज़रूरत हो और बोलना तुम्हारी दुनिया व परलोक के लिए लाभकारी हो। ज़बान को बहुत अधिक बोलने और निरर्थक बातें करने से बचाओ क्योंकि ज़बान विवेक की गवाह और अक़्ल की निशानी है, विवेक तथा सभ्य ज़बान इंसान का आभूषण है।

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि इंसान की दो विशेषताएं उसे अन्य रचनाओं से श्रेष्ठ बनाती हैं पहली विशेषता यह है कि इंसान अक़्ल की मदद से सृष्टि की वास्तविकताओं को सीखता है, दूसरी विशेषता यह है कि तर्क और ज़बान की ताक़त से सीखी हुई बातों को दूसरों तक स्थानान्तरित करता है।

ज़बान को अपशब्द कहने, घटिया बातें करने, दूसरों को सताने, पीड़ा देने और नुक़सान पहुंचाने के लिए प्रयोग करना मना है। इसे धर्म ने और धार्मिक शिक्षाओं ने बहुत बुरा कृत्य तथा हराम कहा है। जिस तरह बहुत सी अच्छाइयां और भले काम ज़बान के माध्यम से किए जा सकते हैं उसी तरह बहुत सी शिष्टाचारिक बुराइयों का पटल भी ज़बान है। झूठ, आरोप, दूसरों की बुराई, दूसरों का मज़ाक़ उड़ाना, बेजा तरीक़े से फटकारना, दूसरों का अपमान करनाख बेइज़्ज़ती कर देना, गालियां देना, चुग़ली करना, बहुत अधिक बोलना, झूठी गवाही देना आदि अनेक बुराइयां और अनैतिक काम हैं जो ज़बान की मदद से अंजाम दिए जाते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि ईश्वर ने ज़बान के लिए जो प्रकोप रखा है वह किसी भी अंग के लिए नहीं निर्धारित नहीं किया है। यह ज़बान प्रलय के दिन कहेगी कि हे ईश्वर क्या वजह है कि तूने मेरे लिए सबसे कठोर दंड़ रखा है। तो उसे उत्तर दिया जाएगा कि दूसरे अंगों और भागों की सज़ा से तुम्हारी सज़ा अधिक कठोर रखे जाने की वजह यह है कि ज़बान से कभी कभी एक शब्द एसा निकल जाता है जो बेगुनाह की हत्या का कारण बनता है, लोगों की संपत्ति लूट ली गई, लोगों की इज़्ज़त पर हमला हुआ। ज़बान से ही इंसान भयानक सामाजिक बुराइयां और अपराध अंजाम देता है। अतः स्वाभाविक है कि इस भयानक अपराध और पाप की सज़ा भी अधिक कठोर होगी।

ज़बान को सुरक्षित रखा जाए तो इंसान ख़ुद भी सुरक्षित रहता है और उसकी दुनिया और परलोक की दोनों ज़िंदगियां सुकून से सुशोभित होती हैं। यदि इंसान का अपनी ज़बान पर नियंत्रण नहीं है और वह ज़बान को दूसरों को नुक़सान पहुंचाने से नहीं रोक सकता तो शरीर के अन्य अंगों के लिए लोक परलोक की समस्याएं और परेशानियां पैदा होने लगती हैं।

 

हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम का एक कथन है कि इंसान की ज़बान हर सुबह अन्य अंगों की ख़बर लेती है और पूछती है कि क्या हाल है? अन्य अंग जवाब देते हैं कि अगर तुम हमारी जान छोड़ तो हमारी हालत अच्छी ही रहेगी। इसके आगे शरीर के अंग कहते हैं कि तुम्हें ईश्वर का वास्ता है हमारा ज़रा ख़याल रखना क्योंकि अंगों का दंड़ या पारितोषिक ज़बान पर निर्भर है। अगर तुम सही काम करोगी तो हम भी ईश्वरीय विभूतियों से आनंद उठाएंगे वरना हम भी ईश्वरी प्रकोप का शिकार बनेंगे।

इंसान को ईश्वर से मिलने वाली एक और नेतम श्रवण शक्ति है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम कहते हैं कि कान का अधिकार यह है कि उससे सत्य बात सुनी जाए, उससे केवल वही बातें सुनी जाएं जो इंसान के दिल में नेकी का जज़्बा जगाएं, अच्छे आचरण दें, कान दिल का दरवाज़ा है इसी रास्ते से अच्छी या बुरी चीज़ें दिल में पहुंचती हैं।

कान का अधिकार यह है कि उसे दुसरों की बुराई सुनने से बचाया जाए उसे हराम और नाजायज़ बातें सुनने से सुरक्षित रखा जाए। उसे उन भली बातों को सुनने के लिए सुरक्षित रखा जाए जो दिल को नेकी से भर देती हैं और इंसान को महानता और सदाचार सिखाती हैं। कान के ही दरीचे से बातें दिल में उतरती हैं, इसी रास्ते से अच्छे बुरे अर्थ आत्मा तक पहुंचते हैं।

 

चूंकि दिल, दिमाग़, हृदय, पवित्र मानवीय विचारों और सोच का स्थान है अतः इस्लाम के नैतिक शास्त्र में इन अंगों को हर संभव माध्यम से पवित्र रखने पर ज़ोर दिय गया है तथा उन्हें बुराइयों से दूषित न करने की अनुशंसा की गई है।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम दो बिंदुओं की ओर संकेत करते हैं। एक तो यह कि इस दरवाज़े को सारी अच्छी, नेक और शिक्षा दायक बातों के लिए खुला रखो। दूसरे यह कि कान के दरवाज़े को सारी बुरी हराम और निंदनीय बातों के लिए बंद रखो।

सत्य का संदेश सुनने के लि कान को प्रयोग किया जाए तो यही चीज़ महान व्यक्तिगत, सामाजिक, ऐतिहासिक तथा धार्मिक बदलाव का आरंभ बिंदु बन सकती है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वर के सदाचारी बंदों की विशेषताएं बयान करते हुए कहते हैं कि सदाचारी लोग गुणों से सुसज्जित होते हैं उनकी बातें सही होती हैं व संतुलित रास्ते पर चलते हैं, उनका स्वभाव विनम्रतापूर्ण होता है, अपनी आंखों को उन चीज़ों पर बंद रखते हैं जिन्हें ईश्वर ने उनके लिए हराम ठहराया है और अपने कानों को उस ज्ञान के लिए जो उनके लि हितकारी है खुला रखते हैं।

कानों को हराम और नाजायज़ बातों के लिए बंद करने और इन बातों को इस रास्ते से दिल और आत्मा तक पहुंचने से रोकने को भली और शिक्षादायक बातें सुनने पर प्राथमिकता देने का रहस्य यह है कि यदि कान दूषित हों तो उनमें अच्छी बातें और अच्छा ज्ञान स्वीकार करने की क्षमता बाक़ी नहीं रहती। अतः सबसे पहले ज़रूरी है कि कान को पवित्र बनाया जाए तथा जो भी नाजायज़ बातें हैं उन्हें कान में न पड़ने दिया जाए। इसके बाद के चरण में यह कोशिश की जाए कि कान में अच्छी बातें और अच्छा ज्ञान पहुंचे।  

 

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Apr २८, २०१८ १३:२० Asia/Kolkata
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