जैसा कि सभी को पता है कि अमरीकी इतिहास में बराक ओबामा पहले काले राष्ट्रपति हैं।

बराक ओबामा 2009 से 2017 तक अमरीका के राष्ट्रपति रहे। आज के कार्यक्रम में और उसके बाद वाले कार्यक्रम में हम उन फ़िल्मों पर नज़र डालेंगे जो बराक ओबामा के राष्ट्रपति काल में बनी हैं। अपेक्षा थी कि वर्ष 2009 से 2017 तक, अमरीका में एक श्यामवर्ण राष्ट्रपति के काल से प्रभावित होकर हालीवुड में बनने वाली फ़िल्मों में श्यामवर्ण और श्वेतवर्ण के लोगों के संबंधों में किसी सीमा तक परिवर्तन आएगा। आज हम समीक्षा करेंगे कि क्या बराक ओबामा के काल में हालीवुड ने श्यामवर्ण की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक चिंताओं को अधिक पेश किया या इसमें कोई ख़ास परिवर्तन नहीं हुआ ? या हालीवुड की फ़िल्मों में कालों और गोरों को जैसा पेश किया गया या अतीत की भी भांति श्यामवर्ण को श्वेतवर्ण के दुश्मन के रूप में ही पेश किया गया है?

यदि हालीवुड की कंपनियों द्वारा 2009 से 2017 के बीच बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालें तो जिस श्रेणी में हम इन फ़िल्मों को रखेंगे आप भी उससे सहमत होंगे। अलबत्ता हमने पिछले कार्यक्रमों में ओबामा के कार्यकाल की पांच फ़िल्मों की समीक्षा की थी। यह फ़िल्म इस प्रकार हैं वर्ष 2009 में दा ब्लाइंड साइड, वर्ष 2013 में टूवेल ईयर्स अ स्लेव, वर्ष 2013 में दा बटलर, 2013 में फ़्रूटूवेल स्टेशन (Fruitvale Station) और वर्ष 2015 में दा हेटफ़ुल एट।  इन फ़िल्मों और हालीवुड की दूसरी फ़िल्में जो श्यामवर्ण के बारे में बनाई गयीं हैं, देखने के बाद हम यह समझते हैं कि इस प्रकार की फ़िल्में वास्तव में समाजवाद और इतिहास का ही बखान करती हैं। इतिहास का बखान करने वाली फ़िल्मों में हम दो प्रकार की न्यायप्रिय और प्रतिशोधात्मक कहानियां देखते हैं। समसाजिक वास्तविकता का बखान करने वाली फ़िल्मों में हम वर्तमान अमरीकी समाज में श्यामवर्ण की जीवन समस्या और गोरों के साथ कालों के जीवन को सामान्य दिखाने जैसे विषयों को देखते हैं।

 

बराक ओबामा के शासन काल में बनने वाली फ़िल्में श्यामवर्ण के इतिहास को बयान करती है। इन फ़िल्मों में अमरीका के कालों के इतिहास को जीवनी के रूप में दिखाया गया है। मानो बराक ओबामा के कार्यकाल में हालीवुड को सुनहरा अवसर मिल गया था ताकि वह श्यामवर्ण के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों के इतिहास को पूरी शक्ति के साथ बयान कर सकें। इस कार्यकाल में इतिहास को दो तरह से बयान किया गया। अधिकतर फ़िल्में श्यामवर्ण के इतिहास को न्यायपूर्ण ढंग से पेश करती हैं जबकि कुछ फ़िल्मों में गोरे लोगों से कालों के संबंध को बदले की भावना के रूप में पेश किया गया है।

जिन फ़िल्मों में न्यायपूर्ण ढंग से कालों के जीवन को बयान किया गया है वह टूवेल ईयर्स अ स्लेव और दा बटलर हैं। इन फ़िल्मों में हम गोरों के अत्याचारों के मुक़ाबले में कालों के अत्याचारग्रस्त होने को देखते हैं किन्तु श्वेतवर्ण का व्यक्तित्व केवल सकारात्मक और नकारात्मक नहीं है। अच्छे गोरों के साथ बुरे गोरों को भी दिखाया गया है। काले लोगों को पेश करने के दौरान फ़िल्में कभी उनके निगेटिव रोल को दिखाती है और कभी उनको अच्छा बनाकर पेश करती है। यद्यपि उनका पाज़ीटिव रोल को बढ़ा चढ़कर दिखाया जाता जिसके कारण उनका निगेटिव रोल छिप जाता है। यह विषय नस्लभेदी व्यवस्था के अत्याचारपूर्ण होने को दिखाता है और हालीवुड यह कहना चाहता है कि वह काले लोग जो प्रयास करते हैं, सक्षम हैं और उनमें सूझबूझ है, यदि उचित माहौल में हों तो वह विभिन्न क्षेत्रों में चमकते हुए सितारों की भांति बनकर उभर सकते हैं किन्तु मानो उनको समाज से निकालने का मुख्य कारण उनकी काली चमड़ी और समाज में फैला हुआ नस्लभेद है।

 

टूवेल ईयर्स अ स्लेव नामक फ़िल्म में दिखाया गया है कि कालापन, दास प्रथा की व्यवस्था की बलि के समान है। कुछ गोरे स्वामी, कालों के विरुद्ध बहुत अधिक हिंसा करके उनके भविष्य को बदल देते हैं। अलबत्ता सारे गोरे ऐसे नहीं हैं। फ़िल्म में अच्छे गोरों के साथ साथ बुरे गोरों को भी दिखाया गया है जबकि गोरों को तुलनात्मक अच्छा व्यक्ति दिखाया गया है। गोरे लोगों के निगेटिव रोल के साथ जो हिंसक और कट्टरपंथ व्यवहार रखते हैं, संतुलित और अच्छे गोरों को भी दिखाया गया है जिनके रोल पाज़िटिव होते हैं। कालों को मुख्य नायक के रूप में पेश नहीं किया जाता। कुछ काले अपनी वर्तमान स्थिति से छुटकारा पाने की जुगत में हैं और वह रुकावटों को दूर करने का प्रयास करते हैं जबकि कालों का दूसरा गुट वर्तमान स्थिति के सामने घुटने टेक देता है और उसको परिवर्तन की आवश्यकता दिखाई नहीं पड़ती।

 

टूवेल ईयर्स अ स्लेव नामक फ़िल्म गोरों और कालों को श्रेणीबद्ध करने का प्रयास करती है और उनके मुक़ाबलों और सहयोग को न्यायपूर्ण दिखाने का प्रयास करती है। फ़िल्म पाज़िटिव और निगेटिव रोल को पेश करने के बजाए न्यायपूर्ण ढंग से बड़ी सफलता के साथ दासप्रथा को दिखाने में कामयाब रही है।

वर्ष 2013 में बनने वाली फ़िल्म दा बटलर की मुख्य कहानी, श्यामवर्ण के लोगों के समानता के संघर्ष के इर्द गिर्द घूमती है। यह फ़िल्म, कुछ लोगों और गुटों को श्यामवर्ण के अधिकार दिलवाने में प्रभावी समझती है। श्यामवर्ण की पुरानी परिश्रमणी पीढ़ी अपनी नर्म मांगों से तथा नई पीढ़ी पढ़ लिखकर पार्टी का गठन करती हैं और सड़कों पर प्रदर्शन करती है और इनमें से हर एक अपने हिसाब से श्यामवर्ण के विकास के मार्ग में मौजूद रुकावटों और नस्लभेद को दूर करने की कोशिश करती है। दा बटलर नामी फ़िल्म में दिखाया गया है कि श्वेतवर्ण के राष्ट्रपति जान एफ़ कनेडी का श्यामवर्ण के युवाओं के इतने व्यापक स्तर पर प्रदर्शनो का जब सामना होता है तो गोरों और कालों के हक़ में समान क़ानून बनाने का प्रयास करते हैं और इसी प्रयास में उनकी हत्या कर दी जाती है।

टूवेल ईयर्स अ स्लेव और दा बटलर नामक फ़िल्मों पर न्यायपूर्वक नज़र डालने से पता चलता है कि श्यामवर्ण के लोगों को गोरे लोगों के बराबर नागरिक अधिकार प्राप्त करने के लिए अधिक समय, पीढ़ियों तथा विचारों के बदलने और निरंतर संघर्ष की आवश्यकता होती है। इन फ़िल्मों में हम देखते हैं कि निगेटिव और पाज़िटिव दोनों रोल, कालों और गोरों दोनों को दिए गये हैं किन्तु महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि फ़िल्म के डायरेक्टर ने पक्षपातपूर्ण ढंग से और न ही नस्लभेद के बीच पाए जाने वाले संबंधों को पेश करने का प्रयास किया बल्कि न्यायपूर्वक ढंग से कहानी बयान करने का प्रयास किया है। फ़िल्म, गोरों के वर्चस्व के मुक़ाबले में कालों के वर्चस्व विरोध और प्रतिरोध के दृश्य पेश करती है।

 

फ़िल्म की कहानी जब गोरों के वर्चस्व और उनकी विशिष्टता की बात करती है तो वह उनकी ज़ोर ज़बरदस्ती और हिंसा को भी पेश करती है और जब वह गोरों की अच्छाई बयान करती है तो फ़ौरन अपना ट्रैक बदल देती है और श्यामवर्ण के लोगों को दासप्रथा से मुक्ति दिलाने के गोरों की सहायताओं का दृश्य दिखलाती है।

यह फ़िल्म कभी भी गोरों की अत्याधिक हिंसा और कालों के अत्याचार ग्रस्त होने को पेश नहीं करती बल्कि फ़िल्म अमरीकी समाज में विशेष और तार्किक ढंग से पेश करके श्यामवर्ण के लोगों के नागरिक अधिकार के आंदोलन के परिणाम तक पहुंचने से पहले असमान नस्लभेदी व्यवस्था की आलोचना करता है और इस प्रक्रिया को श्यामवर्ण की पहचान प्राप्त करने को अमरीका के सामान्य नागरिकों जैसा दिखाती है।

वर्ष 1967 में बनी गेस हूज़ कमिंग टू डिनर (Guess Who's Coming to Dinner) जैसी अमरीका में नागरिक आंदोलनों के बारे में बनी दूसरी फ़िल्मों में और वर्ष 2013 में निर्मित फ़िल्म दा बटलर के बीच मुख्य अंतर यह है कि इनमें बहुआयामी कहानी बयान की गयी है। दा बटलर नामक फ़िल्म श्यामवर्ण के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक आयामों के मार्ग में संघर्ष की समीक्षा करती है। गेस हूज़ कमिंग टू डिनर नामक फ़िल्म काले और गोरे के बीच शादी के विषय पर केन्द्रित है जबकि दा बटलर फ़िल्म, श्यामवर्ण के बराबरी के संघर्ष के विषय को पेश करके इस बराबरी की कहानी को व्यापक स्तर पर पेश करती है। इसके अलावा गेस हूज़ कमिंग टू डिनर नामक फ़िल्म, हालीवुड में नागरिक अधिकार आंदोलन के बारे में बनने वाली दूसरी फ़िल्में अपने विषय पर केन्द्रित होती हैं। उदाहरण स्वरूप वर्ष 1959 में बनी फ़िल्म इमिटेशन आफ़ लाइफ़ (Imitation of Life) काले और गोरे मां बाप की एक जवान लड़की, गर्मी की एक रात में, गोरों के समाज में अपनी पहचान हासिल करने के लिए गोरे पुलिसकर्मी के बाद काले पुलिसकर्मी का सहारा लेती है जबकि दा बटलर फ़िल्म, श्यामवर्ण के लोगों की आपत्ति और विरोध के काल को प्रदर्शित करती है।

बराक ओबामा के काल में बनने वाली फ़िल्में, श्यामवर्ण के संघर्ष और नस्लभेद के इतिहास पर न्यायपूर्ण ढंग से नज़र डालती है। इन फ़िल्मों में दा हेल्प, लिंकन और सेलमा की ओर संकेत किया जा सकता है। यह फ़िल्में, श्यामवर्ण की अधिकार प्राप्ति और गोरों की ज़ोर ज़बरदस्ती को सीमित करने को बयान करती हैं। इन फ़िल्मों में काले लोग समाज में फैले ढांचे को विवश करता है कि वह भी गोरों की भांति उनके समान अधिकार की मांग स्वीकार करे। इन फ़िल्मों के नायक, श्यामवर्ण की पहचान की सीमाओं को ख़राब करने की प्रक्रिया के मुक़ाबले में बड़े ही सावधानीपूर्ण ढंग से श्वेतवर्ण व्यवस्था के मुक़ाबले में डट जाते हैं और धीरे धीरे अपनी मांगों को पेश करते हैं।

बराक ओबामा के काल में और बाद में बनी फ़िल्मों पर नज़र डालने से पता चलता है कि इस प्रकार की फ़िल्में, बराक ओबामा के काल में बहुत अधिक बनीं हैं जिसमें समाज के विभिन्न आयामों पर नज़र डाली गयी है। (AK)

 

मई ०७, २०१८ १२:२६ Asia/Kolkata
कमेंट्स