समस्त ईश्वरीय धर्मों विशेषकर इस्लाम धर्म कानून बनाने में इस बात का पक्षधर है कि समस्त कानून यहां तक कि नैतिक कानून भी मध्यमार्गी हों।

इस्लाम धर्म किसी कार्य में सीमा से आगे बढ़ जाने या पीछे रह जाने को पसंद नहीं करता है और वह उसे अज्ञानता का परिणाम मानता है।

 

हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम रिसालये हुकूक नाम की अपनी पुस्तक में पेट के अधिकार के बारे में फरमाते हैं" पेट का अधिकार यह है कि उसे थोड़ी सी भी हराम चीज़ का पात्र न बनाओ और हलाल चीज़ के प्रयोग में भी मध्यमार्ग का ध्यान रखो और शरीर को मजबूत करने में अधिक खाने से बचो और भूख और प्यास के समय इस बात का ध्यान रखो कि अधिक खाना और पीना सुस्ती व आलस्य और समस्त भलाइयों से दूर रहने का कारण है। इसी प्रकार अधिक पीना मस्ती, मध्यमार्ग से निकलने, अज्ञानता और बेमुरव्वती का कारण है।

 

जैसाकि स्पष्ट है कि शरीर के इस अंग की रचना केवल शरीर के दूसरे अंगों को मजबूत करने, उन तक भोजन पहुंचाने और इंसान के जीवन को जारी रखने के लिए की गयी है। इंसान के शरीर की रचना इस प्रकार से की गयी है कि इंसान को चाहिये कि वह न केवल पेट की आवश्यकता की पूर्ति पर ध्यान दे बल्कि उसके लिए वैध है कि वह खाने- पीने से आनंद भी ले। जैसाकि महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन में फरमाया है कि हे ईमान लाने वालो जो हमने तुम्हें पवित्र आजीविका दी है उसे खाओ और ईश्वर का आभार व्यक्त करो अगर उसकी उपासना करते हो।

खाने- पीने का वक्त होना चाहिये और उस वक्त को ध्यान में रखने से शरीर के इस अंग के अधिकार को भी दृष्टि में रखा जाता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं “ किसी भी स्थिति में पेट को ईश्वरीय हराम का पात्र न बनाओ।“

 

खाने- पीने में कुछ ऐसी चीज़ें भी हैं जिन्हें महान ईश्वर ने प्रत्यक्ष रूप से मना किया है जबकि कुछ ऐसी भी चीज़ें हैं जिन्हें अप्रत्यक्ष रूप से मना किया गया है। दूसरों का माल उन चीज़ों में से है जिनका प्रयोग सार्वजनिक रूप से हराम है। इसी प्रकार चोरी करना, लेन- देन में धोखा देना, सूद लेना और काम को सही ढंग से अंजाम न देना। ये वे कार्य हैं जो सीधे तौर पर हराम हैं और खाने- पीने की जो चीज़ें हराम आय से तैयार होती हैं और वे पेट में जाती हैं तो यह पेट के साथ विश्वासघात है और शरीर का यह अंग प्रलय के दिन इंसान के खिलाफ दावा करेगा।

अगर इंसान के धन में खुम्स व ज़कात जैसा धार्मिक टैक्स अनिवार्य हो गया और इंसान ने इस अधिकार को अदा नहीं किया तो यह माल दूसरे के माल से मिश्रित हो गया है और इस प्रकार के माल को खर्च करना दूसरे के माल में खर्च करना है और खाने- पीने की हर प्रकार की चीज़ की खरीदारी और उसे पेट में डालना हराम है। दूसरे शब्दों में पेट के अधिकार का अतिक्रमण है।

खाने में वह चीज़ें भी हैं जिन्हें विशेषकर खाने से मना किया गया है। उदाहरण के तौर पर जानवरों व पशुओं में एसे जानवर भी हैं जिनका मांस खाना हराम है और एसे जानवरों को हराम गोश्त कहा जाता है और उनके मांस को खाने से परहेज़ करना अनिवार्य है। इसी प्रकार जिन जानवरों का मांस खाना हलाल है उसकी भी कुछ शर्तें हैं और उन जानवरों को ज़िब्ह करते समय उनका ध्यान रखा जाना ज़रूरी है। अगर एसा नहीं किया गया तो उनके मांस को खाना हराम हो जायेगा और एसी स्थिति में यह कहा जायेगा कि पेट के अधिकार का ध्यान नहीं रखा गया। पीने वाली चीज़ें भी इसी प्रकार हैं।

दूसरी ओर खाने- पीने में अधिकता से मना किया गया है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के कथनानुसार सीमा से अधिक खाने पीने की भर्त्सना का कारण यह है कि अधिक खाना पीना शरीर और सोच में आलस्य का कारण बनता है और इन दोनों चीज़ों का एक प्राकृतिक प्रभाव अस्तित्व में आता है और वह यह है कि समस्त भलाइयों से इंसान की रुचि खत्म हो जाती है।

              

 

अब एक अन्य विषय की चर्चा करते हैं और वह इंसान के अंदर काम इच्छा की भावना है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इंसान के अंदर महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने जो कामइच्छा रखी है वह मानवता के बाक़ी रहने का कारण है। साथ ही वह आनंद उठाने का बहुत बड़ा कारण व साधन भी है। अगर कोई इंसान काम इच्छा का लाभ सीमा से अधिक उठाता है तो इसके बहुत हानिकारक परिणाम हैं इसलिए इसे नियंत्रित करने पर बहुत बल दिया गया है जबकि कुछ समाजों में काम इच्छा से लाभ उठाने की कोई सीमा नहीं है। इसी तरह कुछ लोगों का मानना है कि काम इच्छा से लाभ ही नहीं उठाया जाना चाहिये और वह इसकी भर्त्सना करते हैं और उनका कहना है कि यह जानवरों का काम है और वे इंसानों का प्रोत्साहन इसके दमन के लिए करते हैं।

इसके मुकाबले में कुछ लोग इस बात के पक्षधर हैं कि काम इच्छा से लाभ उठाने में किसी प्रकार की सीमा नहीं होनी चाहिये जबकि समस्त आसमानी धर्म विशेषकर इस्लाम धर्म कानून बनाने में मध्यमार्ग का पक्षधर है और सीमा से आगे बढ़ जाने या सीमा से अधिक पीछे रह जाने को अज्ञानता का नतीजा मानता है।

इस्लाम के अनुसार सीमा से अधिक या सीमा से कम दोनों का स्रोत इंसान की अज्ञानता है। साथ ही इस्लाम जहां सीमा रहित आज़ादी से मना करता है वहीं मर्द और औरत द्वारा एक दूसरे से आनंद उठाने का आग्रह करता है। इस्लाम धर्म की बुनियाद रखने वाले पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं कि विवाह मेरी परम्परा है और जो मेरी परम्परा से मुंह मोड़े वह मुझसे नहीं है।

इस्लाम धर्म में उन समस्त कारणों और कारकों से मना किया गया है जिन्हें विवाह न करने का बहाना बनाया जाता है। इस्लाम धर्म के अनुसार मानवीय परिपूर्णता तक पहुंचने के लिए काम इच्छा की भावना से सही ढंग से लाभ उठाया जाना चाहिये। उदाहरण के तौर पर जो लोग यह कहते हैं कि धर्म की सुरक्षा के लिए काम इच्छा का दमन करना चाहिये। इस प्रकार की बातों के मुकाबले में पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं" विवाह की छत्रछाया में तुम अपने आधे धर्म की सुरक्षा कर सकते हो और शेष आधे के लिए तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय अपनाओ”

पवित्र कुरआन स्पष्ट शब्दों में विवाह करने का आदेश देता और कहता है" अगर निर्धन भी हो तो ईश्वर अपनी कृपा से तुम्हें धनी कर देगा।"

इस्लाम धर्म के अनुसार विवाह न केवल वैध तरीके से काम इच्छा पूरा करने का साधन है और इस्लाम ने उसकी भर्त्सना नहीं की है बल्कि विवाह इस प्राकृतिक आवश्यकता व मांग का जवाब है। जिस तरह से खाना पीना एक प्राकृतिक ज़रूरत है और उसे छोड़ने के लिए नहीं कहा गया है उसी तरह से काम इच्छा भी एक प्राकृतिक ज़रूरत है और विवाह करने पर जितना अधिक बल इस्लाम धर्म में दिया गया है उतना शायद ही किसी बात पर बल दिया गया हो।

 

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विवाह करने और आध्यात्मिक परिपूर्णता एवं आत्मा की शुद्धि में किसी प्रकार का कोई विरोधाभास नहीं है बल्कि विवाह ईमान में मजबूती का कारण है। क्योंकि जब इंसान विवाह के पावन बंधन में बध जाता है तो वास्तव में उसने अपने अंदर पापों से बचने के कारक को मज़बूत कर लिया। इस संबंध में दूसरा बिन्दु यह है कि जब इंसान सीमा रहित होकर काम इच्छा की पूर्ति करता है तो उसके व्यक्तित्व का पतन हो जाता है और वह जानवरों की तरह बल्कि उनसे भी बदतर हो जाता है। इसलिए इस्लाम ने सीमा रहित काम इच्छा की पूर्ति से मना किया है।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम इस अधिकार के संबंध में फरमाते हैं कामैच्छा का अधिकार यह है कि उसे हराम कार्यों से बचाया जाये और हराम चीज़ों से आंख बंद करना उसकी सहायता है कि यह बेहतरीन सहायता है। इसी प्रकार मौत और ईश्वरीय प्रकोप की याद से सहायता चाहना है।

 

इस्लाम धर्म की शिक्षाएं प्राकृतिक ज़रूरतों की पूर्ति है। वह वैध ढंग से काम इच्छा को पूरा किये जाने को इंसान की ज़रुरत समझता है। इंसान के अंदर काम इच्छा की जो भावना है वह भयंकर व विनाशकारी बाढ़ की तरह है और अगर उसे ईमान और ईश्वरीय भय के बांध से नहीं रोका गया तो वह उन समस्त सदगुणों व विशेषताओं को तबाह कर सकती है जो इंसान के अंदर मौजूद हैं। तो सही रास्ता और बांध बनाकर बाढ़ के समस्त फायदों से लाभ उठाना चाहिये। इसी तरह मजबूत बांध बनाकर इस बाढ़ से होने वाले विनाश को भी रोका जा सकता है। इंसान की समस्त इच्छाएं इसी प्रकार की हैं। जैसे क्रोध और काम इच्छा आदि और कानून की सीमा में रखकर उन सबसे लाभ उठाया जा सकता है।

 

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मई १४, २०१८ १४:१० Asia/Kolkata
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