हमने अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासनकाल में अश्वेतों की तस्वीर पेश करने में हॉलिवुड के दो दृष्टिकोणों का उल्लेख किया था।

पहला अश्वेतों के संघर्ष के इतिहास को न्यायपूर्ण तरीक़े से पेश करना था, दूसरा अश्वेतों के इतिहास को दोहराने में बदले की भावना से काम लेना था। आज के कार्यक्रम में हम दूसरे दो दृष्टिकोण पेश करेंगे। इन दोनों को सामाजिक वास्तविकता या सामाजिक यथार्थवाद के रूप में बयान किया जाता है। इसके तहत वर्तमान अमरीकी समाज में अश्वेतों की समस्याओं का बखान किया जाता है, दूसरे अश्वेतों और श्वेतों को एक साथ सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए दिखाया जाता है।

सामाजिक वास्तविकता से संबंधित फ़िल्मों में ऐसी कहानियां पेश की जाती हैं, जिसमें अश्वेतों और श्वेतों के बीच जातीय संबंधों पर आलोचनात्मक नज़र डाली जाती है। यह यथार्थवाद वर्तमान समय में अश्वेतों के जगत से संबंधित है, न कि उनके पिछले इतिहास से। इस तरह की फ़िल्मों की कहानी अल्पसंख्यकों की समस्याओं और उनके जीवन में पेश आने वाली नई परिस्थितियों के इर्दगिर्द घूमती है। इन फ़िल्मों में अश्वेतों की संस्कृति की अच्छाईयों और बुराईयों की झलक देखी जा सकती है।

सामाजिक यथार्थवादी फ़िल्मों में अमरीका में वर्तमान अश्वेत समाज की समस्याओं को पेश किया जाता है। इस तरह की फ़िल्मों में अश्वेतों के जीवन की समस्याओं और सामाजिक संगठनों एवं सरकार के उनसे निपटने का उल्लेख किया जाता है। इन फ़िल्मों में अल्पसंख्यक अश्वेतों की समस्याओं की जड़ों की समीक्षा की जाती है, अश्वेत युवाओं के अपराधों और उनके विनम्रतापूर्ण समाधान को पेश किया जाता है। इस तरह की फ़िल्मों की केटेगरी में फ़्रूटवेल स्टेशन फ़िल्म को डाला जा सकता है। इस फ़िल्म में ऑस्कर ग्रैंट नामक अपराधी अश्वेत युवक में होने वाले सुधार को दर्शाया गया है, जिसके सामने आर्थिक समस्याएं हैं और पुलिस उसके और उसके साथियों के साथ हिंसक व्यवहार करती है। पुलिस कि जिसका काम शांति व्यवस्था क़ायम रखना और व्यवस्था बनाए रखना होता है, वह जब संदिग्ध अश्वेत युवकों को देखती है तो उनके साथ हिंसक व्यवहार करती है, जिसके कारण निर्दोष ऑस्कर की मौत हो जाती है।

फ़्रूटवेल स्टेशन में पहले ग़रीबों के मोहल्लों में अश्वेतों की परिस्थितियों को दर्शाया गया और उनके असामान्य कार्यों को उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति से जोड़ा गया है। श्वेत पुलिस रंगभेद के आधार पर उनके साथ मारपीट करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि अमरीकी पुलिस उनके साथ ग़ुलामों जैसा व्यवहार करती है। अमरीकी समाज में आम जीवन में जिन कठिनाईयों का सामना अश्वेतों को करना पड़ता है, उन्हें अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा भी समाप्त नहीं कर सके, जबकि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में इसका वादा किया था।

फ़्रूटवेल स्टेशन जैसी अन्य फ़िल्मों की श्रेणी में प्रेशस और मूनलाइट को भी रखा जा सकता है। प्रेशस फ़िल्म का मूल विषय अश्वेत समाज में समलैंगिकता और पारिवारिक हिंसा की समस्या है। इस फ़िल्म का निर्दोष कैरेक्टर, अमरीकी समाज में अश्वेतों पर होने वाले अत्याचारों और अपनी पारिवारिक समस्याओं के कारण अलग थलग पड़ जाता है और अपनी ख़याली दुनिया में गुम हो जाता है। इस फ़िल्म में अश्वेतों की इन समस्याओं को अपमानजनक दृष्टिकोण से पेश नहीं किया गया है, बल्कि उनके साथ हमदर्दी जताई गई है। फ़िल्म में इन लोगों के साथ सहयोग और उनके जीवन स्तर को सुधारने में संगठनों एवं सरकार की भूमिका पर बल दिया गया है।

मूनलाइट फ़िल्म 2016 में रिलीज़ हुई। इस फ़िल्म में अमरीकी समाज में अश्वेतों की समस्याओं को बयान किया गया है। इसकी कहानी एक समलैंगिक अश्वेत युवक के इर्दगिर्द घूमती है, जिसे जीवन को तीन भागों बचपन, जवानी और वृद्धावस्था में बांटा गया है। वह अपने जीवन में सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक और रोज़गार संबंधित समस्याओं से जूझता है। वह एक बदमान एवं ग़रीब मोहल्ले में पलता बढ़ता है। इस फ़िल्म में यह दिखाया गया है कि एक अश्वेत, किस तरह से शिक्षा और जीवन की अन्य सुविधाओं के अभाव में अपराध की ओर आकर्षित होता है। परिवार, समाज और स्कूल में उसकी सही परवरिश नहीं होती है। नागरिक संगठन भी उसकी किसी तरह की कोई मदद नहीं करते हैं। नागरिक संगठन अपराधी अश्वेत बच्चों की सामाजिक परिस्थितियों के कारण मदद नहीं करते हैं, जिसके कारण वे विभिन्न प्रकार के अपराधों और अनैतिक कार्यों की ओर आकर्षित होते हैं।

मूनलाइट फ़िल्म का अश्वेत कैरेक्टर, जब अवहेलना का शिकार होता है, तो वह ग़लत रास्ते का चयन करता है और मादक पदार्थ बेचने लगता है। कोई भी संगठन उसकी सहायता के लिए आगे नहीं आता है। निसंदेह उसके इन अपराधों की ज़िम्मेदारी, नागरिक संगठनों एवं शैक्षणिक संस्थाओं के कांधों पर है।

आम विचारों के विपरीत, मूनलाइट फ़िल्म में अश्वेतों की समस्याओं को दिखाने के कारण और कुछ आलोचकों के मुताबिक़ ट्रम्प के भेदभावपूर्ण बयानों के कारण, 2017 में बेहतरीन फ़िल्म का ऑस्कर पुरस्कार जीतने में सफल रही। इससे यह संदेश जाता है कि ट्रम्प और उनके अनुयाई यह समझ लें कि अश्वेत अपराधी के रूप में जन्म नहीं लेते हैं, बल्कि सामाजिक समस्याओं और सरकार एवं नागरिक संगठनों की उपेक्षा के कारण, उनके समाज में यह बुराईयां उत्पन्न हो जाती हैं।

सामाजिक यथार्थवादी अन्य फ़िल्मों में अश्वेतों एवं श्वेतों को एक साथ शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए दिखाया जाता है। हालांकि ऐसी फ़िल्मों की संख्या बहुत कम है। इन फ़िल्मों द्वारा श्वेतों और अश्वेतों के बीच की दूरी को कम करने की कोशिश की जाती है। उनके बीच शांतिपूर्ण जीवन को दर्शाया जाता है और उनके बीच अच्छे संबंधों पर बल दिया जाता है।

ओबामा शासनकाल में बनने वाली दो फ़िल्मों को इस श्रेणी में डाला जा सकता है। द ब्लाइंड साइड और क्रीड। ब्लाइंड साइड फ़िल्म में दिखाया गया है कि श्वेतों और अश्वेतों को कैसे एक दूसरे की ज़रूरत होती है और अश्वेत भी समाज में पहले दर्जे के नागरिक हैं। इसमें श्वेत और अश्वेतों के बीच के अंतर को मिटा दिया गया है, दोनों के बीच की दुश्मनी को समाप्त कर दिया गया है। इस फ़िल्म में अश्वेतों के पिछड़ेपन का कारण, अमरीकी समाज में शैक्षिक एवं सामाजिक भेदभाव को बताया गया है। इस भेदभाव के समाप्त होने की स्थिति में अश्वेत भी श्वेतों की तरह जीवन व्यतीत कर सकते हैं, उन्हें असफलता का सामना करना पड़ सकता है, प्रगति कर सकते हैं और अपने लिए और समाज के लिए लाभदायक साबित हो सकते हैं। इस फ़िल्म में एक क़दम के बाद दूसरे क़दम पर श्वेतों और अश्वेतों की बीच की खाई को निराधार बताया गया है।

 

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासनकाल में इस विषय से संबंधित बनने वाली फ़िल्मों की हमने समीक्षा की। हालांकि इस तरह की कुछ फ़िल्में ओबामा के सत्ता में पहुंचने से पहले भी बनीं थीं। लेकिन जिन चार दृष्टिकोणों की समीक्षा की गई है, इस काल में उन पर अधिक ध्यान दिया गया। इस काल में इन चार दृष्टिकोणों से संबंधित फ़िल्मों के अलावा, दो अन्य दृष्टिकोणों पर भी गंभीरता से ध्यान दिया गया। इनमें से एक वे फ़िल्में हैं, जो आम अश्वेतों की पंसद के आधार पर बनाई गई हैं। इनमें से डोप, बार्बरशिप द नेक्स्ट कट और मीट द ब्लैक्स का नाम लिया जा सकता है। इन फ़िल्मों में अश्वेतों ने मुख्य भूमिका निभाई है। इन फ़िल्मों में अश्वेतों के समाज में कामुकता और राजनीतिक सनसनी का मिश्रण मौजूद है।

 

ओबामा शासनकाल में जातीय विषयों पर बनने वाली अन्य कमर्शियल फ़िल्मों में अश्वेतों की प्रतिभाओं को आश्चर्यजनक और रोमांचक कहानियों के ज़रिए पेश किया गया है। ऐसी फ़िल्मों में लॉ अबाइडिंग सिटिज़न और द बुक ऑफ़ इली का नाम लिया जा सकता है। इसी तरह की फ़िल्मों में पिछले दशकों में बनने वाली फ़िल्में, जैसे कि सेवन, द ग्रीन माइल और शाफ़्ट हैं। इस तरह की फ़िल्मों में अश्वेतों को आम तौर पर हीरो के रूप में पेश किया जाता है और फ़ाइटिंग के दृश्यों में उनके आकर्षक शरीर का इस्तेमाल किया जाता है।                              

 

मई १५, २०१८ १२:०४ Asia/Kolkata
कमेंट्स