इस कार्यक्रम की अंतिम कड़ी में हम उन फ़िल्मों पर एक नज़र डालेंगे जिन्की समीक्षा हमने इससे पहले वाले कार्यक्रमों में की थी।

इन फ़िल्मों पर नज़र डालने के दौरान हम हालीवुड में गोरों और कालों के संबंधों की भी समीक्षा करेंगे।

हालीवुड की फ़िल्मों में गोरो और कालों के टकराव और लेनदेन का मुख्य कारण शक्ति होता है और इससे उनकी दोस्ती और दुश्मनों की सीमा का पता चलता है। वर्ष 1915 में निर्मित द बर्थ आफ़ ए नेशन The Birth of a Nation नामक फ़िल्म में सामाजिक व राजैतिक असमानों के मुक़ाबले में कालों को पूर्ण रूप से नकारात्मक रोल में पेश किया गया जबकि गोरों को पाज़िटिव रोल देकर वैधता प्रदान करने का प्रयास किया गया। फ़िल्म की स्क्रिप्ट भी सभ्य गोरे और असभ्य कालों के बीच दूरी और गोरों की कालों पर विजय को प्राकृतिक रूप में बयान करती है दूसरे शब्दों में दशकों को बताया जाता है कि गोरे कालों से बेहतर हैं और यह पूर्ण रूप से स्वाभाविक बात है और यदि ऐसा न होता तो समाज में अराजकता फैल जाती और यही वजह है कि शक्ति और ताक़त गोरों के हाथ में होनी चाहिए।

1927 में बनने वाली फ़िल्म अंकल टाम्स कैबिन Uncle Tom's Cabin में भी दिखाया गया है कि शक्ति गोरे के हाथ में होती है। यह फ़िल्म भी द बर्थ आफ़ ए नेशन की ही भांति कालों का अनादर और अपमान करती है किन्तु फ़िल्म गोरों की शक्ति को बिना प्रतिद्वंदी के नहीं दिखाना चाहती और यह दिखाना चाहती है कि कालों को उच्च सामाजिक स्थान प्राप्त करने और अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए आपत्ति दर्ज कराने का कोई अधिकार नहीं है। दूसरे शब्दों में गोरों का आगे रहना और कालों का कमज़ोर होना, द बर्थ आफ़ ए नेशन नामक फ़िल्म के विपरीत, अच्छे गोरों और बुरे कालों के व्यक्तितव से प्रभावित नहीं है बल्कि अमरीका में नस्लभेद की अत्याचारी और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का परिणाम है।

 

आपको याद होगा कि वर्ष 1949 में बनने वाली फ़िल्म पिंकी वह तीसरी फ़िल्म थी जिसकी हमने समीक्षा की थी। इस फ़िल्म में गोरों के नस्लभेद, वर्चस्वाद और उनके श्रेष्ठ होने के दावे को चुनौती पेश की गयी थी। यदि ज्ञान और तकनीक को शक्ति का एक कारण मान लिया जाए तो वर्ष 1949 में बनने वाली पिंकी नामक फ़िल्म में हम देखते हैं कि अश्वेत समाज में भी पढ़े लिखे लोग पैदा हुए और फ़िल्म की मुख्य हिरोइन अर्थात पिंकी एक दक्ष नर्स है किन्तु हालीवुड में पहले के दशकों में बनने वाली फ़िल्मों अर्थात दा बर्थ आफ़ ए नेशन और अंकल टाम्स कैबिन जैसी फ़िल्मों में पढ़े लिखे कालों को उचित नौकरी नहीं मिलती। अलबत्ता फ़िल्म पिंकी में भी दिखाया गया है कि काले लोगों का मानना है कि उनकी सफलताओं के पीछे गोरों का हाथ है या उनकी सहायताओं की वजह से वह सफल हुए हैं।

जिस चौथी फ़िल्म की हमने समीक्षा की थी वह थी गेस हूज़ कमिंग टू डिनर Guess Who's Coming to Dinner । यह फ़िल्म वर्ष 1967 में बनी थी और इसे कालों के नागरिक आंदोलन के अंतिम वर्षों में बनाया गया था। इस फ़िल्म में अमरीकी समाज की स्थिति को खुलकर बयान किया गया। इस फ़िल्म का अश्वेत , कालों के लिए आशा की नई किरणें पैदा करता है। यह एक विश्वसनीय डाक्टर है और एक श्वेत लड़की से विवाह करना चाहता है। यह ऐसा विषय था जो 1960 के दशक में अमरीकी समाज में स्वीकार्य नहीं था, सांस्कृतिक रोक थी और क़ानूनी पचड़े थे। इस फ़िल्म में काले और गोरे लोगों के बीच विवाह, दो जातियों को एक स्तर पर लाने का प्रयास था अर्थात यह फ़िल्म काले और गोरों दोनों को अमरीका के पहले दर्जे के नागरिक के रूप में पेश करने का प्रयास करती है और यह दिखाती है कि यह दोनों एक साथ जीवन व्यतीत कर सकत हैं।

 

वर्ष 1998 में बनने वाली फ़िल्म अमेरकन हिस्ट्री एक्स American History X में कालों की शक्ति में वृद्धि हुई। इस फ़िल्म में कालों और गोरों को लगभग एक समान शक्ति दी गयी है और एक जैसा बताया गया है। इस फ़िल्म में काले उग्र नहीं हैं बल्कि वह गोरों के विस्तारवाद और वर्चस्व के मुक़ाबले में डटे हुए हैं।  अमरीका के काले और गोरे युवाओं में पायी जाने वाली घृणा, उनकी तबाही और मौत का कारण बनती है। यूं कहा जाए कि फ़िल्म की कहानी यह है कि अमरीकी समाज को काले और गोरे के बीच संतुलन स्थापित करने और एक दूसरे को खुले दिल से स्वीकार करने की आवश्यकता है और यदि ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें भारी तबाही और बर्बादी का सामना करना पड़ेगा।

इस कार्यक्रम में हमने जिन दस फ़िल्मों की समीक्षा की थी उनमें से पांच फ़िल्में राष्ट्रपति बराक ओबामा के काल में बनी थीं। रोचक बात यह है कि इन फ़िल्मों में भी अमरीका के प्रशासनिक और अप्रशासनिक ढांचों में जातय भेदभाव की जड़ों को दिखाया गया है जबकि अमरीका के अश्वेत राष्ट्रपति भी इसे समाप्त करने और अमरीका के कालों की मांगों को आगे बढ़ाने में भी कुछ नहीं कर सके।

फ़िल्मों में भी कालों और गोरों के बीच मुक़ाबले बाज़ी की मिसाल अधिक हो गयी किन्तु अधिकतर फ़िल्मों में अंतिम फ़ैसला गोरों के हाथ में ही होता है। यहां तक कि उन फ़िल्मों में जिनमें काले अधिक शक्ति प्राप्त करते हैं वह गोरों की मदद से ही संभव होता है। उदाहरण स्वरूप  2009 में बनने वाली द ब्लाइंड स्पाट नामक फ़िल्म में कुछ गोरे लोगों द्वारा अपनी शक्ति के दुरुपयोग को दिखाया गया है और वह काले लोगों को कमज़ोर करते हैं ताकि अपना वर्चस्व स्थापित रख सकें और अपनी क्षमताओं से लाभ उठा सकें।

 

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म, उन फ़िल्मों से एक है जो अमरीका के वर्तमान समाज में अश्वेत लोगों के सामने मौजूद समस्याओं को बयान करती है। फ़िल्म की कहानी, गोरे अमरीकियों के नस्लभेदी विचार जो दासप्रथा की मीरास है, अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। अमरीकी समाज  ने अश्वेतों की अपने जीवन सुधारने में अधिक सहायता नहीं की। अमरीकी कालों के सामने सबसे बड़ी समस्या, एक इज़्ज़तदार काम पाना है किंतु इस प्रकार के काम उनके लिए सीमित हैं और काले मजबूर होकर ग़ैर क़ानूनी कामों की ओर चले जाते हैं। गोरे लोग, कालों को ग़ुडे और मुजरिम समझते हैं जबकि जब तक जुर्म साबित न हो कि वह मुजरिम नहीं होना। अमरीकी समाज की नागरिक और आर्थिक संस्थाओं द्वारा भेदभाव किए जाने के कारण वह अपने योग्य काम प्राप्त नहीं कर पाते।

फ़ुरूटवेल स्टेशन नामक फ़िल्म ने पूरी निष्ठा से अमरीका में अश्वेत लोगों के जीवन को खोलकर पेश किया है। यद्यपि आस्कर कभी कभी इस फ़िल्म में लड़कियों से छेड़छाड़ करता और उनको देखता है किन्तु The Birth of a Nation दा बर्थ आफ़ ए नेश्न की तरह इस फ़िल्म में हरकत नहीं करता।   

अमरीका में वर्ष 2013 में बनी द बटलर फ़िल्म में दिखाया गया है कि बीसवीं शताब्दी के मध्य या आरंभिक दशकों की तुलना में अमरीकी समाज के राजनैतिक व सामाजिक परिवर्तनों के आधार पर श्वेतों के मुक़ाबले में अश्वेत लोगों के प्रतिरोध या बर्ताव की शैली बदल गयी थी। इस संघर्ष में अश्वेतों लोगों की विभिन्न पीढ़ियों ने भाग लिया। फ़िल्म अमरीकी समाज में अश्वेत या कालों की भूमिका के बारे में बाप बेटे के विभिन्न और विरोधभासी दृष्टिकोणों को पेश करती है और यहां से एक नया बिन्दु सामने आता है। सिसियल के अनुसार जिसने सेवक का जीवन बिताया था, ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए कठिन परिश्रम करना और नर्म मांग पेश करना है। जबकि लुईस का मानना था कि संघर्ष और पार्टी बना कर अपनी मांगों को पूरा कराया जा सकता है। फ़िल्म कहती है कि अश्वेतों की समानता की मांग को परिणाम तक पहुंचाने के लिए दोनों ही प्रकार के बर्ताव ज़रूरी थे।

 

रोचक बात यह है कि हालीवुड की फ़िल्मों के इतिहास की समीक्षा करने से समझ में आता है कि हालिया वर्षों में हालीवुड में बनने वाली फ़िल्मों ने अतीत की तुलना में कालों के हितों और उनकी स्थिति को बेहतर बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया किन्तु सही अर्थों में वे हालीवुड में अश्वेत जगत की स्थिति को मजब़ूत करने में सफल नहीं हो सकीं। जैसा कि फ़िल्मों में दिखाया गया है कि अमरीका में सामाजिक स्तर पर कालों और गोरों में समानता नहीं पैदा हो सकी, काले लोग वर्चस्ववाद विरोधी और शक्ति का आधार समझे जाते हैं जो गोरों की व्यवस्था को गिराने के प्रयास में हैं जबकि गोरे शक्तिशाली और वर्चस्ववादी समझे जाते हैं जो कालों को समाज से निकालने और उनको एक ओर करने में लगे हुए हैं। यहां पर यह देखा जा सकता है कि सफ़ेद लोगों के वर्चस्व, भेदभाव और नस्लभेद के कारण अमरीकी समाज में अश्वेत लोग पीछे रह गये किन्तु अमरीकी समाज में भेदभाव के ढांचे के दृष्टिगत यह विषय बहुत तेज़ी से कम हुआ।

हालीवुड में भेदभाव की यह अंतिम कड़ी समाप्त होती है, आशा है कि आपको हालीवुड की फ़िल्मों की समीक्षा पर आधारित हमारा यह कार्यक्रम पसंद आया होगा। (AK)   

 

मई १५, २०१८ १२:१५ Asia/Kolkata
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