हमने दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी के लेखक और शायर तक़ीयुद्दीन अवहदी बलयानी के बारे में चर्चा की थी।

तक़ी मुहम्मद अवहदी दक्क़ाकी बलयानी काज़रूनी तीन मुहर्रम सन 973 हिजरी क़मरी को इस्फ़हान में जन्मे थे। बलयानी परिवार में सभी धार्मिक मूल्यों पर प्रतिबद्ध तथा परिज्ञान और सूफ़ीवाद में चरम पर थे।  अवहदी ने समय के प्रचलित ज्ञान 12 वर्ष की आयु तक हासिल किया और उसके बाद उच्च शिक्षा नैतिकता और दर्शनशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। अपने युवाकाल के कुछ भाग उन्होंने यज़्द और शीराज़ में बिताया और वहां शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने अपने समय के प्रसिद्ध धर्मगुरुओं और उस्तादों से शिक्षा ग्रहण की। यही समय था कि उन्होंने सूफ़ीवाद और इरफ़ान के मैदान में क़दम रखा। अवहदी को उस कविता के बाद जो उन्होंने अज़बकान पर शाह अब्बास की विजय के समय पढ़ी, शाह पसंद की उपाधि मिली। वर्ष 1014 हिजरी क़मरी में वह अपने मित्र के साथ भारत की यात्रा पर निकले।

अवहदी इस यात्रा के दौरान जिनमें फ़ारसी साहित्य के कुछ विद्वान और शायर भी साथ थे, शीराज़, किरमान और क़ंधार होते हुए लाहौर पहुंचे। उनके स्वर्गवास की सही तारीख़ पता नहीं है और केवल इतना पता है कि वर्ष 1038 हिजरी क़मरी और 1039 के वर्षों में वह जीवित थे। इससे पहले हमने आपको बताया था कि अवहदी की प्रसिद्ध पुस्तक तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन है जो शोधकर्ताओं के बीच एक सार्वजनिक उल्लेख के रूप में प्रसिद्ध है। यह किताब आठ खंडों पर आधारित है जिसमें फ़ारसी भाषा के लगभग तीन हज़ार पांच सौ शायरों और लेखकों की किताबों और शेरों का विवरण है।

तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक फ़ारसी भाषा के शायरों और लेखकों की जीवनी की सबसे महत्वपूर्ण और बड़ी पुस्तक है जिसमें फ़ारसी भाषा के आरंभ से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी अर्थात लेखक के काल तक के समस्त कवियों, शायरों और लेखकों की जीवनी वर्णित है। यूं कहा जा सकता है कि यह किताब फ़ारसी साहित्य का व्यापक और बेहतरीन शब्दकोष है। इस पुस्तक के लेखन की शैली पूर्ण रूप से एक समान नहीं है और इस पुस्तक के विभिन्न भागों में विस्तृत अंतर देखे जा सकते हैं। गद्य लिखने की दृष्टि लेहाज़ से उनकी शैली अलग ही है विशेषकर कवियों और शायरों की विशेषता बयान करते हुए उनके गद्य पद्य का रूप धारण कर लेते हैं।

तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन लिखने में तक़ीयुद्दीन अवहदी की शैली आलोचनात्मक है और कुछ जगहों पर उन्होंने विद्वानी दृष्टिकोण पेश किए हैं। उन्होंने पुस्तक लिखने में यथासंभव निष्पक्षता का ख़्याल रखा है। उन्होंने विभिन्न पुस्तकों के चुने हुए भागों को ही शामिल करने का प्रयास किया है। अवहदी ने दूसरों पर आरोप लगाने और बुरा कहने से परहेज़ किया है किन्तु अपना दृष्टिकोण बयान करते समय सच्चाई से भी परहेज़ नहीं किया है। उदाहरण स्वरूप मौलाना अली मुग़ानी की जीवनी बयान करते समय वह लिखते हैं कि वह पद्य में दक्ष थे विशेषकर क़सीदा कहने में, किन्तु वह असमान्य और बेकार के शब्द प्रयोग करते थे। वह मौलाना अम्र किरमानी के बारे में लिखते हैं कि उनके दीवान को जब मैंने देखा, उनके शेर सभी व्यवस्थित, सादा भाषा में और सही हैं।

तक़ीयुद्दीन ने अपनी पुस्तक तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन में शेरों का उल्लेख करने और अरबी उदाहरण देने से परहेज़ किया है किन्तु भूमिका में उन्होंने वचन दिया है कि यदि संभव हुआ तो वह अरब भाषी कवियों पर भी एक पुस्तक लिखेंगे । इसी प्रकार उन्होंने सूफ़ीवाद और आशेक़ाना शेरों को भी अपनी पुस्तक में जगह दी है।

 

तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक मूल्यवान पुस्तक, साहित्यिक लाभ के अलावा उसके अनुवाद के महत्व तथा शायरों की जीवन और अन्य फ़ायदे पर भी बल देती है। इस पुस्तक के अध्ययन से भारत और ईरान में सफ़वी काल की सामाजिक स्थिति, जीवन शैली, रीति रिवाज और साहित्य के वास्तविक चेहरे को देखा जा सकता है। अवहदी की तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन पुस्तक, उन महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है जो स्पष्ट रूप से पाठकों के सामने सफ़वी काल के साहित्यिक जीवन को पेश करती है। इसके अलावा अवहदी ने इस्फ़हान के उन शायरों और उन मोहल्लों के बारे में भी लिखा है जिनके बारे में सूत्रों में बहुत कम ही मिलता है या उनके बारे में बात ही नहीं की गयी है।

बहुत से शोधकर्ताओं का मानना है कि इस काल में सामाजिक और साहित्य स्थिति पर शोध इस मूल्यवान पुस्तक के अध्ययन के बिना अधूरा है। इस पुस्तक में बहुत सी ऐतिहासिक कहानियां और इशारे बयान किए गये हैं। इन्हीं ऐतिहासिक इशारों में नुक़तवियों से शाह अब्बास का युद्ध भी है। वह कुछ स्थानों पर इसी संदर्भ में मुहम्मद बाक़िर ख़ेदह काशानी की जीवनी जो स्वयं को इस गुट का अनुसरणकर्ता कहता था और शाह अब्बास सफ़वी के हाथों उसके गुट के जनसंहार की ओर इशारा करते हैं।

इस्फ़हान विश्व विद्यालय के प्रोफ़ेसर डाक्टर शफ़ीईयून का कहना है कि बावजूद इसके कि इस्फ़हान, ख़ुरासान और इराक़ के बहुत से क्षेत्रों से जहां फ़ारसी बोली जाती थी, बहुत समय बाद फ़ारसी साहित्य का विशेषकर गद्य में गढ़ बना, सफ़वी काल में और उनके एक शताब्दी बाद, फ़ारसी शेर का ध्वजवाहक था, उसने बहुत से साहित्यिक गुटों को पैदा किया और उनका नेतृत्व किया।  उनका मानना था कि इन शेरों की साहित्य की दृष्टि से विश्वसनीयता की अनदेखी करते हुए मंगोलों के पहले के काल की तुलना में किसी में भी यह साहस नहीं था कि कहे कि किसी भी काल में इस प्रकार के शेर लोगों के आम जीवन में प्रविष्ट नहीं हुए। सौभाग्य से इस संबंध में हम तक बहुत से ऐतिहासिक प्रमाण और साहित्यिक किताबें पहुंची हैं। पहली किताब जिसके लेखक ने बहुत ही निपुणता और दक्षता से बातों को बयान किया है वह तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक मूल्यवान पुस्तक है।

अपनी किताबों और स्रोतों के आधार पर अवहदी का यह मानना थ कि कुछ शायर मध्यम वर्ग के थे किन्तु उनके शेर बाद वालों की सूचि में हैं और सैद्धांतिक रूप से अवहदी से पहले शायरों को आरंभिक, मध्य युग और बाद के काल के शायरों में विभाजित नहीं किया गया।

तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक मूल्यवान पुस्तक, अपनी व्यापकता और विस्तार की दृष्टि से अपने समय तक अद्वितीय है और अब भी यह किताब फ़ारसी भाषा की दो तीन व्यापक और समग्र किताबों में गिनी जाती है। जब यह यह पुस्तक लिखी गयी है तब से यह लोगों के ध्यान का केन्द्र रही है। पहली बार मुल्ला क़ातेयी हेरवी ने जो इस पुस्तक के समकालीन थे, जहांगीर के दरबारी शायरों की जीवनी लिखी और उसी समय 103 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, उन्होंने अवहदी का उल्लेख किया। उनका कहना था कि तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक, बहुत ही अच्छी और महत्वपूर्ण पुस्तक है किन्तु इसको ख्याति नहीं मिली किन्तु यह याद रखना चाहिए कि हेरवी का वर्ष 1024 क़मरी में अर्कथात तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक के पूरा होने से पहले ही निधन हो गया था और इस किताब के बारे में उनका दृष्टिकोण उनके निधन के कई वर्ष बाद सामने आया। स्पष्ट सी बात है कि इतने व्यापक विषय के साथ एक किताब, पूरी तरह लिखे जाने और पूरी होने से पहले अपनी वास्तविक प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सके किन्तु ईरान और पूरब के विशेषज्ञों जिन्होंने ईरान के साहित्य पर शोध किया है, कार्ल हरमन एता के मतानुसार उन्हें वर्षों तक तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक के बारे में पता ही नहीं था और इसका कारण शायद यह होगा कि उसकी प्रतियां कम थी और लंबी किताब होने के कारण इसको पुनः लिखने में बहुत कठिनाइयां पैदा हुईं।

तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक से तक़ीयुद्दीन अवहदी के बाद भी बहुत से लेखकों और जीवनी लिखने वालों ने लाभ उठाया। पहली बार दाग़िस्तान के गवर्नर अली क़ुली ख़ान ने रियाज़ुश्शोरा नामक पुस्तक लिखने के लिए उससे लाभ उठाया और इस पुस्तक की व्यापकता के दृष्टिगत इस किताब में वर्णित कुछ शायरों की जीवनी को उन्होंने वैसा ही अपनी पुस्तक में उल्लेख कर दिया। उनके बाद रज़ा क़ुली ख़ान हिदायत ने जिनके पास केवल तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक का हस्तलिखित नुस्ख़ा था, मजमउल फ़ुसहा और रियाज़ुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक लिखने में इससे भरपूर लाभ उठाया किन्तु उन्होंने भी अली क़ुली ख़ान की भांति यह उल्लेख नहीं किया कि उन्होंने यह बात किस स्रोत से लिखी है। इन लोगों के बाद आफ़ताब राय लखनवी ने भी जिन्होंने वर्ष 1300 क़मरी में रियाज़ुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक लिखी, अवहदी की पुस्तक से भरपूर लाभ उठाया और कई स्थानों पर उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि उन्होंने यह बात तज़केरा तज़केरा अरफ़ातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफ़ीन नामक पुस्तक से लिखी है। वर्तमान समय में भी अहमद गुलचीन मुग़ानी और उसके बाद ज़बीहुल्लाह सफ़ा ने भी अवहदी की पुस्तक से भरपूर लाभ उठाया है। (AK)   

 

 

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मई २१, २०१८ १५:०९ Asia/Kolkata
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