पवित्र रमज़ान का महीना अपनी बरकतों और विभूतियों के साथ जारी है।

सलाम हो हे सबसे अच्छे दिन और सबसे अच्छी रातें और घड़ियां, सलाम हो उस महीने पर जिसमें समस्त पाप माफ़ कर दिए जाते हैं। सलाम हो उस साथी जो महान है और उसका उच्च स्थान है। इसका गुज़र जाना बहुत दुखद था, सलाम हो उस महीने पर जो अपने बंदों के कल्याण का कारण बनता है, सलाम हो उस महीने पर जो अपने बंदों को कृपा और दया की शुभ सूचना देता है। सलाम हो उस महीने पर जिसमें बंदा अपने दिल की बात ईश्वर से बयान करता है और अपनी परिपूर्णता की प्राप्ति की दुआ करता है।

दुआ कभी उस चीज़ के लिए होती है जिसकी दुआ करने वालों को आवश्यकता होती है या वह चीज़ जो उसके पास न हो। कभी कभी दुआ इस चरण से भी आगे की होती है। यद्यपि प्रेम को आत्मा की एक आवश्यकता कहा जा सकता है किन्तु इसलिए कि यह स्वयं एक स्वतंत्र आवश्यकता है। यह मनुष्य की आत्मा के भीतर छिपी एक प्रवृत्ति है और मनुष्य जीवन में हर चीज़ से अधिक इसकी उपियोगिता है।  वह दुआएं जो प्रेमी के दिल से निकलती हैं सबसे अच्छी और बड़ी दुआएं हैं।

पवित्र रमज़ान में पढ़ी जाने वाली सबसे सुन्दर और अच्छी दुआ, इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की वह दुआ है जो सहीफ़ए सज्जादिया में वर्णित है। सहीफ़ए सज्जादिया, दुआ करने वालों और ईश्वर से अपने दिल की बात कहने वालों का श्रंगार है।  इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम अपनी दुआओं में जिसमें वह सिखाते हैं कि दुआ इस अर्थ में नहीं है कि हमें जो कुछ प्राप्त हुआ है, इस लिए है कि उसको अपनी बौद्धिक और मानवीय ज़िम्मेदारियों का उतराधिकारी बना दें। इस्लामी संस्कृति में दुआ, संसार और मानवीय आवश्यकताओं के प्रति जागरूकता है और इसी प्रकार ईश्वरीय शक्ति से जुड़ने का बेहतरीन रास्ता है। इसीलिए इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की समस्त दुआओं में ईश्वर की प्रशंसा और उसकी सराहना है। यह दुआएं व्यक्तिगत और सामाजिक शिष्टाचार के बेहतरीन और उच्च विषयों को शामिल किए हुए हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने वर्तमान स्थिति को दृष्टि में रखते हुए शीया मुसलमानों की शुद्ध शिक्षाओं को दुआओं की परिधि में बयान किया। वास्तव में यह किताब ईश्वर से इंसान, स्वयं और दूसरों से संपर्क पर बल देती है।

सहीफ़ए सज्जादिया वास्तव में उस परिपूर्ण मनुष्य की बातों का प्रतीक है जो दुआ और बातचीत के रूप में ईश्वर के दरबार में पेश की जाती हैं। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने लोगों को यह बताया कि किस प्रकार एकांत में ईश्वर से दुआ करे और उसके दरबार में किस प्रकार गिड़गिड़ाए कि उसकी दुआ स्वीकार कर ली जाए। पवित्र रमज़ान में की जाने वाली महत्वपूर्ण दुआओं में से एक सहीफ़ए सज्जादिया की रमज़ान की विशेष दुआ है। पवित्र रमज़ान का चांद देखते ही हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम दुआओं और उपासनाओं का क्रम शुरु कर देते थे और रज़मान की विभूतियों और उसकी अनुकंपाओं को याद करत थे। जब पवित्र रमज़ान का महीना ख़त्म होने लगता था तब भी उसकी विदा के लिए विशेष दुआएं पढ़ते थे और ईश्वर का बहुत अधिक स्मरण करते थे।

हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम सहीफ़ए सज्जादिया में पवित्र रमज़ान के बारे में दो दुआएं बयान करते हैं जिसको पढ़ना रमज़ान के महीने में बहुत लाभदायक है। इस दुआ में इस महीने में रोज़दारों की ज़िम्मेदारियों और इस महीने के गुणों को बयान किया गया है। मनुष्य इन दुआओं द्वारा समझ जाता है कि वह पवित्र रमज़ान की किन विभूतियों से संपन्न है और रमज़ान के महीने के समाप्त होते ही ईश्वर की मेहमानी का दस्तरख़ान उठा लिया जाता है और जिन लोगों ने इस महीने का ख्याल नहीं रखा और इस अवसर से लाभ नहीं उठाया उन्होंने कितना नुक़सान उठाया।

पवित्र रमज़ान उन महीनों में से है जिसमें आम तौर पर सभी लोग उपासना और ईश्वर की इबादत में व्यस्त होते हैं। इस महीने में अल्लाह के मोमिन बंदे, व्यापारिक, सामाजिक और आसपास के विभिन्न प्रकार के माहौल में उपासना और अनुसरण के लिए अधिक प्रयास करते हैं और सुबह के समय पवित्र क़ुरआन के सूरए सजदा की आयत संख्या 16 पर अमल करते है जिसमें कहा गया है कि उनके शरीर बिस्तर से अलग रहते हैं और वे अपने ईश्वर को भय और लोगों के आधार पर पुकारते रहते हैं और हमारे दी हुई आजीविका को हमारी राह में ख़र्च करते रहते हैं। इसी प्रकार इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम पवित्र रमज़ान के महीने का चांद देखने के बाद अपनी दुआ में फ़रमाते हैं कि ख़ुदा का शुक्र कि उसनें हमें अपनी प्रशंसा का शुभ अवसर प्रदान किया। हम उसकी नेमतों को भूले नहीं हैं और उसकी हम्द और उसका आभार व्यक्त करते हैं। उसनें हमारे लिये ऐसे रास्ते खोले हैं जिनके द्वारा हम उसकी हम्द कर सकें और उन रास्तों पर चल सकें।

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हे पवित्र रमज़ान ईश्वर ने तुझे नये काम के लिए नये महीने की चाभी क़रार दिया है। उस ईश्वर से जो मेरा और तेरा पालनहार है, मेरा और तेरा सृष्टिकर्ता है, मेरा और तेरा भाग्य निर्धारित करने वाला है, मुझे और तुझे रूप प्रदान करने वाला है, चाहता हूं कि तुझे बरकतों का महीना क़रार दूं और उसकी विभूतियों से आजीविका कम न हो।

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम दुआ क्रमांक 44 में पवित्र रमज़ान की विशेषताओं को इस प्रकार बयान करते हैं। रमज़ान का महीना रोज़ों का महीना है, यह इस्लाम का महीना है। यह रोज़ों का महीना है अर्थात रोज़े द्वारा दिल और आत्मा को शुद्ध करने का महीना है, क्योंकि रोज़े द्वारा इन्सान भूख, प्यास और दूसरी चीज़ों से लड़ता है। इस्लाम का महीना है अर्थात ख़ुदा के सामने समर्पित हो जाने का महीना है। रोज़े में भी इन्सान को भूख और प्यास लगती है लेकिन कुछ खाता पीता नहीं है क्योंकि ख़ुदा के सामने समर्पित है, बहुत से वैध काम जो ख़ुदा ने छोड़ने को कहे हैं, छोड़ देता है। आम दिनों में इस तरह इन्सान ख़ुदा के सामने समर्पित नहीं होता, जिस तरह रमज़ान में होता है। दूसरे दिनों में शायद इस तरह से आज्ञा पालन नहीं करता जिस तरह इस महीने में करता है, इसी लिये इसे इस्लाम का महीना कहा गया है।

इंसान इस महीने में ईश्वरीय परिपूर्णता का मार्ग प्राप्त कर सकता है। वास्तव में रमज़ान का महीना वह महीना है जिसमें मनुष्य उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है क्योंकि यह हालात हमेशा उपलब्ध नहीं होते। इस प्रकार से इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम दुआ के द्वारा मोमिनों को कुछ निर्देश देते हैं। वह कहते हैं कि हे मेरे पालनहार मुझे यह क्षमता दे कि मैं इस महीने में नेकी व भलाई से अपने रिश्तेदारों का ध्यान रखूं, क्षमा याचना द्वारा पड़ोसियों के ख़्याल रखूं, लोगों के अधिकारों से अपनी संपत्ति को पाक करूं, ज़कात निकाल कर उसे पवित्र करूं, जो लोग मुझसे दूर हो गये हों उनसे सुलह करूं, जिन लोगों ने मुझपर अत्याचार किए हैं, इंसाफ़ के तक़ाज़े के अनुसार उनसे बर्ताव करूं, जिन लोगों ने मुझसे दुश्मनी की हो उससे सुलह करूं, किन्तु जिससे तेरी राह में और तेरे लिए उससे दुश्मनी की, वह तो दुश्मन है और उससे दोस्ती नहीं करूंगा, वह उन लोगों से है जिसमें मैं ढल नहीं सकता।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने पवित्र रमज़ान को जीवन के बेहतरीन दिन बताते हुए कहा कि सलाम हो कालों के बीच सबसे प्रतिष्ठित साथी पर, मेरी ज़िंदगी के दिनों और घंटों के सबसे बेहतरीन महीने। इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर इंसान के सभी काम के लिए एक समय होता है। इसी बीच मोमिन लोग अपने समय से अधिक लाभ उठाते हैं और कुछ काल को अपने शिष्टाचार को बेहतर बनाने के लिए बेहतरीन अवसर समझते हैं और इन अवसरों से भरपूर लाभ उठाकर उसे अपने जीवन का यादगार लमहा बना लेते हैं। इसीलिए कुछ समय लोगों से संपर्क और उनसे बात करने स्वर्णिम अवसर होते हैं जिसमें मनुष्य के लिए निर्णायक परिणाम सामने आते हैं। कालों की आत्माके रूप में पवित्र रमज़ान का महीना, मनुष्य की अध्यात्मिक परिपूर्णता में निर्णायक भूमिका अदा करता है। इसकी रातें और दिन और इसके हर क्षण, मनुष्य को अपने महबूब की सुन्दरता का दर्शन कराने के लिए आसमान की सैर कराते हैं। इसीलिए इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम इस पवित्र महीने को अपनी उम्र का सबसे बेहतरीन समय और सबसे अच्छा साथी क़रार देते हैं और उससे जुदा होते समय उससे लाड प्यार करते हैं और उसकी विभूतियों के बारे में बातें करते हैं। इस प्रकार से उन्होंने पवित्र रमज़ान में छिपी अनुकंपाओं को दूसरों के सामने खोला है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की दुआ के दूसरे भाग में आया है कि सलाम हो तुम पर, मुझसे कितनी बूराईयों को दूर कर दिया, कितनी ज़्यादा विभूतियां और अनुकंपाएं इसकी छत्रछाया में मुझपर बरसीं। दुआ के इस भाग में इमाम ज़ैनुल आबेबदीन अलैहिस्सलाम पवित्र रमज़ान को बुराईयों से दूर रहने का कारक बताते हैं जबकि दूसरी ओर इसको विभूतियों की बारिश का कारण बताते हैं।

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम पवित्र रमज़ान के अंतिम दिनों में दुआ संख्या 45 में बहुत दुखी लहजे में कहते हैं कि हमारे बीच पवित्र रमज़ान का महीना है, ईश्वरीय प्रशंसा का महीना है क्योंकि यह अपने साथ विभूतियां और अनुकंपाएं लाया है और हमारे लिए बहुत सारी ख़ूबिया उपहार स्वरूप लाया है। हम इस महीने की छत्रछाया में विभूतियों और अनुकंपाओं तक पहुंचे, ऐसा दोस्त था जो अपने साथ क्षमा, दया और अनुकंपाए लाया। रमज़ान का मुबारक महीना शुरू होने से पहले रसूले अकरम स. लोगों को इस महीने के लिये तैयार करते थे। रसूलुल्लाह (स) का एक ख़ुतबा है जिसे ख़ुतबए शाबानिया कहते हैं, इसमें इस तरह आया हैः रमजान का महीना तुम्हारी ओर अपनी बरकत और रहमत के साथ आ रहा है। जिसमें पाप माफ़ होते हैं, यह महीना ईश्वर के यहां सारे महीनों से बेहतर और श्रेष्ठ है। जिसके दिन दूसरे महीनों के दिनों से बेहतर, जिसकी रातें दूसरे महीनों की रातों से बेहतर और जिसकी घड़ियां दूसरे महीनों की घड़ियों से बेहतर हैं। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम पवित्र रमज़ान के विदा होने पर दुखी लहजे में कहते हैं कि सलाम हो तुम पर कि तुम्हारी विदाई से परेशान नहीं होता, तुम्हारा रोज़ा छोड़ने से थकन और दुख नहीं होता, सलाम हो तुम पर कि तुम्हारे आने से पहले, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में था और तुम्हारे जाने से मुझे दुख हो रहा है। (AK)

 

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मई २७, २०१८ ११:४५ Asia/Kolkata
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