शताब्दियां पहले वर्ष 224 हिजरी क़मरी में ईरान के उत्तर में स्थित आमुल शहर में एक बच्चे ने जन्म लिया और ईश्वर ने उसके भाग्य में लिख दिया था कि वह इस्लामी जगत का पहला महान इतिहासकार व पवित्र क़ुरआन का व्याख्याकार बनेगा।

इस बच्चे का नाम अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर तबरी था। ऐसा प्राचीनतम स्रोत जिसमें तबरी के बारे में पूर्ण सूचना मिल सकती है, वह इब्ने नदीम की पुस्तक अलफ़ेहरिस्त है जो वर्ष 377 हिजरी क़मरी में तबरी के निधन के 67 वर्ष बाद लिखी गयी। इब्ने नदीम ने अपनी किताब में मुहम्मद बिन जरीर तबरी की संक्षिप्त जीवनी बयान करते हुए उनके धर्मशास्त्र के बहुत से प्रसिद्ध अनुयायियों और शिष्यों के नाम और उनकी किताबों को भी बयान किया है।

मुहम्मद बिन जरीर तबरी, एक योग्य व मेधावी व्यक्ति थे जिनका उदाहरण मनुष्यों में बहुत ही कम मिलता है। वह हमेशा ज्ञान व शिक्षा को पसंद करते थे और उन्होंने अपनी पूरी उम्र ज्ञान की प्राप्ति और शिष्यों के प्रशिक्षण में व्यतीत कर दिया। यहां तक कि ज्ञान की प्राप्ति में बाधा न पैदा हो इसीलिए उन्होंने विवाह तक नहीं किया। तबरी अपनी दक्षता और ज्ञान में स्वयं के चरम पर पहुंचने के बारे में कहते हैं कि मैंने सात साल की आयु में पवित्र क़ुरआन याद करना शुरु दिया और आठ वर्ष की आयु में मैं इमामे जमाअत हो गया और लोगों को नमाज़ पढ़ाया करता था और नौ वर्ष की आयु में मैंने हदीस लिखना शुरु किया, उसके बाद वह कहते हैं कि मेरे पिता ने एक सपना देखा जिसके बाद बचपन से ही उन्होंने मेरी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया।

मुहम्मद बिन जरीर तबरी ने 12 वर्ष तक अपने जन्म स्थल में आरंभिक ज्ञान प्राप्त और 12 वर्ष की आयु के बाद वह पिता के कहने पर उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त करने के लिए यात्रा पर निकल गये और उन्होंने अपनी पहली यात्रा रय की की।

 

उस समय रय शहर ईरान के बड़े शहरों में से एक समझ जाता था और ईरान के दूसरे शहरों से लोग वहां उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। रय शहर में उन्होंने मुहम्मद बिन हमीद राज़ी से हदीस का ज्ञान प्राप्त किया और पैग़म्बरे इस्लाम के युद्धों का इतिहास जिन्हें ग़ज़वा कहा जाता है, मुहम्मद बिन इस्हाक़ वाक़ेदी से सीखा। तबरी ज्ञान प्राप्ति की अपनी भावना व लगन के बारे में कहते हैं कि मैंने अहमद बिन हम्माद दुलाबी के निकट इतिहास पढ़ा और हर दिन इस काम के लिए शहरे रय से अहमद साहब के पास जाता था जो रय शहर के पास स्थित एक गांव में रहते थे, उसके तुरंत बाद मैं रय शहर वापस आता था, पागलों की तरह मुहम्मद बिन हमीद राज़ी की सेवा में उपस्थित होकर हदीस पढ़ता था।

 

तबरी अबु अब्दुल्लाह अहमद बिन हंबल से ज्ञान प्राप्त करने के लिए रय शहर से बग़दाद के लिए रवाना होते हैं किन्तु जब वह बग़दाद पहुंचते हैं उससे कुछ दिन पहले ही अहमद बिन हंबल का स्वर्गवास हो चुका होता है। तबरी बग़दाद से वासित शहर जाते हैं, वासित शहर बसरा और कूफ़ा के बीच में स्थित है, वहां पहुंच कर उन्होंने हदीस की शिक्षा अबू करीब मुहम्मद बिन अला हमदानी जैसे प्रसिद्ध धर्मगुरुओं से ज्ञान प्राप्त किया और उसके बाद बग़दाद लौट गये । उसके बाद से वह एक फ़क़ीह के रूप में फ़त्वा देने लगे।

ज्ञान प्राप्ति करने की उनकी ललक बग़दाद में भी शांत नहीं हुई और वह कुछ समय तक मेसोपोटामिया में रहने के बाद, ज्ञानियों की तलाश में मिस्र चले गये। उन्होंने इस यात्रा के दौरान सीरिया और बैरूत के रास्ते से गुज़रे तथा 253 क़मरी में अहमद बिन तूलून के शासन काल में मिस्र पहुंच और मिस्र में तीन वर्ष तक रहे और मिस्रा के फ़ुस्तात शहर में वहां के कुछ प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों की शिष्य बने और उनसे ज्ञान प्राप्त किया और उन्होंने अनस बिन मालिक, शाफ़ेई और इब्ने वहब से बहुत ही हदीसें नक़ल कीं।

तबरी अपनी बहुत सी यात्राओं के दौरान, अपने काल से पहले के ऐसे यात्रा वृतांतों का अध्ययन करते थे जिनमें इतिहास और भूगोल का वर्णन होता था। इसी प्रकार उन्होंने अपनी यात्राओं के दौरान इस्लामी जगत के विभिन्न प्रकार के जीवनी लिखने वालों से मुलाक़ात की और उनसे बहुत अधिक सूचनाएं प्राप्त कीं। वह तीन साल मिस्र में रहने के बाद सीरिया के रास्ते बग़दाद गये और उसके बाद बहुत कम समय के लिए अपने देश तबरिस्तान गये और वर्ष 290 हिजरी क़मरी में आमुल लौटे। तबरी ने जब आमुल के माहौल को अपने ज्ञान के लिए उचित नहीं समझा तो उन्होंने एक बार फिर अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया और बग़दाद के लिए रवाना हो गये। बग़दाद पहुंचने पर वह रहिया याक़ूब मोहल्ले में रहे और अपने अध्ययन का क्रम जारी रखा।

तबरी ने बग़दाद में फ़िक़्ह, इतिहास और हदीस के क्षेत्र में अपने ज्ञान को पूरा करने के साथ ही बहुत से शिष्यों का प्रशिक्षण किया और जब वह बग़दाद के क़न्तरा बरदान मोहल्ले में रहते थे तो उन्होंने अरबी भाषा में अपना इतिहास लिखना शुरु किया और तारीख़े तबरी के नाम से प्रसिद्ध पुस्तक तारीख़े रूसुल व अल मुलूक लिखना शुरु किया। वह प्रतिदिन अपनी पुस्तक के चालीस पृष्ठ लिखते थे और लगभग चालीस वर्ष में उन्होंने तारीख़े तबरी नामक पुस्तक लिखकर पूरी कर दी। उन्होंने 48 वर्ष की आयु में अपनी यात्रा वृतांत के नुस्ख़ों को एकत्रित करना शुरु किया और 65 वर्ष की आयु तक निरंतर प्रयास द्वारा 23 वर्ष की अवधि में बिखरे हुए नुस्ख़ों को एकत्रित किया और मृत्यु से पहले उन्होंने अपनी यात्रा वृतांत को पूरा कर दिया। तबरी ने अपनी इतिहास की किताब पूरी करने के साथ अब्बासी शासक मुकतफ़ा की इच्छा से वक्फ़ के बारे में एक पुस्तक लिखी जिसमें उस काल तक के समस्त मुख्य और चयनित धर्म गुरुओं की वक़्फ़ के बारे में राय लखी हुई थी। इसी प्रकार उन्होंने अलफ़ज़ाएल नामक पुस्तक लिखी जिसमें इस्लामी जगत के चारों खलीफ़ा अर्थात ख़ोलफ़ाए राशेदीन की जीवनी और हदीसे ग़दीर को सिद्ध किया गया है, इस पुस्तक को उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के गुण और उनकी विशेषताओं के बयान के साथ पूरी की। तबरी ने अपनी मूल्यवान उम्र के दौरान पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की जिसका नाम है जामेउल बयान अन तावीलुल क़ुरआन।

 

प्रसिद्ध लेखक, इतिहासकार और तबरी के समकालीन बुद्धिजीवियों का मानना था कि व ज्ञान की प्राप्ति के साथ सत्य के बचाव में कभी पीछे नहीं रहे और वह कभी भी दूसरों की वजह से सत्य और सत्यता से दूर नहीं हुए। वह न तो किसी से डरते थे और न ही स्थान व किसी से निकटता के प्रयास में रहते थे, यही कारण था कि उनको जलने वालों और ज्ञान का दावा करने वालों की ओर से बहुत ही कठिनाईयो का सामना करना पड़ा किन्तु उनके काल के ईश्वरीय भय रखने वालों, धर्मावलंबियों और ज्ञानियों ने हमेशा उनके गुण गाए हैं। उन्होंने पूरी उम्र उस ज़मीन के छोटे से टुकड़े की आय से प्राप्त होने वाली आमदनी पर बिता दी जो उनके पिता से उनको मिली थी। उन्होंने कभी सरकारी पद स्वीकार नहीं किया।

मलिकुश्शोरा बहार मुहम्मद बिन जरीर तबरी की नैतिक विशेषता के बारे में कहते हैं कि तबरी, उस नैतिकता से हमेशा दूर रहते थे जो बुद्धिजीवियों के लाएक़ न हो, निधन के दिन तक उनकी उपासना, ईश्वरीय भय और उनकी आवश्यकता मुक्ति में विघ्न उत्पन्न नहीं हुआ वह परिपूर्णता, नैतिकता, ईश्वरीय भय और उपासना के चरम पर थे, वह बहुत संवेदनशील स्वभाव वाले व्यक्ति थे, वह जलने वालों और उन गुटों से जो उन पर बिदअत अर्थात धर्म में नई चीज़ शामिल करने का आरोप लगाते थे, बहुत दुखी होते थे और मृत्यु के समय किसी ने गुरु से कहा कि बुरा भला कहने वालों और दुश्मनों को माफ़ कर दें तो उन्होंने कहा कि मैं सबको माफ़ कर दूंगा केवल उन लोगों को जिन्होंने उन पर बिदअत का आरोप लगाया है।

मुहम्मद बिन जरीर तबरी के धर्म के बारे में विभिन्न दृष्टिकोण पाए जाते हैं। कुछ लोग उन्हें तबरिस्तान का रहने वला मानते हैं और शीया कहते हैं जबकि कुछ उनको सुन्नी समुदाय का मानते हैं किन्तु उनकी किताबों और उनके साथ रहने वाले बुद्धिजीवियों की बातों से पता चलता है कि तबरी, इजतेहाद के दर्जे पर पहुंचने और फ़क़ीह बनने के बाद तक वह अपने समय के प्रचलित धर्मशास्त्र के पंथ पर चलते थे और उन्होंने स्वतंत्र धर्मशास्त्र के एक पंथ का आधार रखा जो जरीरी के पंथ के नाम से प्रसिद्ध है। इब्ने नदीम ने किताब अलफ़ेहरिस्त और इसी प्रकार तराजिम और अहवाल नामक पुस्तक में जरीरी पंथ पर चलने वाले बहुत से बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं के नामों का उल्लेख किया है।

अबू जाफ़र मुहम्मद बिन ज़रीर तबरी का शनिवार 26 शव्वाल वर्ष 310 हिजरी क़मरी में बग़दाद में निधन हो गया। उन्हों उन्ही के घर में दफ़्न कर दिया गया। इब्ने असीर, तबरी के निधन के पूरे इतिहास के बारे में लिखते हैं कि जैसे ही उनकी आंखें बंद हुईं, तो लोगों ने दिन के उजाले में उनको दफ़्न किए जाने का विरोध किया और कहा कि वह काफ़िर और राफ़ेज़ी हैं, यह द्वेषपूर्ण कार्यवाही अहमद बिन हंबल के अनुयायियों की ओर से उनके उकसावे के कारण थी, इस दुश्मनी का कारण भी यह था कि तबरी ने धर्मशास्त्रियों के बीच मतभेद नामक पुस्तक लखी और उस किताब में प्रसिद्ध धर्मशास्तियों के दृष्टिकोण और उनकी राय बयान की किन्तु अहमद इब्ने हंबल का उल्लेख नहीं किया, क्योंकि इसका कारण उन्होंने यह बयान किया कि अहमद इब्ने हंबल फ़क़ीह नहीं बल्कि मुहद्दिस थे, यह बात इब्ने हंबल के उनके शिष्यों को बहुत बुरी लगी और वह तबरी से दुश्मनी करने लगे और उन्हें परेशान करने लगे, क्योंकि उस समय हंबली मत के मानने वालों की संख्या बग़दाद में बहुत अधिक थी और वह जो चाहते थे तबरी के बारे में कहते थे और उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही करते थे। (AK)

 

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मई २७, २०१८ १५:२६ Asia/Kolkata
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