हमने बताया था कि प्रसिद्ध इतिहासकार और क़ुरआने मजीद  के समीक्षक अबू जाफर मुहम्मद बिन तबरी सन 224 हिजरी क़मरी में उत्तरी ईरान के आमुल नगर में जन्मे थे और चूंकि वह अत्याधिक तेज़ दिमाग़ के स्वामी थे इस लिए जल्दी ही आरंभिक शिक्षा इसी नगर में पूरी कर ली और मात्र 12 साल की आयु में अपने पिता के प्रोत्साहन के बाद आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने नगर से निकल गये।

रैय, बगदाद, सीरिया, मिस्र वह नगर और देश हैं जहां तबरी शिक्षा प्राप्ति के लिए रहे और वहां के बुद्धिजीवियों से दर्शनशास्त्र, इस्लामी नियम और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों की शिक्षा प्राप्त की और अन्ततः बगदाद को अपना ठिकाना चुना और जीवन की अंतिम सांस तक इसी नगर में रहे। तबरी ने बग़दाद में अपने आवास के दौरान, जहां एक ओर इस्लामी नियमों, इतिहास और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया वहीं दूसरी ओर शिष्य भी बनाए और इसके साथ ही इतिहास और क़ुरआने मजीद की समीक्षा के विषय पर कई किताबें भी लिखीं। अबू जाफर मुहम्मद बिन जरीर तबरी का , 26 शव्वाल सन 310 हिजरी क़मरी को शनिवार के दिन बगदाद में निधन हो गया और उन्हें रविवार को उनके घर में दफ्न कर दिया गया।

अबू जाफर मुहम्मद बिन जरीर बिन यज़ीद तबरी, प्रसिद्ध इस्लामी इतिहासकार हैं। उनका मुख्य विषय " फ़िक़्ह" अर्थात इस्लामी नियमों  की जानकारी थी और इसी विषय में उन्हें सब से अधिक ख्याति प्राप्त हुई क्योंकि " इब्ने नदीम " ने अपनी किताब " अलफेहरिस्त " में उनका उल्लेख मालिक, शाफेई और दाऊद बिन अली जैसे बड़े फक़ीह व ज्ञानियों के साथ किया है लेकिन इतिहास के अध्याय में उनका उल्लेख नहीं किया।

 

 

तहज़ीबुल आसार नामक किताब , मुहम्मद बिन जरीर तबरी की एक रचना है जिसमें उन्होंने विभिन्न प्रकार के विचारों का उल्लेख किया है और उन पर चर्चा की है और इसी चर्चा के दौरान उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि इस क्षेत्र में वह खास विचारधारा रखते हैं। कुछ विषयों में तो उन्होंने शिया मुसलमानों की विचारधारा को अपनाया है और यही वजह है कि कुछ लोग उन्हें शिया भी कहते हैं। तबरी की नज़र अपने काल में चर्चा का विषय बनने वाले मुद्दों पर भी रहती थी यही वजह है कि जब उन्होंने सुना कि कुछ लोग, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के उत्तराधिकारी बताने वाले कथन " हदीसे ग़दीर" का इन्कार करते हैं तो उन्होंने इस विषय पर एक मोटी किताब लिख डाली। इस किताब को ज़हबी जैसे बहुत से सुन्नी बुद्धिजीवियों ने भी देखा । ज़हबी ने बताया है कि यह किताबे काफी मोटी है।

 

तबरी एसे काल में थे जब इस्लामी सभ्यता के पास अपनी शक्ति व प्रभाव व उपयोगिता के प्रदर्शन का पूरा अवसर था। यह वह समय था जब इस्लामी शासन के अधीन दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में हज़ारों इस्लामी बुद्धिजीवी और विद्वान विभिन्न विषयों में शिक्षा व दीक्षा में व्यस्त और यही काल था जिसके आधार, इस्लामी सभ्यता के स्वर्णिम युग की रचना हुई है। इस काल में जिन विषयों पर बहुत ध्यान दिया गया उनमें पैगम्बरे इस्लाम के कथनों अर्थात " हदीस" का ज्ञान था क्योंकि यह वही ज्ञान था जिसने इस्लामी नियमों , कुरआने मजीद की समीक्षा, हदीस बयान करने वालों बल्कि इतिहास के ज्ञान तक को समृद्ध किया था। कूफा, बगदाद, बसरा, सीरिया, मिस्र, रैय, नीशापूर तथा अन्य कई क्षेत्रों के धार्मिक शिक्षाकेन्द्र पैगम्बरे इस्लाम के कथनों का वर्णन करने वाले बुद्धिजीवियों से भरे थे जो इस्लाम की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करने में सक्षम थे और पैगम्बरे इस्लाम के कथनों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेने और देने के लिए इस्लामी जगत के विभिन्न नगरों की निरंतर यात्रा करते रहते थे।

 

 यह वही युग था जब विभिन्न इस्लामी मत और विचारधाराएं अपना अपना दायरा फैलाने का प्रयास कर रही थीं और इस उद्देश्य के लिए विभिन्न मतों के विद्वान व्यापक स्तर पर किताबें और पत्रिकाएं लिखते थे इसी लिए इस काल में हम देखते हैं कि विभिन्न मतों के ग्रंथ लिखे गये क्योंकि हर मत दूसरे मत से आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था और हर मत के बुद्धिजीवियों की यही कोशिश थी कि वह दूसरे मत के अनुयाइयों के मुक़ाबले में, पैग़म्बरे इस्लाम के अधिक कथन एकत्रित करे, अपने बुद्धिजीवियों का अधिक प्रचार करे और अपनी विचारधारा को सही सिद्ध करे।यही कारण था कि विभिन्न विषयों में इन विचारधाराओं के अनुयाइयों के मध्य टकराव और वाद विवाद का बाज़ार भी गर्म रहता था और इन चर्चाओं के परिणाम, चर्चा में शामिल बुद्धिजीवियों के अध्ययन की दिशा का निर्धारण करते थे और उन्हें आज़ादी देते या सीमित करते थे।

 

मुहम्मद बिन जरीर तबरी का नाम उन बुद्धिजीवियों में शामिल हैं जिन्होंने बहुत किताबें लिखी हैं अलबत्ता उनकी सभी किताबों पर चर्चा करना इस कार्यक्रम में संभव नहीं है। प्रसिद्ध बुद्धिजीवी " याक़ूते हमवी " ने अपनी किताब " मोजमुल उदबा" में तबरी की किताबों का परिचय कराया है। " याक़ूते हमवी " ने तबरी की जिन किताबों का उल्लेख किया है उनमें से कुछ इस प्रकार हैः " जामेउल बयान फी तफसीरिल क़ुरआन" " अलफस्लो बैनल क़ेराआ" " तारीखे तबरी"  " किताबे ज़ैलुल मुज़ील" जो पैगम्बरे इस्लाम के साथियों अर्थात " सहाबा" और उनके अनुयाइयों के बारे में लिखी गयी है, इसी प्रकार , इख्तेलाफो उलमाइल अमसार फी अहकामे शराएइल इस्लाम" नामक किताब भी है जो बुद्धिजीवियों के मतों और मतभेदों के वर्णन पर आधारित है। इसी प्रकार और भी बहुत सी किताबों हैं जिन्हें तबरी की रचनाओं में महत्व हासिल है।

 

तबरी की दसियों किताबों में से दो एसी किताबें हैं जो वास्तव में उनकी विश्व स्तरीय ख्याति का कारण बनी हैं। एक किताब कुरआने मजीद की समीक्षा के विषय पर है और उसका नाम " जामेउल बयान" है और दूसरी किताब इतिहास पर है जिसका नाम " तारीखुर्रुसुले वल उममे वल मुलूक " है लेकिन यह किताब " तारीखे तबरी " के नाम से मशहूर है। इस किताब को दो भागों में बांटा गया है। एक भाग में विश्व का इतिहास है और दूसरे में इस्लामी जगत का इतिहास है। विश्व का इतिहास, सृष्टि की रचना से आरंभ होता है और सन 302 हिजरी क़मरी तक चलता है। इस मूल्यवान पुस्तक को लिखे जाने की सही तारीख का पता नहीं है लेकिन प्रमाणों और तबरी की बातों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह किताब, कुरआने मजीद की समीक्षा लिखे जाने और सन 290 हिजरी क़मरी के बाद लिखी गयी है। तबरी का इतिहास वास्तव में इस्लामी शिक्षाओं से प्रभावित नज़र आता है क्योंकि तबरी खुद इस्लामी नियमों और शिक्षाओं के बड़े ज्ञानी थे। तारीखे तबरी, जानकारियों का ख़ज़ाना है और विश्व की प्राचीन इतिहासिक किताबों में उसे गिना जाता है हालांकि किताब पर तबरी की विचारधारा और धार्मिक आस्था की छाप की वजह से कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने एतिहासिक घटनाओं के वर्णन में निष्पक्षता का ख्याल नहीं रखा। तबरी शेर व शाअरी और साहित्य के क्षेत्र में भी अपने काल में प्रसिद्ध रहे हैं और यही वजह है कि उन्होंने जो इतिहास के विषय पर किताब लिखी है उसे साहित्यिक कला कृति भी कहा जाता है। वास्तव में तबरी की इच्छा यह थी कि वह एक एसी किताब लिखें जिसमें उनके काल तक की घटनाओं का वर्णन हो और इसी लिए उन्होंने मूल्यवान किताब लिखी।

टैग्स

मई २७, २०१८ १६:१८ Asia/Kolkata
कमेंट्स