रमज़ान का पवित्र महीना, ईश्वर का महीना है, क़ुरआने मजीद नाज़िल होने का महीना है, ईश्वरीय दया व क्षमा का महीना है, ईश्वर की विशेष कृपा व अनुकंपा का महीना है।

यह वह महीना है जिसमें मुसलमान और ईमान वाले पूरे उत्साह के साथ क़ुरआने मजीद की आसमानी शिक्षाओं को सीखने की कोशिश करते हैं और अपने धार्मिक दायित्वों का निर्वाह करके अपनी बंदगी का प्रदर्शन करते हैं। वे इस माध्यम से ईश्वर से सामिप्य द्वारा उसकी व्यापक दया का पात्र बनते हैं और ईश्वर से भय के उच्च चरणों तक पहुंचते हैं।

सभी मामलों में सफलता का मंत्र, अवसरों व उचित परिस्थितियों से सही ढंग से लाभ उठाना है। बुद्धिमान लोग हमेशा इस बात की कोशिश करते हैं कि प्राप्त होने वाले अवसरों से भरपूर लाभ उठाएं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि समय जल्दी गुज़र जाता है और संभव है कि मामूली सी ढिलाई के चलते सबसे बड़ा अवसर हाथ से निकल जाए और इंसान के हाथ पश्चाताप के अलावा कुछ न लगे। इसी कारण ईश्वरीय दूतों ने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि अवसरों से हर संभव लाभ उठाओ क्योंकि ये बादलों की तरह बहुत जल्दी गुज़र जाते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया हैः जान लो कि तुम्हारे जीवन के दिनों में ऐसे क्षण आते हैं कि जिनमें ईश्वर की ओर से जीवनदायक हवाएं चलती हैं तो कोशिश करो कि उन अवसरों से लाभ उठाओ और अपने आपको उन अवसरों के समक्ष ले जाओ। एक अन्य हदीस में उन्होंने फ़रमायाः जिसके लिए भी भलाई का कोई दरवाज़ा खुल जाए वह उससे लाभ उठाए क्योंकि उसे नहीं पता है कि वह दरवाज़ा कब बंद हो जाएगा।

रमज़ान का पवित्र महीना उनहीं दिनों में से है जिनमें ईश्वरीय दया की हवाएं चलती हैं और उसका हर पल एक उचित व अद्वितीय अवसर है और अगर उससे अच्छी तरह लाभ न उठाया गया तो फिर केवल पछतावा ही होगा। इसी लिए ईमान वाले इस विभूतिपूर्ण महीने से अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए इसमें अधिक से अधिक क़ुरआन की तिलावत करने और ईश्वर से दुआ व प्रार्थना में बिताने का प्रयास करते हैं।

दुआओं की किताबों में इस पवित्र महीने के हर दिन और हर रात के लिए पैग़म्बर व उनके परिजनों की ओर से अनेक दुआएं मिलती हैं जिनमें से एक दुआए इफ़्तेताह है। यह दुआ रमज़ान की रातों से विशेष है और इसमें बड़े सुंदर व मनमोहक ढंग से ईश्वर का गुणगान किया गया है और ईश्वर के प्रिय बंदे जिस प्रकार से उसे पुकारा करते थे उसी तरह से इसमें ईश्वर को पुकारा गया है। दुआए इफ़्तेताह की एक अहम विशेषता, मानव समाज में व्यापक रूप से पाई जाने वाली समस्याओं व कठिनाइयों पर ध्यान दिया जाना है।

यह दुआ इस प्रकार ईश्वर के गुणगान से शुरू होती है। प्रभुवर! प्रशंसा मैं तेरे गुणगान से आरंभ करता हूं क्योंकि तूने ही मुझे अपनी ओर ध्यान देने का सामर्थ्य प्रदान किया। तेरे उपकार की वजह से दूसरे सीधे मार्ग पर मज़बूती डटे रहते रखता है और मुझे विश्वास है कि तू कृपालुओं में सबसे बड़ा कृपालु है, दंडित करने में सबसे अधिक दंड देने वाला और महानता में सबसे महान है। प्रभुवर! तूने मुझे इस बात की अनुमति दी है कि मैं तुझे पुकारूं, तो हे सुनने वाले ईश्वर! मेरे आभार को स्वीकार कर और हे दयालु ईश्वर! मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर और हे क्षमा करने वाले ईश्वर! मेरी ग़लतियों को माफ़ कर दे।

 

जो चीज़ मनुष्य के कल्याण का कारण बनती है वह यह समझना है कि वह ईश्वर व उसकी महानता के समक्ष एक छोटा व तुच्छ बंद है जिसका, अपना कुछ भी नहीं है। सभी अच्छाइयां ईश्वर की ओर से हैं और जो भी समस्याएं या बुराइयां हैं उनमें वह अपने बुरे कर्मों के कारण ग्रस्त हुआ है। इंसान को यह समझना चाहिए कि अगर वह ग़लत चयन के कारण बुरे रास्ते पर चलता है तो व्यवहारिक रूप से ईश्वर से लड़ता है। उसे अपने आपको ईश्वर से भय और उससे आशा के बीच की स्थिति में बाक़ी रखना चाहिए यानी ऐसा सोचना चाहिए कि संभव है कि अत्यधिक उपासना के बावजूद किसी बड़ी ग़लती के चलते उसका अंजाम बुरा हो जाए लेकिन उसे हर हाल में ईश्वर की दया की ओर से आशावान रहना चाहिए।

ईश्वर ने स्वयं से निराशा को बड़े पापों की श्रेणी में रखा है। मनुष्य चाहे जितना बड़ा पापी हो, उसे ईश्वर की दया की ओर से निराश नहीं होना चाहिए। ईश्वर की दया इतनी व्यापक है कि अगर मनुष्य सच्चे मन से तौबा व प्रायश्चित करके उसकी ओर लौट आए तो ईश्वर उसे क्षमा कर देगा। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पर पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि कोई भी ईमान वाला बंदा ऐसा नहीं है जिसके हृदय में दो प्रकाश न हों, एक ईश्वर से भय का प्रकाश और दूसरे उससे आशा का प्रकाश और अगर इन दोनों को तौला जाए तो इनमें से किसी को भी दूसरे पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है।

दुआए इफ़्तेताह में एक विषय जिस पर अत्यधिक बल दिया गया है, वह इस्लाम के वैश्विक शासन से प्रेम की अभिव्यक्ति है जो ईश्वर के अंतिम प्रतिनिधि हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के प्रकट होने के बाद स्थापित होगा। यह दुआ पढ़ने वाला ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहता है। प्रभुवर! हम एक ऐसे सम्मानीय शासन के लिए उत्सुक है जिसके माध्यम से तू इस्लाम और उसके मानने वालों को सम्मान प्रदान करेगा और असत्य तथा उसके मानने वालों को अपमानित करेगा। प्रभुवर! हमें उस शासन में लोगों को तेरे आज्ञापालन की ओर बुलाने वालों और तेरे मार्ग पर चलने वालों में रख।

 

रमज़ान के पवित्र महीने में सहरी के समय पढ़ी जाने वाली अहम दुआओं में से एक दुआए अबू हमज़ा सुमाली भी है। इस दुआ की शिक्षा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने दी है और इसे उनसे उनके एक साथी अबू हमज़ा ने लोगों तक पहुंचाया है। अबू हमज़ा अपने समय के अत्यंत प्रतिष्ठित लोगों में से थे और उन्हें अपने समय का सलमान कहता जाता था। इस दुआ में ईश्वर के सद्गुणों का उल्लेख है और इसी तरह विभिन्न आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व नैतिक विषयों की ओर भी संकेत किया गया है। इस दुआ में तौबा और ईश्वर से भय के मार्ग का बड़ी अच्छी तरह से चित्रण किया गया है और ईश्वर की महान अनुकंपाओं को गिनाया गया है। दुआए अबू हमज़ा सुमाली में प्रलय की कठिनाइयों और पापों के बोझ की ओर इशारा करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके परिजनों के आज्ञापालन की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इस दुआ में इसी तरह आलस्य और निराशा जैसे अवगुणों से पवित्र किए जाने की प्रार्थना भी की गई है।

दुआए अबू हमज़ा सुमाली की एक अहम विशेषता यह है कि इसमें अपने पालनहार से मनुष्य की प्रार्थना की शैली का भली भांति चित्रण किया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों की दुआओं में इस बिंदु पर बहुत ध्यान दिया गया है कि प्रार्थी हमेशा अपने आपको भय व आशा के बीच महसूस करे। एक ओर जब बंदा अपने पापों को देखता है तो उसमें शर्मिंदगी की भावना पैदा होती है और दूसरी ओर जब वह ईश्वर की महान दया की ओर ध्यान देता है तो उसमें आशा की किरण पैदा होती है।

भय व आशा की यह स्थिति इंसान में हमेशा रहनी चाहिए। इसी लिए इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं। प्रभुवर! मैं तुझे उस ज़बान से पुकार रहा हूं जिसे पापों ने गूंगा बना दिया है। अर्थात जब मैं अपने पापों को देखता हूं तो शर्म के मारे तुझसे बात नहीं कर पाता। प्रभुवर! मैं तुझसे उस हृदय से प्रार्थना कर रहा हूं जिसे पापों व अपराधों ने मार दिया है अर्थात वह निराशा के निकट पहुंच गया है।

ईश्वर यह बात पसंद करता है कि उसके बंदे अपने पापों की स्वीकारोक्ति करें। इससे ईश्वर को कोई लाभ नहीं होता, बंदा चाहे अपने पापों की स्वीकारोक्ति करे या न करे इससे ईश्वर की शक्ति व स्वामित्व में कोई कमी या बेशी नहीं होती लेकिन ईश्वर के समक्ष अपने पापों को स्वीकार करने से बंदा, ईश्वरीय दया का अधिक आभास करता है और ईश्वरीय क्षमा उसके लिए अधिक मोहक हो जाती है। दयालु ईश्वर के समक्ष अपने पापों की स्वीकारोक्ति, वास्तविक तौबा का मार्ग अधिक प्रशस्त करती है। अलबत्ता हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि यह स्वीकारोक्ति केवल ईश्वर के समक्ष होनी चाहिए और किसी को भी इस बात की अनुमति नहीं है कि वह किसी भी व्यक्ति के सामने अपने पापों का उल्लेख करे।

रमज़ान के पवित्र महीने में पढ़ी जाने वाली एक अन्य दुआ, दुआए मुजीर है। पापों को क्षमा किए जाने के लिए रमज़ान की रातों विशेष कर तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं रात में इस दुआ को पढ़ने की काफ़ी सिफ़ारिश की गई है। मुजीर शब्द का अर्थ होता है, रक्षक। इस दुआ का नाम मुजीर रखे जाने का कारण यह कि इसमें यह वाक्य बहुत अधिक दोहराया गया है कि अजिरना मिनन्नारे या मुजीर अर्थात हे रक्षक, नरक से हमारी रक्षा कर।

इस पूरी दुआ में ईश्वर के पवित्र नामों का उल्लेख है और दुआ के हर वाक्य में प्रार्थी ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें नरक की आग से शरण दे। आरंभ के बिस्मिल्लाह और अंत के ईश्वरीय गुणगान को छोड़ कर इस दुआ में 90 वाक्य हैं और हर वाक्य में ईश्वर को हर प्रकार की बुराई से पवित्र कह कर और उसकी महानता को मान कर उसे उसके दो नामों से पुकारा जाता है और फिर यह वाक्य दोहराया जाता हैः अजिरना मिनन्नारे या मुजीर अर्थात हे रक्षक, नरक से हमारी रक्षा कर। (HN)

 

मई २९, २०१८ १६:१४ Asia/Kolkata
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