एकता की रक्षा और फूट व विवाद से दूरी, पैगम्बरे इस्लाम , इमामों और धर्म के मार्गदर्शकों की शैली रही है।

कुरआने मजीद ने भी अपने विभिन्न आयतों में मुसलमानों को एकजुटता व एकता का आदेश दिया है और कहा है कि फूट व मतभेद से दूर रहो। सूरए आले इमरान की आयत नंबर 64 में कहा गया है कि अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और फूट व मतभेद से दूर रहो। 

क़ुरआने मजीद में कई आयतें ऐसी हैं जिनमें मुसलमानों के बीच एकता पर बल दिया गया है। शिया सुन्नी सभी समीक्षकों का यह मानना है कि कुरआने मजीद रमज़ान के महीने में  और " शबे क़द्र " कही जाने वाली रात में उतरा है। किसी भी मुसलमान को इस बात में संदेह नहीं है कि क़ुरआने मजीद विश्व के सभी लोगों के लिए मार्गदर्शन का साधन है। सूरए बक़रह की आयत नंबर 185 में कहा गया है कि, रमज़ान वह महीना है जिसमें कुरआन उतरा है, लोगों के मार्गदर्शन के लिए  और  सत्य व असत्य में फर्क के लिए ।  कुरआने मजीद की इस आयत के दृष्टिगत यह पूरी तरह से साबित होता है कि यह किताब पूरी दुनिया के मार्गदर्शन के लिए है अर्थात न केवल यह कि क़ुरआने मजीद एकता का कारण है बल्कि यह इस्लामी एकता के मार्ग भी सुझाता है। 

 

क़ुरआने मजीद,पैग़म्बरे इस्लाम को एकता व भाईचारे का आह्वान करने वाला बताता है और उनके शिष्टाचार की सराहना करता है। पैगम्बरे इस्लाम की जीवनी एकता के लिए किये जाने वाले प्रयासों से भरी है। पैगम्बरे इस्लाम ने पलायन या हिजरत के पहले साल ही, अपने साथ पलायन करने वाले मुहाजिरों और मदीना के स्थाननीय लोगों अन्सार के मध्य " वधुत्व बंधन " बांधा और उन्हें एक दूसरे का भाई बनाया । यह दोनों लोग, जाति, वंश, वातावरण और आर्थिक स्थिति की दृष्टि से एक दूसरे से बहुत भिन्न थे। इसी लिए  जब मक्का से पैगम्बरे इस्लाम के साथ पलायन करने वाले मदीना नगर पहुंचे और वहां रहने लगे तो यह चिंता होने लगी कि कहीं उनमें आपस में फूट न पड़ जाए इसी लिए पैगम्बरे इस्लाम ने मदीने के स्थानीय लोगों और मक्का तथा अन्य नगरों से मुसलमान होकर मदीना पहुंचने वालों के बीच यह रिश्ता बनाया जिसका उन सब ने अंत तक निर्वाह भी किया। इसके साथ ही पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने इस काम से यह स्पष्ट कर दिया कि इस्लाम में एकता का क्या महत्व है। 

 

मुसलमानों को पैगम्बरे इस्लाम का अनुसरण और क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं का पालन करते हुए हमेशा, संयुक्त बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए और फूट व मतभेद से दूर रहना चाहिए। कुरआने मजीद में एकता पैदा करने वाला एक अन्य साधन, रमज़ान का महीना है । रमज़ान को पूरी दुनिया के मुसलमानों के बीच एकता का एक मजबूत प्रतीक समझना चाहिए। रमज़ान के महीने में रोज़ा रखने का जो संस्कार है उसमें विभिन्न मतों और विचारों के साथ पूरी दुनिया के  सभी  मुसलमान, एक समान नज़र आते हैं । इस महीने में दुनिया के विभिन्न देशों में रहने वाले मुसलमानों के रीति व रिवाज दर्शनीय होते हैं और यदि उन पर ध्यान दिया जाए तो सब के काम एक समान नज़र आते हैं । दुनिया के सारे मुसलमान, रमज़ान में, भोर में एक निर्धारित समय पर " सहरी" खाने के लिए उठते हैं, नमाज़ पढ़ते, क़ुरआन पढ़ते हैं । मुसलमान, सुबह की अज़ान से लेकर मगरिब की अज़ान तक रोज़ा रखते हैं और भूखों को खाना खिलाने, अनाथों का ध्यान रखने और निर्धनों की मदद जैसे भले काम करके, ईश्वर को स्वंय से प्रसन्न रखने का प्रयास करते हैं। 

 

रमज़ान का महीना ऐसा महीना है जिसमें मुसलमान एक प्रकार से आंतरिक रूप से बदलाव का आभास करते हैं और इस बदलाव के बाद उनके जीवन में सकारात्मकता अधिक हो जाती है। इस मुबारक महीने में पूरी दुनिया के मुसलमान एक राष्ट्र में बदल जाते हैं और एक साथ ईश्वर की उपासना करते हैं। विशेष कर " शबे क़द्र" कही जाने वाली रातों में ईश्वर के समक्ष अपने पापों के लिए उससे क्षमा मांगते हैं। जिस तरह से काबा, पूरी दुनिया के मुसलमानों को एकत्रित करता है उसी तरह रमज़ान का महीना भी मुसलमानों को एक दस्तरखान पर बिठाता है और उनके भीतर एकजुटता का आभास मज़बूत करता है।  दुनिया भर के मुसलमानों को " शबे क़द्र" की महानता के बारे में पता है।  यह पवित्र रमज़ान  की विशेष रातें हैं  जिन्हें शबे क़द्र कहा जाता है यह रातें  ईश्वर की कृपा का चरम बिन्दु समझी जाती हैं। इन रातों में ईश्वर अपने बंदों पर विशेष कृपा करता है ।  इन रातों की महानता का स्वंय ईश्वर ने क़द्र नामक सूरे में गुणगान करते हुए कहा है, "तुम क्या जानो शबे क़द्र क्या है।" इसके बाद ईश्वर ने इस रात को हज़ार महीनों से बेहतर बताया है और इस रात के शुरु होने से सुबह सवेरे तक की समयावधि को शांति  का समय कहा है।

वास्तव में ईश्वर ने शबे क़द्र के ज़रिए बंदों को यह अवसर दिया है कि वे अपने सद्कर्मों को परिपूर्ण करे। यह रातें 21 से 23 रमज़ान के बीच में हैं शिया मुसलमानों का यही मानना है किंतु सुन्नी मुसलमानों के अनुसार 27 रमज़ान की रात भी शबे क़द्र हो सकती है। यही वजह है कि शबे कद्र में उपासना के पुण्य के लिए मुसलमान, 21 , 23 और 27 रमज़ान की रातों को विशेष प्रकार से उपासना करते हैं। 

 

रमज़ान में एकता प्रतीक एक अन्य उपासना  " एतेकाफ़" है। कुरआने मजीद के सूरए बक़रह की आयत नंबर 125 में कहा गया है कि हम ने इब्राहीम और इस्माईल को आदेश दिया कि मेरे घर  को तवाफ करने वालों, रहने वालों, रुक और सजदा करने वालों के लिए पवित्र करो। सभी इस्लामी मतों का कहना है कि मस्जिद में विशेष दिनों में रहना, जिसे " एतेकाफ़" कहा जाता है , एक पुण्य वाला कर्म है । " एतेकाफ़" दो भागों पर आधारित होता है, एक मस्जिद में ठहरना और रोज़ा रखना। हालांकि यह उपासना, व्यक्तिगत रूप से और अकेले होती है लेकिन पैगम्बरे इस्लाम की शैली के अनुसार एक सामूहिक रूप से भी अंजाम दिया जा सकता है और इसी लिए बहुत से इस्लामी देशों में एक उपासना सामूहिक रूप से अंजाम दी जाती है। निश्चित रूप से जब एक मुसलमान , रोजा रख कर तीन दिनों तक मस्जिद में रहता है और ईश्वर की उपासना करता है तो इसके उसके मन व मस्तिष्क पर बड़े सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं और उसकी आत्मा पवित्र हो जाती है। इसके साथ ही चूंकि वह यह काम सामूहिक रूप से करता है इस लिए उसमें सामाजिक विषयों और समाज में अपने दूसरों भाइयों की समस्याओं के निपटारे में रूचि पैदा होती है। 

 

इस्लाम ने , मुसलमानों को एक दूसरे का भाई बताया है और स्पष्ट रूप से कहा है कि लोगों को एक दूसरे पर वरीयता, उनकी धर्मपराणता के आधार पर ही दी जाएगी तो फिर यह इस्लाम धर्म अपने अनुयाइयों से यह आशा रखता है कि एकजुटता के लिए आगे बढ़ेंगे और इस्लामी देश एक दूसरे के साथ सहयोग करेंगे लेकिन इस्लामी जगत के बहुत से मुद्दों विशेषकर फिलिस्तीनी मुद्दे पर यदि गौर किया जाए तो यह कटु वास्तविकता स्पष्ट होती है कि बहुत से ताकतवर इस्लामी देश, इस मुद्दे के बारे में एकजुटता के साथ रुख अपनाने की क्षमता नहीं रखते और इस्लामी हितों के खिलाफ, इस्राईल व अमरीका के साथ संबंध बढ़ा रहे हैं। आज इस्लामी जगत की सब से बड़ी समस्या, आपसी झगड़े हैं जो हर मुसलमान के लिए दुख की बात है। यदि हम रमज़ान के महीने और उसकी विभूतियों पर चिंतन करें तो हमें यह महीना, इस्लामी जगत की समस्याओं के समाधान का अच्छ अवसर नज़र आएगा और निश्चित रूप से इस्लामी संयुक्त बिन्दुओं पर ध्यान देकर, मुसलमान महानता की चोटियों तक पहुंच सकते हैं। 

 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई कहते हैं कि अब समय आ गया है कि इस्लामी जगत नींद से जागे और इस्लाम को एकमात्र ईश्वरीय मार्ग के रूप में चुन ले और उस पर मज़बूती के साथ क़दम बढ़ाए। अब समय आ गया है कि इस्लामी जगत, एकजुटता की रक्षा करे और संयुक्त दुश्मन के सामने, जिससे सभी इस्लामी संगठनों ने नुक़सान उठाया है अर्थात साम्राज्य और ज़ायोनिज्म के ख़िलाफ़ एकजुटता के साथ डट जाएं, एक नारा लगाए , एक प्रचार करें और एक ही राह पर चलें। इन्शाअल्लाह उन्हें ईश्वर की कृपा का पात्र बनाया जाएगा और ईश्वरीय परंपराओं और नियमों के अनुसार उनकी मदद भी होगी  और वह आगे बढ़ेंगे। (Q.A.)

 

 

 

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Jun ०३, २०१८ १५:२१ Asia/Kolkata
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