रमज़ान के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन है कि अगर बंदे को यह पता चल जाए कि रमज़ान का क्या महत्व है तो उसकी यह इच्छा होगी कि काश हमेशा रमज़ान रहता।

पवित्र रमज़ान की विदाई के संबन्ध में इमाम ज़ैनुल आबेदीन कहते हैं कि सलाम हो उस महीने पर जिसमे दिल, नर्म हो जाते हैं।  इस महीने में किसी सीमा तक हृदय की कठोरता कम हो जाती है।  रमज़ान की समाप्ति पर रोज़ेदार को पहले तो यह प्रण करना चाहिए कि वह पाप न करने की प्रक्रिया को जारी रखेगा।  दूसरे यह कि खान-पान पर भी नियंत्रण रखेगा। ऐसा करने से वह पहले की तुलना में अधिक खाने-पीने से बचेगा।

रोज़ा रखना वास्तव में कोई आसान काम नहीं है किंतु इसके माध्यम से जो उपलब्धियां प्राप्त होती हैं वे बहुत महत्व रखती हैं जैसे इच्छा शक्ति का मज़बूत होना और आंतरिक इच्छाओं पर अधिक नियंत्रण स्थापित करने की शक्ति आदि।  रोज़ा रखने वाला व्यक्ति रोज़े के दौरान खाने-पीने से बचते हुए एक प्रकार से अपनी आंतरिक इच्छाओं से युद्ध करता है जिससे उसकी इच्छा शक्ति सुदृढ़ हो जाती है।  यह प्रक्रिया मनुष्य के भीतर इच्छा शक्ति को इतना अधिक मज़बूत कर देती है कि वह हर काम अपनी इच्छा के अनुसार करता है न कि दूसरों की इच्छा के अनुसार।  इस प्रकार वह अपनी बहुत सी बुरी आदतों को त्याग देता है।

 

रोज़ा, मनुष्य की इच्छा शक्ति को मज़बूत करने के साथ ही साथ उसके अन्तर्मन को भी पवित्र कर देता है।  जब मनुष्य का पेट भोजन से खाली हो जाता है तो वह आंतरिक विशेषताओं की ओर अग्रसर होता है जैसे सच्चाई, बुराइयों से बचना और दूसरी विशेषताएं।  एक महीने तक रोज़ा रखकर रोज़ेदार, बहुत सी ऐसी विशेषताओं का स्वामी बन जाता है जो पहले उसके पास नहीं थीं।  रमज़ान से प्राप्त सदगुणों की यह ऐसी पूंजी है जिसकी किसी से भी तुलना नहीं की जा सकती।

जिन लोगों के पास मूल्यवान वस्तुएं होती हैं वे उनके महत्व को समझते हुए उनकी रक्षा करते हैं।  ऐसे लोग अपनी मूल्यवान वस्तुओं को सुरक्षित रखने के हर संभव प्रयास करते हैं।  एक महीने तक रोज़ा रखने से रोज़ेदार जो मूल्यवान उपलब्धियां अर्जित करता है उन्हें सुरक्षित रखने की  बहुत आवश्यकता है।  यह सोने से अधिक मूल्यवान उपलब्धिया हैं अतः इनकी सुरक्षा भी सोने से अधिक की जानी चाहिए।  रमज़ान की उपलब्धियां एक ऐसे ख़ज़ाने की भांति है जिनके पीछे शैतान पड़ा रहता है।  अगर एक क्षण के लिए भी इस ओर से ध्यान हटाया जाए तो शैतान इसे चुरा ले जाएगा।  ऐसे में मनुष्य को रमज़ान में एकत्रित की गई पूंजी की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

एक बार एक व्यक्ति पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पास आया और उसने उनसे कहा कि आप मुझे नसीहत कीजिए।  आपने उस व्यक्ति से पूछा कि अगर मैं तुम्हें कुछ बताऊं तो क्या तुम उसे अंजाम दोगे? उसने कहा कि जी हां मैं उसे ज़रूर अंजाम दूंगा।  रसूले ख़ुदा ने उस व्यक्ति से तीन बार यहीं सवाल पूछा और उसने हर बार एक ही उत्तर दिया कि हां मैं आपकी बताई हुई बात को पूरा करूंगा।  इसपर पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि मैं सिफ़ारिश करता हूं कि तुम जब भी कोई काम करने का फैसला करो तो पहले यह देखो कि वह काम ठीक है या नहीं।  अगर वह काम सही हो तो उसे अंजाम दो और अगर सही न हो तो उसे छोड़ दो।

आध्यात्मिक उपलब्धियों की सुरक्षा की सबसे प्रभावी शैली यह है कि अपने कर्मों का लेखाजोखा रखा जाए।  मोमिन व्यक्ति, अपने कर्मों का लेखाजोखा इकट्ठा करके अपनी अच्छाइयों और बुराइयों को सरलता से पहचान जाता है।  इसके बाद वह उन बाधाओं को मार्ग से हटाने का प्रयास करता है जो उसके सदकर्मों की राह में रुकावट हैं।  इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम कहते हैं कि वह व्यक्ति हममे से नहीं है जो अपने कर्मों का प्रतिदिन हिसाब-किताब न करे।  अब अगर उसने कोई अच्छा काम किया है तो ईश्वर से प्रार्थना करे कि उसे ऐसा काम करने की शक्ति दे।  अगर उसने कोई बुरा काम किया है तो ईश्वर से प्रायश्चित करे और भविष्य में ऐसा काम करने से बचे।

इसी संबन्ध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अपना हिसाब करो इससे पहले कि तुम्हारा हिसाब किया जाए अर्थात अपने कर्मों की समीक्षा करते रहो।  मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अच्छे और बुरे कामों का पूरा हिसाब रखे।  अब यदि अच्छाइयां अधिक हैं तो उनकी संख्या में वृद्धि करे और यदि बुराइयां अधिक हों तो तौबा करते हुए उनकी संख्या को कम करने का प्रयास करता रहे।  यदि एसा हो कि अच्छाइयां और बुराइयां बराबर हों तो यह कोशिश करे कि अच्छाइयों की संख्या में वृद्धि हो।  जब अच्छाइयों की संख्या अधिक हो तो ईश्वर का आभार व्यक्त करे और उनकी संख्या को बढ़ाता रहे।

अपने कर्मों की समीक्षा करने के बाद तक़वे अर्थात ईश्वरीय भय का विशेष स्थान है।  तक़वा ऐसी आंतरिक शक्ति है जो आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करने में मनुष्य की सहायता करती है।  तक़वे की संज्ञा कार के उस ब्रेक से दी जा सकती है कि जो कार को हर प्रकार से सुरक्षित रखते हुए अपने गंतव्य तक पहुंचाता है।  इसके महत्व को समझाते हुए हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि तक़वा बहुत मज़बूत क़िला है।

तक़वे या ईश्वरीय भय के संदर्भ में सूरे बक़रा की आयत संख्या 183 में कहा गया है कि हे ईमान लाने वालों, रोज़ा तुम पर उसी तरह से अनिवार्य किया गया है जैसाकि तुमसे पहले वालों पर लिखा गया था ताकि शायद तुम तक़वा हासिल कर सको।  वह बात जिसपर सबको विशेष रूप में ध्यान देना चाहिए वह यह है कि पवित्र रमज़ान के बाद शैतान के हमले बढ़ जाते हैं।  उसका पूरा प्रयास होता है कि जितना हो सके रोज़े की बरकत को नष्ट करे।  एसे में मनुष्य को अधिक से अधिक प्रायाश्चित करना चाहिए।  यदि कोई व्यक्ति पाप करने के बाद तत्काल प्रायश्चित कर ले तो ईश्वर उसे माफ़ कर देता है।  सूरे आले इमरान की आयत संख्या 135 में ईश्वर कहता है कि वे लोग जो शैतान की चाल में आ जाते हैं और फिर तुरंत ही प्रायश्चित करते हैं तो ईश्वर उनके पाप को माफ़ कर देता है।

पवित्र क़ुरआन, ईश्वर की किताब है।  उसकी बातों को व्यवहारिक बनाना, लोक-परलोक में सफलता का कारण बनता है।  यह वह पवित्र महीना है जिसमें क़ुरआन उतरा इसलिए कहा जा सकता है कि क़ुरआन और रमज़ान के बीच एक विशेष प्रकार का समपर्क पाया जाता है।  इस महीने में क़ुरआन से निकटता के बहुत लाभ हैं।  पवित्र क़ुरआन को पढ़ना, इसे पढ़ाना, इसमें सोच-विचार करना हर एक का सवाब है।  रमज़ान के चले जाने के बाद भी क़ुरआन का पाठ अवश्य करना चाहिए।  पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के कथनों में मिलता है कि दिन में क़ुरआन की कम से कम 50 आयतें पढ़नी चाहिए।

रमज़ान मे सहरी का विशेष महत्व है।  पूरे 24 घण्टों के दौरान सहर या भोर समय से बढ़कर कोई समय नहीं है।  सूरे मुज़्जम्मिल में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए ईश्वर कहता है कि रात के चौथे पहर उठकर क़ुरआन में सोच-विचार करो।  इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम कहते हैं कि सहर के समय से सूरज के निकलने तक आसमान के दरवाज़े खुले होते हैं और इस समय आजीविका बांटी जाती है।  यह वह समय है जिसमें बड़ी दुआएं तक क़ुबूल होती हैं।  सहर के समय बंदों पर ईश्वर की कृपा बरसती है।  दुआएं स्वीकार की जाती हैं और प्रायश्चित करने वालों को माफ़ किया जाता है।  इस समय अच्छे काम स्वीकार किये जाते हैं।  यही कारण है कि धर्मगुरूओं का कहना है कि जहां तक हो सके सहर के समय उठो, एक गिलास पानी पियो।  तुम्हारे इस काम से तुम्हें बरकत मिलेगी।  रमज़ान में सहर के समय रोज़ेदार उठते हैं और ईश्वर की उपासना करते हैं।  इस अच्छी आदत को रमज़ान के बाद भी बाक़ी रखो।

अगर रमज़ान के बाद बताए हुए नियमों का पालन किया जाए तो रमज़ान की बरकतें बाद में भी बाक़ी रह सकती हैं।  इन बातों का पालन करने के संदर्भ में इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ईश्वर के निकट वह काम पसंदीदा व प्रिय है जिसे उसका बंदा लगातार करता रहे चाहे वह थोड़ा ही क्यों न हो।  यह प्रक्रिया, उस काम के बाक़ी रहने का कारण बनती है।  मनुष्य जिस काम में भी दक्षता प्राप्त करे उसे चाहिए कि उसके बाक़ी रहने के लिए उसे दोहराता रहे।  यदि हम यह चाहते हैं कि पवित्र रमज़ान का प्रभाव हमारे जीवन पर बाक़ी रहे तो बताई हुई बातों पर रमज़ान के बाद भी लगातार अमल किया जाए।

 

Jun १७, २०१८ १०:२५ Asia/Kolkata
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