रासायनिक पदार्थ आज के विकसित जीवन का अभिन्न अंग हैं।

आज शायद ही कोई उद्योग ऐसा होगा जिसमें मूल पदार्थ के अहम भाग के रूप में रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल न होता हो। सीमेंट, लुब्रिकेंट्स, तारकोल इत्यादि की पैदावार से लेकर औषधि उद्योग, दंत मंजन, शैम्पू और कपड़ा उद्योग तक में रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल होता है। यही कारण है कि रासायनिक उद्योगों को मुख्य उद्योगों में गिना जाता है। रसायन पदार्थ पैदा करने वाले मुख्य देशों पर इस उद्योग की पैदावारों में वृद्धि से रोज़गार, व्यापार और आर्थिक विकास में अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। पिछले कुछ दशकों में रासायनिक पदार्थों से बनने वाली वस्तुओं की मांग में वृद्धि कारण इस उद्योग का मूल्य, जो 1970 के दशक में 171 अरब डालर था, वर्ष 2012 में पांच खरब डालर तक पहुंच गया।

 

रासायनिक पदार्थों में से एक रंग और गोंद है। यह स्पष्ट नहीं है कि पहली बार किसने औद्योगिक रंग बनाया। औद्योगिक रंग की पैदावार से पहले सभी रंग पौधों और जड़ी बूटियों से बनाए जाते थे। रंगरेज़ अपनी आवश्यकता का रंग पारंपरिक ढंग से और अपने पूर्वजों के ज्ञान के आधार पर तैयार करते थे। समय बीतने के साथ साथ रंग बनाने में खनिज पदार्थों का इस्तेमाल होने लगा और धीरे धीरे रंग के दानों से लाभ उठाया जाने लगा। कहा जाता है कि संसार में पहला औद्योगिक रंग डु पोंट नामक एक अमरीकी व्यक्ति ने तैयार किया। कुछ लोगों का कहना है कि वह पौधों पर रखे रहने के कारण अपनी बंदूक़ के बट के रंग में परिवर्तन को देख कर रंग बनाने की सोच में पड़ गया। आज दुनिया में लगभग चार करोड़ टन रंग पैदा किए जाते हैं जिनका मूल्य लगभग 120 अरब डालर है। पूरे संसार में वर्ष 2014 में रंगों का कुल निर्यात लगभग 54 अरब डालर मूल्य का था।

 

ईरान में औद्योगिक रंग के इस्तेमाल का अतीत सौ साल से कम का है। उससे पहले घर निर्माण क्षेत्र के दक्ष रंगरेज़, सरकारी इमारतों और धनवान लोगों के घरों की पेंटिंग के लिए वनस्पति और खनिज पदार्थों का इस्तेमाल करते थे। वर्ष 1939 में पहली बार ईरान में औद्योगिक स्तर पर रंग बनाने की इकाई ने काम करना शुरू किया। उस समय कारख़ानों में वनस्पति तेलों और खनिज पाउडरों के माध्यम से आयल पेंट तैयार किया जाता था। इस क्षेत्र में अनेक इकाइयों के काम शुरू करने के साथ ही ईरान में रंग उद्योग का गठन हुआ। इन कंपनियों ने धीरे धीरे लकड़ी की वार्निश, सूखे रंगों, भट्टी के रंगों और गाड़ी के रंगों की पैदावार के साथ विभिन्न प्रकार के रंग बनाने शुरू किए।

 

आज ईरान में रंग उद्योग में 350 से अधिक कंपनियां कुल मिला कर हर साल इमारती व औद्योगिक दोनों प्रकार के लगभग दस लाख टन रंग पैदा करती हैं। ईरान के रंग उद्योग से निर्यात होने वाली वस्तुएं अधिकतर बिल्डिंगों में और सजावट के लिए काम आने वाले पदार्थ हैं जो अफ़ग़ानिस्तान, तुर्कमनिस्तान, इराक़, ताजीकिस्तान और क़ज़ाक़िस्तान को निर्यात किए जाते हैं। क्षेत्रीय देशों में रंगों का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल इमारतों की रंगाई में होता है और ईरान में तैयार होने वाले रंग, क्षेत्र की रंग मंडी की आवश्यकता का 25 प्रतिशत भाग पूरा करते हैं।

रेसिन रंगों में इस्तेमाल होने वाला एक बहुत अधिक चिपचिपा पदार्थ है। वर्ष 2014 में संसार के निर्यात का लगभग 85 अरब का भाग इसी पदार्थ से विशेष था। रेसिन रंग उद्योग में मूल पदार्थ के रूप में इस्तेमाल होता है। यह पदार्थ वनस्पतियों से हासिल होता है और इंसान हज़ारों बरस पहले इसे देवदार जैसे पेड़ों से प्राप्त करता था। प्राकृतिक रेसिन का रंग पारदर्शी से लेकर गहरा चाकलेटी तक होता है और यह इसकी कड़ाई और गाढ़ेपन पर निर्भर होता है। कुछ प्रकार के रेसिन अपनी अस्थिर विशेषताओं के कारण बहुत जल्दी हवा में मिल जाते हैं। एक प्राकृतिक रेसिन, देवदार के पेड़ से प्राप्त होता है जो अतीत में नौकाओं की दरारों को भरने, शवों को ममी बनाने, खाने के बर्तनों और अन्य कामों में इस्तेमाल होता था। रेसिन को इसी तरह वार्निश, क़लई, एसिड बनाने और इत्र तैयार करने के लिए भी प्रयोग किया जाता था।

 

तकनीक में आने वाली प्रगति और पालीमर की खोज के चलते वैज्ञानिक कृत्रिम रेसिन बनाने में सफल हुए। कृत्रिम रेसिन ऐसे चिपकने वाले पदार्थ हैं जिन्हें रासायनिक पदार्थों के माध्यम से प्रयोगशालाओं में तैयार किया जाता है और विभिन्न प्रकार के रंगों में प्राकृतिक रेसिन की जगह प्रयोग होते हैं। प्राकृतिक रेसिन के मुक़ाबले में कृत्रिम रेसिन अधिक टिकाऊ होता है क्योंकि इसे विशेष परिस्थितियों में तैयार किया जाता है और इसी तरह इसकी शुद्धता का दर भी अधिक होता है।

 

आज ईरान में रेसिन उद्योग में 120 कंपनियां काम कर रही हैं जो हर साल विभिन्न प्रकार के 75 लाख टन रेसिन तैयार करके अन्य देशों को निर्यात करती हैं। इसकी मुख्य मंडी फ़ार्स की खाड़ी के अरब देश और इसी तरह रूस से अलग होने वाले स्वाधीन देश हैं। ईरान पालीमर नामक रासायनिक उद्योग की कंपनी, रेसिन तैयार करने वाली अहम कंपनियों में से एक है। यह कंपनी अपने विशेषज्ञों के अनुभव और ज्ञान के सहारे मध्यपूर्व में रेसिन और रासायनिक पदार्थ तैयार करने वाली सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल हो गई है। ईरानी पालीमर कंपनी ने विभिन्न प्रकार के एक्रिलिक रेसिन बनाने की एक बड़ी यूनिट खोली है और इसी तरह उसने रंग तैयार करने की आधुनिक स्वचलित मशीनें बनाई हैं।

गोंद भी रासायनिक पदार्थों में से एक है। गोंद उद्योग एक बड़ा उद्योग है जो अन्य उद्योगों और उनकी पैदावार में अहम भूमिका निभाता है। अतीत में जैविक और वनस्पति पदार्थों को गोंद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। 19वीं शताब्दी में पालीमर उद्योग में सिंथेटिक या कृत्रिम गोंद बनाए जाने के बाद गोंद के उद्योग में बड़ी तेज़ी से प्रगति हुई और आज एक छोटे से साधारण डिब्बे से लेकर विकसित बोइंग विमानों तक में जुड़ाव के लिए गोंद का इस्तेमाल होता है। गोंद, जोड़ी जाने वाली चीज़ों के लिए ही नहीं बल्कि रौशनाई, रंग, टायर, शीशे और प्लास्टिक के धागों इत्यादि के लिए भी ज़रूरी है।

 

रासायनिक उद्योग अपनी गतिविधियों की व्यापकता और बेजोड़ विविधता के कारण पूरी तरह से अद्वितीय उद्योग हैं। इस क्षेत्र में भी नालेज बेस्ड वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित किए जाने से इस उद्योग की आर्थिक उपयोगिता में वृद्धि हुई है। इस प्रकार से कि इस उद्योग में काम करने वालों को काफ़ी लाभ हासिल होता है। यही कारण है कि दसियों नालेज बेस्ड कंपनियां रासायनिक पदार्थों के क्षेत्र में काम कर रही हैं। इनमें से कुछ कंपनियों ने नेनो टेक्टनालोजी पर ध्यान केंद्रित करके ध्यान योग्य सफलताएं हासिल की हैं।

फ़दक नवीन तकनीक नामक कंपनी नेनो सिलिका बनाने में सफल हुई है। नेनो सिलिका, अंतर्राष्ट्रीय मंडी में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला नेनो पदार्थ है। यह पदार्थ अपने भौतिक व रासायनिक ढांचे व गुणों में परिवर्तन के कारण विभिन्न उद्योगों में अलग-अलग उपयोगिता रखता है। नेनो सिलिका, एक रासायनिक पदार्थ है जो रंग उद्योग में रंगों को गाढ़ा करने और धुंधला बनाने में इस्तेमाल होता है। कंक्रीट और सिमेंट के ढांचों में नेनो सिलिका का प्रयोग उन ढांचों को अधिक मज़बूत बनाता है। यह पदार्थ टायर उद्योग में भी इस्तेमाल होता है।

 

Jun १७, २०१८ १५:२९ Asia/Kolkata
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