आज हम पिछले कार्यक्रमों का सारांश पेश करते हुए इस्लामी शासन व्यवस्था में ज्ञान के महत्व के बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के दृष्टिकोण का उल्लेख करेंगे।

इस कार्यक्रम श्रंखला में अबतक पेश किये कार्यक्रमों को हम एक हिसाब से चार भागों में बांट सकते हैं।  पहले भाग में हमने इस्लाम की दृष्टि से ज्ञान की समीक्षा की थी।  वहां पर हमने बताया था कि इस्लाम में ज्ञान प्राप्ति को कितना महत्व प्राप्त है।  दूसरे भाग में पहली शताब्दी में इस्लामी सभ्यता के फैलने के दौरान उसपर विज्ञान के पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा करते हुए हमने इस्लाम के कुछ महान विद्वानों का उल्लेख किया था।

तीसरे भाग में ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से आरंभ होने वाले वैज्ञानिक विकास और इस्लामी विचारधारा में शिक्षा के महत्व पर इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई के दृष्टिकोणों को बयान किया था।  इसमें ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद और उसके पहले की वैज्ञानिक स्थिति की गहन समीक्षा की गई थी।  चौथे भाग में ईरान में होने वाली वैज्ञानिक प्रगति के संबन्ध में विश्व की अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों का उल्लेख किया था जिसमें दिखाया गया था कि ईरान ने क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वास्तव में उल्लेखनीय प्रगति की है।  आज के कार्यक्रम में हम तीसरे भाग को संक्षेप में पेश करेंगे।  अगले कार्यक्रम में चौथे हिस्से को पेश करेंगे जिसके साथ ही यह श्रंखला समाप्त हो जाएगी।

 

हमारी चर्चा का एक विषय, ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के पूर्व और बाद के वर्षों में विज्ञान की प्रगति की तुलनात्मक समीक्षा करना था।  बीसवीं शताब्दी के दूसरे पचास वर्षों में ज्ञान के क्षेत्र में जो उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की गईं वे विश्व के देशों में उनके विकास का मानदंड बनीं।  यही कारण है कि “आईएसआई” और “स्कोप्स” जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने विश्व के देशों की वैज्ञानिक प्रगति को आंकते हुए इस बारे में रिपोर्टें प्रस्तुत कीं।  इन अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से पेश की जाने वाली रिपोर्टों से विश्व के किसी भी देश की वैज्ञानिक स्थिति का अनुमान बड़ी सरलता से लगाया जा सकता है।  विशेष बात यह है कि यह अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं लंबे समय से मौजूद हैं किंतु ईरान के बारे में पिछले चार दशकों से पहले उन्होंने कोई विशेष रिपोर्ट पेश नहीं की।  इसका एक कारण यह है कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले इस देश में शिक्षा की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था।  जब ईरान में इस्लामी क्रांति आई और क्रांति की सफतला के पश्चात शिक्षा के क्षेत्र में प्रयास किये गए और उसके अच्छे परिणाम सामने आने लगे तो इन अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं का ध्यान, ईरान में वैज्ञानिक प्रयासों की ओर आकृष्ट हुआ।

“आईएसआई” की रिपोर्ट के अनुसार सन 1979 में ईरान में आने वाली इस्लामी क्रांति से पहले अर्थात पहलवी शासनकाल में ईरान के विद्धानों की ओर से अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओ में 2026 लेख छापे गए।  हालांकि उसी काल में विश्व में 80 लाख से अधिक लेख और शोधपत्र सामने आए जिनमे ईरान की भागीदारी बहुत कम रही।  वहीं ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के लगभग 37 वर्षों में ईरान में दो लाख पैंतालिस हज़ार शोधपत्र और लेख सामने आए।  इस प्रकार से शिक्षा के क्षेत्र में ईरान में बहुत तेज़ी से विकास हुआ और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ईरान की भागीदारी बढ़कर पचास प्रतिशत हो गई।  विशेष बात यह है कि यह विकास और प्रगति ऐसी स्थिति में हुई है कि जब ईरान ने आठ वर्ष युद्ध में बिताए।  ईरान पर थोपे गए युद्ध के काल में पढ़ने-पढ़ाने और शिक्षा के क्षेत्र में विकास के अवसर बहुत कम थे।  इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के पहले दशक में आठ वर्षीय युद्ध के बावजूद ईरान में शिक्षा का सिलसिला बंद नहीं रहा बल्कि उसमें उल्लेखनीय ढंग से प्रगति हुई।  इस दौरान जब शिक्षा के लिए प्रयास बहुत कठिन ही नहीं बल्कि असंभव से नज़र आ रहे थे, ईरान के वैज्ञानिकों ने 2881 शोधपत्र पेश करके अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रकार का रेकार्ड बनाया।  दूसरे शब्दों में विश्व के विद्वानों का कहना है कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद विज्ञान के क्षेत्र में लगभग 800 गुना तरक़्क़ी हुई।  आईएसआई जैसी वैश्विक संस्था ने भी इस बात की खुलकर पुष्टि की है कि ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद वैज्ञानिक दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

अपने एक अन्य कार्यक्रम में हमने ईरान के भीतर इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद होने वाले विकास की समीक्षा करते हुए यह बताया था कि ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता भी ज्ञान और विज्ञान को बहुत महत्व देते हैं।  इसी आधार पर ईरान की सरकार ने अपने कार्यक्रमों में विकास और विज्ञान के बारे में कई योजनाएं बनाईं।  हम आपको यह भी बात चुके हैं कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई का मानना है कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है बल्कि उसके साथ ईमान का होना भी ज़रूरी है।  उनका कहना है कि ज्ञान की प्राप्ति एक धार्मिक कर्तव्य है।  वे कहते हैं कि व्यक्तिगत या सामाजिक स्तर पर विकास के लिए ज्ञान के साथ अध्यात्म का होना भी बहुत ज़रूरी है।  वरिष्ठ नेता का कहना है कि ज्ञान या अध्यात्म में से कोई भी अकेले मनुष्य को कल्याण तक नहीं पहुंचा सकता।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने पश्चिमी सभ्यता के शिक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों की भी समीक्षा की।  उन्होंने कई आयामों से शिक्षा के बारे में पश्चिम के दृष्टिकोण की आलोचना की है।  पहला आयाम है मध्ययुगीन काल में शिक्षा और विज्ञान के बारे में चर्च की सोच।  दूसरे पश्चिम द्वारा शिक्षा के माध्यम से संसार पर वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास। तीसरे शिक्षा और विज्ञान पर पश्चिम के एकाधिकार की कोशिश।  चौथे पश्चिम की ओर से विज्ञान और तकनीक के माध्यम से पर्यावरण को क्षति पहुंचाना और पांचवा यह कि पश्चिम की ओर से ज्ञान को धन-दौलन से जोड़ने की कोशिश।  वरिष्ठ नेता का मानना है कि पश्चिमी सभ्यता के विपरीत इस्लामी सभ्यता में शिक्षा को मान-सम्मान प्राप्त है जबकि पश्चिम में यह कमाई का एक अच्छा माध्यम है।

 

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का कहना है कि अविकसित देशों में विकास न होने के कई कारण हैं जैसे वहां के विद्वानों और विचारकों में पाई जाने वाली आत्म विश्वास में कमी और पश्चिम से उनका प्रभावित होना।  उनका कहना है कि आधुनिक तकनीक को सीखना और प्राप्त करना चाहिए किंतु इसके कारण पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है।  लोगों को पश्चिम के भौतिक मूल्यों से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होना चाहिए।  आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई का कहना है कि ईरान की इस्लामी क्रांति की उपलब्धियों में से एक उपलब्धि, देश के युवाओं में आत्म विश्वास को जगाना और उनकी छिपी योग्यताओं को निखारना है।  यही कारण है कि इस्लामी क्रांति ने देश के युवाओं में आत्मविश्वास भर दिया और उन्हें हर प्रकार की निर्भरता से मुक्त कर दिया।  यही विषय ईरान में हर क्षेत्र में चहुमुखी विकास की भूमिका बना।

अविकसित देशों में निराशा फैलाने और उसे पिछड़ा बनाने में उस देश के ऐसे बुद्धिजीवी  ज़िम्मेदार हैं जो निराशावाद का शिकार हैं।  एसे विद्वान पश्चिम से बहुत प्रभावित हैं।  वे अपने देशों के युवाओं में भी निराशा फैलाते हैं।  ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले संयोग से इस देश में भी एसे लोग उपस्थित थे जिनमे आत्मविश्वास का अभाव था।  ऐसे लोग अपनी राष्ट्रीय क्षमताओं की पहचान नहीं रखते थे जिसके कारण वे पिछड़ेपन का शिकार रहे।  इस प्रकार के लोग पश्चिम से बहुत प्रभावित थे।  देश में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद के वर्षों में निराशा, आशा में बदल गई और युवाओं में आत्म विश्वास की भावना जागृत हुई।  इसका परिणाम यह निकला कि नाना प्रकार के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने विज्ञान, उद्योग, तकनीक, कला और आर्थिक दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति की है।  वरिष्ठ नेता के अनुसार साफ्ट वेयर क्रांति के माध्यम से देश की आर्थिक, वैज्ञानिक और औद्योगिक संप्रभुता को सुनिश्चित बनाया जा सकता है।  वे साफ़्ट वेयर क्रांति के विषय को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि इसको व्यवहारिक बनाने का एक मार्ग यह है कि पश्चिम की उन वैज्ञानिक धारणाओं के बारे में संदेह का साहस पैदा किया जाए जिन्हें पश्चिम में अटल वास्तविकता के रूप में माना जाता है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इतिहास ने यह बात सिद्ध की है कि वैज्ञानिक क्षेत्र में साहस ने वैज्ञानिक क्रांति की भूमिका प्रशस्त की है।

 

 

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Jun १८, २०१८ १३:०४ Asia/Kolkata
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