हमने इस बात की ओर इशारा किया कि मस्जिद मूल सांस्कृतिक संस्था है जिसका आधार धार्मिक विचार है।

इसमें इस्लामी समाज के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन के प्रभावी रोल निभाने की अपार संभावनाएं हैं। मस्जिद धार्मिक संस्कृति में उस स्थान को कहते हैं जहां उपासना की जाती है। यह वह स्थान हैं जहां इंसान अपने भीतर जोश व सक्रियता का आभास करता है। इसी तरह मस्जिद ज्ञान सीखने व नीति निर्धारण का स्थान है।

 

मस्जिद इस्लाम के उदय से लेकर इस्लामी इतिहास में राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र रही है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने विभिन्न मामलों को मस्जिद में अंजाम देकर मुसलमान को इस धार्मिक केन्द्र की अपार क्षमताओं के बारे में  बताया और इस विचार को निरस्त किया कि इस्लाम धर्म एक आयामी है। पैग़म्बरे इस्लाम के इस व्यवहार का यह नतीजा था कि मुसलमान हर अहम काम को अंजाम देने के लिए मस्जिद में इकट्ठा होते थे। मस्जिद और राजनीति में संबंध न सिर्फ़ पैग़म्बरे इस्लाम के दौर में बल्कि उनके बाद भी गहरा नज़र आता है। सातवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के मशहूर धर्मगुरु व इतिहासकार इब्ने अबिल हदीद मोतज़ली लिखते हैं, "तीसरे ख़लीफ़ा के क़त्ल के बाद, लोगों ने हज़रत अली को घेर लिया ताकि उनके आज्ञापालन का प्रण ले। उन्होंने इंकार किया लेकिन लोगों ने इतना आग्राह किया कि उनके पास कोई और रास्ता न था। तब आपने फ़रमाया, अगर मेरा आज्ञापालन करने पर तुम्हारा इतना आग्राह है तो मस्जिद में आओ, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे आज्ञापालन का प्रण छिपकर हो बल्कि मुसलमानों की इच्छा से मुसलमानों के इकट्ठा होने के स्थान पर होना चाहिए।" उसके बाद इमाम उठे और इस हालत में कि लोग उन्हें चारों ओर से घेरे हुए चल रहे थे मस्जिद में दाख़िल हुए और लोगों ने उनके आज्ञापालन का प्रण लिया।

 

इस्लामी शिक्षाओं का योरोपीय विद्वान मार्सल बोवाज़ार मुसलमानों की संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति और एकता में मस्जिद के प्रभावी रोल के बारे में लिखता है, "मस्जिद दुनिया में मुसलमानों के बीच एकता पैदा करने वाली बहुत प्रभावी तत्व है, जिसकी सामाजिक व सांस्कृतिक अहमियत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, ख़ास तौर पर मौजूदा दौर में जब मुसलमान इस्लाम के उदय के समय का जोश दिखा रहे हें, मस्जिदें आत्मिक प्रशिक्षण के केन्द्र और अत्याचारियों व वर्चस्ववादियों के मुक़ाबले में इस्लामी जगत के आंदोलन की छावनी बन गयी है और धीरे-धीरे मस्जिदों ने वह स्थान हासिल कर लिया है जो उसे इस्लाम के उदय के समय हासिल था। मस्जिद के भीतर लाइब्रेरी और सामाजिक सभाओं के हॉल की मौजूदगी इस सच्चाई की ओर इशारा करती है कि इस्लाम में मस्जिद सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने के लिए नहीं है जैसा कि कुछ लोगों का ऐसा ख़्याल है, बल्कि अहम राजनैतिक केन्द्रों में है।"           

 

मौजूदा दौर में इस्लामी जगत में नाना प्रकार के राजनैतिक व सामाजिक आंदोलन जारी हैं। ऐसे आंदोलन जो कई सौ साल की निश्चेतना की ओर से जागरुक होने और इस्लामी सभ्यता के पुनर्जीवित होने के सूचक हैं। इन आंदोलनों में मस्जिद को सामाजिक व राजनैतिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में अहमियत हासिल है क्योंकि इस तरह इन आंदोलनों के नेता प्रचार के हर चरण में सक्रिय फ़ोर्स को आकर्षित और उन्हें शिक्षित करने और इससे भी अहम धार्मिक विचारों की क्षमता को अत्याचार से निपटने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह ने उस समय जब उनका आंदोलन अपने चरम पर था, कहा था, "मेहराब का अर्थ है जंग की जगह अर्थात शैतान से लड़ने और उद्दंडियों से लड़ने की जगह। इन मेहराबों से जंग के सोते फूटने चाहिए जैसा कि इससे पहले होता आया है। हे राष्ट्र! अपनी मस्जिदों की रक्षा करो ताकि यह आंदोलन सफल हो सके।"

 

मस्जिद इस्लाम की वास्तिक प्रतीक है। इसी वजह से नमाज़ी एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत थोड़े से पूंजिनिवेश के ज़रिए विभिन्न सामाजिक व राजनैतिक चरणों को तय करते हैं। अलबत्ता पिछले कुछ दशकों के दौरान सामाजिक व राजनैतिक संकटों की वजह से भी मस्जिद ने अधिक राजनैतिक रंग अपना कर लिया है। सामूहिक नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम या मस्जिदों में भाषण देने वाले अपने देश सहित अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों के सामने मौजूद राजनैतिक मुश्किलों के बारे में चर्चा करते हैं। मस्जिद में दिए जाने वाले राजनैतिक भाषण चाहे वह छोटी मस्जिद हो या जामा मस्जिद हो, तीन तरह के होते हैं। पहले प्रकार के भाषण में मुख्य रूप से इस्लाम के आरंभिक दौर की घटनाओं का उल्लेख होता और साथ में पवित्र क़ुरआन की आयतों, पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों और उनके पवित्र परिजनों के आचरण का हवाला दिया जाता है। दूसरे प्रकार के भाषण में आंतरिक मुश्किलों व संकटों पर चर्चा होती है जिसका उद्देश्य मूल्यों की रक्षा करना होता है और तीसरे प्रकार के भाषण में अंतर्राष्ट्रीय संकटों की समीक्षा तथा पश्चिमी जगत और उसमें ख़ास तौर पर अमरीकी के वर्चस्व से संबंधित ख़बरों और इस्लामोफ़ोबिया की समीक्षा होती है।              

 

मस्जिद सय्यद इस्फ़हान की मशहूर सड़क चहार बाग़ से थोड़ी दूर पर मस्जिद सय्यद नामक सड़क के दक्षिणी छोर पर स्थित मस्जिद है। ये उन मस्जिदों में है जिसका निर्माण कार्य बारहवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के अंतिम वर्षों में शुरु हुआ और तेरहवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के मध्य में पूरा हुआ। इस मस्जिद को बहुत ही सुंदर गुल बूटों से सजाया गया है। यह क़ाजारी शासन काल के वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूनों में गिनी जाती है। इस मस्जिद का एक भाग वास्तुकला के सुंदर आयाम की झलकियां पेश करता है।

इस मस्जिद का निर्माण स्वर्गीय धर्मगुरु सय्यद मोहम्मद बाक़िर शफ़्ती की निगरानी में शुरु हुआ और इसी वजह से इस मस्जिद का नाम उन्हीं के नाम पर पड़ा। सय्यद ने 1245 हिजरी क़मरी बराबर 1829 ईसवी को मस्जिद के निर्माण के लिए 8000 वर्गमीटर के क्षेत्रफल पर पहला कुदाल चलाया। यह इतनी बड़ी मस्जिद है कि तत्कालीन क़ाजारी शासक फ़त्ह अली शाह यह समझ रहा था कि इस मस्जिद के निर्माण कार्य को पूरा कराना सय्यद के बस की बात नहीं है। इसलिए उसने मस्जिद के निर्माण में अपनी भागीदारी की पेशकश की लेकिन सय्यद ने उसकी पेशकश को क़बूल नहीं किया। शासक फ़त्ह अली ने कहा, "इतनी भव्य मस्जिद को अंजाम तक पहुंचाना आपके बस की बात नहीं है।" सय्यद ने शासक फ़त्ह अली शाह के जवाब में कहा, "मेरी पहुंच सृष्टि के रचयिता के ख़ज़ाने तक है।" इस तरह क़ाजारी शासक मस्जिद के निर्माण में भाग लेने से पीछे हट गया।

आपके लिए यह जानना रोचक होगा कि सय्यद मोहम्मद बाक़िर शफ़्ती ने जीवन भर पीड़ितों का साथ दिया और अत्याचारी शासकों के मुक़ाबले में डटे रहे। इसी वजह से उन्हें बार बार मौत की धमकी मिली यहां तक कि उन पर जानलेवा हमला भी हुआ लेकिन उनके क़त्ल की साज़िश ईश्वर की कृपा से नाकाम रही। अंततः ज़िन्दगी की 85 बहारें देखने के बाद वह 1260 हिजरी क़मरी बराबर 1844 ईसवी में इस नश्वर संसार से चल बसे। उन्हें इस मस्जिद के पूर्वोत्तरी भाग में जिस क़ब्र में दफ़्न किया गया उसे उन्होंने ख़ुद तय्यार किया था।

मस्जिद सय्यद का क्षेत्रफल 8075 वर्गमीटर है। इसमें दो बड़े शबिस्तान हैं। शबिस्तान मस्जिद के छतदार भाग को कहते हैं। दो छोटे और बड़े गुंबद, दो चेहल सुतून अर्थात चालीस खंबों वाली विशेष इमारत, 3 ऐवान, एक आज़ान देने के लिए विशेष गुलदस्ता, एक स्कूल, 45 से ज़्यादा कमरे, कई गलियारे, दो महताबी पहली मंज़िल पर और 4 महताबी उसके ऊपर वाले भाग में बने हैं। ऐवान उस आयताकार हाल को कहते हैं जो मेहराबदार होता है और उसके तीन तरफ़ दीवार होती है और एक तरफ़ से पूरी तरह खुला होता है। महताबी उस हाल को कहते हैं जिस पर छत नहीं होती। इसे मदरसों और मस्जिदों में रात में उपासना के लिए बनाया जाता था और चूंकि इस हाल में छत नहीं होती और चांद रात में रौशनी आती है इसलिए इसे महताबी कहा जाता है।   

    

मस्जिद का मुख्य गेट उत्तर में है। यह बहुत ऊंचा गेट है जिसके दोनों ओर पत्थर के दो चबूतरे बने हैं। गेट के दोनों ओर को 7 रंग के गुल बूटों वाली टाइल और सुल्स लीपि के शिलालेख से सजाया गया है। इन शिलालेखों में पवित्र क़ुरआन की आयतें लिखी हैं।

मस्जिद का दक्षिण-पश्चिमी गेट भी बहुत ऊंचा है। इस गेट पर क़ाजारी शासन काल के मशहूर लीपिकार मोहम्मद बाक़िर शीराज़ी के हाथ का लिखा शिलालेख है।

मस्जिद सय्यद की गिनती उन मस्जिदों में होती है जिसमें 4 ऐवान होते हैं। उत्तरी ऐवान 7 रंग की इस्लीमी शैली की गुल बूटों वाली टाइलों से सजाया गया है। दक्षिणी ऐवान गुंबद के नीचे है। पूरब और पश्चिम के ऐवान मस्जिद के शीत ऋतु में इस्तेमाल होने वाले शबिस्तान के सामने बने हैं। ऐवानों के चारों ओर धार्मिक छात्रों के लिए छोटे कमरे बने हैं। इस मस्जिद में एक बड़ी घड़ी लगी है जो बहुत मशहूर है। यह घड़ी दक्षिणी ऐवान के ऊपर लगी है। मस्जिद के पूर्वोत्तरी छोर पर सय्यद का रौज़ा है जो आइनाकारी, टाइल के काम, प्लास्टर आफ़ पेरिस के काम, चित्रों और अनेक शिलालेखों से सजा हुआ है।

 

Jun २०, २०१८ १५:०३ Asia/Kolkata
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