वास्तुकला को संस्कृति व इतिहास से संपन्न देशों में सभ्यता के अहम स्तंभों में गिना जाता है।

चूंकि ईरान हज़ार साल पुरानी सभ्यता का स्वामी है इसलिए यह हज़ारों साल से अब तक अद्वितीय वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूनों से संपन्न है। ईरानियों में निर्माण कार्य में रूचि और वास्तुकला की नई नई शैलियों के आविष्कार के कारण ईरान में वास्तुकला में बहुत ज़्यादा विविधता वजूद में आयी।

कुछ पुरातनविदो का मानना है कि प्राचीन ईरानी वास्तुकला में खंबे मूल तत्व की हैसियत रखते थे और अपने इस विचार के पक्ष में वे शूश के आस-पास और मूसियान टीले से बरामद हुए पत्थर के ऊंचे खंबों को तर्क के तौर पर पेश करते हैं। ईरान में सबसे पुरानी व अहम इमारत में पश्चिमोत्तरी ईरान में उरुमिये झील के दक्षिण में स्थित हसनलू क़िला है। इसी तरह मुर्दों की लाश रखने के विशेष तहख़ानों में जो पहाड़ों के बीचों बीच बनाए गए, उनमें भी पत्थर के खंबे हैं। इन खंबों को छत को रोकने के लिए बनाया जाता था या धार्मिक अनुष्ठान के लिए इन्हें इस्तेमाल करते थे। ये खंबे उस दौर के लोगों की परलोक के बारे में आस्था को दर्शाते हैं।

माद जाति के दौर में बड़ी बड़ी इमारते बनती थीं जिनमें पत्थर के मज़बूत खंबे लगे होते थे। माद जाति ने सातवीं शताब्दी ईसापूर्व में मेसोपोटामिया के शक्तिशाली शासन को हराकर स्वाधीन सरकार का गठन किया जिसकी राजधानी मौजूदा हमेदान नगर थी। माद जाति ने पहली ईरानी सरकार का गठन किया जिसके हाथ में लगभग 200 तक सत्ता रही। उनकी वास्तुकला दिखने में बहुत सादा होती थी लेकिन ऐसी विशेषताओं से संपन्न होती थी कि उन्हें ईरानी वास्तुकला की बुनियाद कहा जा सकता है। जैसा कि माद जाति की वास्तुकला का ईरान के पड़ोसी राज्यों की कला पर शताब्दियों तक असर रहा है। पुश्त बंद, कंगूरे, द्वार और भूमिगत गुप्त मार्गों वाले बड़े बड़े क़िलों का निर्माण, ईरान में माद जाति के समय से प्रचलित हुआ। ये क़िले शहर की दीवार के भीतर बनते थे और जंग के समय या विदेशियों के हमलों के समय शासकों व दरबारियों के रहने के मुख्य स्थल होते थे। उस समय उपासना स्थल और सुदंर हॉल भी विशेष समारोहों के लिए बनाए जाते थे। इन इमारतों का बाह्य रूप सादा लेकिन खुरदुरा होता था जबकि भीतर से इस तरह बना होता था कि तेज़ हवा और भूकंप के झटकों को सहन कर सके। आपके लिए यह जानना रोचक होगा कि इस तरह के क़िले ईरान में 12वीं हिजरी क़मरी तक बनते रहे और ये क़िले अभी भी मौजूद हैं।

ईरानी वास्तुकला में 7 शैलियां प्रचलित हैं। इनमें से दो शैली इस्लाम के ईरान आगमन से पहले की हैं।

छठी शताब्दी ईसापूर्व में ईरान में एक बड़ा साम्राज्य वजूद में आया। साइरस द्वितीय ने जो हख़ामनेशी शहज़ादे थे, पहले पार्स, माद और दूसरी ईरानी जातियों को एकजुट किया और फिर देश की सीमाओं के विस्तार व विकास की ओर क़दम बढ़ाया। साइरस ने विशाल ईरान के कलाकारो व वास्तुकारों को बुलाया ताकि वे उसकी और उसकी सरकार के कीर्तिगान के लिए इमारतें बनाएं। इन कलाकारों ने मिल कर ऐसी कला को जन्म दिया जिसका पारसी रंग रूप था और उसमें पूर्वजों की कलाओं की झलकियां भी थीं।

इस शैली की वास्तुकला में हमेशा सबसे अच्छे मसालों का इस्तेमाल होता था। जैसा कि तख़्ते जमशीद में महलों की छतों के लिए लेबनान से देवदार की लकड़ियां और क़न्धार से सागवान और संदल लकड़ियां आती थीं। इस दौर की ज़्यादातर इमारतें चबूतरे पर बनती थीं। यह शैली ईरानी वास्तुकला की विशेषता थी।

तख़्ते जमशीद में इमारतों के निर्माण से पहले दुनिया में बहुत सी जगहों पर खंबे वाली इमारतें और हॉल बने हैं लेकिन उनमें से किसी में दो खंबों के बीच में दूरी उतनी नहीं है जितनी तख़्त जमशीद की इमारतों के दो खंबों के बीच दिखाई देती है। तख्त जमशीद में इमारतों में कहीं कहीं दो खंबो के बीच की दूरी 5 दश्मलव 6 मीटर तक है जिसकी मिसाल इससे पहले कहीं नहीं मिलती।

इसी तरह धातु के होल्डर वाले मज़बूत पत्थरों के इस्तेमाल की वजह से ईरानी वास्तुकारों को 22 मीटर ऊंचे खंबे बनाने में आसानी होती थी। इस काल की इमारतों में इस बात की कोशिश की गयी है कि एक तरह की डिज़ाइन पर आधारित इमारतें न बने कि जिन्हें देखकर लोगों का मन ऊब जाए।

हख़ामनेशी शासन काल में इमारतों के चारों ओर दीवारें होती थीं जिससे इमारत अधिक ख़ूबसूरत लगती थी। पत्थर के खंबों के ऊंपरी भाग में लकड़ी के कैपिटल का इस्तेमाल पारसी काल की वास्तुकला की एक अन्य विशेषता है। इसी तरह इमारतों को प्रकाशमय रखने के लिए उनकी छतों पर चेराग़ रखने की जगहें बनायी जाती थीं। इमारतों के सामने खंबों वाले ऐवान बने होते थे।

हख़ामनेशी शासन काल का सबसे पुराना निर्माण का नमूना पासारगार्ड कमपाउंड है जो तख़्ते जमशीद से लगभग 48 किलोमीटर दूर। इस कम्पाउंड में एक उपासना स्थल, एक पत्थर की बनी मीनार जिसे सुलैमान की जेल कहा जाता है, कई छोटी छोटी इमारतें और एक मक़बरा है जिसकी छत स्लोपिंग अर्थात ढलुवा है।

इस कम्पाउंड की इमारतों को ध्यान से देखने में लगता है कि यह एक दूसरे से पूरी तरह अलग हैं लेकिन इन्हें विशेष नक़्शे के तहत बनाया गया है। इन इमारतों की वास्तुकला यूनानी वास्तुकला से मिलती जुलती है। इन इमारतों के फ़र्श पत्थर के हैं और दीवारों के सबसे ऊपरी भाग में ईंटों का इस्तेमाल हुआ है।

इन इमारतों की सजावट मेसोपोटामिया, ईलाम, यूनान और ईरान की वास्तुकला का संगम पेश करती है। इन इमारतों को सजाने के लिए मीनाकारी युक्त टाइलों का इस्तेमाल हुआ है। दारयूश ने अपने शासन के अंतिम दिनों में इस कम्पाउंड के निकट एक महल बनाने का आदेश दिया। मीख़ी लीपि के शिलालेखों में इस स्थान का नाम पार्सा लिखा गया है जो उसके एक राज्य का नाम था और बाद में इसे पर्सपोलिस कहा जाने लगा। यह महल इतना मज़बूत था कि हर तरह की आपदाओं के सामने टिका रहा और इसका एक मुख्य कारण यह है कि यह महल पत्थर का बना है।

जिस जगह को पैर्सपोलिस कहा जाता है वह लगभग 13 हेक्टर का भूभाग है। यह तीन हिस्सों में बंटा हुआ है। मुख्य कम्पाउंड, ऊंचाई पर बनी इमारतें और निचले भाग में बनी इमारतें।

लेकिर अगर आज आप इस स्थान को देखने जाएंगे तो आपको पत्थर का फ़्रेमवर्क नज़र आएगा क्योंकि सारी चीज़े गिर चुकी हैं। जो उकेरे हुए चित्र बचे हैं वह दीवारों के निचले भाग में उकेरे हुए हैं। यह अवशेष हख़ामनेशी शासन काल के दरबार के हालात और इस शासन के राजाओं की जीवन शैली का पता देते हैं। 20 मीटर ऊंचे 70 खंबों पर छत टिकी होती थी। इन खंबों का सबसे ऊपरी भाग इस तरह बनाया गया है कि दिखने में जानवरों के सिर लगते हैं। सींग वाले या पर वाले शेरों के चित्र तख़्त जमशीद के महलों की दीवारों पर बने हुए हैं। इसी तरह जगह जगह दीवारों पर ऐसे चित्र बने हैं जिनमें दारयूश के सामने लाइन में खड़े सिपाही नज़र आते हैं। इन महलों की दीवारें कहीं कहीं साढ़े पांच मीटर चौड़ी हैं और इनके निर्माण में 45 टन भारी पत्थर इस्तेमाल हुए हैं। तख़्त जमशीद में महलों को इस तरह बनाया गया था कि वह शीत ऋतु में गर्म रहे। इसी तरह वेन्टिलेशन का सिस्टम भी बना हुआ है। पानी पहुंचाने वाली भूमिगत नालियां और घुमावदार सूइज सिस्टम भी तख़्त जमशीद में बने हुए हैं।

इस जगह को प्रशासनिक या राजनैतिक गतिविधियों के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि शान दिखाने और विदेशियों के मन में रोब पैदा करने के लिए बनया गया है। हख़ामनेशी शासन काल में नए वर्ष नौरोज़ के जश्न तख़्त जमशीद में आयोजित होते थे। इन समारोहो में शासन के प्रति वफ़ादारी दर्शाने के लिए उपहार पेश किए जाते थे कि जिनकी तस्वीरें महलों की दीवारों पर उकेरी गयी हैं। हथियार, शेर, धातु के गुलदान, घोड़े, कपड़े और लेबास वे चीज़ें हैं जो उपहार में दी जाती थीं।

एक दूसरा हॉल है जिसमें 99 खंबे हैं। यह 100 खंबों वाले हॉल के नाम से मशहूर है, हख़ामनेशी शासन काल में ख़ज़ाना रखे जाने का स्थान था। इस हॉल से बहुत से मूल्यवान अवशेष बरामद हुए हैं। इस हॉल से बरामद हुयीं प्रतिमाएं और दूसरे उपकरण उस दौर की संस्कृति को स्पष्ट करते हैं। पुरातनविदों का मानना है कि हख़ामनेशी शासन काल की वास्तुकला में जिस तरह यथार्थवाद को चित्रित किया गया है उसकी मिसाल दुनिया में वास्तुकला के किसी युग में बहुत कम दिखाई देती है।

सिकंदर ने 331 ईसापूर्व में तख़्त जमशीद को आग लगाने से पहले इसके मूल्यवान ख़ज़ानों को यूनान भेजने का आदेश दिया। जो चीज़ें यूनान भेजी गयीं थी वे सोना, चांदी, कलाकृतियां, रत्न, क़ालीनें, हथियार  और फ़र्नीचर थे। इस विशाल मैदान में सुंदर व सूक्ष्म डिज़ाइनों से सजे पत्थर के खंबे अभी भी मौजूद हैं और समय बीतने के बाद भी पूरे इतिहास में ईरानियों की कला की गवाही दे रहे हैं।

 

 

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Jun २३, २०१८ १६:२५ Asia/Kolkata
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