कार्यक्रम की आख़री कड़ी में संक्षेप में इस्लामी मानवाधिकारों के बारे में चर्चा की जाएगी।

हमने इस बात का प्रयास किया कि मानवाधिकारों के बारे में इस्लामी दृष्टिकोण से आपको अवगत करवाएं। हमने आपको बताया था कि वर्तमान समय के मानवाधिकार घोषणापत्र की तुलना में इस्लामी मनवाधिकार बहुत व्यापक और विस्तृत है।  मानव समाज विविध सांस्कृतिक विचारधाराओं से संपन्न है। इसी प्रकार मानव समाज विभिन्न धर्मों, नैतिक सिद्धांतों व क़ानूनों के माध्यम से संचालित होता है। इसलिए मानवाधिकार और उसके अनुच्छेद को इस तरह परिभाषित किया जाए कि सभी समाज व राष्ट्र उसे स्वीकार कर सकें।

 

अगर मानवाधिकारों को वैश्विक अधिकार का स्थान देना है तो यह आवश्यक है कि पूरी दुनिया के लोगों के लिए एक जैसे क़ानून निर्धारित किये जाएं चाहे वे किसी भी धर्म, संस्कृति व विचारधारा के मानने वाले हों।   आज यह बात दावे से नहीं कही जा सकती कि सभी समाज के लोगों ने पश्चिमी मानवाधिकारों को पूरी तरह से स्वीकार किया है। इसी प्रकार पश्चिमी मानवाधिकारों के बारे में अबतक ऐसी निष्ठा प्रमाणित नहीं हो सकी है जिससे सभी राष्ट्र व जातियां संतुष्ट हो सकें।

समस्त इंसानों के एक दूसरे के प्रति जो अधिकार हैं उनका इस्लाम की कानूनी व्यवस्था में निर्धारण किया गया है। पूरे विश्वास के साथ दावा किया जा सकता है कि मानवाधिकारों के संबंध में जो भी दस्तावेज़ और घोषणापत्र हैं उनमें से कोई भी इतना व्यापक नहीं है जितना इस्लामी मानवाधिकार।  इस्लाम के अलावा मानवाधिकार के जो दस्तावेज़ व घोषणा पत्र हैं उनमें इंसानों के कुछ ही अधिकारों का उल्लेख है।  जिन अधिकारों का उल्लेख है वे भी नैतिकता के मूल्यवान अधिकारों से खाली हैं। इसी प्रकार जो ग़ैर इस्लामी मानवीय अधिकार हैं उनमें दूसरे वाले पक्ष के अधिकारों को बयान ही नहीं किया गया है।

 

इस्लाम की कानूनी व्यवस्था और उसके जो अधिकार हैं वे न  केवल  व्यक्तिगत, सामाजिक और समस्त इंसानों के अधिकार बयान करते हैं बल्कि पारिवारिक क्षेत्रों में भी इंसानों के जो अधिकार हैं उन्हें भी वे बयान करते हैं।  इस्लाम के मतानुसार इस्लामी मानवाधिकार, व्यक्ति या समाज तक सीमित नहीं हैं बल्कि यह इससे कहीं अधिक व्यापक हैं जिनमें समस्त प्राणियों के अधिकारों का ध्यान रखा गया है।

 

हालांकि मानवाधिकारों के बारे में अधिक बातें अभी हालिया दिनों में अधिक सुनाई दे रही हैं जबकि कुछ शताब्दियों पहले इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जाता था।  हालांकि इस्लाम, शताब्दियों पहले मानवाधिकारों के बारे में बहुत कुछ बता चुका है।  मानवाधिकारों का अर्थ, वास्तव में लोगों के मूलभूत अधिकारों का सम्मान करना है।  इस्लामी मानवाधिकारों में मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य प्राणियों के अधिकारों का भी विशेष ध्यान रखा गया है।  यह ऐसे अधिकार हैं जिन्हें ईश्वर ने अपने अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद (स) के माध्मय से मानवता को उपहार स्वरूप भेजा है।

ग़ैर ईश्वरीय मानवाधिकारों के विपरीत ईश्वरीय मानवाधिकारों में लोगों के मौलिक अधिकारों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।  इनमें मनुष्य के लोक-परलोक दोनों को ही दृष्टिगत रखा गया है। दूसरी ओर इस्लाम की क़ानूनी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य, मानव समाज का चहुमुखी विकास है।  हालांकि पश्चिमी मानवाधिकारों का लक्ष्य यह है कि मनुष्य को भौतिकता के आधार पर ऐसा जीवन उपलब्ध करवाया जाए जिसमें सारी आंतिरक इच्छाओं की पूर्ति की गई हो।  जिस समाज में भी आंतिरक इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रयास किये जाएंगे उस समाज का विनाश सुनिश्चित है।

 

इस्लामी मानवाधिकारों की एक अन्य स्पष्ट विशेषता यह है कि पूरब और पश्चिम की व्यवस्थाओं के नियमों के विपरीत, जिनके बहुत से नियम केवल किताबों तक सीमित हैं और उनके लागू करने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है, इस्लामी मानवाधिकारों में उसके व्यवहारिक होने को सुनिश्चित बनाया गया है।  दुनिया के किसी भी क़ानून के लागू होने के लिए दो बातों की ज़रूरत होती है।  एक, दूसरों के सामने अपमान का आभास और दूसरे सज़ा का डर।  अब अगर कहीं पर यह दोनो बातें नहीं पाई जातीं तो फिर क़ानून को लागू करने में परेशानियां आएंगी।  पश्चिमी मानवाधिकारों को लागू करने के मार्ग में बहुत सी जगह पर यह दो बातें आड़े आती हैं।  कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं कि एक प्रभावशाली व्यक्ति अपने प्रभाव के कारण सज़ा से बिल्कुल नहीं डरता और उसे अपने किये पर पछतावा भी नहीं होता।

अब सवाल यह पैदा होता है कि अगर क़ानून को लागू करने वाले यह दोनों आधार धराशाई हो जाएं तो फिर उसे लागू करने की गारेंटी किसपर होगी? ऐसी कौन सी चीज़ है जो क़ानून का उल्लंघन करने वाले प्रभावशालियों को रोक सके क्योंकि क़ानून को तोड़ने से मनुष्य को कुछ लाभ ही पहुंचता है।  इससे उसके निजी हितों की पूर्ति होती है और उसके अहंकार की तुष्टि होती है।  यह बात सही है कि दुनिया का कोई क़ानून उसके लागू किये जाने की ज़मानत के बिना अधूरा है।  इसका मुख्य कारण यह है कि जब किसी क़ानून को लागू किये जाने की कोई ज़मानत न हो तो फिर उसका कोई महत्व नहीं रह जाता।

इस्लाम की एक विशेषता यह है कि जहां पर इसके नियम अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के स्वामी हैं वहीं पर इन्हें लागू करने के लिए अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं होती।  इसका कारण यह है कि इस्लाम का मानने वाला ईश्वर को सर्वव्यापी जानता है।  यही कारण है कि इस्लामी क़ानून को लागू करने के लिए अलग से किसी के निर्धारण की आवश्यकता नहीं है।  पवित्र क़ुरआन के सूरे अलक़ में ईश्वर कहता है कि क्या इंसान नहीं जानता कि ईश्वर देख रहा है? इस आयत से पता चलता है कि ईश्वर हर व्यक्ति को देख रहा है और कोई भी उसकी नज़रों से ओझल नहीं है।  दूसरी बात यह है कि ईश्वर ने क़ानून का उल्लंघन करने वालों को कड़े दण्ड की बात कही है।  जो भी ईश्वर के नियमों का उल्लंघन करेगा उसे अवश्य दंड दिया जाएगा और इसमें किसी भी प्रकार का शक नहीं किया जा सकता।

 

इस्लामी व्यवस्था की दूसरी विशेषता यह है कि इसमें एक विशेष प्रकार का समन्वय पाया जाता है।  क़ुरआन ऐसी पवित्र किताब है जो बहुत ही उतार-चढ़ाव भरे काल में नाज़िल हुई थी।  यह ऐसे काल में नाज़िल हुई थी कि जब मुसलमान बहुत ही जटिल परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे थे।  उनपर चारों ओर से दबाव था लेकिन इस्लाम से हार्दिक लगाव के कारण वे इस्लाम के प्रति वफ़ादार रहे।

 

इस्लाम क़ानून व्यवस्ता की एक अन्य विशेषता यह है कि उसने अपने मानने वालों को एसे ही नहीं छोड़ा है।  उसने मुसलमानों के लिए मार्गदर्शक नियुक्त किये हैं।  इस्लामी शिक्षाओं में बताया गया है कि जो चीज़ अपने लिए पसंद करो वही दूसरों के लिए भी पसंद करो।  अगर तुम अपने लिए अच्छाई चाहते हो तो दूसरों के लिए भी अच्छाई ही चाहो।  अगर तुमको स्वयं पर अत्याचार पसंद नहीं हैं तो दूसरों के लिए भी अत्याचार को पसंद न करो।  इस्लाम का यह एसा मापदंड है जिसे हर स्तर पर पसंद किया जाता है।  क़ुरआन, मनुष्य से कहता है कि तुम सदैव दूसरों के साथ भलाई करो और दूसरों के लिए हमेशा अच्छा सोचो। 

 

 

Jun २६, २०१८ १४:४४ Asia/Kolkata
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