इस कार्यक्रम में हम सुलतानुल उलमा बहा वल्द के नाम से प्रसिद्ध वक्ता और परिज्ञानी बहाउद्दीन वल्द मुहम्मद बिन हुसैन ख़तीबी के बारे में बताएंगे।

सुलतानुल उलमा बहा वल्द के नाम से प्रसिद्ध बहाउद्दीन वल्द मुहम्मद बिन हुसैन ख़तीबी छठी और सातवीं शताब्दी क़मरी में ख़ुरासान के प्रसिद्ध सूफ़ी, परिज्ञानी और बुद्धिजीवी थे। उनके पिता ईरान के प्रसिद्ध शायर और परिज्ञानी थे जिनका नाम जलालुद्दीन मौलवी था। बहाउद्दीन वल्द, हुसैन बिन अहमद ख़तीबी के पुत्र थे जो मूल्यवान पुस्तक मनाक़ेबुल आरेफ़ीन के लेखक अफ़लाकी के अनुसार अपने समय के प्रसिद्ध विद्वान और धर्मगुरु थे और उनकी माता ख़्वारेज़्म शाहियान परिवार से थीं। बहा वल्द परिवार बल्ख़ में जीवन व्यतीत करता था। कुछ लोगों ने उन्हें शैख़ नज्मुद्दीन कुबरा का शिष्य बताया है जबकि कुछ लोग उनके उपदेश को अहमद ग़ज़ाली तक पहंचाते हैं किन्तु बहा वल्द की पुस्तक मआरिफ़ से जिसमें उनके विचार और दृष्टिकोण शामिल हैं, इस प्रकार की बातों को सिद्ध नहीं किया जा सकता।

बहाउद्दीन मुहम्मद वलद बिन हुसैन बिन अहमद ख़तीब बल्ख़ी वहीं हैं जो मृत्यु के बाद महान मौलाना के नाम से प्रसिद्ध हुए। वह अपने सारे जीवन भर बहा वलद के नाम से प्रसिद्ध थे जबकि ज़्यादातर समय में उन्हें सुलतानुल ओलमा के नाम से याद किया जाता था। बताया जाता है कि मौलाना जलालुद्दीन मौलवी के बड़े बेटे सुलतान वलद वलद नामा नामक अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि बहा वलद ने सुलतानुल ओलमा की उपाधि पैग़म्बरे इस्लाम से हासिल की। वलद नामे में आया है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने बल्ख़ के समस्त धर्मगुरुओं के सपने में आकर बहाउद्दीन को सुलतानुल ओलमा की उपाधि दी। जब बल्ख़ के धर्मगुरु नींद से जागे तो वह तेज़ी से उनके पास पहुंचे और उनका सम्मान किया किन्तु प्रोफ़ेसर फ़ुरूज़ान्फ़र बहावल्द की बची हुई पुस्तक मआरिफ़ का हवाला देते हुए कहते हैं कि सुलतानुल ओलमा की उपाधि उनको सपने में एक बूढ़े व्यक्ति ने दी थी और उसके बाद जब वह फ़त्वा देते थे तो वह अपनी इस उपाधि को पूरी शक्ति के साथ प्रयोग करते थे।
 

 

बहा वलद मआरिफ़ नामक पुस्तक में जब वह 55 वर्ष की आयु में थे अपनी उम्र की ओर संकेत करते हैं। इस विश्वसनीय इतिहास की ओर इशारा करते हुए कहा जा सकता है कि वर्ष 546 हिजरी क़मरी में जब बल्ख़ ख़ुरासान के महत्वपूर्ण शहरों में से एक था, एक उच्च परिवार में जन्मे थे। बहा वलद ने अपने पूर्वजों के काम को एक प्रचारक और बुद्धिजीवी के रूप में आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने जीवन भर स्वयं को एक धर्मगुरु के रूप में महत्व दिया, वह धर्मगुरुओं का विशेष वस्त्र पहनते थे और यात्रा के दौरान वह धार्मिक शिक्षा केन्द्र में ही रहने को प्राथमिकता देते थे। इस चीज़ पता चलता है कि उनकी रगों में सूफ़ीवाद का ख़ून दौड़ रहा है। ज़र्रीन कूब अपनी पुस्तक "पिल्ले पिल्ले ता मुलाक़ाते ख़ुदा" नामक पुस्तक में लिखते हैं कि बहा वल्द अपने समय में प्रचलित उपदेशकों में प्रचलित रिवाज के अनुसार ख़ुरासान, मेसोपोटामिया और तुर्किस्तान की यात्रा पर जाते, धूल मिट्टी से सने शहरों का दौरा करते, ख़्वारज्म जाते, अर्थात जहां भी जाते और जितने भी दिन शहर में रहते थे, शहर की मस्जिद में उपदेश देते थे, धार्मिक शिक्षा केन्द्रों में पढ़ाते थे, यहां तक कि सूफ़ियों के केन्द्र भी जाया करते थे, यह यात्राएं कभी कभी महीनों और वर्षों की हो जाया करती थीं और महीनों और वर्षों तक वह अपनी जन्म स्थली से दूर रहते थे। ख़ाली समय में वह अपने परिवार को यात्रा पर ले जाते थे और कभी कभी वह अकेले ही यात्रा करते थे।

इन यात्राओं के दौरान बहा वल्द ने बहुत से लोगों को अपने उपदेशों और बातों से प्रभावित किया जबकि विरोधी भी पैदा हो गये।  उनके उपदेश जोशीले होते थे जबकि उनके पढ़ाने का अंदाज़ भी बहुत निराला था। जिस धार्मिक शिक्षा केन्द्र में वह कुछ दिन के लिए भी पढ़ा दिया करते थे उसमें बदलाव की आहट देखी जा सकती थी। ज़र्रीन कूब का कहना था कि वह उपदेशों में बुरे धर्मगुरुओं पर भीषण हमला करते थे, झूठे न्यायधीशों पर कटाक्ष करते थे और उन प्रचारकों और वक्ताओं को भी नहीं छोड़ते थे जो ख्याति की तलाश में होते थे और अत्याचारियों की सहायता करते थे। उन समस्त शहरों और क़स्बों की यात्रा की जिसकी उनकी यात्रा की उनमें बल्ख़, तिरमिज़, वख़्श, समरक़ंद और ख़ारज़्म का नाम लिया जा सकता है।  जहां पर भी न्यायाधीश ख्याति की तलाश मे होता था, उससे वे बहुत घृणा करते थे, यह उनके और उनके शिष्यों के लिए बहुत दुख की बात थी।

बहा वल्द अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने में अपने समय में पहचाने जाते थे और इस काम में उनका बहुत से लोगों ने साथ दिया। वह अपने बयानों और सभाओं में लोगों को इस्लाम धर्म के अनुसरण की ओर आमंत्रित करते थे और ख़्वारज़्म शाह सरकार को अत्याचार छोड़ने और न्याय की स्थापना के लिए प्रेरित करते थे।

बहा वल्द जिस शहर या क़स्बे में जाते थे वहां पर अपने शिष्य बना लेते थे। बल्ख़ के लोग उनसे बहुत आस्था रखते थे। मनाक़िबे आरेफ़ीन और अन्य पुस्तकों में आया है कि सुलतानुल ओलमा बहा वलद अपने उपदेशों और बयानों में दर्शनशास्त्रियों की कड़ी आलोचना करते थे क्योंकि उनकी नज़र में दर्शनशास्त्री वास्तविकताओं को बुद्धि द्वारा सिद्ध करते हैं। वह इसी प्रकार समस्त सूफ़ियों की भांति बुद्धि को सीमित समझते थे। उनका मानना था कि पवित्र आत्मा, प्रयास और ईश्वरीय जज़्बे के अतिरिक्त कोई भी चीज़ सत्यता को प्राप्त नहीं कर सकती। इसी आधार पर बहा वलद सहित समस्त सूफ़ी, दर्शनशास्त्रियों की निंदा करते थे और उनका मानना था कि वह सत्य के मार्ग से दूर हो चुके हैं और पथभ्रष्टता का शिकार हो गये हैं। बहा वलद के काल के प्रसिद्ध दर्शनशास्त्र इमाम फ़ख़्रे राज़ी थे और यह ख़्वारज़्मशाह के गुरु भी थे और शाह पर उनसे विशेष आस्था रखते थे, बहा वलद कई बार मिंबर पर गये और उन्होंने उनकी किताब और उनकी आस्था की कड़े शब्दों में निंदा की।

कहा जाता है कि फख़्रे राज़ी बहा वलद से दिल में द्वेष रखते थे और इस बात के दृष्टि कि वह ख़्वारज़्मशाह के निकट प्रभाव रखते थे,  इसीलिए ख़्वारज़्मशाह और बहा वल्द के संबंध ख़राब हो गये। प्रमाणों से पता चलता है कि इमाम फ़ख़्र राज़ी और बहा वलद, इनमें से हर एक अपनी आस्था और अपने पथ का प्रचार कर रहा था और यह दिखाने का प्रयास करते थे कि उनके बीच मतभेद स्वाभाविक हों । गुरुओं के बीच मतभेद और झगड़े का मामला,  शिष्यों तक पहुंच गया और इसके बाद मतभेद की जो आग भड़की है उसको पूछिए मत।

अहमद अफ़लाकी अपनी पुस्तक मनाक़ेबुल आरेफ़ीन और अन्य लेखक लिखते हैं कि बहा वलद ख़्वारज़्मशाह से जो दुश्मनी रखते थे और ईरान पर मंगोलों के हमले की सूचना के बाद उन्होंने बल्ख़ से पलायन करने की ठान ली। फ़ूरूज़ानफ़र का मानना है कि पर में गोलों के ईरान के हमले के कारण मौलवी का परिवार ईरान से पलायन करने पर विवश हुआ। उनका मानना था कि अतीत की रिवायतों के बावजूद जिसकी इतिहास की दृष्टि से पुष्ट भी हो चुकी है, बहा वलद के बल्ख़ से पलायन का मुख्य कारण तातारियों के हमलों से होने वाले रक्तपात का भय था। रिवायतों में बताया गया है कि रक्तपात से बचने और निर्दयता के कारण बहुत से लोग स्वदेश छोड़ने पर विवश हो गये। किताबों में मिलता है कि बग़दाद शहर के बहुत से लोग किराए के घरों में बड़ी परेशानियों में जीवन बिताते थे जबकि पलायनकर्ता बहुत अधिक परेशान होते थे। (AK)

 

Jun २६, २०१८ १६:२७ Asia/Kolkata
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