राजनीति का मस्जिद से संबंध स्पष्ट चीज़ों में से है और आज के कार्यक्रम में हम इसी चीज के बारे में चर्चा करेंगे।

इसी प्रकार कार्यक्रम के दूसरे भाग में ईरान के इस्फ़हान नगर की प्रसिद्ध और एतिहासिक मस्जिद शैख लुत्फुल्लाह की चर्चा करेंगे। आशा है हमारा यह प्रयास भी आपको पसंद आयेगा।           

 

आपको अवश्य याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में इस ओर संकेत किया गया कि इस्लाम के उदय काल में मस्जिद राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र हुआ करती थी। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम बहुत से राजनीतिक मामलों का समाधान मस्जिद में करते थे। इस प्रकार उन्होंने व्यवहारिक रूप से दर्शा दिया कि राजनीति का मस्जिद से घनिष्ट संबंध है। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि इस्लाम धर्म में धोखा और अपने लक्ष्य को साधने के लिए हर हथकंडे का प्रयोग राजनीति नहीं है बल्कि अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सही व वैध प्रयास और इसी प्रकार ईश्वरीय आदेश को व्यवहारिक बनाये जाने को राजनीति कहते हैं। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार के प्रयास के लिए मज़बूत समर्थन की आवश्यकता होती है क्योंकि जब तक इंसान के पास इस प्रकार का समर्थन नहीं होगा तब तक वह गुमराही के बिना मज़बूती के साथ इस मार्ग में नहीं चल सकता। मस्जिद वह बेहतरीन स्थान है जहां इंसान में इस प्रकार की शक्ति उत्पन्न होती है।

मुसलमान जब सामूहिक व समन्वित ढंग से, पवित्र स्थल पर और एक समय में नमाज़ पढ़ते हैं तो उनकी सोच और उनके दिल एक दूसरे से निकट हो जाते हैं और उनके मध्य भाइचारे और दोस्ती का बंधन और मजबूत हो जाता है। इस प्रकार अनजाने में उनके मध्य आस्था और राजनीतिक समन्वय उत्पन्न होता है। साथ ही मस्जिद में उपस्थिति नमाज़ पढ़ने वालों में राजनीतिक जागरूकता में भी वृद्धि का कारण बनती है। सम- सामयिक घटनाओं व मामलों का जानकार इमामे जमाअत अर्थात सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ाने वाला समाज की परिस्थिति, लोगों की समस्याओं और अंतरराष्ट्रीय मामलों को बयान करके नमाज़ पढ़ने वालों की राजनीतिक जानकारी में वृद्धि करता है। इसी प्रकार मस्जिद में इकट्ठा होना और मुसलमानों के मध्य वार्तालाप भी उन्हें जागरुक बनाने में बहुत प्रभावी है। इसी प्रकार जो मुसलमान मस्जिद में इकट्ठा होते हैं उनमें जागरूकता, समय बोध और दुश्मन की पहचान जैसे विषयों की जानकारी की क्षमता अधिक हो जाती है।

 

मस्जिद में जाने का एक सुपरिणाम जागरूकता व चेतना है। इस्लाम धर्म की दृष्टि से निश्चेतना ऐसी बदतरीन स्थिति है जिससे मुसलमान ग्रस्त हो सकता है।

हर प्रकार की अचेतना को निश्चेतना कहते हैं चाहे वह महान ईश्वर से हो, समय से हो, स्थान से हो, राजनीतिक स्थिति से हो, सामाजिक हो या सांस्कृतिक स्थिति से हो। निश्चेत न होने का इतना अधिक महत्व है कि महान ईश्वर शबे मेराज को अर्थात उस रात को जब पैग़म्बरे इस्लाम आसमान पर गये थे उसके महत्व को बयान करता और पैग़म्बरे इस्लाम से बल देकर कहता है” हे अहमद कभी निश्चेतना की खाई में मत पड़ना, जो ईश्वर से निश्चेतना की खाई में गिरता है ईश्वर उस पर ध्यान नहीं देता है कि वह बर्बादी की किस खाई में गिर गया है”

पवित्र कुरआन के अनुसार निश्चेत इंसान का जीवन पशु की भांति बल्कि उससे भी बदतर होता है। जैसाकि महान ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरै आराफ की आयत नंबर 179 में कहता है” निश्चित रूप से इंसान और जिनों में से बहुतों को हमने नरक में डालने के लिए पैदा किया है उनके पास दिल व बुद्धि है परंतु न सोचते हैं न समझते हैं अपनी आंखों से देखते नहीं हैं कानों से सुनते नहीं हैं वे चौपायों की तरह हैं बल्कि उससे भी गुमराह। ये वही निश्चेत लोग हैं।“

पवित्र कुरआन की इस आयत के अनुसार इंसान और पशु के जीवन की सीमा निश्चेतना और जागरूकता है। पवित्र कुरआन की इस आयत में इंसान को जो चौपायों कहा गया है वह बहुत अर्थपूर्ण है। इससे यह नतीजा निकलता है कि निश्चेत इंसान हमेशा दूसरों के हाथों के खिलौना है। निश्चेत इंसान सोचे समझे बिना दूसरे की सेवा में रहते है जबकि एक मानवीय जीवन के लिए स्वतंत्रता व स्वाधीनता होनी चाहिये और साथ ही जागरुकता भी ज़रूरी है।

 

मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह इस्फहान की प्रसिद्ध व ऐतिहासिक मस्जिद है। इस मस्जिद का निर्माण 11वीं शताब्दी हिजरी कमरी में शाह अब्बास प्रथम के आदेश से हुआ है। इस मस्जिद के निर्माण में 18 वर्ष का समय लगा। यह मस्जिद वास्तुकला और टाइल्स के काम की दृष्टि से अद्वितीय है। यह मस्जिद नक्शे जहान नामक चौराहे के पूर्वी कोने पर और अली कापू इमारत के सामने और इमाम ख़ुमैनी मस्जिद के पास में है। यह मस्जिद दर्शकों के लिए अपनी सुन्दरता का जलवा बिखेरती है। बहुत से लोगों का मानना है कि यह मस्जिद दूसरी मस्जिदों की भांति केवल एक मस्जिद की भूमिका नहीं निभा रही है। इस मस्जिद के वास्तुकार ने इस मस्जिद में इस प्रकार का वातावरण उत्पन्न कर दिया है कि दूसरे धर्मों के अनुयाइयों का भी ध्यान इस मस्जिद में ईश्वरीय प्रकाश और परिज्ञान की ओर जा सकता है।

जब मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह की ओर देखते हैं तो सबसे पहले जिस ओर ध्यान जाता है वह यह है कि गुंबद के साथ इस मस्जिद में मीनार नहीं हैं जबकि दुनिया की जितनी भी प्रसिद्ध मस्जिदें हैं उन सबमें मीनारे हैं और मीनार को मस्जिद का अभिन्न अंग समझा जाता है।

 

इस्लाम से पहले जो मीनारों का निर्माण होता था उनका प्रयोग पथ- प्रदर्शन के लिए होता था और जहां मीनार होती थी वह इस बात का सूचक होती थी कि वहां एक नगर है परंतु इस्लाम आ जाने के बाद मीनार मस्जिद की पहचान में परिवर्तित हो गयी और वहां से अज़ान देकर लोगों को नमाज़ के लिए बुलाया जाता है परंतु चूंकि मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह केवल शाही परिजनों और दरबारियों के लिए उपासना स्थल थी इसलिए उसमें मीनार नहीं बनाया गया ताकि सामान्य लोग इस मस्जिद में न आयें। यहां तक कि सफवी काल में जो पर्यटक इस्फहान की यात्रा पर आये थे उन्होंने भी इस बारे में कुछ अधिक नहीं लिखा है और न ही इस संबंध में लिखित अधिक चीज़ें मौजूद हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि यह मस्जिद, मस्जिदे इमाम खुमैनी के पास है और मस्जिद इमाम खुमैनी काफी बड़ी है और उस पर लोग अधिक ध्यान देते थे जिसकी वजह से मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह में मीनार का निर्माण नहीं किया गया। मीनार निर्माण न करने का दूसरा कारण यह हो सकता है कि मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह दरबारियों के लिए विशेष थी और दूसरों को उसमें जाने की अनुमति नहीं थी।

 

मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह जहां टाइलों के काम का अद्वितीय नमूना है वहीं वास्तुकला का भी बेजोड़ उदाहरण है। इस मस्जिद का निर्माण उस समय किया गया था जब इस्फहान में चहार बाग़ और बाग़े हज़ार जरीब का निर्माण आरंभ हुआ था। यह मस्जिद इस्फहान नगर के दक्षिण में और सफ्फा नामक पर्वत के आंचल में स्थित है। इसी प्रकार यह मस्जिद चहार बाग नाम रोड के अंत में है। याद रहे कि इस समय चहार बाग नाम के रोड़ का अस्तित्व नहीं है और जब सफवी काल की वास्तुकला अपने शिखर पर थी तब इस मस्जिद का निर्माण पूरा हुआ और उससे लाभ उठाया जाने लगा। कहा जाता है कि मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह के निर्माण से पूर्व वहां पुराने ज़माने की एक मस्जिद का खंडहर था उसी पर इस मस्जिद का निर्माण किया गया है।

 

एतिहासिक दृष्टि से मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह का निर्माण शैख़ लुत्फुल्लाह मैसी की याद में किया गया है। शैख लुत्फुल्लाह बिन अब्दुल करीम या शैख लुत्फुल्लाह जबले आमिल शैख लुत्फुल्लाह मैसी के नाम से मशहूर हैं और वह लेबनान के मैसुल जबल के एक विद्वान और धर्मशास्त्री थे। ईरान में सफवी शासकों ने शीया धर्म का बहुत प्रचार- प्रसार किया। उनके इसी प्रयास के परिप्रेक्ष्य में वह लेबनान से ईरान आये थे। शाह अब्बास ने शैख लुत्फुल्लाह के ज्ञान की चर्चा सुन रखी थी इसलिए शीया धर्म के प्रचार -प्रसार के लिए उसने उन्हें लेबनान से इस्फहान बुलाया। जब वह इस्फहान आकर रहने लगे तो शाह अब्बास ने इस्फहान में एक मस्जिद और मदर्से के निर्माण का आदेश दिया और जब मस्जिद का निर्माण पूरा हो गया तो वह शैख लुत्फुल्लाह के धार्मिक शिक्षा देने से विशेष हो गयी। इसी प्रकार शैख लुत्फुल्लाह इस मस्जिद में नमाज़े जुमा भी पढ़ाने लगे।

 

इतिहासकारों, पूर्व विशेषज्ञों और विश्व के पूरातनवेत्ताओं के अनुसार मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह ईरान की प्राचीन सुन्दर सभ्यता व संस्कृति का बेजोड़ प्रतीक है। ईरान और पूर्व विशेषज्ञ प्रसिद्ध अमेरिकी प्रोफेसर आर्थर अपेम पोप अपनी किताब “ए सर्वे आफ परशियन आर्ट” में इस मस्जिद के बारे में इस प्रकार लिखते हैं” जो मस्जिद शाह चौराहे के पूरब में और आली कापू इमारत के सामने है वह वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है जो समूचे एशिया में अद्वितीय है। यह सुन्दर मस्जिद ईरानियों की वास्तुला के इतिहास में रत्न की भांति चमक रही है और इसका नाम मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह है। शाह अब्बास ने इस मस्जिद का निर्माण अपने ससुर शैख लुत्फुल्लाह की याद में करवाया था। शैख लुत्फुल्लाह अपने समय के एक प्रसिद्ध व महान विद्वान थे। शाह अब्बास ने इस मस्जिद का निर्माण एक पुरानी मस्जिद के खंडहर पर करवाया था।  वास्तव में जो बड़ा चौराहा है और उसके एक किनारे आली कापू की भव्य इमारत है उसे इस प्रकार के मूल्यवान रत्न की आवश्यकता थी और शायद इसी वजह से शाह अब्बास ने इस मस्जिद का निर्माण कराके चौराहे की सुन्दरता को परिपूर्णता तक पहुंचाया।“

 

अमेरिकी प्रोफेसर पोप एक अन्य स्थान पर कहते हैं” इस मस्जिद में छोटा सा भी कमज़ोर बिन्दु दिखाई नहीं पड़ता है। मस्जिद का जो नक्शा है वह बहुत ही सुन्दर है, यह मस्जिद सौन्दर्यबोध का उत्कृष्टम नमूना है। इस मस्जिद के निर्माण का स्रोत धार्मिक ईमान और आसमानी प्रेरणा के अतिरिक्त कुछ और नहीं हो सकता। जो गहरी सोच रखता है एसा हो ही नहीं सकता कि वह इस मस्जिद के शांत और सुन्दर वातावारण को निकट से न देखे।

जिन लोगों ने इस्फहान की इस मस्जिद को निकट से देखा है और उसके बारे में बहुत कुछ लिखा है उनमें से एक विश्व के प्रसिद्ध वास्तुकार लुईस कान है। वह मस्जिदे शैख लुत्फुल्लाह के बारे में इस प्रकार लिखते हैं” मैं केवल कल्पना की दुनिया में सोने और चांदी से बने इस प्रकार के नमूने की कल्पना कर सकता हूं”।

 

ईरानी अध्ययन व शोधकर्ता डाक्टर मोहम्मद अली इस्लामी भी इस मस्जिद के हाल की सुन्दरता को इस प्रकार बयान करते हैं” मस्जिद का हाल इतना अधिक सुन्दर है कि उसकी सुन्दरता को केवल हाफिज़ के शेरों में देखा जा सकता है।“

 

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Jun २७, २०१८ १४:४२ Asia/Kolkata
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