हमने ईरान में वास्तुकला में ईरानी कलाकारों की भूमिका का उल्लेख करते हुए बताया था कि प्राचीन काल में राजा-महाराजा, अपने शासन की प्रशंसा तथा शत्रुओं को डराने के लिए विभिन्न प्रकार की शैलियां अपनाते थे जिनमें से एक शैली, वास्तुकारों का प्रयोग था।

हख़ामनशी दरबार में वास्तुकारों को बुलकार उन्हे आदेश दिया गया कि वे राजाओं के वैभव और उनके वर्चस्व को प्रदर्शित करने के लिए भव्य महलों का निर्माण करें। 

ईरान के एक बड़े भूभाग पर सिकंदर महान के आक्रमण के बाद इस देश का बड़ा हिस्सा, सिकंदर के सेनापतियों के नियंत्रण में चला गया।  हालांकि ईरान के बड़े हिस्से पर यूनानियों के नियंत्रण के बावजूद ईरान पर यूनान की संस्कृति ग़ालिब नहीं आ सकी।  इसका मूल कारण यह है कि यूनानी, अनेकेश्वरवाद के पक्षधर थे।  इसकी तुलना में ईश्वर के बारे में ईरानियों की विचारधारा अलग थी।  वे लोग ईश्वर को ज्ञान, बुद्धि और शक्ति का प्रतीक मानते थे।  इन विरोधाभासी विचारधाराओं के कारण उनकी संस्कृतियों में निकटता, लगभग असंभव थी।  इसी प्रकार से ईरानी, यूनानियों को अतिक्रमणकारी और हत्यारा मानते थे जिसके कारण उनके बीच दोस्ती और मित्रताकी संभावना कम थी।  यूनानी शासकों के काल में इन शासकों ने रहने के लिए ईरानी नगरों के बाहर अपने क़िले बनवाए थे।  यूनानियों के यह क़िले ठीक उसी प्रकार के होते थे जैस वर्तमान समय में काम्पलेक्स होते हैं।  इन क़िलों में रहने के साथ ही यूनानी अपने धार्मिक संस्कार भी यहीं पर संपन्न किया करते थे।  उस काल में यूनानी अपने भगवानों की जो मूर्तियां बनाया करते थे उनमें से कुछ के अवशेष, पश्चिमी ईरान में पाए गए हैं।

सलूकियों पर पार्त या पारसियों की विजय के बाद अशकानी शासन श्रंखला के अस्तित्व में आने के साथ ही यूनानियों के बहुत से अवशेष नष्ट हो गए।  इसके स्थान पर ईरान की नई वास्तुकला फलने-फूलने लगी।  वर्तमान इशक़ाबाद के निकट स्थित नगर "नसा" या "नैसा" को राजधानी के रूप में चुना गया।  इस बात के दृष्टिगत विगत में पार्त या पारसी क़बीले, पशुपालन और कृषि के काम किया करते थे।  इन लोगों ने आरंभिक काल में बहुत ही साधारण वास्तुकला शैली को अपनाया।  उस काल की वास्तुकला में बनाए जाने वाले घरों का नक्शा यह होता था कि घर के बीच में आंगन होता था जिसके चारों ओर दालान बना होता था।

अशकानी शासन के विकसित हो जाने के साथ ही वास्तुकला में इमारतों के बाहरी भाग की बनावट पर विशेष ध्यान दिया गया।  दीवारों पर पेंटिंग का चलन आरंभ हुआ।  इसका स्पष्ट उदाहरण दक्षिण पूर्वी ईरान में स्थित "माबदे कूहे ख़ाजा" में पाया जाता है।  अशकानियों के काल की वास्तुकला में गहरी ताक़ों, स्तंभों और गोलाकार दरों का प्रयोग होने लगा था।  पार्तियों की वास्तुकला का उत्कृष्टि नमूना, "आनाहीता" उपासनागृह हैं जो पश्चिमी ईरान में स्थित है।  पार्तियों या पारसियों की वास्तुकला में कच्ची ईंटें, पत्थर और पक्की ईंटों का प्रयोग मूल रूप से किया जाता था।  इस काल में जो ना नगर बनाए गए वे गोलाकार थे।  नगर के चारों और ऊंची-ऊंची दीवारें बनाई जाती थीं।  गोलाकार नगरों के निर्माण की शैली, जिनके इतिहास के बारे में स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, भवन निर्माण सामग्री कम लगती थी।

ताक़े कसरा

 

ईरान के सीस्तान प्रांत में हामून झील के बीच में स्थित टापू पर कूहे ख़ाजे के नाम से बना बड़ा महल और उपासना स्थल, उस काल की कला का एक उत्कृष्टि नमूना है।  इस महल के दरवाज़े लकड़ी के थे।  इसमें बड़े-बड़े हाल बने हुए थे।  महल में अग्निकुण्ड भी था।  इस महल पर पीले, हरे, लाल, नीले और कत्थई रंगों से चित्रकारी की गई थी जो उस काल के कलकारों की दक्षता को बताते हैं।

यदि हम पार्तियों या पारसियों के काल की वास्तुकला की विशेषताओं का उल्लेख करना चाहें तो यह कह सकते हैं कि स्थानीय भवन निर्माण वस्तुओं का अधिक से अधिक प्रयोग, गुंबद बनाने में उस कालकी आधुनिक तकनीक का प्रयोग, अधिक ऊंची इमारत बनाने से बचना और डिज़ाइनिंग में विविधता आदि उस काल में प्रचलित था।  इस काल की विशेष बात यह थी कि पेंटिंग और पत्थर पर गुदाई जैसे काम में महिलाओं की योग्ताओं का भी प्रयोग किया गया था।  इन चित्रों में महिलाओं को लंबे कपड़ों में दिखाया गया है।  यह महिलाएं क़बाएं पहनी हुई हैं।  यह महिलाएं, कहीं-कहीं पर सिर पर पट्टी बांधे हुए हैं।  इन बातों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्राचीनकाल में ईरान में पर्दे का चलन रहा है।

हख़ामनशी, सलूकी और पार्तों के काल की कला, का आरंभ सासानी काल से शुरू हुआ।  उस काल में राष्ट्रवाद की भावना पाई जाती थी।  सासानी काल की वास्तुकला की कुछ विशेषताए हैं जैसे कला का विकास और पहाड़ों के पत्थरों पर गुदाई का काम।  जिन चित्रों को पत्थरों पर गोदकर उकेरा जाता था उनमें अधिकांश दरबार के चित्र हुआ करते थे।  उस काल के निर्माण में यथार्थवाद और प्रकृति से निकटता को अधिक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

ईरान के भीतर केरमानशाह और आज़रबाईजान एसे क्षेत्र हैं जहां पर सासानी शासनकाल की वास्तुकला के बहुत से नमून मौजूद हैं।  सामान्यतः यह नमूने या अवशेष, पत्थरों पर उकेरे गए चित्रों के रूप में हैं।  इन चित्रों के ऊपर या किनारे पर इनके बारे में विस्तार से लिखा हुआ है।  इनको फारसी भाषा में लिखा गया है।

सासानी काल के अन्तिम सम्राट का नाम ख़ुसरो द्वितीय था।  उसके काल के जो अवशेष इस समय हैं वे पश्चिमी ईरान में मौजूद हैं।  इनमें सबसे महत्वपूर्ण, महल की दीवारों पर की गई गुदाई है।  इस अवशेष में अर्ध चंद्रमा के आकार का एक चित्र पत्थर पर गुदा हुआ है जिसके भीतर महल का हाल बना हुआ है।  इस हाल के पीछे की दीवार, दो भागों में बंटी हुई है।  ऊपर के भाग में दिखाया गया है कि एक औपचारिक समारोह में राजा को ताज दिया जा रहा है।  इस दृश्य के तीन चित्र, तीन स्तंभों पर बने हुए हैं।  इसमें एक घटना को दलदल तथा बंसवाड़ी में दिखाया गया है।  चित्र में राजा और उसके साथी एक नाव से शिकार करते हुए दिखाई दे रहे हैं।  इनके किनारे पीछे की ओर कुछ लोगों को हाथियों पर सवार और कुछ ढोल बजाने वालों को दिखाया गया है।  चित्र में जितनी सफाई से जानवरों के शरीर को दिखाया गया है वह वास्तव में प्रशंसनीय है।

 

सासान के काल की वास्तुकला केवल महलों के चित्रों तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें घरों, अग्निर्कुंडों, धर्मशालाओं और क़िलों को भी पेश किया गया है।  उस काल की वास्तुकला में महलों के बाद जिन चीज़ों को अधिक प्रदर्शित किया गया वह अग्निकुण्ड हैं।  यह अग्निकुण्ड, सामान्यतः धार्मिक कार्यक्रमों का केन्द्र हुआ करते थे।  उस काल में ज़रतुश्ती, इन अग्निकुण्डों का प्रयोग करते थे और ज़रतुश्त, ईरान का आधिकारिक धर्म था।

वास्तुकला की दृष्टि से अग्निकुण्डों के निर्माण के कुछ विशेष नियम हैं।  इनको बनाने का नियम अपने आरंभिक काल से अबतक लगभग एक ही जैसा रहा है।  जो भी नया अग्निकुंड बनाया जाता था उसको पुराने के आधार पर ही निर्मित किया जाता था।  अग्निकुण्ड में आग जलाई जाती थी और ज़रतुश्तियों के धर्मानुसार वहां पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते थे।

सासानी काल की वास्तुकला की समीक्षा के दौरान "ताक़े कसरा" का उल्लेख भी ज़रूरी है जिसे "एवाने मदाएन" के नाम से भी जाना जाता है।  यह इमारत वर्तमान समय में तो इराक़ में स्थित है किंतु अति प्राचीनकाल में सासानी काल में इसका निर्माण ईरान के भौगोलिक क्षेत्र में किया गया था।  यही कारण है कि उसमें सासानी वास्तुकला की विशेषताएं स्पष्ट रूप में दिखाई देती हैं।  ताक़े कसरा एवाने मादएन एक महल था।  इस महल का महत्वपूर्ण भाग, उसका प्रवेष द्वार है।  इसे एक ऊंचे और विस्तृत क्षेत्र में बनाया गया है।  इसके पीछे आयताकार शक्ल में एक हाल बना हुआ है।  इसके केन्द्रीय भाग में कमरे, गलियारे और हाल बने हुए हैं जो एक गुंबद के नीचे बने हैं।  मुख्य हाल में प्रकाश, 150 खिड़कियों के माध्यम से आता है।  यह बड़ी इमारत, बिना किसी स्तंभ के एक दीवार पर बनी हुई है।  एसा लगता है कि इसके निर्माण के आरंभिक काल में चूने के काम से ललित कलाओं को प्रदर्शित किया गया था किंतु समय बीतने के साथ ही यह चीज़ें विलुप्त हो गईं।                                                                                                                                                       

 

Jun ३०, २०१८ १३:०१ Asia/Kolkata
कमेंट्स