बहाउद्दीन वलद मोहम्मद बिन हुसैन ख़तीबी उर्फ़ बहा वलद छठी व सातवीं हिजरी क़मरी में ख़ुरासान के बड़े आत्मज्ञानियों, उपदेशकों व सूफ़ियों में थे।

आप ही के बेटे जलालुद्दीन मोहम्मद मोलवी हैं जो जलालुद्दीन रूमी के नाम से मशहूर हैं। बहाउद्दीन वलद के पिता हुसैन बिन अहमद ख़तीबी थे जो अपने समय के बड़े विद्वानों में गिने जाते थे। बहा वलद का परिवार बल्ख़ में रहता था। बहा वलद 546 हिजरी क़मरी बराबर 1151 ईसवी में बल्ख़ में पैदा हुए जो उस समय विशाल ख़ुरासान का हिस्सा था। बहा वलद का ख़ानदान अपनी सदाचारिता के लिए मशहूर था।

बहा वलद ने भी अपने बाप दादा का अनुसरण करते हुए बल्ख़ में धर्म के उपदेशक व मुफ़्ती का पेशा अख़्तियार किया और वे भी अपने समय के उपदेशकों के रीति रिवाज के अनुसार, ख़ुरासान व ट्रैनसॉक्सियाना अर्थात तत्कालीन मध्य एशिया के शहरों, तुर्किस्तान, वख़्श, सग़द और ख़वारज़्म में उपदेश देने जाया करते थे। वह जहां जाते, जितने दिन ठहरते वहां की मस्जिद में उपदेश देते, मदरसों में पढ़ाते और सूफ़ियों की ख़ानक़ाह भी जाते थे। लोग उनके उपदेश बहुत शौक़ से सुनते थे। उनके क्लास में लोगों की भीड़ रहती थी। शायरों व लेखकों की जीवनियों में मिलता है कि बहा वलद ने, ख़ारज़्मशाह के अत्याचार से तंग होकर और ईरान पर मंगोलों के हमले की ख़बर से बल्ख़ से पलायन करने का फ़ैसला किया।                         

यह बात निश्चित तौर पर कहना बहुत मुश्किल है कि बहा वलद किस तारीख़ को ट्रैनसॉक्सियाना से निकले थे। मौलाना जलालुद्दीन कहते हैं कि 604 हिजरी क़मरी में ख़ारज़्मशाह के हाथों समरक़न्द की फ़तह के वक़्त वह अपने बाप के साथ थे। इसलिए पश्चिम की ओर बहा वलद का सफ़र इस तारीख़ के कुछ समय बाद शुरु हुआ होगा। उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र का मानना है कि मौलाना के काल में जो घटनाएं घटी हैं उनसे लगता है कि 610 हिजरी क़मरी बराबर 1214 ईसवी में बहा वलद ने पलायन किया है।

बहा वलद अपने परिवार के सदस्यों और कुछ श्रद्धालुओं के साथ हज के इरादे से बल्ख़ से निकल कर बग़दाद की ओर चल पड़े। बल्ख़ से निकलने वाला यह काफ़िला तातारियों के हमले के डर के साथ निशापूर पहुंचा जो विशाल ख़ुरासान के बिल्कुल पश्चिमी छोर पर स्थित शहर था। बहा वलद अभी रास्ते में थे कि उन्हें मंगोलों के बल्ख़ पर हमले और वहां लूटमार व जनसंहार की ख़बर मिली जिससे उनके मन पर बहुत असर हुआ। चूंकि बहा वलद हज के इरादे से निकले थे इसलिए वह निशापूर में ज़्यादा नहीं रुके लेकिन उनके लिए इस शहर में न रुकना भी मुमकिन न था क्योंकि इस शहर में उनके बहुत से दोस्त रहते थे। इसके अलावा निशापूर में वे लोग भी थे जिन्होंने बल्ख़, तिर्मिज़, वख़्श और समरक़न्द में बहा वलद को देखा था, वे निशापूर में बहा वलद की क्लास व उपदेश की बैठकों को याद किया करते थे।

 

उन दिनों निशापूर में बहुत ही बेचैनी भरा माहौल था। इससे पहले भी निशापूर पर ख़ारज़्मशाह और उसके विरोधी हमले कर चुके थे। अनेक बार निशापूर दुश्मनों के हमले से तबाह हुआ था लेकिन इस बार इस शहर में बहुत ज़्यादा डर का माहौल था।

नवीं हिजरी के शायर दौलतशाह समरक़न्दी के अनुसार, बहा वलद इतने मशहूर थे कि जब यह ख़बर निशापूर पहुंची की बहा वलद अपने परिवार के सदस्यों के साथ निशापूर पहुंच रहे हैं तो मशहूर शायर व आत्मज्ञानी शैख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार उनसे ख़ुद मुलाक़ात के लिए गए। दोनों आत्मज्ञानियों ने हज तथा महापुरुषों के दर्शन जैसे विषयों पर बातचीत की। उन सूफ़ियों व धर्मगुरुओं को याद किया गया जिनका उल्लेख अत्तार अपनी किताब तज़केरतुल औलिया में कर चुके हैं। सनाई की शायरी और अत्तार की शायरी के अंदाज़ पर चर्चा हुयी। अत्तार भी बहा वलद की तरह शायरी में सनाई को पसंद करते थे और अत्तार की शायरी की शैली में सनाई की झलक दिखती है। इन सभी बैठकों में जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी अर्थात मौलाना रोम मौजूद थे हालांकि उस वक़्त मौलाना रोम की उम्र कम थी लेकिन वह बहुत ही बुद्धिमान थे। इस मुलाक़ात में शैख़ अत्तार निशापूरी बहा वलद के बेटे मौलाना रोम से बहुत प्रभावित हुए। वह मौलाना रोम के आत्मोत्थान व गहरी सोच से भरे व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए। इस छोटी सी मुलाक़ात में अत्तार निशापूरी यह बात समझ गए कि मौलाना रोम कोई आम उपदेशक, आम धर्मगुरु या आम सूफ़ी नहीं होंगे। अत्तार बहा वलद के इस बेटे को जो अभी भी छोटा था, आम इंसानों से हट कर इंसान देख रहे थे और उन्होंने बहा वलद को शुभसूचना दी कि जल्द ही यह बच्चा पूरी दुनिया में अपने ज्ञान का डंका बजाएगा। अत्तार निशापूरी ने असरारनामे नामक अपनी मस्नवी की एक प्रति जो उन्होंने जवानी में कही थी, इस बच्चे को भेंट की।                 

बहा वलद के सामने अभी रास्ता बहुत लंबा था। उनके क़ाफ़िले में 300 से ज़्यादा लोग थे। यह क़ाफ़िला एक के बाद एक शहर पीछे छोड़ता जा रहा था। रास्ते में ऐसे शहर भी थे जहां तातारियों के हमले के डर की वजह से चिंता का माहौल था लेकिन इसके बावजूद भी यह क़ाफ़िला चलता रहा। ऐसा क़ाफ़िला जो हज के इरादे से निकला था और उसके बल्ख़ लौटने की कोई उम्मीद न थी। बहा वलद का क़ाफ़िला लंबा सफ़र तय करके बग़दाद पहुंचा। जामी नफ़हातुल उन्स किताब में लिखते हैं कि जब बहा वलद बग़दाद पहुंचे तो कुछ लोगों ने पूछा कि यह किस संप्रदाय के लोग हैं? कहां से आए हैं और कहां जाने का इरादा रखते हैं तो मौलाना रोम ने जवाब दिया, ईश्वर के संप्रदाय हैं, ईश्वर की ओर जा रहे हैं और ईश्वर के सिवा कोई शक्ति नहीं। जब यह बात शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी को पता चली जो उस समय ज़न्जान के विद्वानों में थे, तो उन्होंने कहा, “वह बहाउद्दीन बल्ख़ी के सिवा और कौन हो सकता है।” जामी आगे लिखते हैं कि शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी बहा वलद के स्वागत के लिए गए। जब उनके निकट पहुंचे तो घोड़े से उतर गए और बहा वलद के घुटनों को चूमा और उनसे अपनी ख़ानक़ाह चलने के लिए निवेदन किया। लेकिन बहा वलद ने मदरसे को प्राथमिकता दी और अपने साथियों के साथ मदरसे में ठहर गए।

शैख़ शहाबुद्दीन सोहरावर्दी ने बहा वलद से निवेदन किया कि वे बग़दाद में ख़ुरासान के मौजूद मुसाफ़िरों, निवासियों, हाजियों व सूफ़ियों के लिए उपदेश की सभा आयोजित करें। बहा वलद ने इस निवेदन को स्वीकार किया क्योंकि रास्ते में पड़ने वाले शहरों में उन्हें इस बात का मौक़ा नहीं मिला था। इतिहास में है कि बग़दाद का शासक जिसे ख़लीफ़ा कहा जाता था, वह भी बहा वलद की प्रवचन सभाओं में भाग लेता था। थोड़े ही समय में बहा वलद की सभाओं में बड़ी संख्या में लोग आने लगे। शहाबुद्दीन सोहरावर्दी ने बहा वलद से शाम का दौरा करने की अनुशंसा की। उन दिनों शाम पर सल्जूक़ी श्रंख्ला का एक परिवार हुकूमत करता था। सोहरावर्दी अलाउद्दीन कुक़बाद के दरबार में रह चुके थे और उसे वह ज्ञान व धर्म का संरक्षक जानते थे। बहा वलद और उनके परिवार के लिए बग़दाद में ज़िन्दगी कठिन थी इसलिए बहा वलद ने दोबारा सफ़र शुरु किया। उसी साल ख़ुरासान व इराक़ के वासियों के लिए हज करना मुमकिन न हो सका। बहा वलद ने अपने पलायन के शुरु के साल शाम के आस-पास के इलाक़ों में गुज़ारे। हज करने के बाद बहा वलद एशिया मानइर के पूर्वी क्षेत्रों के शहरों का दौरा करते और वहां प्रवचन देते थे। इस क्षेत्र में सीरिया और बग़दाद के विपरीत फ़ारसी भाषा का चलन था। फ़ारसी भाषा बोल चाल, पढ़ने लिखने की भाषा थी इसलिए बहा वलद की प्रवचन सभाओं को लोग बहुत पसंद करते थे।

 

Jul ०२, २०१८ १३:२२ Asia/Kolkata
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